वरिष्ठ रचनाकार। अद्यतन पुस्तक नेपाली साहित्य विमर्श

सूना है मन

सूनी सड़कें सूना मन
सूना-सूना ही है
हर घर का आंगन
करते हैं हम सब
अपने-अपने जतन

उम्मीद है जीतने की
हारे हुए सब संग्राम
किलकारियां गुमसुम हैं
भजन मांगता है भीख
बेचैन परेशान है मासूम

बेटा अपने बाप को कंधा देने से डरता है
रिश्ता आपस में जुड़ने से मुकरता है
हम तो ज्ञानी हैं विज्ञानी भी हैं
हमने ही अणु परमाणु जीवाणु को
खोज निकाला
बोसोन तक खंगाल डाला
धरती, समंदर, अंतरिक्ष
सब का सैर कर डाला
अब अदृश्य विषाणु की मार के शिकार हैं

हम जीत कर सारा संसार
विषाणु की मार से
लड़ाई हार रहे हैं
सडकें सूनी हैं
सूना है मन।

संपर्क : अमा खड़कालय, दुर्गागढ़ी, प्रधान नगर, दार्जिलिंग734003 मो.9749053857