विचार
लोक का सामर्थ्य : सेवा राम त्रिपाठी

लोक का सामर्थ्य : सेवा राम त्रिपाठी

वरिष्ठ आलोचक। ‘वसुधा’ पत्रिका से जुड़े हुए थे लोक के विश्वास और जातीय स्मृतियां आश्चर्यजनक तरीके से हमें अपनी ओर आकर्षित करती हैं।लोक आख्यान है, जीवन भी है और जीवन का सच भी है।इससे आंखें फेर कर कोई आगे की यात्रा नहीं कर पाएगा।इस दौर में लोक को याद करते हुए मुझे बहुत...

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प्रकृति वैभव उर्फ श्रीपर्णा : शेखर जोशी

प्रकृति वैभव उर्फ श्रीपर्णा : शेखर जोशी

    प्रसिद्ध कथाकार और कवि।प्रमुख रचनाएँ : ‘कोशी का घटवार’, ‘मेरा पहाड़’, ‘एक पेड़ की याद’। प्रकृति का सौंदर्य देखने के लिए ट्यूलिप गार्डन, कश्मीर जाने की आवश्यकता नहीं।न ही, उत्तराखंड में फूलों की घाटी जाने की।बस, देखने वाली आंख चाहिए।सौंदर्य हर कहीं बिखरा...

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रामविलास शर्मा मूलतः कवि थे -भाग 2 : विजय मोहन शर्मा

रामविलास शर्मा मूलतः कवि थे -भाग 2 : विजय मोहन शर्मा

    लेखक की पहली पुण्यतिथि पर (10 अक्टूबर 1938 - 6 जुलाई 2021) केंद्रीय जल आयोग में सहायक निदेशक तथा सलाहकार के रूप में देश-विदेश में कई उच्च पदों पर कार्य।रामविलास शर्मा के पत्रों तथा कई बिखरे कार्यों को संपादित करके पुस्तकाकार प्रकाशन।कृष्णदत्त शर्मा के...

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1857- घुड़सवार सैनिक, मातादीन और उसके साथियों की बगावत : सुभाष चंद्र कुशवाहा

1857- घुड़सवार सैनिक, मातादीन और उसके साथियों की बगावत : सुभाष चंद्र कुशवाहा

    सुपरिचित कथाकार, संपादक औरलोक-इतिहास के गंभीर अध्येता और लेखक। ‘लोकरंग’ से जुड़े।अद्यतन पुस्तक ‘भील विद्रोह’। अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह, कई गुमनाम नायकों को छिपाए अभी भी किंवदंती बना हुआ है।अभी भी बहुत से गुमनाम नायकों के त्याग और बलिदान से हम अनभिज्ञ...

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सरहदों की नई व्याख्या ‘रेत समाधि’ : सुमा एस.

सरहदों की नई व्याख्या ‘रेत समाधि’ : सुमा एस.

    प्रमुख हिंदी लेखिका।तिरुअनंतपुरम के गवर्न्मेंट वीमेन्स कॉलेज में प्रोफेसर। ‘सरहद क्षितिज।जहां दो लोक मिलते हैं, गलबहियां करते हैं।बॉर्डर इश्क है।इश्क जेल नहीं बनाता, हर रोक लांघने के लिए सितारे बिछाता हैं।बॉर्डर मिलान की रेखा है।इधर और उधर के जोड़ को...

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यूक्रेन-रूस युद्ध पर बुद्धिजीवी : अवधेश प्रसाद सिंह

यूक्रेन-रूस युद्ध पर बुद्धिजीवी : अवधेश प्रसाद सिंह

    वरिष्ठ लेखक, भाषाविद और अनुवादक। रूस ने 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन से युद्ध शुरू किया था।अब तक काफी लोग हताहत हो चुके हैं।रूस अपने आक्रमण को विशेष सैनिक अभियान कह रहा है।उसका मानना है कि यूक्रेन में नव-नाजियों की सरकार है।दूसरा तर्क है कि यूक्रेन में...

