संपादकीय
प्रेमचंद : परंपराओं से विच्छेद के दौर में

प्रेमचंद : परंपराओं से विच्छेद के दौर में

शंभुनाथ प्रेमचंद ने हिंदी प्रांतों के गवर्नर मालकम हेली की एक टिप्पणी ‘भारत 1983 में’ का विरोध करते हुए लिखा था, ‘सर मालकम हेली के विचार में भारत की परंपरा और उसकी संस्कृति प्रतिनिधि (लोकतांत्रिक) शासन के अनुकूल नहीं है। यह कथन हमें चिंता में डाल देता है।... यह मानव...

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संपादकीय जून-2024 : लेखक का अकेलापन

संपादकीय जून-2024 : लेखक का अकेलापन

शंभुनाथ साहित्य महज कुछ लिखना नहीं है, बल्कि यह दुनिया में प्रेम और स्वतंत्रता की खोज है जो कई बार अकेला कर देती है। फिर भी साहित्य लिखना और पढ़ना जरूरी है, क्योंकि यह जीवन की सुंदरताओं को बचाकर रखनेवाली मनुष्यता की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति है। साहित्य का खो जाना सभ्यता...

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संपादकीय मई-2024 : कामायनी का महत्व

संपादकीय मई-2024 : कामायनी का महत्व

शंभुनाथयदि आज की उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिपक्ष में किसी एक कृति को रखना हो, कहा जा सकता है कि वह प्रसाद की ‘कामायनी’ है। यह कृति सुख की दासता और स्वेच्छाचारिता से एक महाकाव्यात्मक विद्रोह है। आज का मनुष्य कृत्रिम इच्छाओं की वजह से भोगवादी और कट्टर एकसाथ दोनों होता जा...

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संपादकीय अप्रैल 2024 : मानवता का पुनर्जन्म

संपादकीय अप्रैल 2024 : मानवता का पुनर्जन्म

शंभुनाथ दुनिया के सभी धर्म भय और निराशा की देन हैं। ईश्वर जरूर लोगों के दुख से निकला होगा और आशा की किरण बनकर आया होगा। धर्म ही कभी खुले आसमान के नीचे जीवन के शिक्षालय थे, संवाद के स्थल थे, रोने की एकांत जगह और गाने के मंच थे। धर्म सृष्टि की उन चीजों की व्याख्या करते...

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संपादकीय मार्च 2024 : स्त्री, स्त्रीवाद और स्त्री-सशक्तिकरण

संपादकीय मार्च 2024 : स्त्री, स्त्रीवाद और स्त्री-सशक्तिकरण

शंभुनाथ ॠषि याज्ञवल्क्य ने गार्गी के लगातार सवाल करने पर गुस्से से कहा था, ‘ज्यादा पूछा तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा।’ प्राचीन युगों की तरह वर्तमान युग में भी स्त्रियां ज्यादा सवाल करने से रोकी जाती हैं। उनके साहस की हद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से बांध दी जाती है।...

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संपादकीय फरवरी 2024 : दगा की, इस सभ्यता ने दगा की

संपादकीय फरवरी 2024 : दगा की, इस सभ्यता ने दगा की

शंभुनाथ कवि निराला की उपर्युक्त पंक्ति बहुत कुछ कहती है। कोई व्यक्ति या दल दगा करता है तो हम कुछ साल पीछे हो जा सकते हैं, पर जब सभ्यता दगा करती है, देश का इतिहास विध्वस्त हो जाता है, इस विध्वंस से उड़े धूलकण भले बहुतों को सलमा-सितारे नजर आएं! निराला छायावादी कवि थे।...

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संपादकीय जनवरी 2024 : जिज्ञासा के द्वार खुले हैं या बंद

संपादकीय जनवरी 2024 : जिज्ञासा के द्वार खुले हैं या बंद

शंभुनाथ यदि हम वस्तुओं की दुनिया में अपने को खो नहीं चुके हैं तो कभी-कभी अपने को खोजने का प्रयत्न करना चाहिए कि हम कौन हैं, हमारे लक्ष्य क्या हैं। पृथ्वी की इन दिनों कितनी ज्यादा क्षति हो रही है, सामाजिक पर्यावरण कितना बिगड़ रहा है- ऐसे विषयों पर सोचे बिना आज जो लोग...

