संपादकीय सितंबर  2021 : हिंदी की आत्मपहचान कितनी सुरक्षित है

संपादकीय सितंबर 2021 : हिंदी की आत्मपहचान कितनी सुरक्षित है

शंभुनाथ कोई भाषा जब आत्मपहचान खोती है तो वह पहले भीतर से दरिद्र होती है। उसमें ज्ञान और संवेदना का ह्रास होने लगता है। हिंदी का सिद्ध-नाथों से लेकर कबीर-तुलसी और भारतेंदु-प्रेमचंद-निराला से होते हुए आज तक एक बुद्धिदीप्त, समावेशी और हृदय की भाषा के रूप में विकास होता...
अफ़ग़ानिस्तान की बेटियां

अफ़ग़ानिस्तान की बेटियां

आज़ाद हवाओं में सांस लेने वालों के लिए कविता एक शगल हो सकती है, लेकिन बारूदी धुएँ से घुटी फिज़ाओं वाले अफगानिस्तान जैसे देशों में कवि होना, गुमनामियों और मौत को दावत देना है। खासतौर पर तब, जबकि आप एक स्त्री हों। लेकिन मायने तो इसी बात के हैं कि जब मौत सामने खड़ी हो तब आप...
शब्दों की आड़ में अर्थों का दुखांत : उपमा ऋचा

शब्दों की आड़ में अर्थों का दुखांत : उपमा ऋचा

पिछले एक दशक से लेखन में सक्रिय। संप्रति स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक ‘शब्दों पर बात करने के लिए शब्दों का प्रयोग करना ठीक वैसा ही है जैसा कि पेंसिल का चित्र बनाने के लिए पेंसिल का इस्तेमाल करना। एक निहायत ही मुश्किल, पेचीदा और गुमराह करने वाली कवायद!’...
दो कविताएं : अनवर शमीम

दो कविताएं : अनवर शमीम

दो काव्य संग्रह ‘यह मौसम पतंगबाज़ी का नहीं है’ एवं ‘अचानक कबीर’ प्रकाशित। संप्रति – स्वतंत्र लेखन। सफ़ेद ख़ाली पन्ने उसे याद आएयुद्ध में गिराए गए बमों से ज़ख़्मीलहूलुहान बच्चेजिन्हें उसने थोड़ी देर पहले हीटी.वी. पर रोते-बिलखते देखा था दूसरे दिन...
उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उन्हें वर्तमान राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। वे आज  एक चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन करने आए थे। सबसे पहले सतपाल जी से मिले । स्वाभिमानी सतपाल जी ने अपने बारे में इतना ही बताया था –  ‘सर, पिछले दस वर्षो से मैंने सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर...