
न्गूगी वा थ्योंगो
(1938-2025) अफ्रीका के प्रमुख उपन्यासकार, नाटककार और आलोचक। लेखन की शुरुआत अंग्रेजी में हुई, बाद में अपनी मातृभाषा गिकुयू को अपनाया। प्रमुख कृतियां- ‘डीप नोट’, ‘ए ग्रेन ऑफ ह्विट’, ‘पेटल्स ऑफ ब्लड’ और ‘बिकोलोनाइजिंग द माइंड’। वे अफ्रीकी साहित्य में उपनिवेश-विरोधी और सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े स्वर माने जाते हैं।

वास्तव में उसे कोई नहीं जानता था। वामाइथा जो शायद उसके दिल के सबसे करीब थी, वह भी उसे समझ नहीं पाई थी। वह हमेशा अकेला ही रहता था। फिर भला उसकी मदद कौन करता?
मुझे वह अच्छी तरह याद है। मुझे याद है उसका लंबा कद और फौलादी जिस्म। उसको देखकर ऐसा लगता था मानो वह अपने पांवों मात्र से किसी को भी कुचल सकता था। उसकी आंखें बड़ी, काली और चमकदार थीं। हालांकि कुछ क्षण ऐसे भी आते थे जब उसकी गहरी आंखें किसी बच्चे की तरह मिन्नत करतीं, असहाय नजर आतीं- आपके भीतर सहानुभूति जगाती हुई अथवा डर पैदा करती हुई। कभी-कभी वह दीवार को इस तरह से घूरता कि लगता मानो उसकी हर बारीकी को आत्मसात कर रहा हो। मुझे नहीं पता वह भ्रम का शिकार था कि नहीं, लेकिन वह अक्सर गहरी सोच में डूब जाता और फिर अचानक भौचक्का होकर इधर-उधर देखने लगता, मानो उसने कोई अजीब सपना देखा था।
मैं उसे पहली बार स्कूल में मिला था। उस समय लिमुरु में मंगुओ ही एकमात्र स्कूल था, इसलिए दूर-दूर से बच्चे वहां पढ़ने आते थे। वह गाथिगी-इनी रिज में रहता था, जो स्कूल से कई मील दूर था। उसे घर पहुंचने के लिए कई पहाड़, घाटियां और मैदान पार करने पड़ते थे। हम स्कूल में उसे कुरुमा कहते थे, जिसका मतलब होता है ‘काटना’। हालांकि अब मुझे याद नहीं कि हम उसे इस अजीब नाम से क्यों पुकारते थे। उसका असली नाम मंगारा था। वह लंबा, गठीला और आकर्षक लड़का था। लड़कियां उसे पसंद करती थीं, लेकिन वह उनसे दूरी बनाए रखता था। दरअसल उसे किसी से भी मेल-जोल रखना पसंद नहीं था। वह एक अच्छा खिलाड़ी था और उसकी रुचि दौड़, लंबी कूद और मुक्केबाजी जैसे खेलों में थी। उसे कुश्ती बेहद पसंद थी और वह हर किसी को चुनौती दे देता, चाहे वह लड़का उससे उम्र में बड़ा ही क्यों न हो। यदि वह हार जाता तो दोबारा लड़ता और कई बार पटखनी खाने के बाद भी कभी किसी तरह का गुस्सा नहीं दिखाता। और फुटबॉल के खेल में तो उसका कोई सानी नहीं था, वह सबका हीरो था।
शुरुआत में मैंने उसकी ओर अधिक ध्यान नहीं दिया। शायद इसका कारण उसके प्रति मेरी ईर्ष्या थी। क्योंकि मैं न तो खेलों में न किसी अन्य क्षेत्र में और न पढ़ाई में अच्छा था। एक लोकप्रिय लड़के का, जो शिक्षकों और लड़कियों का चहेता था, हम जैसे असफल लड़कों के लिए ईर्ष्या का पात्र होना स्वाभाविक था। मैं उससे नफरत करता था – मैं उसकी अलग-थलग रहने की आदत से नफरत करता था और मित्रता की प्रयासों के बावजूद उसका तिरस्कारपूर्ण व्यवहार मुझे बिलकुल पसंद नहीं था।
