आप एक दूसरे व्यक्ति भी हैं

एलिस मुनरो
(1931-2024) कनाडा की नोबेल पुरस्कार प्राप्त विख्यात कथाकार। कनाडा के जीवन, खासकर स्त्री जीवन पर विपुल कहानी लेखन।
लेखक हमेशा बेवफाई के बारे में लिखते रहते हैं। यह बहुत नाटकीय होता है। बेवफाई की दुष्टता, गोपनीयता और जटिलताओं से पता चलता है कि आप स्वयं को एक व्यक्ति समझते हैं, लेकिन आप एक दूसरे व्यक्ति भी हैं। दो किस्म की जिंदगियांहोती हैं: सरल-सीधी जिंदगी और दोषपूर्ण जिंदगी। एक लेखक के लिए इसमें बहुत सारी चीजें होती हैं। मुझे नहीं लगता कि ये चीजें कभी नहीं होंगी।
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समय एक ऐसी चीज है जिसमें मेरी बहुत रुचि है: अतीत और वर्तमान… और लोगों के बदल जाने के बाद कैसा दिखाई देता है अतीत।
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घर के कामों से मुझे कभी परेशानी नहीं हुई…बाद में इस बात से मुझे परेशानी हुई कि ये चीजें आपकी जिंदगी से अपेक्षित हैं… जब आप गृहिणी हैं तो आपके सामने लगातार अवरोध आते हैं। आपकी जिंदगी में खुद आपके लिए कोई जगह नहीं होती। क्या यह सच नहीं कि आपने कपड़े धोए!
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मुझे लगता है कि जो लोग अक्सर भागते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो किसी काम में जोश से लगे होते हैं, फिर वे अधिक की चाह रखते हैं। जो उन क्षणों में हो रहा है वे अपने जीवन में उससे अधिक की मांग करते हैं। कभी-कभी यह एक बड़ी गलती होती है क्योंकि वह हमेशा पर्याप्त होता है, हालांकि आपकी अपेक्षाओं से अलग।
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अब मुझे अच्छी तरह जमकर लिखे गए उपन्यासों के प्रति आकर्षण महसूस नहीं होता। मैं ऐसी कहानियां लिखना चाहती हूँ जो गहन अनुभव के क्षण दें, भले वे आपसे जुड़े हों अथवा न हों। मुझे लगता है मैं जीवन को इसी तरह देखती हूँ। लोग धीरे-धीरे स्वयं को नया रूप देते रहते हैं और ऐसी चीजें करते रहते हैं जो उन्हें समझ में नहीं आतीं।
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मैं बी ग्रेड की गृहिणी थी, शायद बी माइनस। मैं समय मिलने पर भी एक वाक्य पूरा नहीं कर पाती थी। मुझे चिंता के दौरे पड़ते थे। आंशिक रूप से यह स्थिति को व्यक्त करने का तरीका था क्योंकि मैं कई बार सांस तक नहीं ले पाती थी। मैं लोगों और कर्तव्यों से घिरी रहती थी। मैं गृहिणी और बच्चों की मां थी। मुझे हमेशा इस आधार पर आंका जाता था कि मैं इन भूमिकाओं को किस तरह से निभाती हूँ।
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मैं तरह-तरह से जीवन भर व्यक्तिगत कहानियां लिखती रही हूँ।
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स्वाभाविक रूप से मेरी कहानियां स्त्रियों के विषय में हैं। मैं एक स्त्री हूँ। जो अधिकतर पुरुषों के बारे में लिखते हैं उनके लिए क्या शब्द है मुझे नहीं मालूम। ‘नारीवादी’ का क्या अर्थ है, इस बारे में भी मैं हमेशा सुनिश्चित नहीं हूँ। शुरुआत में मैं कहती थी, ठीक है, बेशक मैं नारीवादी हूँ। लेकिन यदि इसका यह अर्थ है कि मैं एक तरह से नारीवादी सिद्धांत का पालन करती हूँ तो फिर मैं नारीवादी नही हूँ।
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मैं कभी किसी सुनियोजित थीम या इरादे के साथ शुरुआत नहीं करती। चीजें बस चली आती हैं, जिस तरह से उन्हें आनी होती हैं। मैं यह कभी नहीं सोचती कि मैं क्या लिखने जा रही हूँ या मैं किस बारे में लिख रही हूँ या मैं किस बारे में लिखने की कोशिश कर रही हूँ। जब मैं लिख रही होती हूँ तो बस उस कहानी के बारे में सोचती हूँ जो मैं कहना चाहती हूँ।
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किसी युवा लेखक को सलाह देना संभव नहीं है क्योंकि हर युवा लेखक अलग होता है। आप कह सकते हैं- पढ़ो, लेकिन एक लेखक बहुत ज्यादा पढ़कर पंगु हो सकता है। अथवा- मत पढ़ो, मत सोचो, बस लिखो और इसका परिणाम महाबकवास भी हो सकता है!
