समीक्षा संवाद

दलित कहानियों का स्त्री पक्ष : मधु सिंह

      युवा लेखिका और संस्कृतिकर्मी। विद्यासागर विश्वविद्यालय से हाल में डॉक्टरेट की उपाधि। कोलकाता के खुदीराम बोस कॉलेज में शिक्षण।आज की कहानी नई रचनाधर्मिता और सामुदायिक उभार के कारण बदली दिखती है। इसका स्वर जितना आधुनिक विमर्शों से जुड़ा है, उतना ही वह...

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तर्कपूर्ण बौद्धिक जगह की खोज संजय जायसवाल

तर्कपूर्ण बौद्धिक जगह की खोज संजय जायसवाल

कवि, समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।    21वीं सदी में उदारीकरण, लोकतंत्र और गांधी के विचारों को लेकर एक गहरी बेचैनी है। यह हमारे लिए एक आश्वस्ति है। विमर्शों के इकहरेपन के बरक्स आलोचक विचार-विमर्श की एक...

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आलोचना के तीन रूप : मृत्युंजय श्रीवास्तव

आलोचना के तीन रूप : मृत्युंजय श्रीवास्तव

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।  अवधेश प्रधान हिंदी के ऐसे लेखक हैं जो अपने पाठकों को ‘परंपरा की पहचान’ निरंतर कराते रहे हैं। समय-समय पर लिखे उनके लेखों का संग्रह है ‘परंपरा की पहचान’। इसमें वे परंपराओं की आलोचनात्मक यात्रा पर निकलते हैं। इस पुस्तक में...

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कथेतर गद्य की तीन कृतियां : रमेश अनुपम

कथेतर गद्य की तीन कृतियां : रमेश अनुपम

  कवि और आलोचक। अद्यतन कविता संग्रह‘लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास’।    कथेतर गद्य की परंपरा हिंदी साहित्य में प्रारंभ से विद्यमान रही है। वासुदेव शरण अग्रवाल, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, रांगेय राघव, महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, राहुल सांकृत्यायन,...

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गद्य में जिया हुआ सच : संध्या नवोदिता

गद्य में जिया हुआ सच : संध्या नवोदिता

युवा कवयित्री, लेखिका, पत्रकार और अनुवादक।   कभी कोई निरा वर्तमान नहीं होता। वर्तमान एक अबाध गति के साथ घटित होता हुआ किसी मायावी प्रतिनिधित्व का रूप लेने लगता है। वह बार-बार परिभाषित होना चाहता है। यहां समस्या किसी एकल सच के न होने की है। शहर एक समग्र...

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उपन्यास की लोकतांत्रिकता : सरोज सिंह

उपन्यास की लोकतांत्रिकता : सरोज सिंह

वरिष्ठ लेखिका और समीक्षक।संप्रति इलाहाबाद में शिक्षण कार्य। हिंदी लेखक आर्थिक स्तर पर सामान्यत: इतना समर्थ नहीं होता कि आने-जाने, रहने-बसने, पढ़ने-लिखने और सामग्री जुटाने के साधन जुटा सके। पर मुझे लगता है कि आप कुछ करने की ठान लो, तो काम चलाने योग्य साधन जैसे-तैसे जुट...

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समकालीन कविता के नए रंग : निशांत

समकालीन कविता के नए रंग : निशांत

युवा कवि। काजी नजरुल यूनिवर्सिटी, आसनसोल में सहायक प्रोफेसर। यहां कुछ ऐसे कवियों पर चर्चा है, जिन्हें पर्याप्त अनुभवी और कुशल कहा जा सकता है। राजेंद्र कुमार का नवीनतम संग्रह है ‘उदासी का ध्रुपद’। उमाशंकर चौधरी का संग्रह ‘कुछ भी वैसा नहीं’ और विनय कुमार का ‘पानी जैसा...

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तीन उपन्यास-कथा एक संगीत है : मृत्युंजय श्रीवास्तव

तीन उपन्यास-कथा एक संगीत है : मृत्युंजय श्रीवास्तव

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।    क्या आप किसी ऐसी औरत को जानते हैं जो घर में चल रहे पूजा-पाठ और कर्मकांड के व्यापार से घुटन महसूस करती हो? क्या आप ऐसी किसी औरत से मिले हैं जो इस किस्म की वजहों से अपने दांपत्य जीवन को असफल मानती हो? ऐसी ही एक औरत है...

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स्थानीयता और सार्वभौम के बीच कविता : संजय जायसवाल

स्थानीयता और सार्वभौम के बीच कविता : संजय जायसवाल

कवि, समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।    हिंदी कविता का परिदृश्य वैविध्यपूर्ण है। जीवन की असंख्य छवियां कविताओं में आकार पाकर हमें उत्प्रेरित करती हैं, चकित करती हैं और कई बार प्रतिवाद के लिए उकसाती हैं। कविता...

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प्रतिरोध की समकालीन कविताएं : रमेश अनुपम

प्रतिरोध की समकालीन कविताएं : रमेश अनुपम

  कवि और आलोचक। अद्यतन कविता संग्रह‘लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास’।    हर कला भयावह समय में उम्मीद से अधिक भरोसा होती है। यह आप आपदाओं में अनुभव करते हैं। युद्ध के समय में इनका महत्व समझ में आता है। कोरोना समय इसका ज्वलंत उदाहरण है। मेरी डायरी, किताब और...

