वरिष्ठ लेखिका।‘सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)। ‘एक शख्स कहानी–सा’ (जीवनी) ‘लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

 

आत्मकथाओं के संजाल ने इन दिनों दिल-दिमाग़ छेक रखे थे कि ‘एक नगरवधू की आत्मकथा’ के विस्फोट ने बाक़ी सारे तंतुओं को तितर-बितर कर दिया। लंबाई, चौड़ाई, मोटाई सबमें निहायत छोटी-सी, पर आक्रामक ऐसी कि बालू के कणों-सी आंखों में चुभती चली जाए, और आप सिर पटकते रह जाएं, कि भला! इसमें ऐसा है क्या जो बार-बार आप इसे मुड़कर उठा लेते हैं और इससे पूछने लगते हैं कि भई! इस निहायत मामूली आकार की तुम! ऐसा क्या समाए हो अपने में (?) कि हाथ, आँख, कान, नाक, मन…सबकुछ अवश-से तुम्हारी ओर खिंचे चले जा रहे हैं? कुछ तो ख़ास है तुममें!!.. जो उन मोटे-मोटे गौरव ग्रन्थों (क्लासिक) ‘वैशाली की नगरवधू’, ‘आम्रपाली’ आदि से भिन्न है।…

जरा विचारों के इस मकड़जाल को परे खिसकाकर, उस इन्द्रजाल में फँसने का जोख़म उठाया जाए, जिसका सहारा लिए यह दुबली-पतली ‘पतुरिया’ हमें ‘झाला’ (ऑनियारी आंखें) मार रही है… ‘आमंत्रण निमंत्रण नहीं/अनायास खींच लेता है अपनी ओर/मेरा मिथ्यालय/श्रेष्ठ जनों के बीच/यहीं रचा जाता है/कलाओं का महारास/मेेरे द्वार कभी बंद नहीं होते/ये खुले रहेंगे/तुम्हारे जाने के बाद भी।’

क्या ही दुस्साहसपूर्ण उवाच है!.. कितने गर्व से अपने ‘मिथ्यालय’ का परिचय दे रही हैयह नई-नवेली नगरवधू। ‘ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या’.. के आदि- सूक्त की धज्जियाँ बिखेरतीं ये उक्तियाँ!.. भौतिकता, मांसलता, ऐन्द्रिकता, स्थूलता आदि-आदि सारे शब्दों को ‘सत्य’ मानती हैं। सत्य मानती हैं उस ‘क्षण’ को, जिसमें ये सारे शब्द प्रकाशित होते हैं। इस नगरवधू को अलौकिकता, दिव्यता, आध्यात्मिकता, त्याग, अनश्वरता आदि बड़े-बड़े शाश्वत सिद्धान्तों से कोई लेना-देना नहीं है। यदि इसे कुछ लेना-देना है, तो स़िर्फ और स़िर्फ अपने शरीर से!! जो कि उसके वजूद का अन्तिम सत्य है। इतना ही नहीं, वह पूरी तन्मयता से.. पूर्ण समर्पण से.. उस सम्पूर्ण क्रिया को सम्पादित करती है, जो उसके लिए निर्धारित की गयी है।

‘मेरे प्याले भरे हैं मद से/कीमियागर की तरह/मैं मिला रही हूँ/दो विपरीत रसायन/विस्फोट होने को है/मैं प्रतीक्षा करूँगी तुम्हारे डगमगाने की।’

कर्मयोग का इससे सुन्दर निष्पादन क्या हो सकता है? इस धरती के सारे शास्त्र कहते आए हैं कि जिसे जो भूमिका सौंपी गयी है, उसे प्रत्येक प्राणी को पूरी श्रद्धा से और सम्पूर्णता से निभानी चाहिए- ‘सवा सोलह आने’ स्वयं को अतल-तल तक उलीच कर.. बिना पलक झपकाए.. संकोच रहित.. दीप्तिमान गर्व से। कर्म चाहे जो हो, पर यदि वह नियति द्वारा निर्धारित किया गया सत्य है, तो उसे एक प्रकार का प्रभु-समर्पण ही मानना चाहिए।