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रामविलास शर्मा मूलतः कवि थे -भाग 2 : विजय मोहन शर्मा

रामविलास शर्मा – वे मूलतः कवि थे : विजय मोहन शर्मा

    लेखक की पहली पुण्यतिथि पर (10 अक्टूबर 1938 - 6 जुलाई 2021) केंद्रीय जल आयोग में सहायक निदेशक तथा सलाहकार के रूप में देश-विदेश में कई उच्च पदों पर कार्य।रामविलास शर्मा के पत्रों तथा कई बिखरे कार्यों को संपादित करके पुस्तकाकार प्रकाशन।कृष्णदत्त शर्मा के...

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रामविलास शर्मा की आलोचना-दृष्टि : गोपेश्वर सिंह

रामविलास शर्मा की आलोचना-दृष्टि : गोपेश्वर सिंह

    चर्चित आलोचक और शिक्षाविद।अद्यतन आलोचना पुस्तक - ‘आलोचना के परिसर’।दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्रोफेसर और अध्यक्ष। सुनते हैं कि रूसी भाषा के महान लेखक लेव तोलस्तोय का संपूर्ण साहित्य 90 खंडों में प्रकाशित है।इधर चर्चा है कि रामविलास...

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रेत समाधि उपन्यास पर कुछ बातें : शंभुनाथ

रेत समाधि उपन्यास पर कुछ बातें : शंभुनाथ

        ‘रेत समाधि’ को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिलने के बाद उसे पढ़ने की उत्सुकता स्वाभाविक है।खुशी-खुशी पढ़ा।ग्लोबल मिजाज के उपन्यास में जो खिलंदड़ापन होता है, करुणा को भी विनोद में बदलते हुए, वह इस उपन्यास में है।इसमें बिंबों की एक माला है।तालाब...

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रेत समाधि – बहस बुकर पुरस्कार पर : दिनेश श्रीनेत

रेत समाधि – बहस बुकर पुरस्कार पर : दिनेश श्रीनेत

    कवि-कथाकार, पत्रकार तथा सिनेमा तथा लोकप्रिय संस्कृति के अध्येता।प्रमुख कृति ‘पश्चिम और सिनेमा’।इकनॉमिक टाइम्स के ऑनलाइन संस्करण में भारतीय भाषाओं के संस्करणों के प्रभारी। गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ को मिले इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ के बाद खुशी का...

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थेरी गाथा-स्त्री मुक्ति की आदिकथा : विभा ठाकुर

थेरी गाथा-स्त्री मुक्ति की आदिकथा : विभा ठाकुर

    कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रो़फेसर। थेरीगाथा प्रथम प्रतिश्रुति के रूप में स्त्री गाथा का जीवित दस्तावेज है।धर्मशास्त्रों का हवाला देकर पितृसत्तात्मक समाज ने बहुत समय तक स्त्रियों को ज्ञान के अधिकार से वंचित रखा था।नारी को माया कहा...

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शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की इतिहास दृष्टि तिमिर नाशक या तिमिरवर्धक : संजय कुमार

शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की इतिहास दृष्टि तिमिर नाशक या तिमिरवर्धक : संजय कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्र। राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ (1823-1895) का लेखन अपने समय के अंतर्विरोधों से घिरा नजर आता है।नवजागरण के आगोश में नित नए चिंतन तथा नई खोजों के दौर में उनके लेखन में किसी एक दृष्टि का बोलबाला नहीं है, बल्कि घटनाएं, परिस्थितियां...

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आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है : मृत्युंजय

आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है : मृत्युंजय

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी। गुजरात के आदिवासी कवि हैं चामूकाल राठवा।उनकी एक कविता ‘आदिवासी’ का एक अंश है, ‘इस शब्द को वे/इस तरह बोलते हैं/जैसे यह किसी/ महामारी का नाम हो/...इस शब्द को सुनकर/वे ऐसे देखते हैं/जैसे उन्होंने/आकाश में उड़ती/रकाबी देख ली हो।’...

