युवा गजलकार। जयप्रकाश विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। कुछ साझा संकलनों में गजलें प्रकाशित।

गजल

1.
चलो, कुछ तो है जो कि सारा मिला है
हमें मुश्किलों का पिटारा मिला है

कहीं जो मुकद्दर का मारा दिखा तो
लगा कोई हमको, हमारा मिला है

फंसी थी भंवर में ये कश्ती हमारी
मिले आप जैसे, किनारा मिला है

किसे मिल सका है ये बीता हुआ कल
यहां वक्त किसको दुबारा मिला है

बहुत लोग हैं, पर अकेला पड़ा तो
मुझे सिर्फ अपना सहारा मिला है।

2.
चलती है साथ में बेड़ियां आज भी
कैद में जी रहीं बेटियां आज भी

कौन लेगा भला कोई उनकी खबर
जिनके हिस्से नहीं रोटियां आज भी

रौशनी के लिए हर किसी को यहां
हैं मयस्सर कहां खिड़कियां आज भी

राजतंत्र अब नहीं तंत्र है लोक का
हैं मगर दास और दासियां आज भी

मेरी गजलों का लहजा अलग क्योंकि है
चांद से पहले हैं रोटियां आज भी।

संपर्क :ग्राम+पोस्ट : अहियापुर, प्रखंड : साहेबगंज, मुजफ्फरपुर843125 (बिहार) मो. 9931330923