विचार
शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की इतिहास दृष्टि तिमिर नाशक या तिमिरवर्धक : संजय कुमार

शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की इतिहास दृष्टि तिमिर नाशक या तिमिरवर्धक : संजय कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्र। राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ (1823-1895) का लेखन अपने समय के अंतर्विरोधों से घिरा नजर आता है।नवजागरण के आगोश में नित नए चिंतन तथा नई खोजों के दौर में उनके लेखन में किसी एक दृष्टि का बोलबाला नहीं है, बल्कि घटनाएं, परिस्थितियां...

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आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है : मृत्युंजय

आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है : मृत्युंजय

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी। गुजरात के आदिवासी कवि हैं चामूकाल राठवा।उनकी एक कविता ‘आदिवासी’ का एक अंश है, ‘इस शब्द को वे/इस तरह बोलते हैं/जैसे यह किसी/ महामारी का नाम हो/...इस शब्द को सुनकर/वे ऐसे देखते हैं/जैसे उन्होंने/आकाश में उड़ती/रकाबी देख ली हो।’...

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स्त्री-विमर्श का सच : चंद्रभान सिंह यादव

स्त्री-विमर्श का सच : चंद्रभान सिंह यादव

युवा आलोचक। ‘मीडिया और आधी आबादी का सच’ पर पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च। जॉन स्टुअर्ट मिल की रचना ‘द सब्जेक्सन ऑफ़ विमेन’ के अनुसार,  स्त्री और पुरुष के बीच शारीरिक विषमताएं अवश्य हैं, किंतु बौद्धिक क्षमता में दोनों बराबर हैं। सीबीएससी, प्रादेशिक बोर्ड या सिविल सेवाओं के...

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प्रसाद और छायावाद – साधारण में छिपे असाधारण की खोज : विनोद शाही

प्रसाद और छायावाद – साधारण में छिपे असाधारण की खोज : विनोद शाही

वरिष्ठ आलोचक और नाटककार।आलोचना की लगभग तीस पुस्तकें।अद्यतन पुस्तक ‘संस्कृति और राजनीति’। जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक भी हैं और उसका शिखर भी।उनके छायावाद को समझना, एक तरह से हिंदी छायावाद की मूल प्रकृति को समझने जैसा है।प्रसाद ने छायावाद की जो जमीन तैयार की, उसे...

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रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रसायनशास्त्री और पूर्व-शिक्षक। रामविलास शर्मा की पुत्रवधू। पति विजयमोहन शर्मा के साथ एक पुस्तक का संपादन पत्रों के महत्व को रामविलास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। उन्होंने जान लिया था कि पत्रों में एक उष्मा होती है जो पढ़ने वाले को अभिभूत करती है और इनमें दी गई...

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रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रसायनशास्त्री और पूर्व-शिक्षक। रामविलास शर्मा की पुत्रवधू। पति विजयमोहन शर्मा के साथ एक पुस्तक का संपादन पत्रों के महत्व को रामविलास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। उन्होंने जान लिया था कि पत्रों में एक उष्मा होती है जो पढ़ने वाले को अभिभूत करती है और इनमें दी गई...

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निराला की दृष्टि में भाषा और जातीयता : कृष्णदत्त शर्मा

निराला की दृष्टि में भाषा और जातीयता : कृष्णदत्त शर्मा

(1942- 2021)। दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर से 2007 में सेवानिवृत्त। पश्चिमी साहित्यशास्त्र के विशेषज्ञ। कोरोना की दुखद चपेट में असामयिक मृत्यु। अंग्रेज़ी के एक बड़े आलोचक ने भाषा को मानव-मन के ऐसे ‘शस्त्रागार’ की संज्ञा दी है, ‘जिसमें अतीत के विजय-स्मारक और भावी...

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शब्दों की आड़ में अर्थों का दुखांत : उपमा ऋचा

शब्दों की आड़ में अर्थों का दुखांत : उपमा ऋचा

पिछले एक दशक से लेखन में सक्रिय। संप्रति स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक 'शब्दों पर बात करने के लिए शब्दों का प्रयोग करना ठीक वैसा ही है जैसा कि पेंसिल का चित्र बनाने के लिए पेंसिल का इस्तेमाल करना। एक निहायत ही मुश्किल, पेचीदा और गुमराह करने वाली कवायद!' -पैट्रिक रूथफ़्स...

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मलूकदास की चिंता और अकाल : आलोक कुमार पाण्डेय

मलूकदास की चिंता और अकाल : आलोक कुमार पाण्डेय

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  में शोधार्थी। मलूकदास (17वीं सदी) का पारिवारिक धंधा व्यापार था, जिसमें प्रायः उनका मन नहीं लगता था । वे अपने समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की दुश्वारियों से दो-चार हो रहे थे । न केवल उनका काव्य, बल्कि वैयक्तिक...

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