हर कोई जब छाती में बहुत से सपने और माथे में बहुत से ख़याल डाल कर घर से ज़िंदगी ख़रीदने निकलता है, और ज़िंदगी के बाज़ार में ज़िंदगी की क़ीमत सुनता है, तो उसकी छाती में खनकते सब सिक्के बेकार हो जाते हैं। एक ग़ुस्सा था रुके हुए पानी की तरह जिसके निकलने की कोई राह नहीं थी,...



















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