संपादकीय नवंबर 2020 : अब क्या खोना बाकी है !

संपादकीय नवंबर 2020 : अब क्या खोना बाकी है !

शंभुनाथ ‘भूल जाना मेरे बच्चे कि खुसरो दरबारी था / या वह एक ख्वाब था / जो कभी संगीत, कभी कविता, कभी भाषा, कभी दर्शन बनता था।’ (कुंवर नारायण) यदि कभी खड़ी और ब्रजभाषा के कवि खुसरो का कुछ लिखा हुआ सामने आए तो क्या हम पहचान पाएंगे उस ‘हिंदी की तूती’ को?...
शंकरानंद की तीन कविताएं

शंकरानंद की तीन कविताएं

      युवा कवि। अब तक तीन कविता संग्रह। स्त्री के हाथ तमाम रेखाएं धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती हैं जो कुछ कोमल है वह घिस जाता है समय के साथ जिसे देखा था और पहचान गया था उंगलियों से अब वे उंगलियाँ धूसर हो गई हैं उन्हें थामता हूँ तो लगता है न जाने कितनी...
युद्ध और बच्चे : उषा दशोरा

युद्ध और बच्चे : उषा दशोरा

      काव्य संग्रह – ‘भाषा के सरनेम नहीं होते’। संप्रति अध्यापन। 1. जब युद्ध की घोषणा हुईतब  हँसते हुए बच्चेफूल वाले पौधों को पानी दे रहे थे उनकी हँसी के भार से डरी कई बंदूकेंपौधों के पीठ के पीछे जा छुपींउनमें फूल के बीज होने की जिद होने लगीजिद थी  कि...
कटोरे में चाँद : शिरोमणि महतो

कटोरे में चाँद : शिरोमणि महतो

          ‘महुआ’ पत्रिका का संपादन। अद्यतन कविता संग्रह ‘चाँद से पानी.    एक दिन सोचाबचपन के दिनों कोयाद किया जाएआँगन में बैठकरकटोरे में पानी भरकरदेखा जाए – चाँद को कटोरे के पानी मेंमुझे दिखा चाँदथका-हारा सामंदा-मंदा सा क्या पानी है...
स्मृतियाँ मरतीं नहीं : राजेंद्र नागदेव

स्मृतियाँ मरतीं नहीं : राजेंद्र नागदेव

        कवि, चित्रकार, वास्तुकार। अद्यतन कविता संग्रह् ‘सुरंग में लड़की’। अंदर की दुनिया में बेआवाज़ बहुत बोलते हैं हमअक्सर मैं अवकाश या बिना अवकाश के समय भीअपने अतीत से बातें करता हूँ वहाँ अब मुझे वह कौआ कहीं दिखाई नहीं देताजो  दो खंभों के बीचझूलती...