वरिष्ठ लेखिका।‘सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)। ‘एक शख्स कहानी–सा’ (जीवनी) ‘लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

 

‘ज़रा इसे पढ़िए और कुुछ सीखिए’ -कहकर अत्यन्त पढ़ाकू रतन खेमानी ने मझोले आकार की एक काली-सी किताब ‘बतरस’ मेरे सामने ठसक से धर दी। आहत दर्प और बेरुख़ी से क़िताब को उठाया- नाम ‘बतरस’ दिखा… हुँह! ज़रूर इसमें कोई बात ख़ास है… वर्ना यह आदमी तो कभी इस शैली में बात करता नहीं!.. ‘चलो देखते हैं’ की मुद्रा में पहला पन्ना पलटा और सामने ही हमारे परिवार में प्रिय अज्ञेयजी पर लिखा ‘कवि को कवि ही सुनते हैं’ दिखा..

कई साक्षात्कार कितने घिसे-पिटे और उबाऊ होते हैं इसका अनुमान सबको है.. पर साहब, चौंका दिया विनोद दास ने! अज्ञेयजी जैसे गम्भीर, अल्पभाषी, किंचित् स्मित मुख-मुद्रा, धर्मकाँंटे पर नपी-तुली-सी बातचीत की शैली और औपचारिकता से ठसाठस भरे व्यक्ति की शुरुआत ऐसी अनौपचारिक!

“अज्ञेयजी से यह बातचीत उनके केवेंटर ईस्ट स्थित आवास पर हुई। घने पेड़ों से घिरे एक बड़े इलाके में उनका घर था। जब मैं पहुँचा, बाहर बरामदे में रखी आरामकुर्सी पर बैठे हुए वह अखबार पढ़ रहे थे। पहले अत्यन्त सौम्यता से जलपान के लिए वह मुझे भीतर डायनिंग टेबल पर ले गये। वहाँ इला डालमिया भी मौजूद थीं। अज्ञेयजी ने स्वयं मेरे लिए चाय बनाई। खूब सिंके हुए टोस्ट पर मक्खन भी खुद लगाया। मेरे सरीखे देहाती को उनके आतिथ्य का यह अन्दाज बेहद रोचक लगा। इस आत्मीय आवभगत के बाद उनके बरामदे में यह बातचीत हुई। बातचीत के दौरान पेड़ों से आती चिड़ियों की चहचहाहट से मन पुलकित हो जाता और ध्यान बँट जाता। अज्ञेयजी को यह ध्यान बँटना अच्छा लग रहा था।”

हिम्मत है भाई ! पहले ही वाक्य में ‘संग’ उठा लिया। पूछते हैं- “केदारनाथ सिंह ने कहा कि उन्होंने हम सबका मजाक उड़ाने और चिढ़ाने के लिए चौथे सप्तक का संपादन किया है। क्या आप इस पर कोई टिप्पणी करना चाहेंगे?”

‘यदि चौथे सप्तक का भी इसमें कुछ योगदान हुआ, तो मैं समझता हूँ, अच्छा ही हुआ। बाकी रही मजाक उड़ाने या चिढ़ाने की बात!..” और अज्ञेयजी के उत्तर का सारांश कितना मार्मिक और सौष्ठवपूर्ण है- “यह तो फुरसत ही नहीं थी कि लोगों को चिढ़ाने या मजाक उड़ाने के लिए पुस्तक का संपादन करूँ।”

कविता पढ़ने और सुनने के प्रश्न पर अज्ञेयजी का बेबाक़ उत्तर-

“यह प्रवृत्ति कुछ ़ज़्यादा ही बढ़ी है कि कवि ही कवि की बात सुनते हैं और कवि ही कवि की बात करते हैं, जो अच्छी बात नहीं है। समाज में कभी कविता का सम्मान ़ज़्यादा होता है और कभी कम। इस दृष्टि से मैं समझता हूँ कि कविता के क्षेत्र में कोई नयी घटना नहीं घटी है।”

अज्ञेय जैसा अल्पभाषी जब ऐसी खरी बात कहता है, तो उसका दरजा बहुत ऊँचा होता है। ऐसा दुस्साहस कोई बड़ा लेखक ही कर सकता है। अब देखिए जरा; आलोचना के प्रश्न पर अज्ञेयजी का कैसा सुगठित और सटीक उत्तर है-

“हमारे समाज में आलोचना के दो काम होते हैं। एक तो साहित्य-रचना के पीछे रहे, उसकी व्याख्या करे। उससे जो नये मूल्य प्रकट होते हैं, उसको समाज तक पहुँचाए और समाज को उस साहित्य की समझ को बताए। दूसरी तरफ आलोचना का यह भी काम होता है कि समाज में जो परिवर्तन होते हैं, उसे रचनाकर्मी तक पहुँचाए कि समाज इस तरह बदल रहा है और इसलिए साहित्य में इस तरह के परिवर्तन होने चाहिए।”