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आलोचना के कुछ आयाम : संजय जायसवाल

आलोचना के कुछ आयाम : संजय जायसवाल

कवि, समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।    आज जब चारों ओर संवाद की जगह शोर बढ़ता जा रहा है, हम संवाद के ढांचे को समावेशी और विवेकपरक बनाने की बेचैनी हिंदी आलोचना में देख सकते हैं।इन दिनों इतिहास के पुनर्लेखन के...

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गद्य में जिया हुआ सच : संध्या नवोदिता

दो स्त्री रचनाकारों के उपन्यास : मृत्युंजय श्रीवास्तव

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।इस वर्ष के आरंभ में ही दो ऐसे उपन्यास आ गए, जिनसे हिंदी कथा साहित्य समृद्ध होता दिख रहा है।यह एक संयोग ही है कि जिन उपन्यासों की चर्चा यहां होगी, उनकी रचनाकार स्त्रियां हैं।दोनों स्त्री रचनाकारों की चिंता और मांग भी समान...

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उम्मीदों के चार कवितालोक : आनंद गुप्ता

उम्मीदों के चार कवितालोक : आनंद गुप्ता

युवा कवि।कई कविता संकलन तथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।संप्रति उत्तर २४ परगना में अध्यापन।कविता और स्मृति का एक दूसरे के साथ गहरा संबंध रहा है।स्मृतियों में लौटना, यानी फिर अतीत के गुजरे हुए पलों को जीना।स्मृतिविहीन कविता और जिंदगी दोनों नीरस हो जाती...

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जयशंकर प्रसाद और जैनेंद्र कुमार – जीवनी के दर्पण में : मृत्युंजय श्रीवास्तव

जयशंकर प्रसाद और जैनेंद्र कुमार – जीवनी के दर्पण में : मृत्युंजय श्रीवास्तव

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।जयशंकर प्रसाद और जैनेंद्र कुमार की जीवनियां बहुतों के लिए उत्सुकता जगा सकती हैं, क्योंकि दोनों अपने-अपने समय के बड़े साहित्यकार रहे हैं।   प्रसाद के अवसान के ८३ वर्ष बाद आई यह जीवनी प्रसाद की रचनाओं की परतें भी खोलती है,...

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हिंदी कहानी के कुछ नए चेहरे : अंकित कुमार मौर्य

हिंदी कहानी के कुछ नए चेहरे : अंकित कुमार मौर्य

युवा समीक्षक।बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में शोधरत।रवींद्र आरोही के पहले कहानी संग्रह ‘जादू : एक हँसी एक हीरोइन’, शेषनाथ पांडेय के कहानी संग्रह ‘इलाहाबाद भी!’, सविता पाठक के कहानी संग्रह ‘हिस्टीरिया’ तथा मिथिलेश प्रियदर्शी के कहानी संग्रह ‘लोहे का बक्सा...

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तीन उपन्यास-तीन जमीनें : सरोज सिंह

तीन उपन्यास-तीन जमीनें : सरोज सिंह

वरिष्ठ लेखिका और समीक्षक।संप्रति इलाहाबाद में शिक्षण कार्य।उपन्यास अपने समय और समाज की सशक्त विधा और उपलब्धि है।साथ ही यह पाठक से संवाद करने में अधिक समर्थ है।हर उपन्यास में एक कथा संसार होता है।कथा में घटनाओं की श्रृंखला होती है, किस्सागो तथा श्रोता एक दूसरे के...

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जन बुद्धिजीवी और ग्रामचेतस : मृत्युंजय

जन बुद्धिजीवी और ग्रामचेतस : मृत्युंजय

    प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।ऐसे समय में जब सोच की शोचनीय हालत हो और हर स्तर पर सोच के महा अकाल के दृश्य उपस्थित हों तथा बिना सोचे-समझे जीने की लत लग गई हो, विजय कुमार और नरेश चंद्रकर की संपादित किताब जन बुद्धिजीवी एडवर्ड सईद का जीवन और...

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कविता और जीवन का संवाद : मधु सिंह

कविता और जीवन का संवाद : मधु सिंह

    युवा लेखिका।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में पीएच.डी. की शोध छात्रा।कोलकाता के खुदीराम बोस कॉलेज में शिक्षण।कविता और मनुष्य का पुराना सृजनात्मक नाता है।कविता मानव मन की कई उलझनों को स्पष्ट करने और कई बार चेतना को जगाने का काम करती है।यह गहरे अवसाद...

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हिंदी आलोचना की नई जमीन : संजय जायसवाल

हिंदी आलोचना की नई जमीन : संजय जायसवाल

कवि और समीक्षक. विद्यासागर विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर एवं प्रबुद्ध रंगकर्मी.हिंदी आलोचना की नई जमीन उर्वर होने के साथ संभावनाओं से भरी है।आलोचना की समृद्ध परंपरा के साथ आज कई आलोचक निरंतर नए मिजाज के साथ लेखन कर रहे हैं।तथ्यपरकता, विश्लेषणात्मकता, आलोचनात्मक विवेक और...

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जमीन के तीन उपन्यास : श्रद्धांजलि सिंह

जमीन के तीन उपन्यास : श्रद्धांजलि सिंह

  युवा लेखिका।दार्जिलिंग गवर्मेंट कॉलेज में प्रोफेसर।  साहित्य अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों से टकराने और उन पर सोचने का अवसर देता है।इसलिए आजादी के इस अमृत महोत्सव में एक नागरिक और एक मनुष्य की हैसियत से समय की क्रूर और नग्न सच्चाइयों से रूबरू होना बेहद जरूरी...

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