
वरिष्ठ लेखिका।‘सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)। ‘एक शख्स कहानी–सा’ (जीवनी) ‘लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’, ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

‘बहूजी! आपके कैलेन्डर में चाहे जो लिखा हो, सच्चाई ई है कि ‘महालया’ चौदस (चतुदर्शी) को है, और चौदस एक दिन पहले है- अरथात नौ अक्टूबर को! और यह बात हम कोई ऐसे वैसे नहीं कह रहे- उज्जयिनी से परकासित यह पंचाग ऐसा ही दिखा रहा है।’
मैंने अपने मैथिल पुजारी को घूर कर देखते हुए कहा- ‘पंडितजी! आप तो ऐसे जोर देकर कह रहे हैं जैसे आप साक्षात कालिदास ही हैं। ‘उज्जैन’ को ‘उज्जयिनी’ कह रहे हैं और वहाँ के पंचांग का परचम यों फ़हरा रहे हैं मानों ‘मेघदूत’ का यक्ष विंध्याचल पर्वत को हिमालय से और नर्मदा को गंगा से श्रेष्ठतर सिद्ध कर रहा हो! आख़िर उज्जैन का पंचांग इस काशीवाले पंचांग पर भारी कैसे हो सकता है?’
‘बींदनी जी, हम तो आपकी पढ़ाई-लिखाई के बड़े काईल (क़ायल) हैं, पर बड़ा अचरज होई रहा है कि आपको यह जानकारी भी नहीं कि ‘करक रेखा’ उज्जैन को ‘बीचोबीच’ से काटती है, और ऐही खातिर राजा जयसिंह ने भी वहाँ …का कहत है एक ‘भेदसाला’ (वेधशाला) जंतर-मंतर भी बनाय दिया कि यहाँ से नक्षत्रन की गनना सबसे बढ़िया होएगी।’
‘पंडितजी! क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उज्जैन के मध्य से ‘ट्रॉपिक ऑफ कैंसर’ (हम सब अँग्रेजी की दुम जो ठहरे) गुजरती है?’
‘हाँ! हाँ वो ही करके रेखा। आप सही समझे हैं। आपका विस्वास न होवे तो नक्सा में बाँच लें। बींदनीजी! वैसन भी उज्जयिनी है बड़ी भयानक नगरी। हम ‘जालान सिठानी’ के संग उहाँ गए थे ज्योतिर्लिंग की पूजा कराने और संगै ही ‘काल भैरव’ को सराब (मदिरा) भी पिला आए थे।’
‘पंडितजी, आपका दिमाग़ ख़राब है क्या? पहले के कालिदास ने और आज के अमृतलाल बेगड़ ने वहाँ के सौंदर्य वर्णन में ‘थान के थान’ नाप दिए और आप फ़रमा रहे हैं भयानक!’
‘अरे! नाहीं बहूजी! बहोत जगह ‘घूरे’ (घूमने) के कारन, हमार बोली लटपटा ज़रूर गई है, पर ईहाँ हम भयानक ई खातिर बोले कि वहाँ ‘महाकालेस्वर मंदिर’ मा ‘स्मसान’ से ताजा मुरदा का ‘भसम’ लायकर आरती होत है। ब्राह्म मुहरत में ‘भस्मार्ति’।’
ऊँ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
मृत्यु से लड़कर उस पर विजय प्राप्त करने का यह महामृत्युंजय मंत्र- महाकालेश्वर में सर्वदा गूँजता रहता है।
प्रश्न- ऐ! जीव तुम यहाँ कैसे?
