वरिष्ठ लेखिका।‘सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)। ‘एक शख्स कहानी–सा’ (जीवनी) ‘लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

आधुनिक जगत की बात जब हम करते हैं, हमारे सामने एक ओर विज्ञान और टेक्नोलॉजी का अत्यंत विकसित युग आकर खड़ा हो जाता है, आधुनिक उदारीकरण और ग्लोबलाइजेशन द्वारा विश्व को आर्थिक ग्लोब में देखने की परिकल्पना सामने आती है; वहीं दूसरी ओर शीत युद्ध और आतंकवाद का परम भयानक रूप भी है, भुखमरी, बीमारी और बेरोज़गारी का विराट काला समुद्र भी है। अपनी अस्मिता और स्वार्थों के खोने का भय साम्प्रदायिक, जातीय और क्षेत्रीय वैमनस्य का रूप ले चुका है।

हमारा विश्व, दिन पर दिन एक जटिल विश्व होता जा रहा है। अति-आधुनिकता के नाम पर मानवीय मूल्यों का सतत ध्वंस, पुनरुत्थान की भयावह वापसी आदि कहीं न कहीं लोकव्यापीकरण और आधुनिक चेतना को निरर्थक बनाती प्रतीत होती है। हमारी शती ने साम्यवाद से लेकर अनेक विचार-सरणियों का उद्भव और पतन देखा है। दो-दो भयानक युद्ध देखे हैं, विकसित राष्ट्रों के आतंकवादी व्यूह में गरीब देशों को फँसते देखा है; और देखा है कि राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्ध, दोहरे कूटनीतिक मानदण्डों से परिचालित हो रहे हैं।

तकनीकी विकास इस चरम सीमा पर पहुँच गया है कि उससे मनुष्य की संवेदनाओं पर कहाँ-कहाँ आघात होता है, इसकी नाप-तौल भी मुश्किल हो गयी है। परिवारों, सार्थक परम्पराओं, मानवीय मूल्यों और सम्बन्धों के अनवरत टूटने के दौर से हम गुज़र रहे हैं। ऐसे तमाम दिग्भ्रमों के बीच से सर्जनात्मक संवेदना के लिए राह निकालना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

हमारी चिंता यह है कि क्या हमारी समूची साहित्यिक विरासत और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ मिलकर इस विकट समय में कोई सार्थक भूमिका निभा सकती हैं?

हिन्दी वस्तुतः पण्डितों की नहीं, जनता की भाषा है। सौभाग्यवश हिन्दी साहित्य का जन्म भी फक्कड़ सिद्धों और नाथों की बानियों में हुआ। यह संतों की कुटिया में पला और बड़ा हुआ। सिद्ध हों या संत या भक्त, सबने जनता को प्रेम, उदारता और मानवीयता की सीख दी है। तत्कालीन राजनीति जब लोगों के बीच मतभेद पैदा कर रही थी, तब संत और भक्त कवि परस्पर जुड़ने के लिए जनता का आह्वान कर रहे थे। तुलसी अगर कह रहे थे- ‘सियाराम मय सब जग जानी’, तो कबीर हिन्दुओं और तुर्कों के बीच एक ही ईश्वर होने के मर्म को सिखा रहे थे। जायसी और प्रेममार्गी कवियों ने तो फारसी लिपि में भारतीय जन-जीवन को अभिव्यक्त कर कमाल का काम किया था। संतों ने पाखण्ड, हिंसा, द्वेष और तमाम ऐसे बाह्याचारों पर लगातार प्रहार किए, जो मनुष्य को मनुष्य से न स़िर्फ अलग करते हैं; बल्कि पारस्परिक वैमनस्य की जड़ों को सींचते हैं। सिद्धों, भक्तों, नाथ कवियों या संतों के धर्म के जो भी माध्यम रहे हों, उनका काव्य लोक जीवन और लोक मूल्यों की अन्विति का काव्य था।

भक्ति काल के बाद आये रीति काल में प्रमुख रूप से कविता की पच्चीकारी करने और अभिव्यक्ति को प्रेम के रूमानी घेरे में समेटने की भले ही कोशिश हुई हो, परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी राग-भावना की अभिव्यक्ति हुई जो कम से कम ऐसी अभिव्यक्तियों से बेहतर थी, जिनसे मानवीय पाखण्ड और विकृतियाँ पनपती हैं। इस युग में भी ऐसे कवि हुए, जो प्रेम की सनातन मार्मिकता व्यक्त कर रहे थे और राष्ट्रीय स्वाभिमान के उस विनाश युग में ओजस्वी वाणी से राष्ट्रीय संकल्प और मूल्यों की रक्षा करने की प्रेरणा दे रहे थे।

