वरिष्ठ लेखिका।सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)एक शख्स कहानीसा’ (जीवनी) लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

समकालीन आलोचक और निर्देशक नाटककार मोहन राकेश के ‘आधे-अधूरे’ को नाटक की नई विकास-यात्रा में प्रथम महत्वपूर्ण चरण मानते हैं। इस नाटक के कथ्य पर जब हम विचार करते हैं तो हमें यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह एक ऐसे सामाजिक व्यक्ति की कथा है, जो अपनी पदावस्था के कारण पराजित है। दूसरे स्तर पर वह अपनी निजी चिंताओं और अहम्मन्यता के आगे परास्त है। तीसरे स्तर पर वह अपने परिवार के बीच अपने संबंधों का अन्वेषण करता है और असफल होता है। अतः एक व्यक्ति की पारिवारिक और व्यक्तिगत मानसिक भूमियों के उस सामाजिक सत्य का प्रतिस्थापन इस कृति में किया गया है। जिसके कारण, आज की सामाजिक विसंगतियां मनुष्य के अस्थिर होने का कारण बनती हैं।

नाटक का प्रमुख पात्र महेंद्रनाथ अपने पारिवारिक संदर्भ से टूटा हुआ है। वह पराएपन और अकेलेपन को झेलने के लिए बाध्य है। यह व्यक्ति अंतर और बाह्य दोनों धरातलों पर अलग-अलग व्यक्ति है और यह स्थिति आज के अधिकांश नगर व्यक्ति की है। काले सूटवाले पात्र (महेंद्रनाथ) के इस कथन से यह बात और स्पष्ट होती है- ‘जो मैं इस मंच पर हूँ, वह यहां से बाहर नहीं हूँ, और जो बाहर हूँ-शायद अपने बारे में इतना ही कह देना काफी है कि सड़क पर, फुटपाथ पर चलते हुए, आप अचानक जिस आदमी से टकरा जाते हैं, वह मैं हूँ। बात इतनी ही है कि विभाजित होकर भी किसी-न-किसी अंश में आप में से हर व्यक्ति हूँ। यही कारण है कि नाटक के बाहर हो या अंदर मेरी कोई निश्चित भूमिका नहीं है।’ (आधे-अधूरे, पहला संस्करण) दरअसल यह पात्र सूत्रधार के रूप में नाटक की मुख्य संवेदना का विश्लेषण इन पक्तियों में कर देता है।

यहां ‘आधे-अधूरे’ की विवेचना इसलिए अपेक्षित है कि हिंदी नाट्य-परंपरा में यह कृति चिंतन-प्रक्रिया और जीवन-बोध के उन विविध स्तरों का उद्घाटन करती है, जिनके कारण समकालीन भारतीय मध्यवर्ग में बिखराव और संत्रास की स्थिति व्याप्त हो रही है। यह नाटक एक ऐसे परिवार को प्रतिनिधि रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें महेंद्रनाथ, सावित्री, उनका पुत्र अशोक, बड़ी पुत्री बिन्नी तथा छोटी किन्नी की पारिवारिक प्रक्रियाएं सामाजिकता के घरातल को ग्रहण करने के प्रयास में बिखर जाती हैं। परिवार से बाहर व्यक्ति हैं- जुनेजा, जगमोहन और सिंघानिया। पुरुष अर्थात महेंद्रनाथ व्यापार में अपना धन गंवा बैठा है और आर्थिक दृष्टि से संपूर्ण परिवार सावित्री पर निर्भर है। यह नाटक की वस्तुयोजना है, जिसे कथावस्तु या अभिधा के रूप में समकालीन आलोचक विवेचित करते हैं। परंतु समकालीन नाटकों में वस्तु के माध्यम से अर्थ  के अन्वेषण को ही श्रेयस्कर स्वीकार किया गया है।

