विस्मृति से एतराज़
नवजागरणयुगीन हिंदी आलोचना और बालकृष्ण भट्ट : रवि रंजन

नवजागरणयुगीन हिंदी आलोचना और बालकृष्ण भट्ट : रवि रंजन

शिक्षाविद एवं आलोचक। ‘लोकप्रिय कविता का समाजशास्त्र’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र और पद्मावत’, ‘अनमिल आखर’ समेत आठ पुस्तकें। ‘समालोचना का अर्थ पक्षपात रहित होकर न्यायपूर्वक किसी पुस्तक के यथार्थ  गुण-दोष की विवेचना करना और उसके ग्रंथकर्ता को एक विज्ञप्ति देना है,...

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मेरे अग्रज नंदकिशोर नवल/ भारत भारद्वाज

मेरे अग्रज नंदकिशोर नवल/ भारत भारद्वाज

वरिष्ठ समीक्षक और लेखक 'पुस्तक वार्ता', 'वर्तमान साहित्य' आदि पत्रिकाओं के पूर्व-संपादक । सपने में भी मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे नंदा भैया की श्रद्धांजलि लिखनी पड़ेगी, लेकिन यथार्थ क्रूर होता है। उसे चुपचाप स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। मुझे याद...

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नंदकिशोर नवल : एक राजनीतिक आलोचक/ वेंकटेश कुमार

नंदकिशोर नवल : एक राजनीतिक आलोचक/ वेंकटेश कुमार

युवा आलोचक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। ‘लोकचेतना वार्ता’ के संपादक। यह कहना गलत न होगा कि निराला और मुक्तिबोध के रचना संसार से संघर्ष करते हुए ही आलोचक नंदकिशोर नवल का जन्म हुआ। ‘मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना’ नवल जी की महत्वाकांक्षी किताब है। उन्होंने...

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विस्मृति से एतराज : स्वयं प्रकाश की कहानियाँ/ बालमुकुंद नंदवाना

विस्मृति से एतराज : स्वयं प्रकाश की कहानियाँ/ बालमुकुंद नंदवाना

चर्चित अनुवादक, पुस्तक ‘हिंदू धर्म प्रवेशिका’ समकालीन हिंदी कहानी के प्रकाश स्तंभ स्वयं प्रकाश को विशिष्ट पहचान दिलाने वाले प्रमुख तत्व हैं – यथार्थ की उनकी गहरी समझ, उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण और रचनात्मक विवेक, सोद्देश्यता और शिल्प के प्रति उनकी सजगता। इन सभी तत्वों...

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