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विश्वनाथ किशन भालेराव:‘वागर्थ’ बहुत ही महत्वपूर्ण पत्रिका है।पढ़ने के बाद वैचारिक क्षमता का निर्माण होता है।ज्ञानवर्धक जानकारी है।कवयित्री चित्रा पंवार की कविताएं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत ही मार्मिक और जीवन के प्रति सचेत होने के संबंध में लिखी गई हैं। विष्णु...

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गंगा प्रसाद, कांचरापाड़ा:‘वागर्थ’ 2022 अगस्त अंक।संपादकीय के तहत ‘स्वतंत्रता के इन 75 सालों ने क्या दिया’ पढ़कर लगा कि अपनी बात रखी गई है।सुभाष चंद्र कुशवाहा का आलेख ‘1857 घुड़सवार सैनिक, मातादीन और उसके साथियों की बगावत’ दस्तावेज जैसा मालूम पड़ा।लघुकथा ‘कारण’ (मीरा जैन)...

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सबाल्टर्न की अर्थवत्ता महेश कुमार, बनारस :‘वागर्थ’ के मई अंक में शंभुनाथ जी ने ‘एलीट विमर्श और लोकमन’ संपादकीय लिखा है।एलीट समाज और लोक के बीच के प्रतिस्पर्धी संबंधों की पड़ताल की गई है।मिथकीय और संस्कृत साहित्य के अलावा आधुनिक ‘राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य’ से भी संदर्भ...

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धीरेन्द्र सिंह -‘वागर्थ’ जून अंक।डॉ. कुसुम खेमानी के हिंदी साहित्य के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए।कुछ कहानियां इस अंक में काफी लंबी हैं।पत्रिका का सबसे आकर्षक भाग लगा विविध भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद।सभी अनुवादकों...

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उदय राज सिंह:‘वागर्थ’ के अप्रैल अंक में मल्टीमीडिया एक उत्तम प्रयास है! उपयोगी और लाभदायक! आभार पूरी टीम के प्रति ! अंकेश मद्धेशिया: ऐसे और भी वीडियो बनाइए, कथनों का चयन बहुत अच्छा है. बहुत सामयिक! समर सिंह: अप्रैल अंक की मल्टीमीडिया प्रस्तुति को कई बार पूरा सुना....

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नौशीन परवीन, रायपुर:‘वागर्थ’ के जनवरी अंक से लेकर मैं अब तक ‘वागर्थ’ को गंभीरता से पढ़ती आ रही हूँ।मुझे लगता है कि हिंदी में यह अपनी तरह की एक अलग पत्रिका है जो सुनियोजित रूप से संपादित और प्रकाशित होती है।इसकी विविध सामग्री पठनीय और संग्रहणीय है।पूरी ‘वागर्थ’ टीम इसके...

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भावना सिंह, हालिशहर :2022 के जनवरी अंक में छपी ईशमधु तलवार जी की कहानी ‘पत्थर के डालर’ अंतर्मन को छू गई।सच में इस कोरोना महामारी ने बहुतों से बहुत कुछ छीन लिया।हम दिन-रात पाने की चाह में बस चलते चले जा रहे थे, पता नहीं कब इस महामारी ने हम पर विराम लगा दिया।यह कैसी...

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नंदकिशोर तिवारी, वाराणसी:‘वागर्थ’ मासिक का दिसंबर ’21 अंक देखा।जायसी का पद्मावत : पंचशती चर्चा जानकारीपूर्ण लगी।जसिंता केरकेट्टा की कहानी ‘औरत का घर’ हरियश राय की ‘इंडिया’, नर्मदेश्वर कर ‘अजान’ रुचिकर लगे।कविताएं भारत यायावर, राजेंद्र उपाध्याय, पूजा यादव की रचनाएं...

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प्रेमकुमार गौतम (उ.प्र.) : ‘वागर्थ’ जून-नवंबर 2021 अंक में प्रकाशित कुछ दिवंगत रचनाकारों की रचनाओं ने बरबस ध्यान खींच लिया| शरतचंद श्रीवास्तव की कविता ‘आधी रात’, सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कथा- ‘कीचड़’ बेहद मर्मस्पर्शी बन पड़ी है| मरहूम जहीर कुरेशी की कथा -...

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सौरभ सिंह: ‘वागर्थ’ दिसंबर 2021 अंक| वैश्विक बाजार ने गांवों में अपरंपार इच्छाएं पैदा की हैं| परंतु लोगों के पास इसे पूरा कर सकने का कोई साधन नहीं है| इस अंतर्विरोध ने असह्य अवसाद और अवसन्नता पैदा की है| अतिरिक्त उत्पादन की चाहत ने प्रकृति का नाश कर दिया| व्यक्तिवादी...

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मन के भीतर की कई परतों की पड़ताल

मन के भीतर की कई परतों की पड़ताल

पूनम सिंह, मुहफ्फरपुर: जून-नवंबर 21 अंक में वैभव सिंह की कहानी इस अंक के नागरिक परिसर में विमर्श के कई प्रश्न खड़े करती है| हिंदी लोकवृत की समस्याओं को लेकर अवधेश प्रधान, बसंत त्रिपाठी तथा अन्य सजग बौद्धिकों द्वारा की गई परिचर्चा ने इस परिसर में संवाद को बहुतस्तरीय और...