फिर मुझे उसके एकाकीपन का अहसास हुआ। मुझे नहीं पता सबसे पहले उसके अकेलेपन पर मेरा ध्यान कब गया था। क्या वे उसकी आंखें थीं? शायद… मुझे लगता है, वह स्कूल की असेंबली के समय था, जब मैंने अचानक पीछे मुड़कर देखा और पाया कि वह अपने आस-पास की गतिविधियों को बहुत तन्मयता के साथ देख रहा था। और जब मेरी नजर एक पल के लिए उससे मिली, उसने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं और दूसरी ओर देखने लगा।
एक बार मैं स्कूल में काफी जल्दी पहुंच गया और टहलते-टहलते कब्रिस्तान की ओर चला गया। मंगारा वहां बैठा हुआ था अकेला, गहरी सोच में डूबा हुआ। मैंने उससे कुछ नहीं कहा।
हमारा असली सामना हमारे स्कूल के नीचे वाले घने जंगल में हुआ। स्कूल के लड़कों के मन में यह बात घर कर गई थी कि वह जंगल प्रेत-बाधित था। कहा जाता है कि बहुत पहले एक महिला को उसके पति ने इतना पीटा कि वह घर से भाग गई और जब वह जंगल की झाड़ियों के पास पहुंची, उसकी तुरंत मृत्यु हो गई।
उस दिन मैं अकेलापन महसूस कर रहा था। दोपहर के खाने के समय जब सभी लड़के घर चले गए थे, मैं घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच से रास्ता बनाता हुआ उस छोटे-से जंगल के बीचों-बीच एक बड़े, साफ-सुथरे और खुले स्थान पर पहुंच गया। वहां मंगारा बिलकुल अकेला बैठा था। मुझे अचानक सामने पाकर वह चौंक गया और झुंझला उठा। काफी देर तक हम दोनों एक-दूसरे को घूरते रहे। हमारे बीच के सन्नाटे को तोड़ते हुए मैंने कहा-
‘तुम यहां क्या कर रहे हो?’
वह थोड़ी देर चुप रहा। फिर भौंहें सिकोड़ी मानो वह मेरे प्रश्न को तौल रहा था। मैं झुंझला उठा और सवाल को दोहराने वाला था कि उसने मुंह खोला।
‘मैं काली चिड़िया को ढूंढ रहा हूँ।’
‘काली चिड़िया?’
‘हां’, उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा। उसकी नजरें मुझ पर नहीं थीं, वह मुझसे परे कहीं बहुत दूर देख रहा था। मैंने पीछे मुड़कर देखा- वहां कुछ नहीं था। मैं हैरान था। मुझे उसका व्यवहार बड़ा अजीब लगा और मुझे तुरंत एक महीने पहले की वह सुबह याद आ गई जब मैं स्कूल से कब्रिस्तान गया था और वहां उससे मिला था।
‘मैंने तुम्हें कब्रिस्तान में देखा था।’
‘ओह! अच्छा?’
‘हां।’
‘अच्छा तो फिर से काली चिड़िया?’
मैं हँस पड़ा। वह भी हँसा और फिर से गंभीर हो गया। मुझे लगा यह सब एक स्कूली बच्चे की कल्पना मात्र थी।
‘क्या वह तुम्हें मिल गई है?’
‘नहीं!’
मैंने फिर कभी उस बात पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन हमारी वह मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई। हमने साथ-साथ स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उसने फिर कभी काली चिड़िया का जिक्र नहीं किया। वह पढ़ाई में होशियार था। हालांकि ऐसा नहीं लगता था कि वह ज्यादा मेहनत करता था, लेकिन जब अंतिम परीक्षा का परिणाम आया उसका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। वह उन चंद लड़कों में से था जिन्हें कॉलेज में दाखिला मिल गया। हमारे रास्ते अलग हो गए। मुझे लिमुरु में टी. एंड एच. ट्रेडिंग कंपनी में नौकरी मिल गई।
मेडिकल की पढ़ाई के दौरान वह एक अच्छा विद्यार्थी साबित हुआ। सभी को, यहां तक कि अध्यापकों को भी उससे बहुत उम्मीदें थीं।
‘उसे क्या हो गया है?’ एक सहपाठी ने मुझसे पूछा, जब हम नैरोबी के एक कैफे में चाय पी रहे थे।
‘क्यों?’