यह हिन्दी की ही विरासत थी कि अगर किसी समय धर्म के केन्द्र से मानवीय रागात्मकता और मूल्याश्रित जीवन को उजागर किया गया था, तो उसकी परिणतियाँ किसी पतनोन्मुख युग में न होकर आधुनिक युग के लिए प्रेरणादायी चेतना के रूप में हुईं। भारतेन्दु युग का सामाजिक जागरण, रूढ़ियों से मुक्त होने की कामना और सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक पाखण्डों पर प्रहार मूल रूप से हिन्दी के मूल्याश्रित लोक-चरित्र और लोक-चेतना का ही अनवरत प्रवाह था। राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष के युग में रचनाकारों की वाणी ने परम्परा के श्रेष्ठ उपादानों के माध्यम से लोगों की आत्महीनता को दूर करते हुए उनके अन्दर एक ऐसा ओजस्वी राष्ट्रीय भाव जगाया, जो तत्कालीन समय की आवश्यक माँग थी। मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जैसे राष्ट्रीय कवियों की वाणी हिन्दी-भाषी जनता की वाणी ही थी।

तात्पर्य यह है कि प्रारम्भिक सिद्ध कवियों की काव्य-साधना से लगाकर आगे भी जारी उत्तरदायी कवियों में मनुष्य के जिस मंगल की आकांक्षा और उसे नष्ट करने वाली रूढ़ियों पर प्रहार करने की प्रवृत्ति थी, वही संत और भक्त कवियों की वाणी में अधिक प्रबल होकर उभरी। ईर्ष्या, घृणा और मूल्यों के पतन के विरुद्ध मनुष्य के भीतर से एक श्रेष्ठतर और उदात्त भावना की सृष्टि करना इस साहित्य का लक्ष्य रहा है। सौन्दर्य और प्रेम की नदियाँ बहाने वाले कवियों ने भी मनुष्य के हृदय में रागात्मकता का प्रसार किया है और एक ऐसी दुनिया की तलाश करनी चाही है, जिसमें द्वेष के लिए कोई जगह न हो।

हमारे समाज को जब रूढ़ियों ने जकड़ा, जब वह अनेक प्रकार के अंधविश्वासों और साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद के खूँखार जबड़ों में फँसा था, तब भी हमारे लेखकों ने उनके खिलाफ हम सबको सचेत किया और मनोबल बढ़ाया। यह हिन्दी की साहित्यिक विरासत का ही सार्थक विकास था। छायावादी कवियों ने कविता और गद्य के माध्यम से भारतीय जन-मानस को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता का बोध कराया और उनके भीतर सोए ऊँचे मानवीय भावों को जाग्रत किया। कामायनी, राम की शक्ति-पूजा, चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, तुलसीदास, जागो फिर एक बार आदि ऐसी रचनाएँ हैं, जो इतिहास के संदर्भों को सामयिक अर्थ देती हैं और मनुष्य की अन्तर्वृत्तियों को जाग्रत कर सांस्कृतिक और सामयिक संघर्ष को नयी अर्थवत्ता देती हैं।

सौन्दर्य और प्रेम से जीवन को परिशुद्ध करते हुए एक ऐसी निष्कलुष उदात्त भावना इन रचनाओं के माध्यम से लोगों के मन में प्रवेश कर रही थी, जो राष्ट्रीय संघर्ष के लिए बल भी थी और मानसिक विकास के लिए सम्बल भी। इतना ही नहीं, समकालीन समस्याएँ, अन्तर्बाधाएँ और उत्पीड़न को भी इन रचनाकारों ने नयी अर्थवत्ता दी और सदियों से मन में बैठी ग़ुलामी से मुक्त होने का आह्वान किया। यह मनोवैज्ञानिक उपचार निश्चय ही महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि बाहर की बेड़ियाँ तोड़ने से पहले जरूरी होता है भीतर की बेड़ियों को काटना।

‘ध्रुवस्वामिनी’ का पुरुष–उत्पीड़न से मुक्त होकर अपने स्वतंत्र नारी व्यक्तित्व को घोषित करना या ‘चतुरी चमार’ और ‘पगली’ जैसे चरित्रों का अपने विशिष्ट व्यक्तित्व और संघर्ष द्वारा नये अर्थ में उजागर होना या तत्कालीन अकाल, भुखमरी और ग्रामीणों की समस्याओं का गद्य व कथा के माध्यम से अवतरित होना यह दिखाता है कि किस तरह हमारे रचनाकार जीवन की उत्कट समस्याओं और मानवीय सम्बन्धों को नये ढंग से परिभाषित कर रहे थे।

