युवा कवयित्री, पशुप्रेमी।

गुफ्तगू

जिंदगी में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए
बस एक दिन
जो सिर्फ पहाड़ों को देखते हुए गुजरे
एक कप चाय के साथ
और ढेर सारी कहानियां जिसमें
छिपी हो एक गुफ़्तगू
कहीं सूखी नदियों की बात हो
तो कहीं बिखरते बादलों की
और जब कोई दोस्त पूछे ‘तुम कैसे हो’
तो यकीन हो कि जितना तुम बताना चाहते हो
उतना ही वह सुनना
बात हो अकेलेपन की, आंसुओं की
थोड़ी मुस्कराहट और ढेर सारी ख्वाहिशों की
कहीं ठहरी हुई जिंदगी की तो कहीं तूफानों की
और अगर कोई बोले
कि काफी समय हो गया है
अब घर आ जाओ
तो हिम्मत हो यह बताने की
कि अभी सिर्फ दिन शुरू हुआ है
अभी तो रात लंबी है
अभी तारों ने सिर्फ गुनगुनाना शुरू किया है
धरती ने पैर थामे हैं अपने
कुछ आराम तो उसे भी हो
जिसने सूरज की गर्मी को
अपने आंचल में छिपा कर रखा है
अभी तो उसकी खुशी में लहराना बाकी है।

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