‘वह हमेशा किसी सोच में डूबा रहता है। बड़ा अजीब-सा, गुमसुम। एकदम अलग-थलग। क्या कहूं? जिस तरह से वह चीजों को देखता है, तुम खुद सोच सकते हो, ओह!!’
कॉलेज के दिनों में उसकी मुलाकात वामाइथा से हुई थी, जो गिकोरोरो गांव के एक स्कूल में शिक्षिका थी। उसे उससे (वामाइथा से) गहरा लगाव हो गया था। वह अकसर मुझसे उसका जिक्र किया करता था। वह उससे शादी करना चाहता था। उन दिनों वह काफी खुश दिखाई देता था, ऐसा लगता था मानो उसका अकेलापन उसे सदा के लिए छोड़कर चला गया था। मैं उनसे एक-दो बार मिला था। वह लंबी और छरहरी थी। उसके चमकीले काले बाल सदा संवरे हुए रहते थे। वह मुझे धार्मिक प्रवृत्ति की लगती थी- कम से कम मुझे तो ऐसा लगता था और यहां तक कि जब वह चलती थी तब भी उसके पूरे व्यक्तित्व से पवित्रता झलकती थी। वह सुंदर थी। उसकी सुंदरता असल में उसके भीतर से प्रस्फुटित होती थी और पूरे अस्तित्व पर छा जाती थी।
कॉलेज के अंतिम सत्र की छुट्टियों में वह अचानक हमारे घर आया। मैं अविश्वास से उसे देखता रह गया। मैंने उसकी आंखों में फिर वही डर, वही भटकाव देखा। वह थका-हारा सा लग रहा था। उसकी वह खुशी गायब हो गई थी। मुझे लगा शायद वामाइथा ने उसका साथ छोड़ दिया था, लेकिन मैंने उस विषय में बात करना उचित नहीं समझा।
हमारे घर में मेरा एक पसंदीदा छोटा-सा कमरा था। हम अपना समय अकसर वहीं गुजारते थे। एक शाम हम खाना खाने के बाद आदत के अनुसार मेज पर बैठ गए। हमारे बीच खामोशी पसरी हुई थी। मैं ऐसे ही एक किताब के पन्ने पलट रहा था। मंगारा पहले से अधिक अंतर्मुखी हो गया था।
‘तुमने काली चिड़िया के बारे में नहीं सुना है।’ मैं लगभग उछल पड़ा। मुझे उसमें वह स्कूल वाला लड़का दिखाई दिया और मुझे हमारी उस भुतिया जंगल की मुठभेड़ याद आ गई।
‘वही चिड़िया जिसे तुम स्कूल में ढूंढ रहे थे?’
‘हां। मैं अब भी उसकी तलाश में हूँ।’
‘अरे! क्या तुम सचमुच गंभीर हो?’
‘मैं अपने जीवन में इससे अधिक गंभीर पहले कभी नहीं रहा।’ मैंने हँसना चाहा, लेकिन जिस लहजे में उसने यह कहा, उसने मुझे हँसने से रोक दिया। फिर लंबी आह भरते हुए कहा, ‘ओह! मैं सारी उम्र सताया गया हूँ।’ फिर उसने मेरी ओर देखा और बोलना जारी रखा, ‘तुम अंधविश्वासी नहीं हो। हां, मैं जानता हूँ कि तुम अंधविश्वासी नहीं हो। तुम्हें अजीब लगेगा कि एक मेडिकल का छात्र ऐसा हो सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि यह अंधविश्वास नहीं है। यह है- क्या तुम कभी अपने अतीत के बारे में सोचते हो?’
‘हम्म! ज्यादा नहीं।’
‘तुम, उदाहरण के लिए, यह नहीं सोचते कि अतीत तुम्हारा पीछा कर सकता है और बदला लेने की भावना से मौत का शिकार बना सकता है?’
‘कैसे?’ मैं हैरान था। मैं डर भी रहा था।
‘क्या तुम मानते हो कि बहुत पहले तुम्हारे दादा या पिता के साथ घटी कोई घटना तुम्हें प्रभावित कर सकती है?’