‘मेरे अस्फुट प्रलाप/अधखुले अधर/सौन्दर्य का यह मौन विस्फोट/अब कहाँ सम्भव ‘मुक्तिप्रसंग’/भोर होने तक/यूँ ही तना रहेगा इन्द्रजाल।’

नगरवधू की शृंगार-प्रस्तुति का यह बारीक़ वर्णन क्या किसी पुरुष लेखक द्वारा सम्भव हो पाता? रोज़मर्रा की भाषा के साधारण शब्दों से बुना हुआ यह बिम्ब विधान, गहरे मायने भेदता ‘मुक्तिप्रसंग का संदर्भ’ सूक्ष्म विन्यासों की यह सृष्टि.. क्या पहले कभी सम्भव हुई है?

‘तुम्हारी जिह्वा/ठाँव-कुठाँव टपकाती है लार/इसे काबू करना तुम्हारे वश में कहाँ/तुमने चख लिया है/हर रंग का लहू।’ सच्चाई से रची-पगी इस व्यंग्योक्ति के बाद अभिव्यक्त होती है..

महारानी द्रौपदी की नयी व्याख्या!! पाँच पतियों की पत्नी सती द्रौपदी को क्या उपाधि दी जाए?.. उस पौराणिक स्थिति को क्या नाम दिया जाए (?).. एक परिस्थिति विशेष के कारण जो श्रेष्ठतम धार्मिक लोगों द्वारा स्थापित की गयी थी। द्रौपदी को पाँच पतियों में बाँट दिया गया था; ऊपर से द्रौपदी पर यह लांछन भी लगा कि तुम्हें हिमालय में सबसे पहले गलना पड़ेगा, क्योंकि .. चाहे तुमने कर्त्तव्य-निर्वाह और व्यवहार एक-सा रखा हो, पर अन्तर से तुम अर्जुन को अधिक प्यार करती थी। प्रेम करना क्या इतना बड़ा पाप है?

‘…एक बार आओ/मेरी रामरसोई में/अग्नि केवल तुम्हारे जठर में नहीं/मेरे चूल्हे में भी है/यह पृथ्वी स्वयं हाँडी बनकर/खदबदा रही है/केवल द्रौपदियों को ही मिलती है/यह हाँडी/पाँच पतियों के परमसखा से..’ एक गृहस्थन और नगरवधू की ‘रामरसोई’ का अन्तर यहाँ यही है कि चूल्हे पर पृथ्वी रूपी हाँडी खदबदा रही है, साधारण अदहन नहीं और यह ‘हाँडी’ भी कोई मामूली हाँडी नहीं होकर स्वयं भगवान कृष्ण द्वारा प्रदत्त दिव्यपात्र है। यह एक ऐसे कराहते सत्य का उच्चारण है कि सुननेवाला कोने ढूँढ़ता फिरे सिर छुपाने को। यदि सृष्टिकर्ता भी परोक्ष में दी गयी अपनी इस सहमति को स्वीकार करें, तो इस सत्य का साक्षात्कार कर पत्थर-से स्तब्ध रह जाएंगे। गर्भाशय से पृथ्वी की तुलना सदियों पुरानी है, सर्वथा नूतन है ‘द्रौपदी’ के ‘पाँच पतियों’ और उनके परम सखा श्रीकृष्ण का यह परिचय।

