आलेख
कितनी लोकप्रियता और कैसी गंभीरता/विजय बहादुर सिंह

कितनी लोकप्रियता और कैसी गंभीरता/विजय बहादुर सिंह

वरिष्ठ आलोचक और कवि। प्रमुख कृतियाँ : ‘नागार्जुन का रचना संसार’, ‘महादेवी के काव्य का नेपथ्य’। भवानी प्रसाद मिश्र और नंददुलारे वाजपेयी ग्रंथावली का संपादन। बीसवीं सदी में आजादी से पहले और बाद के दिनों में या इधर लिखे गए साहित्य को देखता हूँ तो जैसी लोकप्रियता...

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आदिवासी संघर्ष : साहित्येतिहास की समस्याएँ/ राकेश कुमार सिंह

आदिवासी संघर्ष : साहित्येतिहास की समस्याएँ/ राकेश कुमार सिंह

झारखंड के चर्चित लेखक, अद्यतन उपन्यास ‘मिशन होलोकास्ट'   हिंदी में ऐतिहासिक घटनाओं और चरित्रों को लेकर साहित्य रचने की परंपरा रही है। श्रीनिवास दास, वृंदावनलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर से लेकर भीष्म साहनी और संजीव तक। 'परीक्षागुरु',...

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स्त्री की देह एक क़ब्र है, जो सब कुछ स्वीकार कर लेती है : लुईस ग्लूक/ उपमा ऋचा

स्त्री की देह एक क़ब्र है, जो सब कुछ स्वीकार कर लेती है : लुईस ग्लूक/ उपमा ऋचा

लेखन एवं अनुवाद हाल ही में लुईस ग्लूक के नाम वर्ष 2020 के नोबल लिट्रेचर प्राइज़ की घोषणा करते हुए स्वीडिश अकादमी ने उन्हें ‘कविता का अचूक स्वर’ कहा, ‘जो व्यक्तिगत अनुभवों को आडंबरहीन सौंदर्य के साथ प्रस्तुत करके उन्हें सार्वभौमिक बना देता है।‘ प्रसिद्धि और पुरस्कार...

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नागार्जुन के गांधी/ सुमित कुमार चौधरी

नागार्जुन के गांधी/ सुमित कुमार चौधरी

भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में शोधार्थी   नागार्जुन की चरित्र-प्रधान कविताओं में दास्य-भाव न होकर तत्कालीन यथार्थ की अनुगूंज अधिक सुनाई देती है। इन कविताओं में वे सभी चरित्र शामिल हैं जो समावेशी तेवर के हिमायती और इसके विरोधी हैं।...

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