‘किस अर्थ में?’
‘आह, हर तरह से। जैसे, क्या तुम्हारे पिता को दिया श्राप तुम तक पहुंच सकता है?’
‘पिता द्वारा किए गए पापों को उनकी तीसरी अथवा चौथी पीढ़ी को भुगतने पड़ते हैं… है न?
‘हां, मेरे कहने का यही मतलब है।’
‘अरे नहीं! यह तो बड़ी बेतुकी बात है!’
उसने गहरी सांस छोड़ी, फिर जैसे अपने आप से बात कर रहा हो, उसने कहा, ‘ओह! इसमें तुम्हारा दोष नहीं, वामाइथा के नहीं समझने का कारण अब मुझे पता चल गया है।’ मैं चौंक गया। उसकी आवाज अत्यधिक दयनीय थी, वैसी आवाज मैंने पहले किसी से नहीं सुनी थी।
‘वह रविवार की एक शाम थी।’ उसने अचानक बोलना शुरू किया, ‘मैं अपने एक दूर के रिश्तेदार के घर से लौट रहा था। रास्ते में चांद को निहारते हुए मैं यूं ही, बेवजह रिज पर टहलने लगा और जब घर पहुंचा तो काफी देर हो चुकी थी। मेरी मां वहां थी और मेरे दोनों भाई चूल्हे के पास बिस्तर पर खेल रहे थे। सभी खुश दिखाई दे रहे थे। पिताजी घर पर नहीं थे। यह मेरे लिए असामान्य बात थी, क्योंकि देर तक घर से बाहर रहने की उनकी आदत नहीं थी। यहां तक कि जब वे धार्मिक समारोहों में प्रार्थना के लिए जाते, तब भी अकसर जल्दी घर लौट आते थे। इसलिए कुछ समय तक इंतजार करने के बाद हम सब बेचैन होने लगे।
‘मैंने खाना समाप्त किया ही था कि दरवाजे पर जोरदार धमाका हुआ। और पल भर में हमें दरवाजे पर एक काली भयावह आकृति नजर आई। वह आकृति मेरे पिताजी की थी। उनके सदैव सजे-संवरे रहने वाले बाल बिखरे हुए थे। उनकी आंखें लाल थीं। वे कुछ क्षण दरवाजे पर बिना कुछ बोले खड़े रहे और फिर अचानक धूसर फर्श पर ढह गए।
हम सब दहशत में चीख पड़े, हमें लगा कि वे मर गए थे।
‘असल में वे मरे नहीं थे। मेरी मां ने उनके माथे पर ठंडे पानी की छींटे मारी और हमने देखा कि उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलीं। हमें अपने चारों ओर देखकर वे हैरान लग रहे थे। भय ने उन्हें इस कदर जकड़ लिया था कि कांपने लगे। वे कुछ बुदबुदाए। हमें बस इतना ही सुनाई दिया- ‘काली चिड़िया।’ और फिर सो गए।
‘तब पहली बार मैंने काली चिड़िया का नाम सुना था।
‘मेरे पिताजी उस आघात को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाए और तकरीबन एक महीने बाद उनका निधन हो गया। क्योंकि मेरे पिता एक धर्म परायण एवं ईमानदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध थे, इसलिए उनकी अचानक हुई मृत्यु को लेकर काफी चर्चा हुई।
‘मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद मेरे दोनों भाई भी निमोनिया के कारण मर गए। मैं अपनी मां के साथ अकेला रह गया था। हमने अपना सबकुछ बेच दिया और हम कियांबू छोड़कर गाथिनी-इनी में आकर बस गए। तब मेरी मां ने मुझे पूरी कहानी सुनाई- मेरा मतलब है काली चिड़िया की कहानी।’
मंगारा रुका और गहरी सांस ली।
‘देखो, यह सारा किस्सा मुरांगा से जुड़ा हुआ है- मुरांगा हमारा पैतृक जिला था। वहां हमारी बहुत सारी जमीन थी। मेरे दादा उन युवाओं में से थे जिन्होंने गोरों द्वारा लाए गए ईसाई धर्म को सबसे पहले अपनाया था। वे सभी नए धर्मांतरित जोश से भरे हुए थे। वे यह मानने लगे थे कि उनके जाति-समुदाय में जो कुछ भी था, वह सब बुरा था। सारे रीति-रिवाज पाप की श्रेणी में आते थे। उनके लिए लोगों की हर आस्था अंधविश्वास थी, शैतान का काम था। वे हमारे देवता को अंधकार का राजकुमार कहते थे और उन्हें ऐसा लगता था कि वे ईसा मसीह के विशेष रूप से चुने हुए सैनिक थे, जिन्हें एक विलुप्त होती जाति को नरक की अनंत यातना से बचाना था। उन्हें विश्वास था कि कोई भी वस्तु उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी। मसीह उनके साथ था। इसलिए वे पहाड़ियों पर स्थित पवित्र स्थानों पर जाते, और देवताओं पर बलिदान के रूप चढ़ाए पशुओं के मांस इधर-उधर फेंक देते- शैतान से युद्धरत मसीह के सैनिक!’