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संपादकीय दिसंबर-2023 : दृष्टि का अकाल

संपादकीय दिसंबर-2023 : दृष्टि का अकाल

शंभुनाथमीराबाई दमन और हिंसा के माहौल में भी कृष्ण के प्रेम में बावरी थी। उन्होंने सवाल किया था कि इतने पाखंड और लोभ से भरकर तुम ईश्वर की भक्ति कैसे कर सकते हो- ‘यहि विधि भगति कैसे होय’। राणा उन्हें पहरे में रखता था। लोग कड़वा बोलते थे, निंदा करते थे। मीरा ने कहा, ‘कड़वा...

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संपादकीय नवंबर-2023 : भारतीय ज्ञान परंपरा पर बहस

संपादकीय नवंबर-2023 : भारतीय ज्ञान परंपरा पर बहस

शंभुनाथ इस युग में किसी विचार की सचाई के लिए बौद्धिक शक्ति का होना पर्याप्त नहीं है। भौतिक शक्ति भी चाहिए, अर्थात भीड़ और पूंजी की शक्ति। सौ साल पहले लोग ज्ञानियों का अपार आदर करते थे और पांच सौ-हजार साल पहले वे ही समाज के आलोकस्तंभ थे। वर्तमान युग में ज्ञान की जगह...

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संपादकीय अक्टूबर-2023 : अहिंसा के लिए कविता

संपादकीय अक्टूबर-2023 : अहिंसा के लिए कविता

शंभुनाथ अहिंसा का व्यापक अर्थ है। यह गांधी के दर्शन का संपूर्ण सार और भारत देश का बार-बार दबाया गया महाभाव है। अहिंसा की जो यात्रा बुद्ध से शुरू हुई थी, वह सभ्यता के वर्तमान शिखर पर गंभीर चुनौतियों से घिर गई है। इस बार संपादकीय की जगह अहिंसा के लिए प्रार्थना के रूप...

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संपादकीय सितंबर-2023 : भाषा में अंधेरा

संपादकीय सितंबर-2023 : भाषा में अंधेरा

शंभुनाथ उपनिषद में भाषा को ‘मन की नहर’ कहा गया है। वह मानव चित्त का प्रतिबिंब होने के अलावा समूची सभ्यता का प्रतिबिंब है। हम जो बोलते हैं, उसमें इसकी झलक होती है कि समाज किस तरफ जा रहा है। खासकर  बहस की भाषा से सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास की दिशा का बोध हो सकता है।...

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संपादकीय अगस्त-2023 : स्वतंत्रता की जययात्रा

संपादकीय अगस्त-2023 : स्वतंत्रता की जययात्रा

शंभुनाथ अज्ञेय ने एक जगह लिखा है, ‘स्वाधीनता एक ऐसी चीज है जो निरंतर आविष्कार, शोध और संघर्ष मांगती है।’ इसका अर्थ है, स्वाधीनता की कोई आखिरी मंजिल नहीं है। भारत की स्वतंत्रता के 75 साल पर कई तरह से चर्चा हुई। इस दौर को अमृतकाल कहा गया और 15 अगस्त की महत्ता को खुलकर...

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प्रेमचंद : परंपराओं से विच्छेद के दौर में

संपादकीय जुलाई-2023 : प्रेमचंद : भूलने से पहले

शंभुनाथ हमारा समय प्रेमचंद को भूलने के दौर में है। 1960-70 के दशक में आधुनिकतावादी उभार के समय प्रेमचंद को बैलगाड़ी के जमाने का कथाकार कहा जा रहा था। वे सामान्यतः याद नहीं किए जाते, क्योंकि लोगों की चेतना पर प्राचीन-नए दबाव बढ़ गए हैं। बहुत कौशल से अंधेरे में समा चुकी...