‘आधुनिकताबोध की पीड़ा’ निबन्ध में निर्मल वर्मा ने एक जगह लिखा है कि अज्ञेय का ‘मैं’ हमेशा सुसंस्कृत और शालीन है तथा ‘अन्य’ हमेशा उच्छाड़, गलत और हास्यास्पद, इस पर कोई टिप्पणी करना चाहेंगे?” अज्ञेय जैसे शालीन, सुसंस्कृत व्यक्ति से इस तरह का व्यक्तिगत प्रश्न पूछने का साहस विरले ही कर सकते हैं और विनोद दास उनमें से एक हैं।

“इस पर टिप्पणी तो उन्हीं को करनी चाहिए। इस बात का पूर्वार्ध अगर सच है, तो मुझे इसमें कोई दोष नहीं दिखाई देता और उत्तरार्ध अगर सही है, तो पूर्वार्ध कैसे सच हो सकता है?”

वाह! विनोद दास पहले कविता, फिर आलोचना और अब उन्हें कथा-साहित्य में ले आए। क्या कुछ भी बाकी नहीं छोड़ेगे..?

“काफी अरसे से आपने कथा साहित्य में कुछ नहीं लिखा। क्या आपको ऐसे माहौल में कथा-साहित्य की उपादेयता कम लगती है या आप अपने को उस मनःस्थिति में नहीं पाते हैं या कोई अन्य कारण है?”

“नहीं लिखा, सो नहीं लिखा। उसके और कारण क्या हो सकते हैं? जो लिखा है, उसी के बारे में पूछना चाहिए कि क्या लिखा- जो नहीं लिखा उसका तो कोई कारण होता नहीं।”

इसपर भी प्रश्न- “कभी ऐसा भी होता है कि उस विधा का समय नहीं रह जाता या उस विधा का स्वर प्रमुख नहीं रह जाता।”

“ऐसा हो सकता है, पर यहाँ कुछ ऐसा रहा, यह तो मैं नहीं सोचता। उपन्यास का समय तो निश्चित रूप से आज है। अलबत्ता कहानी का युग अब नहीं है। इसका साहित्यिक महत्व कुछ कम हो गया है। उपन्यास की लोकप्रियता, उपयोगिता और महत्व अभी कम नहीं हुआ है, लेकिन कहानी का स्थान (यह मैं सारे संसार की बात कर रहा हूँ) बहुत कुछ टी.वी. के कार्यक्रमों ने ले लिया है।”

लगता है, निर्मल वर्मा की आड़ में विनोद दास उनसे अपना यह प्रश्न पूछ रहे हैं!.. “उपन्यास विधा के बारे में पिछले दिनों निर्मल वर्मा ने यह बहस शुरू की थी कि हिन्दी उपन्यास ने योरोपीय ढाँचे को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया और उसने अपनी जातीय ज़रूरतों के अनुरूप उपन्यास के स्वरूप की खोज नहीं की। इस बारे में आप क्या सोचते हैं?”

“उन्होंने कहा है तो उनसे ही व्याख्या लेनी चाहिए, लेकिन बहुत हद तक यह बात नहीं है। हालाँकि उपन्यासकार के बारे में यह बात जितनी सही है, उतनी ही उसके आलोचक के बारे में भी। उपन्यासों में कुछ नया ज़रूर हुआ है, जो भारतीय ही है, लेकिन उपन्यास आलोचक अभी तक अपनी कसौटियों में कोई संशोधन नहीं कर पाया है। वह उपन्यास को अभी भी योरोपीय आलोचक की आँख से देखता है। दोष वहाँ है, उपन्यासकारों में उतना नहीं है।”

“’50 के बाद के किन उपन्यासकारों को आप पसंद करते हैं?”

इतने बड़े साहित्यकार से सीधे-सीधे यह सवाल पूछ लेना (?) भई। हद है.. पर ख़ैर.. देखें-

“उपन्यासकारों में रेणु मुझे महत्त्वपूर्ण लगते हैं। कुछ और भी उपन्यास पढ़े हैं। कुछ अच्छे भी लगते हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी का पहला उपन्यास बहुत अच्छा लगा था। फिर ‘पुनर्नवा’ भी अच्छा लगा। नागर जी के भी उपन्यास अच्छे लगे। मैंने जो ऊपर तीन नाम लिये हैं, तीनों ही उपन्यासकार पश्चिमी ढंग के उपन्यासकारों से अलग हैं।”

महत्त्वपूर्ण आलोचक के प्रश्न पर अज्ञेयजी का यह बेहिचक और साफ़-शफ्फ़ाफ़ उत्तर उनके गहन आत्म-विश्वास का परिचायक है:-