‘वहां मुंडु मुगो नाम का एक बूढ़ा आदमी रहता था जिसे पूरे इलाके के लोग सम्मान देते थे। वह कई बीमारियों का उपचार कर सकता था और आरोगी तथा अन्य दुष्ट लोगों से लड़ता था। कहा जाता था कि वह भविष्य भी देख सकता था। उसका जादू बहुत शक्तिशाली था, लेकिन वह उसे केवल लोगों की भलाई के लिए इस्तेमाल करता था- खासकर अकाल एवं युद्ध जैसी विभीषिका के समय। इस आदमी के पास मेरे दादा गए। उन्होंने धार्मिक उन्माद का प्रदर्शन करते हुए उस बूढ़े आदमी का सारा सामान नष्ट कर जला दिया। फिर उसे उपदेश देने लगे। बूढ़े आदमी को शुरू में तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। फिर उसने दिल दहलाने वाली आवाज में मेरे दादा से कहा कि इस अपराध की कीमत उन्हें अपने जीवन में चुकानी पड़ेगी। उसके बाद वह बूढ़ा आदमी उस इलाके से गायब हो गया।
‘कई वर्षों बाद वह लौटा, एक काली चिड़िया के रूप में। मेरे दादा की मृत्यु हो गई। उनके जाने के बाद उनकी पत्नी और बच्चे भी चल बसे, सिवाय मेरे पिताजी के। मरने से पहले सबने यही कहा कि उनके पास एक काली चिड़िया आई थी। मेरे पिताजी मुरांगा से भागकर कियांबू आ गए। और वह काली चिड़िया भी उनके पीछे-पीछे चली आई।
मंगारा चुप हो गया। फिर थके हुए कमजोर स्वर में, जिसने मुझे उसकी ओर देखने के लिए मजबूर कर दिया, उसने कहा, ‘मेरी मां की मृत्यु गाथिनी-इनी में आने के कुछ ही समय बाद हो गई। उसने भी काली चिड़िया को देखा था। मैं गहरे सोच में डूब गया; मेरे पिताजी और मेरी मां को उस पाप के लिए क्यों मरना पड़ा जो उन्होंने किया ही नहीं था? आखिर क्यों? तब मैंने प्रण लिया कि मैं उस काली चिड़िया का पता लगा कर रहूंगा। आज भी मैं उसे पकड़ने के लिए तरस रहा हूँ। शायद तुम्हें विश्वास न हो, लेकिन मेरे लिए, तब भी, वह चिड़िया वास्तविक थी। स्कूल के दिनों में मैं उसे ढूंढ़ता रहा। फिर मैं कॉलेज में आ गया।
‘मेरी मुलाकात वामाइथा से हुई। मैं उस चिड़िया को भूल गया। मैं हर समय यही सोचता रहा कि मैं दुनिया में कैसे आगे बढ़ूं ताकि मैं उससे शादी कर सकूं। मैं कितना मूर्ख था, जो सोच रहा था कि मैं सफल हो रहा था। क्योंकि वह सफलता थी, जिसकी मुझे तलाश थी। मुझे लगा यही राह मेरी आत्मा को शांति देगी… और फिर काली चिड़िया का विचार मेरे मन में कभी नहीं आया, यदि आया भी, तो मैंने अपनी पढ़ाई में और अधिक उत्साह से डूबकर उसे खुद पर हावी नहीं होने दिया।’
वह रुका। उसने अपने दोनों हाथ सिर पर रखे और कुर्सी पर पीछे की ओर झुक गया। उसने मेरी तरफ देखा और फिर कहीं दूर देखते हुए कहा, ‘अब मुझे वह काली चिड़िया मिल गई है।’
मैं खड़ा हो गया और डरते हुए कमरे के चारों ओर देखने लगा। दीवारों पर फड़फड़ाती परछाइयां शैतान का रूप दिखाई दे रही थीं। मैं तुरंत बैठ गया और शर्मिंदा महसूस करने लगा।