आज तक सबने जाना था ‘नगरवधुओं का दुर्भाग्य’!.. जाना था कि उनके अप्रतिम सौन्दर्य ने उनका सम्पूर्ण जीवन विषाक्त कर दिया था… उनके बेमिसाल सौन्दर्य ने उनसे इस धरती के सारे सहज-सुख छीन लिये थे। इन्हें पढ़ते समय, हम काँप कर लरज जाते थे और सहानुभूति के उद्रेक से बार-बार उच्चारने लगते थे ‘बेचारी’! हमारे लिए उनका ‘नगरवधू’ बनाया जाना समाज के कुकर्म का द्योतक था, नरक था, लेकिन यह कैसी नगरवधू है (?) जो अपने ‘इस होने’ को गरिमामय मानती है(?) अनोखा मानती है (?) और सती-साध्वी के ‘कैवल्य’ (एकनिष्ठता) को नया अर्थ देती है ‘डोलेगी तुम्हारी देह/मेरी लय पर/उस एकान्त में/जिसे रचा है मैंने/अन्धकार के आलोक से/रुको नहीं, चले चलो/भय नहीं केवल लय/मैं नहीं तुम कहोगे ‘कैवल्य’/मैंने तो गढ़ा है इसे/मैं जानती हूँ इसका मामूली अर्थ/मैं हर रात यह प्रदान करती हूँ/..अन्धकार के इस आलोक से!’ वह एक ऐसी सृष्टि रचती है, जिसकी एकमात्र स्वामिनी वही है।.. चारों ओर उसी का राज है।.. दूसरी सारी सत्ताएँ वहाँ अर्थहीन हैं.. सारे सम्बन्ध बेमानी। ‘कैवल्य’ की सत्ता में ही पूर्णता का अभिमान हो सकता है।.. शायद इसीलिए  ‘देवी स्थापन’ में और ‘यज्ञवेदी’ के निर्माण में नगरवधू की दहलीज़ की मिट्टी का सम्मिश्रण अनिवार्य माना जाता है- ‘सप्तपदी में ऐसे ही नहीं कहती धर्मपत्नी/यद् इयं हृदयं तव/तद् इयं हृदयं मम/उसे हर युग में आना पड़ता है/मेरे पास/प्राप्त करने तुम्हारा हृदय।..’

‘तुम्हारी कल्पना से ही/चुराती हूँ अपना रूप/बन जाती हूँ हर बार वैसी/जैसी देखना चाहते हो/और तुम समझते हो मुझे/विधाता का अपरूप उपहार/जितने ध्यान से देखती हूँ तुम्हें/उतना निखारती हूँ अपनी आकृति/तुम मेरे दर्पण हो।” -ऐसा संश्लिष्ट यथार्थ! -कहीं कोई झिझक नहीं ..ज़रा भी हिजाब नहीं.. लेश मात्र भी संकोच नहीं.. यह कहने में कि मेरा यह अपरूप सौन्दर्य किसी न किसी से चुराया हुआ है- ‘चौर्यम्’!!.. जिसे पाप माना गया है.. और यह अभिमानिनी भरी दुपहरिया डंके की चोट इसका एलान कर रही है, पर मन के अन्तरतम कोने में झाँक कर देखा जाए, तो क्या सभी यह पाप नहीं करते? यदि रूप को कोई निहारने वाला, सराहनेवाला न हो, तो क्या रूप की कोई अर्थवत्ता हो सकती है? क्या बिना दुष्यन्त की आँखों के कालिदास की शकुन्तला का कान्तिमय लावण्य द्युतिमान हो सकता था? लेकिन ऐसी अनोखी कल्पना (?) क्या पहले कभी सम्भव हुई है? सीधा-सीधा परसा गया यह सुलगता हुआ सच,सारी तपन के बावजूद नकारा नहीं जा सकता। सब जानते हैं कि पर्त-दर-पर्त यह आदिम सत्य हम सबके अन्दर छिपा है- भौतिक सौन्दर्य में मानवमात्र की आसक्ति!!.. सुन्दर देह का मुग्धकारी आकर्षण..समुन्नत शरीर की माँसल ऊँचाई-निचाई!.. क्या..कभी..किसी क्षण..हम सभी को आकृष्ट नहीं करती?