उत्तर- बंगाल की घुमक्कड़ी मिट्टी से बना यह तन कौतुकप्रिय स्वभाव और कौतूहल भरे मन के साथ आ विराजा है इस महाकालेश्वर की भस्मार्ति में। ब्राह्ममुहूर्त क्या! आधी रात से ही मंदिर के बाहर भक्तों की कतार में संज्ञाशून्य-सा बैठा यह मन निश्चित नहीं कर पा रहा कि- आजन्म ‘पूजाहीनम्’, ‘मंत्रहीनम्’, ‘क्रियाहीनम्’ वाला यह तन यहाँ क्या करने आया है! क्या यह उम्र का तक़ाज़ा है (?) जिसमें ‘अनाहत स्वर’ और ‘अलौकिक स्पंदन’ को महसूस करने की आकांक्षा बढ़ती जा रही है?.. पहले ‘बहुतेरी’ बार जब ऐसी कोई इच्छा होती थी, तो मेरा स्वच्छंद और अधीर स्वभाव इसे मेरे बचकानेपन के ‘खाते में खता’ देता था। वैसे आज का कठोर सत्य यह है कि पूजा की ‘झूड़ी’ (टोकरी) गोद में रखे यह यहाँ मौजूद है और उत्सुक है ‘मृत्यु द्वारा जीवन का उत्सव’ समझने हेतु।…
विशाल कक्ष में… विराट दीपक के आलोक में भव्य शिवलिंग का शृंगार हो रहा है… घी से अंग-अंग स्नेहमय करने के पश्चात दूध, दही, नारियल जल आदि से अभिषेक आरम्भ होता है। गुडेंचा बंधुओं के स्वर गूँज रहे हैं- ‘करालं महाकालं कृपालम्। गुणागार संसारपारम नतोऽहम्’! कुछ वायवीय-सा समाँ है कि अचानक पूरा कक्ष आलोकित हो उठता है- सिंहासन पर एलोरा की माहेश्वर मूर्ति सरीखे विक्रमादित्य विराजित हैं और उनके दाएँ-बाएँ ‘नवरत्न’ शोभित हैं।… नर्तकी मंगलाचरण के अंतिम पद पर नृत्य समाप्त कर रही है। तानसेन आसन से उठ, राजा को कोरनिश बजाकर तानपूरे पर अहीर भैरव में महाकालेश्वर की बन्दगी करते हुए दिखते हैं- सरितागन भिन्न-भिन्न पंथ जैसे/अवत सिंधु पाई रहित मगन/तानसेन कहत ऐसे भगत/भिन्न भिन्न धरमन/उपासती भिन्न-भिन्न/एक ही ब्रह्म पावत’, क्षणमात्र में ही ‘ब्रह्माविर्भाव’.. नर्तकी, राजा, नवरत्न… सब अदृश्य।… बस… सूने कक्ष में मात्र ज्योतित दीया।
अहर्निश जलता यह ‘दीया’ अनश्वर कैसे हुआ? मिटा क्यों नहीं? क्या यह साक्षात ज्ञान है?… ‘आत्मा है?’ चैतन्य है? या ‘दीये’ की अनश्वरता काल का ही चक— है?… और ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’ के तहत राजा-नर्तकी-सभासद आदि इस ‘दीये’ के वस्त्र हैं? या यही वह शाश्वत सत्ता है, जो चक— की धुरी की तरह परिधि का न्यास करती हुई भी उसकी नश्वरता से परे है? स्थिर है? क्या यही परात्पर है?… क्या यही कबीर है, जो गुहार मचा रहा है… ‘रात सोया कौन?’ जो उठा, क्या वह वही था?.. क्या निद्रा मृत्यु नहीं? और जगना पुन: जन्म?
क्या यह जन्म एक पड़ाव मात्र है?… मन अकुला रहा है, सिर घूम रहा है।… हे भगवान! हँसती-खिलखिलाती इस काया को तुमने कहाँ फँसा दिया?