‘पिछले सप्ताह की बात है। मैं सीधा यहां नहीं आया। रविवार को मैं वामाइथा के साथ टहलने गया था। जीवन में शायद पहली बार मैं बहुत खुश था और मुझे लगा कि मैंने अतीत को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया है और मैं मुक्त हो गया हूँ। मैं एक नई दुनिया का नया इंसान था- वामाइथा और मेरी दुनिया। हम मजाक करते रहे, हँसते रहे। शाम हो रही थी। हम एक चट्टान पर बैठकर छोटे बच्चों की तरह खेलने लगे। वामाइथा कुछ समय के लिए मुझसे दूर चली गई और मैं दूसरी तरफ यूं ही शून्य में ताक रहा था।
‘अचानक मैंने देखा, वह चिड़िया मुझे घूर रही थी। मैं बता नहीं सकता उस आकृति का मुझ पर क्या असर पड़ा। मैं कुछ महसूस तक नहीं कर पाया, चीख भी नहीं पाया, बस हैरान-सा देखता रहा। मैं उस चिड़िया के बिलकुल सामने था, जिससे मिलने की मेरी तीव्र इच्छा थी, जिसके लिए मैं प्रार्थना करता रहा था, मैं कुछ नहीं कर पाया। चिड़िया काली थी; कोयले जैसी काली। शाम के धुंधलके ने उसको और गहरा दिया था। उसकी आंखें बहुत बड़ी थीं और… और वे किसी इंसान की आंखों जैसी लग रही थीं। वे लाल थीं। अरे! नहीं… नहीं, वह गायब हो गई थी और मैं हिल तक नहीं पाया’
यह सब याद करके मंगारा थरथरा गया था। मैं भी कांप उठा था। मैं तेजी से दरवाजे की ओर भागा और घबराकर मैंने कुंडी लगा दी। फिर खिड़की बंद करके पर्दा लगा दिया, ताकि मनहूस अंधेरा अंदर न आ सके।
‘क्या तुमने वामाइथा को बताया था?’
‘नहीं! मैंने नहीं बताया। मैंने उससे कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। वह मुझे कांपते हुए देख सकती थी। उसे लगा मुझे सर्दी हो गई थी। मैं उसे इस सब में कैसे घसीट सकता था? वैसे भी उसे मेरी बात पर विश्वास नहीं होता, तुम्हें भी तो…’
मैंने तुरंत विरोध किया। लेकिन मन ही मन, शायद अपनी कमजोरी को ढकने के लिए, यह विचार आया कि यह शर्म की बात है कि एक मेडिकल का विद्यार्थी, यूरोपियन धर्म एवं विचारों में पला-बढ़ा ऐसी बेहूदा बातों पर यकीन करता है।
‘मुझे पता है तुम्हें इन बातों पर विश्वास नहीं है। यदि कोई और मुझे यह बात कहता, तो मैं भी उस पर विश्वास नहीं करता…।’
बाद मैं रात को जब हम सोने जा रहे थे, उसने मुझे बुलाया और कहा, ‘जानते हो, मेरे दादा को उस पवित्र पेड़ के नीचे शुद्धीकरण के लिए जाना चाहिए था। मेरी मां ने मरने से पहले कुछ ऐसा ही कहा था।’
उस रात मुझे काफी देर से नींद आई।
मंगारा अपने अंतिम सत्र के लिए कॉलेज चला गया। उसके बाद, मंगारा के बारे में मुझे कोई सूचना नहीं मिली। इधर मुझे कंपनी ने मुझे पदोन्नत कर तांगान्यिका भेज दिया ताकि मैं उनके डिपो की जिम्मेदारी संभालूं। मैं अपने आप पर गर्व महसूस कर रहा था क्योंकि कंपनी में ऐसा पद पाने वाला मैं पहला अफ्रीकी था।