प्रेमचन्द और उनके युग के रचनाकारों ने ग्राम्य-जीवन और साधारण मनुष्य की यातनाओं के साथ उनकी उदात्तताओं का जो रूप प्रस्तुत किया; उसने साहित्य में परम्परागत रूप से चली आ रही नायक की अवधारणाओं को ही बदल दिया। उन्होंने अपनी संवेदनशील सशक्त लेखनी द्वारा प्रमाणित किया कि बड़े कुल या समृद्धि के बीच ही बड़े आदमी पैदा नहीं होते; बल्कि दरिद्रता व अभाव के बीच भी ऐसे इन्सान पैदा होते हैं, जो नायक या महानायक बनने की क्षमता रखते हैं। शास्त्रीय अवधारणाओं का यह बदलाव असल में हिन्दी साहित्य की उस अन्तर्वाही चेतना का ही प्रतिफल है, जो मनुष्य के अंतर्जगत और व्यक्तित्व को उसकी बाह्य स्थितियों की तुलना में सदैव अधिक महत्त्व देती आई है। वर्ग-वैषम्य और शोषण विरोधी लेखकीय चेतना यद्यपि मार्क्सवाद के प्रभाव से अधिक प्रखर हुई, परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय तक प्रेमचन्द ‘गोदान’ सहित अपनी सब महत्त्वपूर्ण कृतियाँ लिख चुके थे।

छायावादी कहे जाने वाले जयशंकर प्रसाद ने ‘कंकाल’ और ‘तितली’ -जैसे प्रचण्ड आक्रामक और ग्राम्य-जीवन की नयी रूप-रेखा प्रस्तुत करने वाले उपन्यास लिख दिए थे। इस संदर्भ में निराला की ‘भिखारी’, ‘दान’ जैसी कविताओं को भी देख सकते हैं। आशय यह है कि हिन्दी साहित्य पर मार्क्सवाद के प्रभाव को मान्यता देते हुए भी हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि मानवीय संवेदना और समानता की भावना के कारण हमारे रचनाकार स्वयं ही प्रगतिशील थे, किसी आयातित आग्रह के कारण नहीं। प्रेमचन्द के युग में ही रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचक हुए, जिन्होंने आलोचना की परम्परा को नयी धार दी। शुक्ल जी की आलोचना में सर्वहारा की ही नहीं, प्रकृति और जीवन के उन समस्त पक्षों की मार्मिक अभिव्यक्ति का आग्रह था, जिनसे मनुष्य सही अर्थों में सामाजिक मनुष्य बनता है।  प्रगतिवादी युग में लेखकों ने निश्चय ही मार्क्सवाद से प्रभाव ग्रहण किया और सामाजिक चिंतन को विचारधारा की सीमाओं में बाँधने की कोशिश की; फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ परम्परा की सचेत संवेदना की अनुपस्थिति है।

उदाहरण के रूप में हम केदारनाथ अग्रवाल की प्रकृति सम्बन्धी अनेक कविताएँ, नागार्जुन की ‘बादल’, सुमन की महात्मा गाँधी की मृत्यु पर लिखी रचनाएँ और ‘जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी’ जैसी अनेक रचनाओं को ले सकते हैं। हिन्दी के लेखकों ने शोषण के खिलाफ जिन मूल्यों की प्रतिष्ठा की, हमेशा स्मरण रहेंगे। चाहे प्रगतिशील युग हो या नये साहित्य या उत्तर-आधुनिकता का युग ही क्यों न हो, हमारे विभिन्न लेखकों ने व्यक्ति, देश, समाज की और मानवता की समस्याओं के जिन धरातलों को छुआ है, वे आज भी प्रासंगिक हैं। इसी दौर में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपन्यासों की समानान्तर धारा साहित्य में प्रवाहित थी, जो इतिहास और परम्परा को नये अर्थों में प्रतिष्ठित कर रही थी। इस संदर्भ में वृन्दावन लाल वर्मा जैसे लेखकों को उद्धृत कर सकते हैं।

नयी कविता, नयी कहानी, नयी आलोचना अर्थात् नये साहित्य के युग में हम देखते हैं कि अनेक विचार और अवधारणाएँ पश्चिम से हमारे देश में प्रवेश कर रही थीं और हमारे लेखकों को आकर्षित कर रही थीं। परिणामस्वरूप हमारे साहित्य में कई विचारों और प्रभावों का संक्रमण देखा गया।