‘देवी! पुष्पांजलि एवं नैवेद्य अर्पित करें’- यह निर्देश वापस यथार्थ की धरती पर ले आया। चलो छुट्टी हुई… सोचते ही हाथ-पैर, आँख, नाक सब क्रियाशील हो उठे। अद्भुत शृंगार से शिव का रूप दमक रहा है… मीनार सदृश्य अर्ची से चार पुजारी चार दिशाओं से आरती कर रहे हैं… सद्य: चिता की भस्म से उपासना आरम्भ हुई और सम्पूर्ण शृंगार देखते ही देखते भस्मीभूत हो गया। अरे! यह क्या? दो घंटे तक पूर्ण शृंगार!! अब फिर सब कुछ राख में?… इसका क्या अर्थ है? क्या यह हम अज्ञों को जीवन का क—म सिखाने की कोई ख़ास शैली है?… क्या यह अलिप्तता का पाठ है?… पुन: पुन: यौवन,… जरा पुन: पुन:… पुन: पुन: मृत्यु… शैशव पुन: पुन:!…
क्या त्याग और भोग दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं?… अर्थात शृंगार भी सही और भस्म भी सही? ब्रह्म सत्य पर जगत भी मिथ्या नहीं? जैसे यह शृंगार नश्वर है, वैसे ही है यह भस्म! दोनों को सत्य मानें या भ्रम, यह तुम्हारी अपनी प्रतीति और नियति है। इस काल के आवृत्त को सत्य या भ्रम… चाहे जो मान लो… सत्ता दोनों की ही है।… तुम्हारी गति, मुक्ति, भोग और त्याग सब गर्भनाल की तरह इस जीव से जुड़े हैं। … शायद पुरखों ने ठीक ही कहा है- ‘कथा है कि कोई अंत नहीं/ अंत ही है इसका प्रारम्भ/ मनुष्य एक सूक्ष्म बुदबुद/ क़ैद इस वृत्त में।’ अंजलि के शब्द वातावरण को आच्छादित कर रहे हैं- ‘बुद्धिम् देहिम्, रूपम् देहिम्, भक्तिम् देहिम्, रूपम् देहिम्! वरम् देहिम!’ ‘क्या इच्छा है! द्रौपदी, अहिल्या, शकुंतला-सा रूप चाहिए?’ ‘नहीं-नहीं, मुझे ययाति नहीं बनना है।’ ‘क्या अमरत्व चाहिए?’
‘जर्जर जीर्णशीर्ण विचारों से रचा-बुना यह तन-मन लेकर क्या होगा? बल्कि इस मत्त चतुर को दक्ष यज्ञ की तरह ध्वंस कर दो!’…
यदि ‘सती’-सी ‘सिद्धि’ देनी है, तो अनुग्रह करो कि यह काया गल कर, जल कर, सड़ कर, धरती में समा कर, जब फूटे तो कंटकाकीर्ण क्षुद्रताओं से मुक्त हो… और प्रेम-वेलि की तरह इस धरती को सुवासित कर दे। कम से कम स्वार्थों के संजाल से घिरी इस धरती को और बोझिल न बनाए। … क्या ये विचार और शब्द मेरे हैं?.. या कोई प्रेतकाया मुझमें समा गई है?
सुबह से रात तक जोड़-तोड़ बैठाते इस साधारण पिंड के भी परे हैं ये विचार!!
उजड़े मेले-सा मंदिर वीरान था। भक्तों की श्रद्धा से आलोकित विराट शिवलिंग अपनी विद्यमानता से उस सन्नाटे को और गहरा रहा था। इस ‘सूईपटक’ सन्नाटे ने रोमांच की एक लम्बी सिहरन रीढ़ की हड्डी पर खींच दी।
तभी आवाज़ें सुनाई पड़ीं ‘अरे भई! उठो भी। पूरा मन्दिर खाली हो गया है और तुम ‘भाठे’ (पत्थर)-सी बैठी हो। कर्क मन्दिर, कालिदास की गढ़कालिका और ओंकारेश्वर नहीं चलना है क्या?’