 “सामान्य आलोचना की दृष्टि से मुझे हजारी प्रसाद जी द्विवेदी की आलोचना अच्छी लगती रही और मैं समझता हूँ कि उससे लाभ भी हुआ है। रमेशचन्द्र शाह की आलोचना पाठक मात्र के लिए उपयोगी रही है। कुँवर नारायण ने भी आलोचना की है, लेकिन बहुत कम। उनकी आलोचना अच्छी है, लेकिन इसकी मात्रा इतनी कम है कि उसका कोई महत्त्वपूर्ण प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। नामवर सिंह जी की आलोचना से कई बार ऐसा लगता है कि साहित्य की समझ तो उनको है, लेकिन वह पूरी तरह प्रकट नहीं होती, क्योंकि मतवाद के बंधन के बाहर वह नहीं जाना चाहते।”

अब विनोद दास ने जानना चाहा कि अज्ञेयजी ने ज्ञानपीठ पुरस्कार राशि में बराबर की राशि मिलाकर ‘वत्सल निधि’ की स्थापना किस उद्देश्य से की है?

पुनः चौंका दिया विनोद दास ने। इस तरह की बात अज्ञेयजी से पूछ पाने के लिए एक ख़ास परिवेश और प्रश्नकर्ता में बहुत दम-ख़म चाहिए। लगता है ये दोनों ही वहाँ मौजूद थे।

“जब कोई साहित्यकार बीमार होता है, तो सभी शोर मचाते हैं कि सरकार को कुछ करना चाहिए। सरकार को क्यों करना चाहिए ऐसा कुछ लेखक के लिए, जो वह दूसरे नागरिकों के लिए नहीं करती? हमें अपनी माँग क्यों करनी चाहिए? हम एक तरफ तो यह मानकर चलते हैं कि लेखक साधारण आदमी से जुड़ा हुआ है और साधारण आदमी है और दूसरी ओर हम उसकी हर ज़रूरत को असाधारण मानते हैं और उसके लिए सरकार से चाहते हैं कि कोई असाधारण व्यवस्था करे; ऐसा क्यों? जिस तरह हम अपने परिवार के किसी सदस्य के सुख-दु:ख में हिस्सा लेते हैं और साहित्यकार को अपना परिवार मानते हैं, तो हम उसके सुख-दुःख में सबसे पहले योग देने क्यों नहीं जाते?”

जिन्होंने अज्ञेयजी को थोड़ा भी जाना है, वे इन शब्दों के महीनपन और गहराई को समझ सकते हैं… समझ सकते हैं उस करुणा को, जो उनके हृदय में राज करती थी; जबकि आमतौर पर अज्ञेयजी को बहुत ही आत्म-केन्द्रित, असम्पृक्त, निर्मोही और आभिजात्य औपचारिकता से परिपूर्ण एक मुज्जस्मा माना जाता था।

संयोगवश चार-पाँच बार अज्ञेयजी के आतिथेय (कलकत्ता प्रवास) की भूमिका निभाते समय मुझे भी बार-बार यह अनुभूति होती थी कि अज्ञेयजी का अन्तर्मन बाल-सुलभ-सा सहज था। एक बार जब मैं उनके और इलाजी के लिए उपहार लाने जा रही थी, तो वे भी साथ चल पड़े (आश्चर्य-सा हुआ, क्योंकि यह घटता नहीं था) ख़ैर.. दुकान में पहुँच कर शुभ्र धवल दन्तपंक्ति से चमचमाती हँसी बिखेर कर बोले, “उलाहना न मिल जाए, इसलिए आया हूँ, वरना कहा जाता है- पसन्द आए चाहे नहीं, आप थोड़े ही पसन्द कर लाए हैं!” और फिर बाक़ायदा उन्होंने गुलाबी रंग की एक ढाकाई जामदानी चुनी।

एक बार दिल्ली से पत्र आया, “आपका भेजा अशोक का पौधा मिला। सौभाग्य से तभी सुन्दरलाल जी बहुगुणा आ गए, तो उनसे रोपवा लिया।”

मेरा जवाब था, “अज्ञेयजी ! कहा जाता है अशोक वृक्ष पर षोडश कन्या का पदाघात हो, तभी उसमें से फूल खिलते हैं। आपने यह क्या किया? बहुगुणा जी से पौधा रोपवा लिया!..”

मैं नासमझ यह समझ नहीं पाई थी कि गझिन सोच के व्यक्ति अज्ञेय ने कुछ सोचकर ही सुन्दरलाल बहुगुणा से वह पौधा लगवाया था। इसकी ताईद अबकी बार (1 मई 2009) बहुगुणाजी के कलकत्ते आने पर हुई। उन्हें देखकर मैं सोच रही थी इस उम्र में बहुगुणाजी का यह रूप और रंग (?), तो उस समय तो वे सच ही  किसी भी सुंदर षोडश कन्या से बराबरी कर सकते थे!

