आलेख
नीलेश रघुवंशी – स्त्री कविता का भूगोल : आशीष मिश्र

नीलेश रघुवंशी – स्त्री कविता का भूगोल : आशीष मिश्र

युवा आलोचक। और साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप से निरंतर सक्रिय। नीलेश रघुवंशी का जन्म विदिसा के कस्बा‘गंज बासौदा’ में हुआ। बासौदा का इतिहास मालवा के पठारी भूगोल में बहुत गहरे धंसा हुआ है। नीलेश का आरंभिक भावबोध बासौदा के कस्बाई जीवन-अनुभवों में आकार लेता है। इसमें आठ बहनों,...

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प्रसाद और छायावाद – साधारण में छिपे असाधारण की खोज : विनोद शाही

प्रसाद और छायावाद – साधारण में छिपे असाधारण की खोज : विनोद शाही

विनोद शाही वरिष्ठ आलोचक और नाटककार। आलोचना की लगभग तीस पुस्तकें। अद्यतन पुस्तक ‘संस्कृति और राजनीति’। जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक भी हैं और उसका शिखर भी। उनके छायावाद को समझना, एक तरह से हिंदी छायावाद की मूल प्रकृति को समझने जैसा है। प्रसाद ने छायावाद की जो जमीन...

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कविता का कोरोना काल : जयश्री सिंह

कविता का कोरोना काल : जयश्री सिंह

मुंबई विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। ताजा किताब ‘भय आक्रांत’(कथेतर गद्य)।  इस समय पूरा विश्व एक बड़ी त्रासदी से गुजर रहा है। देशों की उन्नत सभ्यताओं को एक अदृश्य वायरस ने बौना कर दिया है। मध्यम वर्गीय परिवार का व्यक्ति आज फिर से संघर्ष के उसी बिंदु पर आ कर...

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पंकज चतुर्वेदी-प्रतिवाद की भंगिमा : आशीष मिश्र

पंकज चतुर्वेदी-प्रतिवाद की भंगिमा : आशीष मिश्र

युवा आलोचक। और साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप से निरंतर सक्रिय। कवि-वैशिष्ट्य जैसे इस बात का प्रमाण है कि हर कवि में एक भिन्न संवेदनतंत्र होता है, उसी तरह कविता का युग-वैशिष्ट्य इस बात का प्रमाण है कि कवि का भाव बोध इतिहास के भीतर ही बनता है। ऐतिहासिक शक्तियां उसके भावबोध,...

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केदारनाथ सिंह की कुछ कविताएं : हरिमोहन शर्मा

केदारनाथ सिंह की कुछ कविताएं : हरिमोहन शर्मा

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्राध्यापक। ‘चंद्रशेखर वाजपेयी कृत रसिक विनोद’, ‘उत्तर छायावादी काव्य भाषा’ और ‘रचना से संवाद’ (आलोचना) पुस्तकें प्रकाशित। प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह के काव्य संग्रह ताल्सताय और साइकिल (2005) के शीर्षक को देख कर थोड़ा...

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पवन करण की गोलचक्कर से दूर जाती कविताएं : आशीष मिश्र

पवन करण की गोलचक्कर से दूर जाती कविताएं : आशीष मिश्र

युवा आलोचक। और साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप से निरंतर सक्रिय। हिंदी कविता के इतिहास में दो प्रवृत्तियां लगातार दिखाई पड़ती हैं। पहली प्रवृत्ति, कविता को कवि-कौशल से अर्जित बहुमूल्य कलात्मक वस्तु मानने की और दूसरी, कविता को जीवन का स्वाभाविक कलात्मक विकास तथा सार्वजनिक...

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आशुतोष दुबे की कविताएं अनुभूति की सार्वजनीनता खोजती हैं : आशीष मिश्र

आशुतोष दुबे की कविताएं अनुभूति की सार्वजनीनता खोजती हैं : आशीष मिश्र

युवा आलोचक। और साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप से निरंतर सक्रिय। आशुतोष दुबे की मनोगतियों का स्व-साक्षीभाव उसकी गुरुता को बढ़ा देता है। यहाँ सिर्फ द्रष्टा किसी दृश्य को नहीं देखता, बल्कि आत्म का कोई और स्तर है जो द्रष्टा को देखते हुए भी देखता है। यह उसकी भी गतियों को...