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स्त्री-विमर्श का सच : चंद्रभान सिंह यादव

स्त्री-विमर्श का सच : चंद्रभान सिंह यादव

युवा आलोचक। ‘मीडिया और आधी आबादी का सच’ पर पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च। जॉन स्टुअर्ट मिल की रचना ‘द सब्जेक्सन ऑफ़ विमेन’ के अनुसार,  स्त्री और पुरुष के बीच शारीरिक विषमताएं अवश्य हैं, किंतु बौद्धिक क्षमता में दोनों बराबर हैं। सीबीएससी, प्रादेशिक बोर्ड या सिविल सेवाओं के...

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प्रसाद और छायावाद – साधारण में छिपे असाधारण की खोज : विनोद शाही

प्रसाद और छायावाद – साधारण में छिपे असाधारण की खोज : विनोद शाही

वरिष्ठ आलोचक और नाटककार।आलोचना की लगभग तीस पुस्तकें।अद्यतन पुस्तक ‘संस्कृति और राजनीति’। जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक भी हैं और उसका शिखर भी।उनके छायावाद को समझना, एक तरह से हिंदी छायावाद की मूल प्रकृति को समझने जैसा है।प्रसाद ने छायावाद की जो जमीन तैयार की, उसे...

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रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रसायनशास्त्री और पूर्व-शिक्षक। रामविलास शर्मा की पुत्रवधू। पति विजयमोहन शर्मा के साथ एक पुस्तक का संपादन पत्रों के महत्व को रामविलास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। उन्होंने जान लिया था कि पत्रों में एक उष्मा होती है जो पढ़ने वाले को अभिभूत करती है और इनमें दी गई...

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रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रामविलास शर्मा के पत्र : संतोष शर्मा

रसायनशास्त्री और पूर्व-शिक्षक। रामविलास शर्मा की पुत्रवधू। पति विजयमोहन शर्मा के साथ एक पुस्तक का संपादन पत्रों के महत्व को रामविलास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। उन्होंने जान लिया था कि पत्रों में एक उष्मा होती है जो पढ़ने वाले को अभिभूत करती है और इनमें दी गई...

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निराला की दृष्टि में भाषा और जातीयता : कृष्णदत्त शर्मा

निराला की दृष्टि में भाषा और जातीयता : कृष्णदत्त शर्मा

(1942- 2021)। दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर से 2007 में सेवानिवृत्त। पश्चिमी साहित्यशास्त्र के विशेषज्ञ। कोरोना की दुखद चपेट में असामयिक मृत्यु। अंग्रेज़ी के एक बड़े आलोचक ने भाषा को मानव-मन के ऐसे ‘शस्त्रागार’ की संज्ञा दी है, ‘जिसमें अतीत के विजय-स्मारक और भावी...

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शब्दों की आड़ में अर्थों का दुखांत : उपमा ऋचा

शब्दों की आड़ में अर्थों का दुखांत : उपमा ऋचा

पिछले एक दशक से लेखन में सक्रिय। संप्रति स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक 'शब्दों पर बात करने के लिए शब्दों का प्रयोग करना ठीक वैसा ही है जैसा कि पेंसिल का चित्र बनाने के लिए पेंसिल का इस्तेमाल करना। एक निहायत ही मुश्किल, पेचीदा और गुमराह करने वाली कवायद!' -पैट्रिक रूथफ़्स...

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मलूकदास की चिंता और अकाल : आलोक कुमार पाण्डेय

मलूकदास की चिंता और अकाल : आलोक कुमार पाण्डेय

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  में शोधार्थी। मलूकदास (17वीं सदी) का पारिवारिक धंधा व्यापार था, जिसमें प्रायः उनका मन नहीं लगता था । वे अपने समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की दुश्वारियों से दो-चार हो रहे थे । न केवल उनका काव्य, बल्कि वैयक्तिक...

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