‘अपरूप सौन्दर्य’ का प्रभाव कितना विस्फोटक हो सकता है, इस तथ्य से इतिहास के पन्ने पर पन्ने भरे हुए हैं। क्या यह अपने आप में एक विरोधाभास ही नहीं है कि एक ओर तो निहायत ही सतही चीज़ें, जैसे- नश्वर शरीर का दैहिक सौंदर्य!!.. ऐन्द्रियता!! आदि-आदि प्रतिमान, स्वयं के ‘शाश्वत सत्य’ होने का दावा करें और दूसरी ओर धार्मिकता का ढिंढोरा पीटकर देह के सत्य को सर्वदा झुठलाया जाए (?) उसे क्षुद्र और हीन माना जाए, पर शायद ये प्रश्न सदा अनुत्तरित रहे हैं और रहेंगे।

दरअस्ल व्यष्टि का सच कुछ और होता है और समष्टि का कुछ और। दैनन्दिन जीवन में हम ढेरों ऐसे काम करते हैं, जिन्हें व्यक्तिगत स्तर पर सही मानते हुए भी हम सामूहिक रूप से उनका अस्वीकार और तिरस्कार करते हैं। इस सन्दर्भ में जैनेन्द्र कुमारजी द्वारा स्थापित किए गए कई तथ्य याद किये जा सकते हैं।

अर्सा पहले वैज्ञानिकों ने एक सत्य का प्रतिपादन किया था- ‘हम सबका जीवन किसी दूसरे की क़ीमत पर चलता है।’ क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दूसरों से कुछ छीन कर ही अपने को बचाते हैं?… यदि हम किसी वस्तु का भोग न करें, तो क्या वह अनायास ही किसी दूसरे के काम नहीं आ जाएगी? लेकिन क्या साधु-से साधु आदमी ने भी कभी इस ख़्याल को तवज्जुह दी है? इस पर निमिष मात्र के लिए भी सोचा है? क्या किसी ने भी यह माना है कि इस धरती पर बिताया हमारा प्रत्येक क्षण किसी और का दान है? बल्कि इसके विपरीत हम हमेशा यह मानते रहे हैं कि देखो! हम कितने महान हैं।.. अहर्निश दूसरों का भला सोचते रहते हैं.. लेकिन क्या करेंगे आप (?) जब आपकी आँखों के सामने प्रकाश की चुभती लौ लाकर ‘नगरवधू’ दावा करेगी ‘अन्य जीवन’ से साधिकार ‘छिनताई’ का, कह पाएँगे आप (?) यह ग़लत है? जब वह नकारेगी प्रकृति और अन्तरिक्ष के रेशों से बने नदी-से ‘दुकूल’ को और आदेश देगी ‘अन्य जीवन से छीने गये रंगों से’ अपने वस्त्र-निर्माण का। उसकी काया की जीत होगी उसकी आत्मा पर- ‘मुझे चाहिए एक पोशाक/जिसे काटा छाँटा गया हो मेरी रेखाओं से मिलाकर/इतना सुचिक्कन कि मेरी त्वचा/इतने बेलबूटे कि याद न आये/हत्भाग्य पतझड़/सारे रंग जो छीने गये हों/अन्य जीवन से/इतना झीना जितना नशा/इतना गठित जितना षड्यन्त्र/मैं हर दिन बदलती हूँ चोला/श्रेष्ठजनों की सभा में/आत्मा नहीं हूँ मैं/कि पहने रहूँ एक ही देह/मृत्यु की प्रतीक्षा में।’ यह ‘झीना आवरण’ इतना हल्का और पारदर्शी है, जितना नशा और इतना संगुम्फित जितना षड्यन्त्र..। यह जो ‘नगरवधू’ का ‘देह रूपी इन्द्रजाल’ है, वह है क्या? शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की कीर्ति? निरभ्र आकाश में दमकती सौदामिनी? सरसों के फूलों की सुनहली कांति? नहीं.. यह तो एक नामालूम ‘ठीकरा’ है.. बेकार.. झूठा और फ़ालतू-सा। नगरवधू ने अपनी सोलह कलाओं से उस पर लकीरें खींचकर, सूर्य-किरणों के साथ मिलकर ऐसा तिलिस्म रचा कि पूरी पृथ्वी उस इन्द्रधनुषी जाल में फँस गयी- ‘..श्रेष्ठजन पुलकित रहते हैं इन दिनों/मेरी कला की अतिरिक्त कलाओं से/वे आतुर हैं जानने को कि/सूर्य की किरणों को भी विभाजित/करने वाला/एक नगण्य काँच का टुकड़ा/किस उपेक्षित कोने में पड़ा है/रहने दो यह झीना आवरण/तुम मेरे रहस्य हो।’