पानी में भीगे पक्षी की तरह शरीर को तोड़-मरोड़ कर, फटकार-झटकार कर फुर्ती से समेटा। प्रभु को धन्यवाद देती हुई उठी कि राग से भरे मन में यह विराग, ‘श्मशान वैराग्य’ की तरह तो ठीक है, पर इस काया का यह न तो स्थायी भाव है और न ही संचारी। उद्दीपन भाव में कभी-कभी विवादी स्वर भी सोह जाता है… पर कम ही।
चंद्रगुप्त द्वितीय का यह छोटा सा शहर ‘उज्जयिनी’ अपने आँचल में ढेरों-ढेर पौराणिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक अजूबे समेटे है। दो-दो ज्योतिर्लिंग, एक सिद्धपीठ, संदीपनी आश्रम, मदिरा पीते कालभैरव, बावन कुंडों का सूर्य मंदिर, लाखों वर्ष पुराने डायनासोर-शुतुरमुर्ग के अंडे, साढ़े चार लाख वर्ष पुराना विशाल हाथी-मस्तक और ‘गैंडे की सींग’ आदि-आदि। 1963 के पश्चात् कोई भी उत्खनन न होने के कारण पुरातत्ववेत्ता डॉ. व्ही. एस. व्हाकरणकर बहुत आहत हुए थे। उनके अनुसार अनेकानेक पुरुषार्थी एवं संस्कृति प्रेमी राजाओं द्वारा पालित-पोषित यह नगरी सघन सम्पदाओं की अधिष्ठात्री है। ईसा से चतुर्थ सदी पूर्व ही उज्जैन को समय-सारिणी ‘ग्रीनविच’ केन्द्र मान लिया गया था। नक्षत्र गणना के ‘सूर्य सिद्धांत’ एवं ‘पंच सिद्धांत’ भी यहीं रचे गए थे। वर्तमान में कालिदास अजायबघर के प्रमुख सोलंकी जी ने बताया कि आप 21 जून को वेधशाला से सूर्य का दक्षिणायन गमन साफ-साफ देख सकते हैं। ‘कर्क मंदिर’ के ‘सीमेंट पट’ पर लिखा हुआ है- ‘इस स्थान पर कर्क रेखा की काट के कारण 21 और 22 जून 1963 को, डॉ. व्हाकणकर ने ‘शून्य गुरुत्वाकर्षण’ जीरो ग्रेव्हिटी परीक्षित की है।’
पग-पग में अनगिनत तथ्य एवं कहानियाँ समेटे महिमामय उज्जैन को विदा करना कठिन था, लेकिन ‘ओंकारेश्वर’ की ज्योति और माण्डू से आती ‘मेघ मल्हार’ और ‘दीपक राग’ के सुर अपनी ओर खींच रहे थे। इस खिंचाव से खिंचे हमारे क़दमों ने ओंकारेश्वर में प्रविष्ट होते ही प्रकृति का मनोहारी दृश्य देखा।
ओंकारेश्वर के चरणों में बहती नर्मदा के गर्भ से नवजात शिशु की लालिमा लिए सूर्य पैदा हुआ और कुछ ही क्षणों बाद बिना रोए-गाए उसने हँसते-हँसते अपने हाथ-पैर खोल अपने पूरे क़द को प्राप्त कर लिया। आँखें झपकाकर उसने ओंकारेश्वर के शिखर कलश को स्वर्णशृंग से दमका दिया, फिर ‘पाँडवों के महल’ के छज्जे में खड़ी द्रौपदी को मुस्कुराकर देखता हुआ वह अपने कुरुक्षेत्र के मध्य ऐसे जा खड़ा हुआ जैसे कृष्ण की फटकार सुन अर्जुन आगे बढ़ आया हो। उसके प्रकाशमय प्रतिबिम्ब को नर्मदा जल ने वापस उसे ही अर्पित कर दिया।
‘कबीर चौराहे’ पर बिंदास कबीर खड़ा है।… ज्ञान-कर्म-अर्थ-धर्म-मोक्ष के चारों रास्ते सामने हैं… पर कबीर किसी को भी न चुनकर स्वयं में ही स्थित हो जाता है। रास्ते बार-बार उसका आह्वान कर आगे बढ़ जाते हैं, पर थक कर उसी में लौट आते हैं। कबीर को कहीं नहीं जाना है। ‘ओंकारेश्वर’ को ही वहाँ आकर कबीर में उगना है। इस कलिकाल में कबीर ही ऐसा घटा सकता है।