‘आधे-अधूरे’ का हम इसी अर्थ के अन्वेक्षण की दृष्टि से विवेचन करेंगे। महेंद्रनाथ और सावित्री की कथा के माध्यम से हम देखते हैं कि अधूरेपन को भरने के लिए मनुष्य अपना घर बसाता है, किंतु ‘अधूरेपन’ की छाया का विस्तार ही इस परिवार की नियति बन जाती है। सावित्री परिवार के अधूरेपन को भरने के लिए भटकती है। इसी प्रक्रिया में वह सिंघानिया, जुनेजा, मनोज, जगमोहन इन सबके प्रति आसक्त होती है। परंतु ‘अधूरापन’ उसे हर जगह मिलता है। सभी चेहरे एक जैसे हैं, मुखौटे अलग-अलग हैं। इस प्रकार समकालीन जीवन के कुछ सघन बिंदुओं को यह नाटक रेखांकित करता है।

नारी अपनी सहज आकांक्षाओं, पुरुषत्व की खोज और पूर्ण पुरुषत्व की अवधारणा के अंतर्गत आर्थिक और भावनात्मक स्तर पर परिवार को सौहार्द्र सूत्र के माध्यम से पूर्णता प्रदान करती है। इस पूर्णता की अनुपस्थिति में पुरुष में पलायन की भावना का उत्पन्न होना सहज है। इसी की तीव्र अनुभूति व्यष्टि और समष्टि दोनों ही संदर्भों में नारी में एक प्रकार के भटकाव की स्थिति उत्पन्न करती है, और यह भी एक यथार्थ है। इस प्रक्रिया में पारिवारिक संगठन का विभाजित हो जाना, विशृंखलित हो जाना भी नैसर्गिक है। सावित्री हर अन्वेषण में टूटती है, भटकती है, फिर जुड़ने का प्रयत्न करती है। अतः इस प्रक्रिया में घटनाएं बार-बार अपने को दोहराती हैं। परिवार में एक बिखराव, परायापन और परस्पर संभाषणेतर स्थिति आ जाती है। नाटक के सभी पात्र संत्रास को अनिवार्य नियति के रूप में झेलते हैं।

आर्थिक स्थिति वह मेरुदंड है, जिसके टूटने या वि-सृजित होने से संपूर्ण पारिवारिक रचना खंडित, विशृंखलित और विरूपित हो जाती है। इस प्रकार सावित्री और महेंद्र एक-दूसरे के लिए अधूरे हैं, और उनके अधूरेपन का प्रभाव परिवार के संगठन पर पड़ता है। विन्नी मनोज से जुड़ती है परंतु वहां भी संबंधों में बिखराव है। वह जिस असमर्थता और पराएपन की स्थिति में पड़ती है, उसका उल्लेख यों करती है, ‘मैं इस घर से ही अपने अंदर कुछ ऐसी चीज लेकर गई हूँ जो कि किसी भी स्थिति में मुझे स्वाभाविक नहीं रहने देती। दो आदमी जितना साथ रहें, एक हवा में सांस लें, उतना ही ज्यादा एक-दूसरे से अजनबी महसूस करें।’ यह प्रतीति उसे मनोज से मुक्त होने के लिए बाध्य करती है। वह पुनः अपने टूटे परिवार में लौट आती है। पुत्र अशोक के मन में बेकार पिता के लिए एक करुणा है और मां के लिए एक आक्रोश है। साथ ही प्रभावशाली व्यक्तियों के घर में आने से वह अपनी निगाह में छोटा हो जाता है।