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कम से कम मैं मानवीय तो कहला ही सकूं

कम से कम मैं मानवीय तो कहला ही सकूं

संजय जायसवाल, नैहाटी :  वागर्थ के अक्टूबर अंक में ज्ञानप्रकाश जी की सारी गजलें हमारे दिल की बातें हैं, लाजवाब| बहुत दिनों बाद लगा कि सच पढ़ नहीं देख रहा हूँ| शैलेय की तीनों कविताएं पठनीय हैं| बढ़ती दूरियों और खामोशियों पर एक सामीप्य और संवाद की गहरी बेचैनी| पुष्पांजलि...

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भावपक्ष के समान उत्तम कोटि का कला पक्ष

भावपक्ष के समान उत्तम कोटि का कला पक्ष

हंसा दीप, कैनेडा : सितंबर 2021 का वागर्थ। नि:संदेह आने वाली पीढ़ियों को अपना भविष्य अंग्रेजी भाषा में नज़र आता है, परिणामस्वरूप हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी सिर्फ बोलचाल की भाषा रह गई है। पालक अपने बच्चों को बचपन से ही अंग्रेजी स्कूलों में भेजकर उनके सुनहरे...

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दारुण यथार्थ से साक्षात्कार

दारुण यथार्थ से साक्षात्कार

बिपिन बिहारी साव : आज की मीडिया व्यावसायिक बुद्धि से संचालित होती है और जिस मीडिया में आदर्श की स्थिति बची है उसका भी रुझान इसी तरफ हो रहा है। इस समस्या की मुख्य जड़ पूंजीवादी सभ्यता है। विनय कुमार सिंह : अगस्त 2021 के संपादकीय में समकालीन पत्रकारिता की दशा-दिशा का जो...

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हम टिटहरी प्रयास तो कर ही सकते हैं।

हम टिटहरी प्रयास तो कर ही सकते हैं।

वेदप्रकाश आर्य : वागर्थ का जुलाई अंक।वे बुद्धिजीवी जिनमें स्वतंत्र चेतना शेष है, जिन्हें सामान्य जन के सुख दुख भीतर से आंदोलित करते हैं, वे अपने आपको विशिष्ट नहीं समझ सकते,समझना चाहिए भी नहीं। परंतु ऐसे बुद्धिजीवियों का इस समय भयानक अकाल पड़ा हुआ है। अब वे बुद्धिजीवी...

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दृष्टिकोण बदल लेने को प्रेरित करता अंक

दृष्टिकोण बदल लेने को प्रेरित करता अंक

ख़ास चिट्ठी : नवनीत कुमार झा, दरभंगा वागर्थ, जून 2021 अंक: दलित आंदोलन और विमर्श की जिस परंपरा को फुले,अय्यनकलि, पेरियार रामास्वामी आदि ने सींचा उसे एक संगठित वैचारिक जमीन देकर पल्लवित- पुष्पित करनेवाले अंबेडकर के विचारों की अहमियत आज बढ़ गई है, क्योंकि आज धार्मिक...

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समकालीन दौर का एक ज्ञानवर्धक चित्र

समकालीन दौर का एक ज्ञानवर्धक चित्र

नवनीत कुमार झा, दरभंगा,  राहुल सांकृत्यायन के समकालीन थर्मानंद कोसांबी भी बुद्ध के प्रति आस्था रखने वाले एक अद्भुत और अध्ययनशील यायावर थे, परन्तु वे राहुल सांकृत्यायन से वैसे ही अलग थे जैसे दो ध्रुव हों !! धर्मानंद कोसांबी से पूरी तरह से अपरिचित होने के कारण राधावल्लभ...

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सराहनीय प्रयास

सराहनीय प्रयास

1- चितरंजन भारती, असम :  वागर्थ का अंक 303। फणीश्वरनाथ रेणु के महत्व को सवालों के दायरे में रख सुधी रचनाकारों ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उपन्यास में बदलते गांव को तीन उपन्यासों के मद्देनजर श्रद्धांजलि सिंह ने बेहतरीन विवेचन किया है। पंकज चतुर्वेदी, उमाशंकर चौधरी,...

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प्रासंगिक और विचारोत्तेजक अंक

प्रासंगिक और विचारोत्तेजक अंक

भारत यायावर, हजारीबाग : लंबे समय तक कोरोना काल में बंद ‘वागर्थ’ अब मुक्त होकर शीतल समीर-सा आया और इंडिया में किसान के बहाने भारत माता के जार-जार रोने की चर्चा कर गया। रेणु से बड़ा किसान लेखक भला और कौन है? पीड़ित दशा में जी रहे किसान को वाणी देने वाले रेणु स्वयं किसान...

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रचनात्मक और चिंतनपरक सामग्री से सजा अंक

रचनात्मक और चिंतनपरक सामग्री से सजा अंक

अंकेश मद्धेशिया, इलाहाबाद : बचपन की स्मृतियों में बसंत पंचमी की स्मृति स्कूल में होने वाली सरस्वती वंदना और सरस्वती पूजा के बाद मिलने वाले प्रसाद के रूप में ही है। उम्र की कुछ और सीढ़ियां चढ़कर आगे आने पर बसंत की गरिमा का कुछ अनुमान हुआ, जब बसंत पर हिन्दी के...

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