परात्पर होने के लिए भी पहले देह से गुज़रना पड़ता है। मनुष्य को जीवन में देवत्व प्राप्त करने के लिए ‘मानुष देह’ की अनुभव यात्रा पूरी करनी पड़ती है। राह में चाहे असुरत्व का जंगल आये, पर यम के द्वार पर जाकर ‘ब्रह्म सूत्र’ समझने के लिए नचिकेता को भी यह यात्रा करनी पड़ती है। क्या इस लक्ष्य का प्रथम सोपान ‘देह’ ही नहीं है (?) क्या इस प्रथम सीढ़ी पर पैर रखे बिना आगे बढ़ा जा सकता है- ‘अप्सराएँ आती हैं मेरी सभा में/सीखने वह दिव्य संचालन/प्रेम प्रारम्भ में/दो देहों का नृत्य ही तो है।’

और अब नगरवधू के ‘रंगमहल’ के ‘मिथ्यालय’ का ‘सत्याभास’- ‘सब कुछ समझ कर आते हैं दर्शकगण/मेरी इच्छा पर हँसने-रोने/जानते हैं/अभिनय है/मानते हैं जीवन/पहचानते हैं मुझे/परन्तु स्वयं भी अभिनेता बनकर/छल करते हैं नहीं जानने का। मैं रचती हूँ सत्याभास/वे देते हैं विश्वास का भ्रम/…मूर्ख बनने का अद्भुत स्वाद लेने/सभागार में आते हैं श्रेष्ठजन।’

अपने अन्त.. अपनी परिणति से अनजान नहीं है ‘नगरवधू’। उसे भूत-वर्तमान- भविष्य..तीनों कालों का सही-सही अन्दाज़ है- ‘यूँ ही कभी/हठात् मत चले आना/मेरे रंगमहल में/आया था जैसे/भर्तृहरि-सा जोगी/और देखकर/मेरी निष्प्रभ आँखें, फीके अधर, पीली त्वचा/और उजड़े केश/कह गया था/हाय!/प्रातः नभ का चन्द्रमा’- पर फिर भी क्या उद्दाम यौवन की समुद्र-सी ठाठें मारतीं लालसाओं को झुठलाया जा सकता है?.. क्या उसी चरम तृप्ति के क्षण में हठात् ‘समाधि’ का बोध नहीं होता?.. क्या कर्मफल ही सबकुछ है(?) कर्म कुछ भी नहीं(?).. क्या मात्र भविष्य के लिए स्वयं को वर्तमान के सुख से वंचित किया जा सकता है(?) ..नगरवधू इन सिद्धान्तों से जद्दोजहद तो ज़रूर करती है, लेकिन क्या एक भय निरन्तर उसकी अन्तःसलिला में नहीं बह रहा (?) क्या उसे राजा भर्तृहरि के ‘नीतिशतक’, ‘शृंगार-शतक’ के बाद की ‘वैराग्य शतक’ की संरचना भयभीत नहीं कर रही (?).. विस्मयकारी है यह तथ्य कि समझ में कमी नहीं पर अपनी स्थिति और मन पर वश नहीं। हालात् यह कि भविष्य के क्षितिज पर कौंधता प्रतिफल वज्र की तरह वर्तमान में आ गिरता है- ‘तुम चले गये/तुम्हारी तरह/..प्रेम की अवाक् पुकार पर/सरल रेखा की तरह खिंचते/तुम चले गये बिना किसी शैली के।.. या यही मृत्यु है/जबकि सबकुछ रह गया पहले सा/मैं भी मेरा जीवन भी/रह गया लोकस्मृति में/खीज रह गयी कुछ नहीं पाने की/शरीर गया पर रह गया अशरीर/रह गयी पिपासा जो नहीं मिटेगी जल से/मृत्यु भी पूर्ण नहीं कर सकी/एक अर्द्धसमाप्त जीवन।’