ओंकारेश्वर की सांध्य-आरती के बाद रुद्राभिषेक में ‘नमामीशमीशान निर्वाण रूपम्’ के अर्थ पुन: महाकालेश्वर के भावलोक में खींच रहे थे। इस बहकती गाड़ी को विचारों से ठेल कर पटरी पर डाला और ‘यायावरी’ मन मिज़ाज़ लिए आ धमके माण्डू में।
‘माण्डू’ के प्रति आकर्षण का प्रमुख कारण है प्रख्यात कवि प्रयाग शुक्ल। सांगीतिक ज्ञान, रंग-कर्म का ज्ञान और चित्रकला- ज्ञान के धनी प्रयाग भाई ने कई वर्ष पहले माण्डू का जिक्र बहुत प्रेम से किया था। कवि वाणी होने के कारण वह इस ‘साधारण सहृदय’ को लालायित करने के लिए काफ़ी था।
मालवा का यह समृद्ध एवं सुरभित इलाका माण्डू अनेकानेक परमार, सुल्तान, मुगल एवं पँवार राजाओं की कर्ममयी रंगस्थली रहा है। यहाँ के इतिहास में विध्वंस और तोड़-फोड़ न्यूनतम और स्थापत्य कला अपने चरम शीर्ष पर पहुँची। माण्डू के संगीत प्रेमी गायक राजा बाज़बहादुर ने अपने राज्यकाल में यहाँ कला एवं संस्कृति को समृद्धतम किया। बाघ गुफाओं में बने चित्र अजन्ता (500 शती ईसा पूर्व) के गुफा-चित्रों की तरह ही आकर्षक हैं। उन्हें भी बाज़बहादुर ने संरक्षण प्रदान किया, पर मूलत: संगीत प्रेमी होने के कारण उसने अनेक स्थानों से गायकों को आमंत्रित कर उन्हें माण्डू का स्थायी निवासी बनाया और संगीत घरानों को ऐसी ऊँचाई दी, जो माण्डू ने कभी देखी न थी।…
यही राजा बाज़बहादुर एक बार शिकार का पीछा करते हुए घने जंगल में खो गया।… मारे प्यास के उसका दम निकल रहा था कि उसके कानों में ‘राग-बसंत’ के स्वर गूॅँजे। उसकी कंठ-प्यास बदल गई कर्ण तृषा में! उस संगीत लहरी का सहारा लिए वह आगे बढ़ा और उसने नर्मदा किनारे एक ग्रामीण नवयौवना रूपमती का ध—ुपद शैली में अप्रतिम गायन सुना। संगीत ज्ञानी होने के कारण रूपमती की गायन की सघनता, गहनता और सिद्धि उससे छिपी न रही। उस कोकिल कण्ठी मधुर आवाज़ का दीवाना बाज़बहादुर मंत्रमुग्ध-सा रूपमती के पिता के यहाँ याचक के रूप में जा उपस्थित हुआ और रूपमती की भिक्षा माँगने लगा।
प्राचीन ‘योजनगंधा सत्यवती’ के ‘मछुआरे पिता’ की तरह इस अर्वाचीन ब्राह्मण पिता ने भी वर्तमान ‘शांतनु’ बाज़बहादुर के सामने दो शर्तें राखीं। पहली शर्त थी कि रूपमती को रोज़ नमर्दा दर्शन करने की सुविधा हो एवं द्वितीय थी- ब्राह्मण कन्या होने के कारण उनका प्रणय गायन तक ही सीमित रहे।… राजा ने इन्हें स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि मृत्यु पर्यन्त निबाहा भी।
