कविता
वे हार नहीं मानतीं : विजय विशाल

वे हार नहीं मानतीं : विजय विशाल

    जन-विज्ञान आंदोलन में वर्षों तक सक्रिय भूमिका। ‘सांप्रदायिक सद्भाव और हिंदी उपन्यास’ तथा ‘सत्ता, साहित्य और समाज’ शीर्षक से आलोचनात्क पुस्तकें और ‘चींटियाँ शोर नहीं करतीं’ कविता संग्रह प्रकाशित। मधुमक्खियों को मालूम हैहर बार की तरहशीघ्र ही ढहा दिया...

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सुमित दहिया

सुमित दहिया

    युवा कवि।दो काव्य संग्रह ‘आवाज़ के स्टेशन’ और ‘खंडित मानव की कब्रगाह’ प्रकाशित। सरहदों का संगीत कितना जादुई होता है सरहदों का संगीतवह ढारस बंधाता हैबहुत दूर से आते हुएबूढ़ी माँ के विलाप कोजो शोकाकुल होती हैअपने युवा बेटे की अचानक हुई मृत्यु पर शून्य को...

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गज़ल : इंदु श्रीवास्तव

गज़ल : इंदु श्रीवास्तव

    ग़ज़ल संग्रह ‘आशियाने की बातें’ और ‘उड़ना बेआवाज परिंदे’ प्रकाशित।स्पेनिन सम्मान और रज़ा पुरस्कार से सम्मानित।गायन का शौक। हम तबाही से घिरे हैं और वो नाराज हैंखून के बादल उठे हैं और वो नाराज हैं अब किसी से क्या बताएं कितने शर्मिंदा हैं हममुफलिसों के घर जले...

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ऐसा भी एक दिन : योगेंद्र

ऐसा भी एक दिन : योगेंद्र

    वरिष्ठ लेखक।प्रमुख कृतियां :  ‘गुरु कुम्हार,शिष कुंभ’, ‘प्रेमचंद की वैचारिक संवेदना’, ‘जस देखा, तस लेखा’, ‘साहित्य, समाज और राजनीति’ तथा ‘सहमत - असहमत’। एक विदा होते वक्त जबसीने से लगाया गयातो मैं बिखरने लगाहृदय की स्थिति ठीक नहीं थीमैं लंबे समय सेकिसी...

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कविता की मुक्ति : शिव कुशवाहा

कविता की मुक्ति : शिव कुशवाहा

    युवा कवि।अद्यतन काव्य संकलन ‘दुनिया लौट आएगी’। समय जब पंख लगाकर उड़ रहा होकुछ रिक्तता साल रही हो अंदर ही अंदरजब सब कुछ लग रहा हो फिसलन भरातब कुछ चुक जाने का एहसाससबसे ख़तरनाक दौर की ओरचुपचाप करता है इशारा जैसे बुझता हुआ दीपकअपनी लौ को फड़फड़ाने सेभांप लेता...

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गुजराती कविता गांधी : त्रिभुवनदास परसोत्तमदास लुहार ‘सुंदरम’, अनुवाद : प्रवीण पंड्या

गुजराती कविता गांधी : त्रिभुवनदास परसोत्तमदास लुहार ‘सुंदरम’, अनुवाद : प्रवीण पंड्या

त्रिभुवनदास परसोत्तमदास लुहार ‘सुंदरम’ (१९०८-१९९१) साहित्य अकादमी व पद्म भूषण से सम्मानित।प्रसिद्ध पुस्तक ‘अर्वाचीन कविता’। प्रवीण पांड्या संस्कृत कवि एवं आलोचक। संस्कृत में चार काव्य संग्रह प्रकाशित। (१)हुआ है पृथ्वी के, तल पर युगारंभ बल कालिया विद्युत् वायु, स्थल जल...

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दिनकर कुमार

दिनकर कुमार

    कवि, पत्रकार एवं अनुवादक।10 कविता संग्रह प्रकाशित।असमिया से 60  से अधिक पुस्तकों का अनुवाद। संप्रति- सलाहकार संपादक, दैनिक अरुणभूमि। अभी सोया हुआ है कंक्रीट का जंगलअभी सोया हुआ है कंक्रीट का जंगलऔर सुन रहा हूं पंछियों का कलरवरेलगाड़ी की सीटीरेत और सीमेंट...

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विनोद पदरज

विनोद पदरज

    वरिष्ठ कवि।कई कविता संग्रह प्रकाशित। आज मैंने कुछ नहीं किया आज मैंने कुछ नहीं कियाअखबार तक नहीं पढ़ाकिसी से बात नहीं कीफोन पर भी नहीं आज मैंने दिन भरडाली पर खिले फूलों को देखाएक नई चिड़िया देखीगौरैयों बुलबुलों मैनाओं से अलगउसकी आवाज सुनीजैसे कंठ में घुंघरू...

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नरेंद्र पुंडरीक

नरेंद्र पुंडरीक

      सुपरिचित कवि।अद्यतन कविता संकलन ‘इन हाथों के बिना’।केदारनाथ अग्रवाल स्मृति शोध संस्थान से जुड़े। यह पृथ्वी हमारा घर है जितना सब को मालूम थाउतना मुझको भी मालूम है किकिसी सुबह शाम या आधी रात कोचला जाऊंगा मैंपता नहींईश्वर कहां रखेगा मेरी आत्मा को अपनी...

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कविताएं : कोरोना काल अशोक वाजपेयी

कविताएं : कोरोना काल अशोक वाजपेयी

प्रसिद्ध हिंदी कवि-आलोचक।भोपाल के भारत भवन के निर्माण में बड़ी भूमिका।प्रमुख कृतियां -‘इस नक्षत्रहीन समय में’, ‘कवि ने कहा’, ‘कुछ रफू कुछ बिगड़े’।हाल में तीन खंडों में ‘सेतु समग्र :अशोक वाजपेयी’।छह-सात आदमी-1 एक आदमी मास्क पहने घर से निकलता हैसड़क पर दूसरा आदमी मास्क...

