युवा कवि। कविता संग्रह जीवन राग। संप्रति कृषि कार्य।

आओ प्रिय

जब तलवे में खुजली होती है
मन कहता है कि
तुमने ही छेड़ी होगी बात
सखियों से बतिया रही होगी
हमारे बारे में ही

रात के तीसरे पहर किताब पढ़ते हुए
हिचकी आती है
हाथ से छिटककर गिर जाती है किताब
दोस्त कहता है कि
जरूर भाभी ने याद किया होगा
इस समय और कौन जागते रहकर
तुम्हें याद करता होगा

तुम्हारे उपवास वाले दिन
खाना खाते हुए हाथ से गिर जाता है कौर
पानी का गिलास सहसा ढुलक जाता है
फर्श पर
मां कहती है
जरूर तुम भूखी होगी अब तक

जो मेरा मन कहता है
जो दोस्त कहता है
जो मां कहती है
आओ प्रिय!
यही बात हम उनसे कहें
जो ब्याह को गठजोड़ कहते हैं

कहें
कि पति-पत्नी भी दुनिया के
सबसे खूबसूरत प्रेमी युगल होते हैं।

हँसी

पेड़-पौधे हँसते हैं
जब आता है वसंत
नई कोपलें-जैसे चमकते हैं दांत
टूथपेस्ट के विज्ञापन में मुस्काती
किसी नायिका की तरह

नदियां भी खिलखिलाकर हँसती हैं
नवयौवना की तरह
जब गिरती है बारिश, बूंद-बूंद
जर्जर हो चुकी देह की धार में
जब खेतों के आसपास होता हूँ मैं
मेरी उपस्थिति में उन्हें
देखता हूँ हँसते हुए
मुस्काते हुए फसलों को

पहाड़ी के पीछे से जब
उगता है सूरज
धरती हँसने लगती है
ठीक धरती की हँसी जैसे हँसते हैं
पशु-पक्षी, वन्यजीव
न ईर्ष्या
न घृणा
न द्वेष

और आदमी की हँसी
तौबा-तौबा!
दया के पात्र हैं वे लोग
जो मुंह पर रुमाल रखकर
या मुंह फेरकर हँसते हैं।

भीड़ भारत

अंधेरा उजाले के आवरण में छुपा है
आवरण तोड़ने से पहले
कठिन है उसे चिह्नित करना

कोई कैमरा ऐसा नहीं है
जो भीतर के अंधेरे को
दिखाना चाहता हो बाहर लाकर
अंधेरे का साम्राज्य फैलता जा रहा है
मीडिया किसी जिन्न की तरह पूछता है
क्या हुकम है मेरे आका!
और खबरें उसी तरह दिखाई जाती हैं
जैसे चाहता है आका
पुरस्कृत होते हैं वे लोग
जो सुबह-शाम कहते हैं -अंधेरा कायम रहे

कुछ अलग ढंग से घटित हो रही हैं घटनाएं
और हम चकित हैं पर बोल नहीं सकते
जैसे गूंगे ने खाई हों नीम की पत्तियां
और स्वाद पूछने पर थू-थू कर
भाग खड़ा होता है
‘देश बदल रहा है’ का नारा बुलंद किया जा रहा है
एक मजबूत अर्थव्यवस्था बनने की खुशी से
गदगद हुए हम लोग
भूखे पेट, नंगे बदन भागे जा रहे हैं
दूसरे से नाउम्मीद होकर तीसरे के पीछे
छले जाना एक कहावत भर रह गया है
जिसे बोलते ही तालियों की गड़गड़ाहट
होने लगती है
और इसी गड़गड़ाहट में छुपकर
छल मुस्कुराता है हमारी बेवकूफी पर

यह भीड़ भारत है मेरे दोस्त!
यहां आमजन के मुद्दे आपको
आम से खास बना देते हैं
और मुद्दे इसी तरह अधर में लटके रह जाते हैं
जैसे लटके हैं पचहत्तर सालों से।

इत्रदान

वैसे तो घर में बहुत सी चीजें हैं
जिनसे पिता की यादें जुड़ी हैं
पर इस इत्रदान की बात ही कुछ और है
यह अब भी उसी तरह महकता है
जैसे महकता रहा होगा पिता की मौजूदगी में

