(29 नवंबर, 1954 – 22 अक्टूबर, 2021)

झारखंड राज्य के हजारीबाग में रहनेवाले भारत यायावर एक कवि के अलावा गहन शोधकर्ता तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावाली और रेणु रचनावली के संपादक रूप में जाने जाते हैं| उनकी हाल की पुस्तक है- ‘रेणु : एक जीवनी’| उनके कविता संग्रह हैं- ‘झेलते हुए’, ‘मैं यहां हूँ’, ‘हाल-बेहाल’|

अचानक हृदयगति रुक जाने से उनका निधन हो गया जो हिंदी की एक बड़ी क्षति है| ‘वागर्थ’ की हार्दिक श्रद्धांजलि|

स्वप्नलोक में कवि का विचरण

मैं कवि था
स्वप्नलोक में विचरण करता रहता था
कहते थे लोग मुझे पागल
मैं प्यार में खोया रहता था
भावों के अतल समुंदर में
कविता के मोती चुनता था
कबीर के पद गाता-गाता
जब गया कबीर के पास
वे एक चादर बुन रहे थे
बहुत बारीक बुनावट थी
बड़े ही प्रेम से
वे चादर बुन रहे थे
और कुछ गा रहे थे
शरीर को ही चादर मानकर चल रहे थे
कर्म और शब्द
एक दूसरे को चूम रहे थे
कविता में वे कर्मरत होकर
मुक्ति का स्वाद चख रहे थे
पूछा मैंने, यह साधो कौन है?
कबीर मंद-मंद मुस्कान छोड़ते हुए बोले
यह साधो मैं हूँ
अपने से संवाद किया करता हूँ
साधो ही साधु है
साधो ही साधक है
साधक कौन है?
जो मन को साधा करता है!
आप योगी हैं या भक्त?
मैं योगी हूँ और भक्त भी हूँ
जब जुड़ जाता हूँ राम से
योगी बन जाता हूँ
फिर विलग होकर
उसकी लाली में रंग जाता हूँ
उस अनंत के गुण गाता हूँ
योगी और भक्त में क्या अंतर है?
योगी तनकर खड़ा रहता है
टूट जाता है झुकता नहीं है
भक्त झुका हुआ ही रहता है
विनम्रता और सहजता का साधक
झुका रहता है
कभी टूटता नहीं है
कबीर कर्मरत थे
अपने कर्म से ध्यान नहीं हटता था
उनके मन में झन् झन् झन् झन् झन्
गूंजित रहता था
वे दुनिया में जितना रहते थे
उतनी ही दुनिया से बाहर थे
मैं प्रश्नाकुल था
परम ज्ञान जल्दी से पाना चाहता था
कबीर से पूछा तो उत्तर मिला
ज्ञान स्वयं स्थापित होता है
अंतस में ही
उसे भीतर ही खोजकर पाना होता है
गुरु कौन है?
कबीर के होठों पर मुस्कान खेल गई
गुरु है तुम्हारा विवेक
उसे थामे रहो
वही तुम्हें परम तत्व तक ले जाएगा
जीवन का अर्थ समझाएगा!

बिना अर्थ के जीवन जी रहे हैं जो
जीवन से ये परे हैं
दरअसल ये मरे हैं
अस्तित्व को कर रहे हैं निरर्थक
काल की विकरालता को भूल रहे हैं
काल तो कराल है
हर अस्तित्व ही
बदल जाता है अनस्तित्व में
लेकिन अस्तित्व होता है जब वाणी में समाहित
तब आत्म होता है
कबीर जीवित हैं अपनी वाणी में
इसलिए वाणी को आधार दो
अपनी चेतना को धार दो
चलो उठो
थोड़ा-सा जीवन संवार लो
फिर कबीर अदृश्य हो गए
चारों ओर खोजता रहा
जब नहीं मिले
तब अपने मन में देखा
संगीतबद्ध कुछ झनकते शब्द
बाहर आने को मचल रहे थे
और अंतर्मन में समाहित
मेरी ही ध्वनि थी
जो मुझे पावन कर गई थी!

यह क्या हुआ?

वह तमाम कलाओं की साधना-भूमि थी
कवियों के शब्दों का पंख लगाकर
उड़ने को उन्मुक्त गगन था
संगीत के सभी वाद्य
सुमधुर ध्वनि में बजते थे
नृत्यकला की उठान दिखाई देती थी
अभिनय की अभिव्यक्ति दिल को भाती थी
कथा दृश्य में ढलकर आती थी पर्दे पर
उसे देखकर हम कभी रोते और कभी मुस्कुराते थे
पर यह क्या हुआ
कि कथा ही बेअसर हुई
संगीत का जादू काफूर हुआ
गीत में कोई औचित्य नहीं रहा
गायकों की नाकदरी हुई
रह गया ग्लैमर का चकाचौंध
अपराधियों का वर्चस्व
पर यह क्या हुआ
मनोरंजन का एक बड़ा उद्योग था
जो खाने की थाली बनकर रह गया
जिसमें बड़ी हस्तियां खाती कम थीं
और जूठन ज्यादा छोड़ती थीं
धीरे-धीरे जूठन सड़ रही थी
और बदबू से
एक घिनौना वातावरण बन रहा था
उस सड़ांध में मर रही थी संवेदना
मर रहे थे विचार
दूर हो गई थी पवित्रता
मायानगरी में माल ही माल था
और यह अनोखा कमाल था
न थी कोई खोज
न नैतिकता
न दृष्टि
न नया कुछ करने की तड़प
न जीवन को रस से भरने की व्याकुलता
बस माल ही माल था
यह कैसा कमाल था
जो भी सोने की इस थाल में परोसा जा रहा था
सड़ी हुई जूठन के सिवा क्या था
लेकिन लोग धन्य थे
उसे चखकर स्वाद ले रहे थे
और गा रहे थे
कोई इस थाली पर उंगली न उठाए
कुछ भी न कहे
बस चुप ही रहे!