बाज़बहादुर ने माण्डू लौटकर ‘तुरत-फुरत’ शाही महल पर एक मण्डप बनवाया, जहाँ से आज भी प्रात: 4.30 बजे नर्मदा दिखाई देती है। अपने प्रेम को उसने मृत्यु पर्यन्त आध्यात्मिक ही रखा। यहाँ तक कि प्रतिदिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय ये दोनों संगीत-दीवाने आमने-सामने के मंडपों में बैठ कर संगीत-साधना करते देखे गये, पर कभी भी उन्हें एक साथ शयनकक्ष में नहीं पाया गया। (बिना माइक के यह अजूबा आज भी देखा और सुना जा सकता है-प्रतिध्वनि विज्ञान के कारण!) आपकी आँखों में अविश्वास की झलक देख वहाँ के बाशिंदे आज भी उनके नाम की कसमें खाते नज़र आते हैंं।
संस्कृत वाङ्मय के रचयिता प्रकांड विद्वान डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर ने एक बार कहा था कि ‘जब भी कोई कहानी सुनो, उसे नकार कर कूड़ेदानी में मत डालो। जैसे छत्रपति शिवाजी के लिए प्रचलित था कि ‘उनका कुत्ता उनकी जलती चिता में कूद गया था’ और वैज्ञानिकों ने इसे सिरे से झुठला दिया था, पर समाधि के पुनर्निर्माण के समय जब मानव शरीर से अधिक हड्डियाँ वहाँ से निकलीं, तब इस कहानी को मान्यता प्राप्त हुई।’ इसी प्रकार जब मुझे ‘लालगढ़’ महल (बीकानेर) में बताया गया कि षोड्षी ‘अल्लाह ज़िलाई बाई’ पैंसठवर्षीय राजा गंगा सिंह पर मुग्ध थीं और वे इस आँगन में बैठकर राजा गंगा सिंह के लिए गाया करती थीं और राजा गंगा सिंह तीन मंज़िल ऊपर बैठकर उनका गायन सुनते थे, तो यकीन नहीं हुआ। पर वर्षों बाद जब मुझे इन्हीं अल्लाह ज़िलाई बाई का कार्यक—म करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, तो मैंने पाया कि चौदह सौ श्रोताओं के सभागार के माइक उनकी आवाज़ की बुलंदी के कारण बंद करने पड़े। मुझे बीकानेर महल की बात याद हो आई, पर जब उनसे यह चर्चा की, तो वे ‘ठुमका मारकर मुस्कराईं’ और बात को टाल गईं।..
ऐसा ही एक वाकिआ जयशंकर प्रसाद के पुत्र रत्नशंकर जी ने सुनाया।… एक दिन काशी नरेश के यहाँ ‘सिद्धेश्वरी देवी’ के रात्रि गायन की महफ़िल सजी थी। प्रसाद जी की उपस्थिति में सिद्धेश्वरी जी का गायन पारिजात पुष्प की सुगंध-सा चारों दिशाओं में फैल जाता था। ठंड के दिन थे और ज्वर होने के कारण प्रसाद जी वहाँ देर तक रुक नहीं पाए और वे विश्राम करने घर चले गये।… सिद्धेश्वरी देवी ने आते ही हरकारा भिजवाया, ‘सिद्धेश्वरी बैठी है, आप आएँ तो गायन आरम्भ हो।’… प्रसाद जी ने उत्तर दिया-‘सिद्धेश्वरी से कहो, मैं यहीं से उसका गायन सुन लूँगा। वह वहाँ गाकर तो देखेे!’
सोचने की बात है कि अल्लाह ज़िलाई बाई तीन मंजिल नीचे बैठकर गाती रहती हैं… सिद्धेश्वरी देवी का गायन प्रसाद जी घर बैठकर सुन सकते हैं… जब मीरा-राधा का कृष्ण प्रेम, ऐन्द्रिक न होकर अतीन्द्रिय हो सकता है, तो रानी रूपमती और बाज़बहादुर का क्यों नहीं!…
संपर्क सूत्र : 3 लाउडन स्ट्रीट, कोलकता-700017