वैसे ऐसे दुस्साहस-भरे प्रश्न करने की प्रेरणा अज्ञेयजी ही देते हैं। यह उक्ति निजी अनुभव पर आधारित है।

एक बार कलकत्ता विश्वविद्यालय में सम्प्रेषणीयता पर उनकी व्याख्यानमाला थी। मैंने घर पर झोंक-झोंक में उनसे कह डाला, “अज्ञेयजी, आप सम्प्रेषणीयता पर बोल रहे थे। पर मुझे तो लगता है कि आपका भाषण वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों के सिर पर से गुज़र रहा था। वे यदि सिर भी हिला रहे थे, तो केवल दिखाने के लिए।”

उन्हें यह बात भायी नहीं, यह उनके चेहरे से ज़ाहिर था, पर मुझपर उनका विशेष स्नेह था; और ऊपर से उनकी गहन समझदारी से भरी गंभीरता; अत: धैर्य-भरे स्वर में वे बोले, “इससे हल्का उस गहरे विषय पर बोला नहीं जा सकता और ये बातें सीधे समझ में आतीं भी नहीं, पर यदि बाद में ध्यान दिया जाय, तो तथ्यों की सत्यता आपको काफ़ी कुछ समझा देगी।” (कहना न होगा ऐसा ही हुआ)।

आपसी बातचीत में विनोद दास और अपने बीच अज्ञेयजी ने जो प्रेम-धारा प्रवाहित कर दी थी, उसका कुछ अनुभव भारतीय भाषा परिषद वालों को भी है। घटना उस समय की है; जब अज्ञेय अपना काव्य-पाठ मंच से करना पसंद नहीं करते थे। वे युगोस्लाविया से लौटे थे और माचवेजी के कहने पर परिषद में काव्य-पाठ के लिए तैयार हो गए, पर कुदरत का कहर भी उसी दिन होना था! उनके माइक पर आने के पाँच मिनट बाद ही बत्ती गायब, माइक ग़ायब, ए.सी. तो दूर पंखा तक ग़ायब.. ऊपर से गर्मी का महीना.. हॉल खचाखच भरा। मारे शर्म के पदाधिकारियों का बुरा हाल;.. हम सबके चेहरे यों उड़े हुए थे मानों कोई ग़मी हो गई हो!.. या भयंकर नुकसान!.. पर ‘करें तो क्या करें’ की मुद्रा में सब हतप्रभ से एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। घबराहट में किसी को भी सिर से पैर तक चूते पसीने का भान न था, पर धन्य हैं अज्ञेयजी ! और धन्य हमारे भाग्य कि अज्ञेयजी ने एक हाथ में टार्च सँभाली और एक में काग़ज़ और किताबों का पुलिंदा;.. और बिना रुके, बिना अटके, बिना पसीना पोंछे- एक घंटे तक धारा प्रवाह काव्य-पाठ करते रहे ‘असाध्य वीणा’ समेत!

एक दिन ग़ज़ब ही हो गया। शाम को घर लौटने पर घरेलू परिचारिका ने बताया कि कोई अँग्रेज़ रतन खेमानी की तबीयत पूछने (बुख़ार था) आया था.. पानी तक तो पिया नहीं;.. ऊपर से बाबू के साथ घंटे भर तक जाने क्या-क्या बातें करता रहा!

पता चला आज अज्ञेयजी ने (रतन को कंठस्थ) सागर-मुद्रा और अन्य पुस्तकों से रतन खेमानी को इतनी कविताएँ सुनाईं कि एक पूरा कैसेट भर गया।

यह किस्सा सुनकर मेरी आँखें पनीली हो आईं कि इसे कहते हैं संस्कार; अभिजात्य; या बड़ापन जो किसी साधारण से आदमी की ऐसी ‘रखपत’ रखता है।

धन्यवाद विनोद दास का कि उनके साक्षात्कार ने अनायास ही ये भूली बातें याद दिला दीं और मैं इनका साझा कर पाई।

अज्ञेय की ऐसी ढेरों महीन-महीन, छोटी-छोटी घटनाएँ हैं, जो उन्हें एक बड़ा आदमी और असाधारण लेखक साबित करती हैं। विनोद दास का साक्षात्कार उनके इस बहुआयामी रूप को सार्थकता प्रदान करता हुआ संस्मरण ही है, जो आकार में बृहद न होते हुए भी साहित्य की लगभग सभी विधाओं का परिचय देता है। आश्चर्य है विनोद दास ने उनके पत्रकारिता वाले पक्ष को कैसे नहीं छुआ! जिन्होंने ‘दिनमान’ पढ़ा है, वे जानते हैं कि यह अपने आप में अप्रतिम था।

(अगल अंक में पढ़ें ‘यादों में शमशेर’)