कविता
कविताएं : ऋतु त्यागी

कविताएं : ऋतु त्यागी

युवा कवयित्री। पी.जी.टी हिंदी केंद्रीय विद्यालय, सिख लाइंस, मेरठ में अध्यापिका। पुस्तकें- ‘कुछ लापता ख़्वाबों की वापसी’,’ समय की धुन पर’(काव्य संग्रह) ध्यान रखना अपना ध्यान रखना अपनाउसने कहाऔर वह ध्यान से ही निकल गयासमय जब उम्र की पपड़ियां गिराने लगातब फिर ध्यान आया...

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दो कविताएं-आवाज और सन्नाटा : शैलेय

दो कविताएं-आवाज और सन्नाटा : शैलेय

संस्कृति कर्मी। लंबे समय तक मजदूर आंदोलन और कुष्ठ रोगियों के मध्य कार्य।  अद्यतन कविता संग्रह, 'बीच दिसंबर'। आवाज - 1 तुम्हारी आवाज इस वक्त भी बराबर गूँज रही हैतुम इस वक्त भी वैसे ही पुकार रही होजैसे दो बरतन खटकते हैं घर मेंऔर साथ-साथ रहते हैंअब घर चलाने कोदो बरतन तो...

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छत : श्रवण कुमार चिहार

छत : श्रवण कुमार चिहार

      दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई में शोधार्थी। उन दिनों की बात ही कुछ और थीजब छतें मिला करती थींएक छत से दूसरी छत की महकअपनेपन की आया करती थी सुबह से कोई व्यायाम करतातो कोई तुलसी पर जलचढ़ाता दिखाई देता थाकिताबें लेकर कोईरटता चक्कर काटता नजर...

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कविताएं : दीपाली अग्रवाल

कविताएं : दीपाली अग्रवाल

      युवा कवयित्री। नोएडा स्थित एक मीडिया संस्थान में सब-एडिटर। दुख मैंने जीवन में यूं बचाए दुखजैसे अंजुरी में पानीधीरे-धीरे रिसता हुआवे खनकते रहेज्यों बच्चे की जेब में सिक्केजिससे वह स्वप्न खरीदना चाहता हैजीवन में सुख आयातो मैंने उन सिक्कों सेफिर...

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आग को गाने लगी हैं आंधियां अब : जगदीश पंकज

आग को गाने लगी हैं आंधियां अब : जगदीश पंकज

      वरिष्ठ कवि। नवगीत संग्रह : 'सुनो मुझे भी', 'निषिद्धों की गली का नागरिक', 'समय है संभावना का'। आग को गाने लगी हैं आंधियां अबबादलो कुछ देरबरसो अब नगर में आ रहे हैंरोज अंगारे उछलकरफेंकता है कौनकितना जानते हैंरेत परपदचिह्न हैं संदिग्ध किसकेदूर से भी...

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ओड़िया कविता मैं लौट क्यों आती हूँ : सुचेता मिश्र, ओड़िया से अनुवाद : राजेंद्र प्रसाद मिश्र

ओड़िया कविता मैं लौट क्यों आती हूँ : सुचेता मिश्र, ओड़िया से अनुवाद : राजेंद्र प्रसाद मिश्र

ओड़िशा साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत कवयित्री। एक निबंध संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित। वरिष्ठ अनुवादक।पक्षियों को दाना चुगा सकती हूँरसोई में नमक की तरह रह सकती हूँगिरते तारों को आंचल में सहेज सकती हूँतभी तोबार-बार कविता तक आती हूँ तुम पैर पटकते होपैंफलेट छापते...

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देह भर : स्वाति मेलकानी

देह भर : स्वाति मेलकानी

      युवा कवयित्री। कविता संग्रह : ‘जब मैं जिंदा होती हूँ’। हम हो सकते थे पेड़ और पहाड़और एक दूसरे में समाईहमारी जड़ेंहमसे भी अधिकआलिंगनबद्ध रहतीं हम हो सकते थे नदी और झरनाजहां एक का अंतदूसरे के आदि को उत्पन्न करतायारात और तारेजिसमें एक का अंधकारदूसरे के...

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मैं किसान हूँ, कवि नहीं हूँ कि  कल्पना से काम चल जाएगा! : चंद्र मोहन

मैं किसान हूँ, कवि नहीं हूँ कि कल्पना से काम चल जाएगा! : चंद्र मोहन

युवा कवि। अभी भी अभी भी लकड़ी का हल चलता है यहांअभी भी हजारों जोड़ी बैलों सेखेतों को जोता जाता हैअभी भी गन्ने के खेतों मेंबहुत रस बचा हुआ हैअभी भी जंगलों मेंजंगली हाथी गरजते हैं बादल से भी तेज अभी भी एक प्राचीन कविकविता की पत्थलगड़ी करता हैजंगलों से जमीनों सेखदेड़े...

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कविताएं : पल्लवी मुखर्जी

कविताएं : पल्लवी मुखर्जी

      तीन साझा संकलन प्रकाशित विलुप्त होती स्त्रियाँ उसने जी लिया थाअपने हिस्से का जीवन शायदउसके पैरों के निशानपगडंडियों पर मिल जाएंगे तुम्हेंउसके पंजों की छाप भीदीवार पर तुम्हें मिलेगीजिसे पाथा था उसने उपले थापते हुएबड़े प्रेम सेबड़े जतन सेबड़े इतमीनान...

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दो कविताएं : मिथिलेश राय

दो कविताएं : मिथिलेश राय

      युवा कवि। अंग्रेजी के शिक्षक। हमें होना चाहिए था हमें होना चाहिए थाझूठ के बीच तनकर खड़ासच की तरह रोटीसेकती स्त्री के लिएचूल्हे की आगऔर धान के बेहड़ रोपती स्त्री केकंठ में गीत की तरह किसी केपतझड़ में झड़ना था पीली औरपुरानी पत्तियों के साथकिसी के बसंत...