जंग लगी गोदरेज अलमारी सा
लकड़ी का यह छोटा सा बक्सा
अपनी खोई हुई चाबी को ढूंढता
खुलने को बेचैन है, और मैं खोलने को
जिसकी चाबी मेला में खोए हुए बच्चे सी
इसी घर में खो गई कहीं मां के हाथ से

गुलाब, केवड़ा, केशर, कालाभूत
खश और रातरानी की छह शीशियों के साथ
इसमें चांदी की वह सलाई भी बंद है
जिसपर रुई लपेटकर
पिता हौले से डुबक देते थे किसी शीशी में
बनाते अपनी या आगंतुक की पसंद की काड़ी
जिसे खोंसा जाता था कान के ऊपरी हिस्से में
वे बहुत देर तक इत्र से गीली हुई उंगलियां
अपनी बंडी पर रगड़ते रहते थे

एक दिन अचानक पिता चले गए
सबकुछ यहीं छोड़कर/अपना प्रिय इत्रदान भी
पर उनके होने की गंध रह गई इसमें
शीशियों पर रह गए उनकी छुअन के निशान
और शीशियों में भरा रह गया
कन्नौज वाले हरिसिंह दद्दा के सधे हाथों से
तौला-तौला, मासा-मासा इत्र भरे जाने का एहसास
और उधारी में भी पूरी भरी जाने की जिद
बाकी रह गई इन शीशियों में

पिता के जाने के बाद रिश्तों की टूट रही कड़ियों सी टूटी तो न होगी कोई शीशी
जैसे बीच आंगन सूख गया अपनत्व का पौधा
सूख तो नहीं गया होगा सारा इत्र?
यही जानने की उत्सुकता में
मैं कइयों बार हिलाता-डुलाता हूँ इसे
और हर बार पिता की सबसे प्रिय
चिरपरिचित खश की गंध
मेरे नथुनों में समा जाती है।

बेटियां

सावन के गीत गाते-गाते झूले से कूदकर
कब की दौड़ने लगी हैं रनिंग ट्रैक पर
बन गईं सबसे तेज धावक
गाय-बैलों का गोबर उठाते
उपले थापते हुए ही पहुंच गईं
चंद्रमा पर
उड़ाने लगीं हवाई जहाज
दौड़ाने लगीं रेलगाड़ियां

उपेक्षा का दुख गहराया तो
थोड़ी देर रो लिया मां के कांधे पर सर रखकर
पर उपेक्षित रहकर भी हारी नहीं
धीरज धरना बेटियों से ही सीखा
सारे पिताओं ने
बेटियों ने ही बनाए रस्सी से पत्थर
काटे जाने के निशान
कुओं के घाट पर रखी शिलाओं में

समय की पीठ पर हाथ टेक
बेटियों ने छू लिया कामयाबी का शिखर
गढ़ रही हैं नए प्रतिमान
बेटियां झुकना जानती हैं पर रुकना नहीं
दो कदम पीछे धकेला तो बढ़ गईं
चार कदम आगे बेटों से
जिन घरों में बेटियां जवान हुईं
उनके छतों की मेड़ियां और ऊंची कर दी गईं
आते-जाते हुए भाइयों ने की निगरानी
पर बेटियां तो बेटियां होती हैं
वे जितने काम निपटा कर गईं पढ़ने
या काम करने
उससे अधिक काम, काम से लौटकर भी निपटाए

पर काम के बोझ से दबकर मरी नहीं
न मरीं कचरे के ढेर पर/गंधाते नालों में
बेटियां पाने के लिए भले ही न बांधे हों
मन्नत के धागे पिताओं ने
पर आज बेटियां ही बन रही हैं
बूढ़े मां-बाबा का सहारा
मांगती हैं उनके सुखी समृद्ध जीवन के लिए दुआएं

बेटियां तो बेटियां हैं
उन्होंने सदियों के फासले को
कुछ दशकों में पूरा कर लिया है।

संपर्क :ग्राम पाटई, पोस्ट धुर्रा तहसील ईसागढ़, जिला अशोकनगर मध्यप्रदेश-473335 मो.9893886181