दूसरी ओर किन्नी माता-पिता, भाई-बहन से घिरकर भी किसी से लगाव का अनुभव नहीं करती। आर्थिक स्तर पर बिखरा परिवार एक विशेष प्रकार की संवेदना से गुजरता है। हर सदस्य एक शरणार्थी के रूप में है। पति के अस्तित्व को पत्नी स्वीकार नहीं कर पाती। पति पत्नी के मित्रों के अनियंत्रित आचरण को लेकर संत्रस्त है। वह अपने पारिवारिक वातावरण को इस स्थिति से मुक्त नहीं कर पाता, कारण वह स्वयं एक ‘अजनबी’ के समान है। अजनबीपन और पराएपन से त्राण पाने के लिए वह बाहर की दुनिया से जुड़ता है, स्वयं से भागता है। उसकी इस स्थिति का परिचय सावित्री के प्रस्तुत कथन से मिल जाता है, ‘महेंद्र भी एक आदमी है, जिसके अपना एक घर-बार है, पत्नी है। यह बात महेंद्र को अपना कहनेवालों को शुरू से ही रास नहीं आई। महेंद्र अब पहले की तरह हँसता नहीं, दीवारों से सिर पटकता है, बच्चों को पीटता है, बीवी के घुटने तोड़ता है, दोस्तों को अपना फुर्सत का वक्त काटने के लिए उसकी जरूरत है। महेंद्र के बगैर कोई पार्टी जमती नहीं।’ इस नाटक की वस्तु-योजना की ऐसे कथन में एक अर्थवत्ता है। आलोचना की आधुनिक शब्दावली में इस अर्थवत्ता को सूत्र रूप में यदि प्रस्तुत किया जाए, तो यह कहा जाएगा कि नगरीकरण के संदर्भ में, संबंधहीनता, अंतःसंघर्ष, अजनबीपन के यथार्थवादी रूप का प्रकाशन और बोध के विविध स्तरों का उद्घाटन करना ही इस कृति का मुख्य उद्देश्य है।

नाटक की घटना एक कमरे में घटती है, यह भी एक प्रतीक है।

आधुनिक जीवन-प्रक्रिया में मनुष्य स्थान और मानसिक धरातल, इन दोनों ही स्तरों पर संकुचित होकर जी रहा है। कमरे की हर वस्तु बार-बार बिखर जाती है, परिवार का हर सदस्य इस बिखराव के लिए उत्तरदायी है। यह स्थिति दोहरी अर्थवत्ता लिए हुए है। पहली अर्थवत्ता केवल अभिधा के धरातल पर हम ग्रहण करते हैं।

दूसरा धरातल सांकेतिक और व्यंजनामूलक है, अर्थात संपूर्ण परिवार इस कमरे में रहते हुए भी बिखरा है, हर सदस्य एक-दूसरे से असंपृक्त है। एक ही पुरुष पात्र को पांच अलग-अलग भूमिकाओं में प्रस्तुत कर नाटककार ने इस तथ्य की ओर संकेत किया है कि अलग-अलग चरित्र-गुण, किसी भी आधुनिक मनुष्य की वैयक्तिक और चारित्रिक विशेषता है। अर्थात महेंद्र, जगमोहन, सिंघानिया, जुनेजा सभी मिलकर आज के आधुनिक मनुष्य के संश्लिष्ट रूप हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। महेंद्र के स्थान पर जगमोहन या जुनेजा को रखने से स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। इन सभी पात्रों के गुणों को एक में समन्वित करने से ही एक पूर्ण आधुनिक व्यक्ति की सहज प्रतीति हो जाती है।

‘आधे-अधूरे’ (व्यापक रूप में इस भावधारा की समस्त नाट्य-कृतियों) की सार्थकता के प्रति जिज्ञासा और कौतूहल-भाव व्यक्त किए गए हैं। इस प्रसंग में प्रथम शंका यह उठाई गई है कि क्या ‘आज के मनुष्य के खंडित व्यक्तित्व को, मानसिकता को, समकालीन संत्रास को वे (लेखक) पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत कर सके हैं। कहना न होगा कि इस नाटक की यही दुर्बलता है।’ (स्वातंत्र्योत्तर हिंदी नाटक, लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय)