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लोग अब शहरों और जीवन के तौर-तरीकों के बारे में अधिक जागरूक हैं। मुझे लगता है कि मैं जो भी लिख रही हूँ वह थोड़ा पुराना है, और मैं आश्वस्त नहीं हूँ कि यदि मैं अभी लिखना शुरू करती तो क्या मैं वैसा ही लेखन करती।
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शायद मुझे स्मृति बहुत रुचिकर लगती है क्योंकि मुझे लगता है कि हम सभी अपने जीवन की कहानियां स्वयं को और साथ ही दूसरों को बताते हैं। महिलाएं तो ऐसा करती ही हैं। वे ऐसा बहुत करती हैं। मुझे लगता है कि जब पुरुष बड़े हो जाते हैं तो वे भी ऐसा करते हैं, लेकिन शायद उनका तरीका थोड़ा अलग होता है।
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मुझे लगता है कि कोई भी जीवन, कोई भी परिवेश दिलचस्प हो सकता है। मुझे नहीं लगता कि एक शहर में रहते हुए मैं और अधिक बहादुर हो सकती थी, सामान्यत: उच्चतर सांस्कृतिक स्तर पर लोगों से प्रतिस्पर्धा करते हुए।
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मैं एक बड़े सजावटी घर में रह चुकी हूँ, किंतु मैं कभी ऐसे घर में नहीं रहना चाहती जो मुझ पर हावी हो जाएं।
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मैं अंतराल पसंद करती हूँ। मेरी सभी कहानियों में अंतराल हैं। लोगों का जीवन भी इसी तरह से प्रदर्शित होता है।
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लेखन के शुरुआती दिनों में मेरे लिए महत्वपूर्ण था सुखद अंत। किसी भी तरह मैं अपनी नायिकाओं के लिए दुखांत बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। बाद में मैंने ‘वुदरिंग हाइट्स’ जैसी पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं। इनमें बहुत ही दुखद अंत होता था। इसलिए मैंने अपने विचारों को पूरी तरह बदला दिया और मैं दुखांत की ओर बढ़ गई, जिससे मुझे आनंद मिला।
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जब आप बड़े हो रहे होते हैं, तो आपको अपनी मां की इच्छाओं या जरूरतों से अलग होना पड़ता है। आपको अपने रास्ते खुद बनाने होते हैं और मैंने यही किया।
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बीस सालों में ऐसा कोई भी दिन नहीं आया जब मुझे किसी और की जरूरतों के बारे में न सोचना पड़ा हो। इसका मतलब है कि लेखन को इसके इर्द-गिर्द ही बैठाना होता है।
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मैं हमेशा पढ़ती रहती हूँ और जो मैं पढ़ती हूँ उसमें कुछ ऐसा होता है जिसका मुझपर असर पड़ता है।
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कुछ कहानियां जो मुझे पसंद हैं, वे एक विशेष समय और स्थान पर केंद्रित लगती हैं। वैसे इस बारे में कोई नियम नहीं है। किंतु जो कहानियां मैं पढ़ती हूँ उनको लेकर मेरे मन में एक साफ-सुथरी भावना बनती है। मेरी अपनी रचनाओं में भी एक लंबा समय होता है और इस समय के भीतर मैं आगे-पीछे होती रहती हूँ, और जिस तरह मैं ऐसा करती हूँ वह कभी-कभी बहुत सीधे तरीके से नहीं भी होता है।
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एक लंबे समय से मेरे मन में यह विचार था कि मैं एक निश्चित मात्रा में अपने काम अपनी क्षमता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ तरीके से करूंगी, फिर एक सुखद स्थिति में पहुंच जाऊंगी, और मुझे और अधिक लिखने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। मैं एक अलग व्यक्ति हो जाऊंगी। मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है कि ऐसा नहीं हुआ। आपका शरीर वृद्ध हो जाता है, मगर आपका मस्तिष्क वैसा ही रहता है।
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बालकृष्ण काबरा ‘एतेश’ कवि और अनुवादक।अद्यतन कविता संग्रह ‘छिपेगा कुछ नहीं यहां’। आरएच-61, एसेट्ज लीव्ज एंड लाइव्ज़, कोड़थी विलेज, वर्थुर होबली, ऑफ सारजापुर रोड, बेंगलुरु – 560035 मो. 9422811671 |