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संपादकीय जून-2023 : सभ्यता का ‘मंकी सिंड्रोम’

संपादकीय जून-2023 : सभ्यता का ‘मंकी सिंड्रोम’

शंभुनाथ हर विकासशील भारतीय भाषा का अपना एक विश्व है जो ‘स्थानीय’, ‘राष्ट्रीय’ और ‘वैश्विक’ के बौद्धिक त्रिभुज से बनता है।इस त्रिभुज का कोई कोण छोटा या बड़ा हो सकता है, पर इसके बिना हर भारतीय अधूरा है! आज हर भारतीय में यह त्रिभुज लड़खड़ाया है या दरका है, जिसका असर साहित्य...

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संपादकीय मई-2023 : आत्मनिरीक्षण का जोखिम

संपादकीय मई-2023 : आत्मनिरीक्षण का जोखिम

शंभुनाथ कई बार मनुष्य के पास सिर्फ एक उपाय होता है, ‘जो घटित हो रहा है उसे चुपचाप जियो’।यह अंधेरे का फोटो खींचने से अलग हो सकता है, यदि हमारे सामने यह सवाल हो- ‘फिर भी यह जीवन अपना है, तो इसका क्या अर्थ है?’ इस प्रश्न का संबंध सबसे पहले आत्मनिरीक्षण से है।भारतीय समाज...

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संपादकीय अप्रैल-2023 : आलोचनात्मक सोच का संकट

संपादकीय अप्रैल-2023 : आलोचनात्मक सोच का संकट

शंभुनाथ आलोचनात्मक ढंग से देखने या रचनात्मक होने का क्या अर्थ है, यह साहित्य ही नहीं, जीवन का भी प्रश्न है।२१वीं सदी की वास्तविकता यह है कि आलोचनात्मक दृष्टि संकुचित हो गई है और रचना से ज्यादा उत्पादन का महत्व है।समाज में बाजार एक सर्वभक्षी डायनासोर के रूप में घुसा...

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संपादकीय मार्च-2023 : असहमति का भविष्य आम असहमति में है

संपादकीय मार्च-2023 : असहमति का भविष्य आम असहमति में है

शंभुनाथ साहित्य का जन्म असहमति से हुआ है।इसका प्रमाण है ‘रामायण’ में बहेलिया द्वारा मिथुनरत नर क्रौंच को मार गिराने के प्रतिवाद में वाल्मीकि के कंठ से फूटा पहला श्लोक, ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः...’।यह भी गौर करने की चीज है कि कवि वाल्मीकि का अयोध्या के राजदरबार से...

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संपादकीय फरवरी-2023 : विमर्शों को जोड़ने का अर्थ

संपादकीय फरवरी-2023 : विमर्शों को जोड़ने का अर्थ

शंभुनाथ दलित विमर्श दलित चेतना की एक मंजिल है, अंतिम मंजिल नहीं।इसी तरह स्त्रीवाद स्त्री चेतना की एक मंजिल है, अंतिम ठिकाना नहीं।१९८० के दशक से स्त्री विमर्श और दलित विमर्श शुरू हुए थे।इसमें राजेंद्र यादव और उनके ‘हंस’ (१९८६) की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।उन्होंने नई...

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संपादकीय जनवरी-2023 : संस्कृतियां साहित्य के कारण ही जीवित रहती हैं

संपादकीय जनवरी-2023 : संस्कृतियां साहित्य के कारण ही जीवित रहती हैं

शंभुनाथ साहित्य हमेशा सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों का मामला है।आज समाज में साहित्य की जरूरत कितनी महसूस की जाती है, शिक्षित लोगों के जीवन में साहित्यिक कृतियों का कितना स्थान है और साहित्य के नाम पर जो कुछ घटित हो रहा है, वह कितना साहित्य है- ये चुनौतीपूर्ण प्रश्न हैं।कहीं...

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संपादकीय दिसंबर-2022 : महान परंपरा और लघु परंपरा

संपादकीय दिसंबर-2022 : महान परंपरा और लघु परंपरा

शंभुनाथ पश्चिमी कोण से एक चर्चित विभाजन है- ‘महान परंपरा-लघु परंपरा’।धारणा बनाई गई है कि वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, गीता, संस्कृत के अन्य क्लासिकल ग्रंथ और इनसे संबंध रखनेवाला साहित्य ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ है।कालिदास महान परंपरा हैं।रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य आदि महान...

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