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दुलीचंद : सुमित दहिया

दुलीचंद : सुमित दहिया

      विभिन्न लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिकाओं मे रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। मुख्यतः दो काव्य संग्रह 'आवाज़ के स्टेशन' और 'खंडित मानव की कब्रगाह' प्रकाशित हो चुके है। पीले दांतों वाला बूढ़ा आदमीजिसके गले मेंफटा हुआ अभागा गमछा पड़ा हैऔर धारीदार कमीज़ परलहू...

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भारतीय नेपाली कविताएं : बीरभद्र कार्कीढोली

भारतीय नेपाली कविताएं : बीरभद्र कार्कीढोली

भारतीय नेपाली कवि। नेपाली साहित्यिक पत्रिका 'प्रक्रिया' के संपादक। इस बार इस बारमैंने अपना जन्मदिन अकेले ही मनायामोमबत्ती जलाते उंगुलियां जल गईंऔर जन्मदिन के केक काटने वाले हथियार सेतकरीबन अपनी हत्या कर बैठा इस बार वसंतआया या नहीं, पता नहीं चलाआंगन में कोई फूल नहीं...

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महेश कुमार केशरी की कविताएं

महेश कुमार केशरी की कविताएं

      युवा कवि। कहानी संकलन :'मुआवजा'। बेटियां बेटियां ससुराल मेंजल्दी ही बुनने लगती हैं रिश्तेकिसी चिड़िया के घोंसले की तरहपराये घर में आकरउसे अपना घर मानने लगती हैंकाकी मामी चाची बऊआ बबुआ कहकरवे देने लगती हैं सबको मान-सम्मान और कुम्हार के चाक पर...

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प्रकाश देवकुलिश की दो कविताएं

प्रकाश देवकुलिश की दो कविताएं

      कवि एवं मीडियाकर्मी। जीवन की करो गिनती इससे पहले किअंधेरा पोत दे काला रंगसफेद रोशनी परफैला जो है उजासउसकी बातें करोअंधेरे की बूंद को समुद्र मत बनाओ इससे पहले किमृत्यु अपने को बदल दे शोर मेंगीत गाओ, सुनाओजीवन की रागिनी गुनगुना रही हैश्रवण के सारे...

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गांधी कविताओं में

गांधी कविताओं में

गांधी जयंती माह में उन्हें याद करते हुए प्रस्तुत है ईजिप्ट की एक दुर्लभ कविता। साथ ही गुजराती और कन्नड़ की कविताओं के साथ ही पढ़ें नागार्जुन और रघुवीर सहाय की बापू को समर्पित हिंदी कविताएं.  ईजिप्ट और गुजराती कविताओं का अनुवाद : अवधेश प्रसाद सिंह लेखक, भाषाविद और...

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कविता : प्रतिभा चौहान

कविता : प्रतिभा चौहान

      कविता संग्रह  'पेड़ों पर मछलियाँ'। न्यायाधीश, बिहार न्यायिक सेवा। कविता - एक वे आगे बढ़ते गएउन्होंने रास्ते में आई हर एक चीज़ काअपने हिसाब से रूप बदलना चाहाऔर बदल डालावे और आगे बढ़ेउन्होंने अपने समूहों को सर्वश्रेष्ठ कहाखुद को किया ईश्वर घोषितनियम...

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राम प्रवेश रजक की कविताएं

राम प्रवेश रजक की कविताएं

        युवा कवि। पुस्तक : ‘बनारसी दास चतुर्वेदी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का आलोचनात्मक अध्ययन’। संप्रति: हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। संदेश बादल गरजने काहवा के तेज होने कापक्षियों के चहचहाने कातितलियों के उड़ने...

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कविताएं : प्रतीक त्रिपाठी

कविताएं : प्रतीक त्रिपाठी

      युवा कवि। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के शिक्षा विभाग में छात्र। कौन हो तुम? रेतसबसे ज़्यादा पानीसोखती हैफ़िर भी सभी नदियांरेत पर बहती हैं एक तुम हो किसबकुछ सोख लेना चाहते हो!तुम रेत नहींकुछ और होजिसके रहतेकोई नदी नहीं बह...

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मुझे कविताओं ने बचाया है : गौरव गुप्ता

मुझे कविताओं ने बचाया है : गौरव गुप्ता

युवा कवि और टिप्पणीकार। प्रकाशित कविता संग्रह- 'तुम्हारे लिए'। उस रोज़ उस रोजढूंढी था कोई तरकीब किजाते जाते फँस जाए तुम्हारे आंचल का कोरकिसी कील मेंऔर तुम रुक जाओ थोड़ी और देर मेरे पाससोचा थाक्या लिखूं किऔर छूट जाए तुम्हारी आखिरी ट्रेनक्या कहूँ तुमसेकि तुम लिपट जाओ...

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इस मौसम में ओस नहीं  आंसू गिरता है : गोलेंद्र पटेल

इस मौसम में ओस नहीं आंसू गिरता है : गोलेंद्र पटेल

      काशी हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र। एक किसानबारिश मेंबाएं हाथ में छाता थामेदाएं में लाठी लिएमौन जा रहा था मेड़ परमेड़ बिछलहर थीलड़खड़ाते-संभलतेअंततः गिरते ही देखा एक शब्दघास पर पड़ा हैउसने उठायाऔर पीछे खड़े कवि को दे दियाकवि ने शब्द लेकर कविता दीऔर उस...

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