मैं तांगान्यिका में छह महीने रहा। बाद में थोड़े दिनों के लिए घर आया। लिमुरू ज्यादा नहीं बदला था। प्रस्तावित नए व्यापारिक केंद्र के लिए पैमाइश की जा चुकी थी, लेकिन पुराना भारतीय बाजार अब भी वहीं था। मैं बाजार से होता हुआ घर की ओर जा रहा था कि रास्ते में मुझे वामाइथा मिली। वह बदल गई थी। वह बहुत कमजोर और दुबली हो गई थी, उसका चेहरा थका हुआ दिखाई दे रहा था। उसने जो पोशाक पहनी थी, लगता था एक सप्ताह से धोई नहीं थी। मैं हैरान था, उसका वह उजला, पवित्र रूप कहां खो गया था? और मंगारा, वह कहां था?
‘कैसी हो?’ मैंने उसका दुबला हाथ पकड़ते हुए कहा।
‘मैं ठीक हूँ।’
‘मंगारा कैसा है?’ मैंने प्रसन्नता से पूछा।
वह मुझे घूरने लगी। मैं भी उसे देख रहा था। मुझे लगा वह मेरे सवाल से आहत थी।
‘क्या तुम्हें पता नहीं चला?’
‘क्या पता नहीं चला?’
‘वह मर गया है।’
‘क्या!’
‘वह परीक्षा में फेल हो गया था। लोग कहते हैं, इसलिए उसने आत्महत्या कर ली। ओह! वह मुझ पर भरोसा क्यों नहीं कर पाया? मैं तो तब भी उससे प्यार करती…’
वह उसे याद करके फूट-फूट कर रोने लगी। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। वह परीक्षा में कैसे फेल हो सकता था।
एक सप्ताह बाद मैं डॉ. के. से मिलने गया। मुझे सीने में दर्द और जुकाम की शिकायत थी। वे उसी कॉलेज के ग्रेजुएट थे। हमने आपस में बहुत सारी बातें की और बातों का सिलसिला मंगारा की मौत तक पहुंच गया।
‘लोगों का कहना है कि फेल होने के कारण उसने आत्महत्या कर ली। लेकिन मैं इस पर यकीन नहीं करता। वह आदमी अजीब किस्म का था, लेकिन पढ़ने में बहुत तेज था। हम में से कोई भी उसका मुकाबला नहीं कर सकता था। पता नहीं क्यों आखिरी सत्र में उसने पढ़ाई बिलकुल छोड़ दी थी। वह दिन-ब-दिन दुबला होता जा रहा था। शाम को वह अकसर कॉलेज चैपल के आस-पास दिखाई देता था। ऐसा लगता था जैसे उसमें जीने की ललक खत्म हो गई थी। परीक्षा के दौरान उसकी आंखों में एक अजीब तरह की चमक थी मानो वह कुछ सुंदर और रोमांचक देख रहा हो… जब परीक्षा का नतीजा आया, वह फेल हो गया था। जब उसे इसका पता चला, मैं उसके साथ था। मैंने देखा उसे जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था मानो उसे यह पहले से पता था। एक सप्ताह के बाद वह पवित्र पेड़ के नीचे मृत पाया गया। उसके चेहरे में एक अजीब सी शांति झलक रही थी, मानो उसने किसी कठिन कार्य को पूरा कर लिया था। वही दृष्टि, जो कभी-कभी पुनरुत्थानवादियों की आंखों में दिखाई देती है।’
जब मैं घर पहुंचा तो सीधा बिस्तर पर लेट गया और काफी देर तक शून्य में ताकता रहा, यह तय नहीं कर पा रहा था कि बत्ती बुझाऊं या नहीं।
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अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : बालमुकंद नंदवाना |