वैयक्तिकता पर समाज की और प्रेम पर अनुशासन के सिद्धान्तों की सदा ही विजय होती है, पर क्या ‘अर्द्ध समाप्त जीवन’ का कोई अस्तित्व नहीं?.. क्या उसके ही इस ‘रंगमहली मिथ्यालय’ ने आगन्तुकों को सहजता और सरलता की ओर नहीं धकेला?..

आरम्भ में एक प्रश्न पैदा हुआ था कि आख़िर इस ‘नगरवधू’ की असाधारणता क्या है?.. क्यों यह आज तक चित्रित नगरवधुओं से भिन्न है? इसका उत्तर स्नेहलता रेड्डी ने अपने ‘सीता’ नाटक के सन्दर्भ में यों दिया है- ‘आज तक ‘रामायण’ हमेशा पुरुषों द्वारा लिखी गयीं, अतः उनमें सीता के द़ृष्टिकोण की कमी रह गयी। एक पत्नी अपने पति से क्या अपेक्षाएँ रखती है (?) ..उसका हृदय कब पूर्णता बोध करता है?.. क्या राम का केवल ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ होना ही सीता के लिए पर्याप्त था?.. क्या उसकी आकांक्षा एक प्रेमी, एक सखा, एक पिता को पाने की थी, जो उसके छोटे-छोटे सुखों-दुःखों का साझा करता?.. क्या राम उसे सही अर्थों में पत्नी होने का सुख दे पाये?’ उनकी सीता ने कई बार राम के उन कृत्यों को चुनौती दी है, जो उनके पति-पद के लिए अवांछित थे। अन्त में स्नेहलता रेड्डी ने माँ सीता के भूमिगमन को ‘श्रीराम’ का अस्वीकार कहा है- ‘राम! तुम मुझे क्या अस्वीकार करोगे, लो मैं तुम्हें अस्वीकार करती हूँ’, कहते हुए सीता धरती में समा गयीं।

रामायण के इस नये दृष्टिकोण के बरअ़क़्स ही हम ‘अजन्ता देव’ की नगरवधू को रखें, तो पाएँगे कि नगरवधू पर दया करना इतर है और उसकी पीड़ा को समझना पूर्णतः भिन्न। विशेषकर उस दर्द को, जो कि ‘स्व’ के अभिमान से जन्मा हो और जिसमें कोई ग्लानिबोध न हो। इस ‘नगरवधू’ को पता है कि ‘आम्रपाली’ की तरह उसे ‘बुद्ध’ की करुणा का अवदान नहीं मिलेगा, इसलिए वह किसी से कोई याचना नहीं करती।

क्या एक वकील की तरह हम साबित कर सकते हैं कि नगरवधू ने ‘पाप’ किया है?.. अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ा है? शायद हाँ.. शायद नहीं.. इसीलिए हम ‘नगरवधू’ के उद्गारों की सर्पिली गलियों में घूमते हुए एक ऐसे चौराहे पर आकर खड़े हो जाते हैं, जहाँ ‘निचाट’ सन्नाटा है- आदमज़ाद और रोशनी तो दूर.. हवा तक का नामोनिशान नहीं है।.. क्या यह ‘अर्द्धसमाप्त जीवन’ का श्राप है, जिसने प्रकृति को भी आच्छादित कर लिया है?..