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देवेश पथ सारिया

देवेश पथ सारिया

    युवा कवि।ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी।मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से संबंध।कविता संग्रह ‘नूह की नाव’ प्रकाशित। तुम, जो जीत जाते हो तुम्हारा जीत जाना बहस मेंतुम्हारी साफगोई की तस्दीक नहीं करतावह दर्शाता है बस इतनाकि तुम वकील...

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धीरे-धीरे : वीरेंद्र सारंग

धीरे-धीरे : वीरेंद्र सारंग

    कवि-कथाकार।चार कविता संग्रह, पांच उपन्यास।महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान से सम्मानित। धीरे-धीरे छिपता और उगता हैजैसे सूर्यसूर्य हमेशा साथ हैबस हम ही रात हो जाते हैंकिताबें धीरे-धीरे सिखाती हैंऔर धीरे-धीरे समझ में आता हैआदमी का चेहरा धीरे-धीरे फैलती है...

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अलका ‘सोनी’

अलका ‘सोनी’

    युवा कवयित्री।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। कवियो तुम आते रहना जब तक बची है यह सृष्टिओ कवियो, तुम आते रहनातुम्हारा आनाउतना ही जरूरी हैजितना जीवन मेंवसंत का आनाजितना खामोशियों मेंकहीं किसी शिशु कीकिलकारी का गूंज उठना इसलिए भीतुम्हारा आना...

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सत्यम तिवारी

सत्यम तिवारी

    युवा कवि।इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक के तृतीय वर्ष के छात्र। बेजुबान सतही नहीं हो जाती पीड़ासिर्फ इसलिए कि वह तुम्हारी नहीं हैभाषा में लेकिन अपनी बातकहने की इजाजत है सबको सुधीजनो, आप चाहते हैंकि मैं बेजुबानों की आवाज़ बनूं लेकिन जब शुरुआत से हीमैं...

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बांग्ला कविता : सुनील गंगोपाध्याय

बांग्ला कविता : सुनील गंगोपाध्याय

(७ सितंबर १९३४ - २३ अक्तूबर २०१२)बांग्ला के प्रसिद्ध कवि-लेखक।२०० से अधिक पुस्तकों के रचयिता।प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘प्रथम आलो’, ‘सेई समय’, ‘मोनेर मानुष’ आदि।कई कृतियों पर बांग्ला फिल्म। अप्रेषित खत (ना पाठानो चिठि)   अनुवाद : सुरेश शॉ कवि-कथाकार और अनुवादक।कहानी...

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दो कविताएँ : आदर्श भूषण

दो कविताएँ : आदर्श भूषण

युवा कवि।पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और अनुवाद प्रकाशित। पिता की स्मृति तुम आओगेमैं जानता हूँया तो प्रश्नवाचक चिह्नों से पहलेया फिर विस्मयादिबोधक चिह्नों के पार सकल रूप धर न भी आओसरसराती हुई हवा याखड़कते पत्तों की-सी दबी आवाज मेंदूर आकाश में देर रात उड़ते किसी वायुयान के...

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कविताएं : गोलेंद्र पटेल

कविताएं : गोलेंद्र पटेल

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।काशी हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र। बाढ़ इसमें कोई संदेह नहींकि बाढ़ नदी को स्वच्छ करती हैधरती को उर्वर बनाती हैपर उससे पहले वह उम्मीद की उपजनष्ट करती हैसारे सपने डूबो देती हैसुख का स्वाद छीन लेती है एक किसान के गले में पड़ी...

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गुलाब के बिंब के गिर्द रची कुछ कविताएं  : उपमा ॠचा

गुलाब के बिंब के गिर्द रची कुछ कविताएं : उपमा ॠचा

युवा कवयित्री, लेखक और अनुवादक।प्रमुख किताबें एवं अनुवाद- ‘एक थी इंदिरा’(जीवनी), ‘भारत का इतिहास’ (माइकल एडवर्ड), ‘मत्वेया कोझेम्याकिन की ज़िंदगी’ और स्वीकार’ (मैक्सिम गोर्की),‘ग्वाला’' (अन्ना बर्न्स) आदि।  एक पारसी कहावत है कि ‘यह जीवन एक गुलाब है, इसकी महक लें...

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दो ग़ज़ल : राहुल शिवाय

दो ग़ज़ल : राहुल शिवाय

युवा कवि।नया संग्रह ‘मौन भी अपराध है’ (नवगीत संग्रह)।संप्रति उपनिदेशक कविता कोश। एकघुप अंधेरा है मगर तू रोशनी को ढूंढ लेदुख भरी इस जिंदगी से चल खुशी को ढूंढ ले दूर है मंजिल तुम्हारी और रस्ता है कठिनजिंदगी के इस सफर में तू किसी को ढूंढ ले मौत के दर पर खड़ी है लाख तेरी...

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दादा जी दरख़्त हैं : शुचि मिश्रा

दादा जी दरख़्त हैं : शुचि मिश्रा

युवा कवयित्री और शोधार्थी। दादा जी दरख़्त हैंइस घर के दरख्त घर के आंगन मेंजमा है बरसों सेबहुत गहरे तक फैली हैंदरख्त की जड़ेंयहां तक कि दीवारों में भीधंस गई हैं वेऔर दिलचस्प है किइन दीवारों को दे रही हैं सहाराजिसके चलते ‘अब गिरी कि तब’दिखने वाली दीवारें जस की तस हैंएक...

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