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राहुल सांकृत्यायन को जैसा पाया : संजीव देव

राहुल सांकृत्यायन को जैसा पाया : संजीव देव

संजीव देव (1914- 1999)  तेलुगु और अंग्रेजी के लेखक के अलावा कलाकार, चित्रकार, फोटोग्राफर, दार्शनिक और कुशल वक्ता। आंध्र विश्वविद्यालय से डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित। बीस वर्ष की आयु में उत्तर भारत के अनेक प्रांतों में घूमकर प्रेमचंद जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों...

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शैलेंद्र के गीत और ‘तीसरी कसम’ : प्रयाग शुक्ल

शैलेंद्र के गीत और ‘तीसरी कसम’ : प्रयाग शुक्ल

प्रमुख कवि तथा कला समीक्षक शैलेंद्र से मेरी भेंट कभी नहीं हुई। पर उनके गीत, वह तो उनके सच्चे प्रतिनिधि हैं। शैलेंद्र का कवि-मन, उनका इंसानी रूप, उनकी ऊर्जा, उनका सोचना, सब तो हैं वहाँ। उनके इस सोचने में, मानो उनका बिंबों में, दृश्यों में, बिंबों में सोचना शामिल है। और...

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कितनी लोकप्रियता और कैसी गंभीरता/विजय बहादुर सिंह

कितनी लोकप्रियता और कैसी गंभीरता/विजय बहादुर सिंह

वरिष्ठ आलोचक और कवि। प्रमुख कृतियाँ : ‘नागार्जुन का रचना संसार’, ‘महादेवी के काव्य का नेपथ्य’। भवानी प्रसाद मिश्र और नंददुलारे वाजपेयी ग्रंथावली का संपादन। बीसवीं सदी में आजादी से पहले और बाद के दिनों में या इधर लिखे गए साहित्य को देखता हूँ तो जैसी लोकप्रियता...

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आदिवासी संघर्ष : साहित्येतिहास की समस्याएँ/ राकेश कुमार सिंह

आदिवासी संघर्ष : साहित्येतिहास की समस्याएँ/ राकेश कुमार सिंह

झारखंड के चर्चित लेखक, अद्यतन उपन्यास ‘मिशन होलोकास्ट'   हिंदी में ऐतिहासिक घटनाओं और चरित्रों को लेकर साहित्य रचने की परंपरा रही है। श्रीनिवास दास, वृंदावनलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर से लेकर भीष्म साहनी और संजीव तक। 'परीक्षागुरु',...

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स्त्री की देह एक क़ब्र है, जो सब कुछ स्वीकार कर लेती है : लुईस ग्लूक/ उपमा ऋचा

स्त्री की देह एक क़ब्र है, जो सब कुछ स्वीकार कर लेती है : लुईस ग्लूक/ उपमा ऋचा

लेखन एवं अनुवाद हाल ही में लुईस ग्लूक के नाम वर्ष 2020 के नोबल लिट्रेचर प्राइज़ की घोषणा करते हुए स्वीडिश अकादमी ने उन्हें ‘कविता का अचूक स्वर’ कहा, ‘जो व्यक्तिगत अनुभवों को आडंबरहीन सौंदर्य के साथ प्रस्तुत करके उन्हें सार्वभौमिक बना देता है।‘ प्रसिद्धि और पुरस्कार...

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नागार्जुन के गांधी/ सुमित कुमार चौधरी

नागार्जुन के गांधी/ सुमित कुमार चौधरी

भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में शोधार्थी   नागार्जुन की चरित्र-प्रधान कविताओं में दास्य-भाव न होकर तत्कालीन यथार्थ की अनुगूंज अधिक सुनाई देती है। इन कविताओं में वे सभी चरित्र शामिल हैं जो समावेशी तेवर के हिमायती और इसके विरोधी हैं।...

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