समय की गति जैसे-जैसे तीव्र होती जाती है और विश्व का भूगोल सिमटने लगता है; वैसे-वैसे अनेक प्रकार की पारस्परिक अन्त:क्रियाएँ होने लगती हैं। दुनिया का पास होना एक मुहावरा भर नहीं है; ऐसा ज्वलन्त सत्य है, जिससे इनकार करने का कोई औचित्य नहीं। भारतीय जीवन, ज्ञान और साहित्य के कितने ही प्रभाव दूसरे देशों की रचनाओं पर पड़े हैं। यह ठीक है कि स्वातंत्र्योत्तर काल में प्रभावों का प्रवाह पश्चिम की ओर से आया है; फिर भी यह बात हमें आश्वस्त करती है कि उन प्रवाहों में भारत बहा नहीं। इसका कारण उसकी ऐसी परिपक्वमानसिकता और ठोस वैचारिक एवं मानवीय आधार-भूमि है, जो गहराई से भारतीय मनुष्य के भीतर ‘रुप’ गई है। यह उल्लेखनीय है कि इतने सारे वैचारिक संक्रमणों के बावजूद हिन्दी साहित्य अपनी जमीन और उसकी गंध से जुड़ा हुआ साहित्य है। किसी भी दौर में वह सरासर विदेशी नहीं हुआ; न अपने देश की मूल समस्याओं और परम्परा की उत्कृष्टता से विमुख हुआ। ‘अन्धायुग’ हो या ‘आत्मजयी’, ‘अपने-अपने अजनबी’ हो या ‘मैयादास की माड़ी’, ‘झूठा सच’ हो या ‘अनामदास का पोथा’- सबके भीतर आधुनिक चेतना के साथ परम्परा से उपलब्ध श्रेष्ठ तत्त्वों का समन्वय दिखाई देता है और ऐसा विखण्डन भी, जो ऐतिहासिक प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है।

हिन्दी के वर्तमान साहित्य में भी, जो बहुत से नये और ताजे रचनाकारों द्वारा समृद्ध किया जा रहा है; हिन्दी जैसी जन-भाषा का जन-चरित्र और लोक-संस्कार विद्यमान है। आज के रचनाकारों के कथ्य और भाषा-शैली पर लोक-भाषा और लोक-जीवन की गहरी छाप है; यह इस बात को साबित करती है कि आज के साहित्य का अपनी विरासत से गहरा रिश्ता है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि पिछले समय में भारत की राजनीति और राजनीतिक दलों में कई तरह की संकीर्णताओं ने प्रवेश किया। कई बार तो ऐसा लगा कि कहीं हम अपने कठमुल्लापन, जातीय और प्रांतीय भेदभाव, आतंकवाद और शोषण-प्रक्रियाओं के चलते मध्य काल में तो नहीं लौट गये हैं; हालाँकि यह एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति भी नज़र आ रही दिखाई पड़ती है, परन्तु इस बात का गर्व के साथ उल्लेख किया जा सकता है कि हिन्दी का कोई भी सर्जनात्मक लेखक; चाहे वह घोषित वामपंथी हो या घोषित दक्षिणपंथी; किसी ने भी सम्प्रदायवाद, जातिवाद, अलगाववाद और अन्य संकीर्णताओं का पक्ष नहीं लिया। इतना ही नहीं, वह बराबर उसके विरोध में खड़ा रहा। यदि हम इस सर्जनात्मक चरित्र को देखें, तो हमें इसमें संदेह नहीं रह जाएगा कि हिन्दी की साहित्यिक विरासत विधेयात्मक है, नकारात्मक नहीं। यहाँ एक ऐसी विरासत है, जो हमें परम्परा से भी सही रूप में जोड़ती है और अपने वर्तमान में भी तन कर खड़े होने की हिम्मत पैदा करती है।

हमारी साहित्यिक विरासत में जो गहरा आध्यात्मिक स्पर्श है; जो एक निरपेक्ष उदात्तता है; निरर्थक परम्पराओं और पाखण्डों पर जो करारी चोट है और समस्याओं की कठिन राहों से गुजर कर आशा और आस्था की नयी दिशा का जो सन्धान है; वह किसी भी दिग्भ्रम के युग में, परिवेश बदल जाने पर भी निश्चय ही एक प्रकाश-स्तम्भ का काम कर सकता है, क्योंकि समस्याओं की शक्ल भले बदल जाये, चरित्रों, कथाओं या विषयों के भीतर निहित कथ्य मनुष्य को विवेकसंगत अर्थ और दृष्टि देने में समर्थ होता है।