इसी रूप में नेमिचंद्र जैन ने निम्नलिखित भाव व्यक्त किए हैं, ‘यह नाटक केवल दो व्यक्तियों के बीच गलतफहमी या झगड़े को या अधिक से अधिक टकराहट की अनिवार्यता को ही पेश कर पाता है। उसे किसी बुनियादी इन्सानी संकट, पारस्परिक संप्रेषण के असंभव होने की स्थिति, अथवा किसी अन्य व्यापक कारण के साथ नहीं जोड़ पाता। यह दो इन्सानों या स्त्री-पुरुष मात्र के बीच, उठनेवाले सवालों की तह तक नहीं पहुंचता। इसमें न संबंधों की तार्किकता उपस्थित होती है और न किसी मानवीय स्थिति की अनिवार्यता ही। नाटक का पूरा अनुभव क्षेत्र बहुत ही छोटा, संकुचित और विशेष व्यक्तियों में सीमित है।’ (नटरंग, विशेषांक-नेमिचंद्र जैन, पृ.38)

इन दोनों प्रतिक्रियाओं की सार्थकता पर विचार करना इसलिए अपेक्षित है कि यह केवल ‘आधे-अधूरे’ की रचना-प्रक्रिया और भावबोध तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जैसा ऊपर संकेत किया गया, बड़े परिप्रेक्ष्य में यह बात कही गई हैं। साथ ही समकालीन नाट्य-कृतियों की सार्थकता के सम्मुख यह प्रश्नचिह्न भी लगाती है।

बहरहाल समकालीन नाटकों की रचना-प्रक्रिया और उसमें व्यंजित संवदेना के परिप्रेक्ष्य में ही वस्तुस्थिति का परीक्षण संभव है। स्मरणीय है कि आधुनिक नाटककार घटना की अपेक्षा एक स्थिति विशेष को रूपायित करता है, और स्थिति विशेष में मानव-नियति और उसके आचरण के उत्प्रेरक तत्वों की ओर संकेत करता है। विशेषकर मनुष्य को अवमूल्यित और स्खलित करनेवाली स्थितियों का संकेत यहां होता है। नाटककार घटना की स्थूलता के प्रति आकृष्ट नहीं होता और पात्रों के आचरण की अपेक्षा वह पात्रों की आंतरिकता का उद्घाटन करता है। इस प्रसंग में कथा का जितना अंश प्रत्यक्ष अपेक्षितः है, उतने को ही नाटककार ग्रहण करता है और घटना एक स्थिति या संकेत के रूप में ही रह जाती है।

‘आधे-अधूरे’ के सभी पात्र परस्पर संबंधों के लिए आशंकित हैं। वस्तुतः सावित्री की भावात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को नाटककार ने जिस यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया है, उसे पकड़ने में संभवतः आलोचक और पाठक की दृष्टि बार-बार फिसल जाती है। सावित्री (और उसकी स्थिति की प्रत्येक नारी) संपूर्णत्व अर्थात दांपत्य का संपूर्णत्व चाहती है, साथ-ही-साथ परिवार को इकट्ठा रखने का दायित्व भी उसका ही है। बेकार पति, बेकार पुत्र और पुत्रियां सब उसके विरोधी हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी मनःस्थिति है, वस्तुस्थिति को झेलने और देखने की अपनी-अपनी मानसिकता है। सावित्री जीवन को जिस रूप में भोगती है, उसमें उसकी सहजता सूख जाती है। भावना और आत्मीय संबंध मर जाते हैं- ‘मोहन राकेश उस औरत को भावुक बिलकुल नहीं बनाना चाहते हैं, कारण उनकी यह प्रतीति थी, कि बहुत भोगा है उस औरत ने।’ (सारिका, मार्च, 1973)

नाटक की सभी अनुवृत्तियां (कथा घटनाएं) समय संदर्भित हैं। इसके पात्र पात्र न रहकर समय के संदर्भ में प्रवृत्तियों के प्रतिरूप बन जाते हैं। इसलिए प्राचीन नाटकों की पात्र-परिकल्पना से इनकी परिकल्पना सर्वथा भिन्न है। जो कुछ यहां घटता है वह घटना न होकर, परिस्थिति है, जो बार-बार घटित होती है। (अंश)