संपादकीय
संपादकीय अक्टूबर  2021 : बिग मीडिया और साहित्यिक पत्रिकाएं

संपादकीय अक्टूबर 2021 : बिग मीडिया और साहित्यिक पत्रिकाएं

शंभुनाथ वैश्‍वीकरण और डिजिटल क्रांति ने बहुत-सी मूल्यवान चीजों को मनुष्य के हाथ से बाहर कर दिया है, उन्हें पुनः उपलब्ध करना कठिन बना दिया है। दोनों मिलकर तरह-तरह से ‘तर्क’, ‘मूल्य’, ‘सच’, ‘न्याय’ जैसी चीजों का ध्वंस कर रहे हैं। उनसे सबसे ज्यादा प्रभावित मीडिया है। कभी...

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संपादकीय सितंबर  2021 : हिंदी की आत्मपहचान कितनी सुरक्षित है

संपादकीय सितंबर 2021 : हिंदी की आत्मपहचान कितनी सुरक्षित है

शंभुनाथ कोई भाषा जब आत्मपहचान खोती है तो वह पहले भीतर से दरिद्र होती है। उसमें ज्ञान और संवेदना का ह्रास होने लगता है। हिंदी का सिद्ध-नाथों से लेकर कबीर-तुलसी और भारतेंदु-प्रेमचंद-निराला से होते हुए आज तक एक बुद्धिदीप्त, समावेशी और हृदय की भाषा के रूप में विकास होता...

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संपादकीय अगस्त 2021 : मीडिया का स्वराज

संपादकीय अगस्त 2021 : मीडिया का स्वराज

शंभुनाथ  एक तरह से आज का मीडिया बाजार और राजनीति के बीच सैंडविच है। मीडिया निर्मित उत्तेजनात्मक खबरों का मालवाहक बनता जा रहा है। पत्रकार तो बिलकुल असहाय है- हायर एंड फायर! हर पाठक-दर्शक को सही खबर जानने का अधिकार है, जबकि आज के मीडिया का लक्ष्य है पाठक-दर्शक के...

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संपादकीय जुलाई 2021 : नागरिक परिसर में बुद्धिजीवी

संपादकीय जुलाई 2021 : नागरिक परिसर में बुद्धिजीवी

शंभुनाथ समाज में मानुष भाव, नागरिक भाव या भारतीय उदारवाद का विघटन क्यों हुआ। इसके लिए एलीट बुद्धिजीवी और उदारवादी राजनीतिज्ञ खुद कितने जिम्मेदार हैं, इस पर सोचने का यह समय है। कई बार जरूरी होता है अपने को सुधारना और अपनी पुरानी मूर्ति के बाहर आना – उसे तोड़कर।...

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संपादकीय जून 2021 : महामारी और नागरिक परिसर

संपादकीय जून 2021 : महामारी और नागरिक परिसर

शंभुनाथ1918 में भारत में स्पेनिश फ्लू नाम से आई महामारी ने भारतीय स्थितियों में दो बड़े परिवर्तन ला दिए थे। एक, इसने दमनमूलक अंग्रेजी राज के प्रति लोगों के मन में असंतोष भर दिया, जिससे प्रथम सत्याग्रह आंदोलन के लिए जमीन मिली। दूसरे, देश में एक अनोखा नजारा देखने को...

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संपादकीय मई 2021 : अंबेडकर को पढ़ते हुए

संपादकीय मई 2021 : अंबेडकर को पढ़ते हुए

शंभुनाथ ‘‘शिक्षा से अधिक शील को महत्व दें। साथ ही, अपनी शिक्षा का प्रयोग दीन-दुखी जनता के उद्धार के लिए न करके यदि केवल ‘अपनी नौकरी भली-अपना परिवार भला’ की भावना के साथ करेंगे तो समाज को आपकी शिक्षा से लाभ ही क्या?’’ अंबेडकर1933 में ‘हंस’ के एक मुखपृष्ठ पर अंबेडकर की...

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संपादकीय अप्रैल 2021 : दलित चिंतन में ऊंचाइयां

संपादकीय अप्रैल 2021 : दलित चिंतन में ऊंचाइयां

शंभुनाथ दलितों का आंदोलन फिर सैकड़ों साल पीछे चला गया है। इससे निश्चय ही एलीटवर्गीय दलितों को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हाल की अनगिनत घटनाओं से साफ है कि आम दलितों और दलित स्त्रियों की दशा पहले से ज्यादा बुरी हुई है, क्योंकि गरम बातें काफी नहीं हैं। कई बार सिर्फ अपने...

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संपादकीय मार्च 2021 : भाषा पर है कैसा संकट

संपादकीय मार्च 2021 : भाषा पर है कैसा संकट

शंभुनाथ पश्चिम में बाबेल की मीनार की एक कथा है। उसका संबंध भाषाओं की भिन्नता से है। कभी पूरी दुनिया में एक ही भाषा थी। सभी एक भाषा बोलते थे। लोगों ने ईंटें पकाईं। उन्होंने एक अच्छा शहर और एक ऊँची मीनार बनानी शुरू की, ताकि वे स्वर्ग तक पहुंच सकें। वे सभी श्रमिक...

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संपादकीय जनवरी-फरवरी 2021 : इंडिया में किसान

संपादकीय जनवरी-फरवरी 2021 : इंडिया में किसान

शंभुनाथ ‘जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं।... कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या?’ (रसप्रिया) ‘रखिए अपना पुरुख वचन, खूब सुन चुकी हूँ पुरुख वचन! चालीस साल से और किसका वचन सुन रही हूँ!’ (तीर्थोदक) ‘जाति बहुत बड़ी चीज है।...

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संपादकीय दिसंबर 2020 : विज्ञान की आजादी

संपादकीय दिसंबर 2020 : विज्ञान की आजादी

शंभुनाथ भारत में अति-विकसित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अति-पिछड़े मानस द्वारा हो रहा है। वैज्ञानिक मानसिकता का चरम अभाव है। समस्या यह है कि बाजार और राजनीति पर मानवीय नैतिकता का जरा भी नियंत्रण नहीं है। ये दोनों अब निरंकुश हैं। ये यथार्थ को अपने उद्देश्य के अनुरूप ढालने...

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संपादकीय नवंबर 2020 : अब क्या खोना बाकी है !

संपादकीय नवंबर 2020 : अब क्या खोना बाकी है !

शंभुनाथ'भूल जाना मेरे बच्चे कि खुसरो दरबारी था / या वह एक ख्वाब था / जो कभी संगीत, कभी कविता, कभी भाषा, कभी दर्शन बनता था।' (कुंवर नारायण) यदि कभी खड़ी और ब्रजभाषा के कवि खुसरो का कुछ लिखा हुआ सामने आए तो क्या हम पहचान पाएंगे उस ‘हिंदी की तूती' को? क्या इस जमाने के...

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संपादकीय अक्टूबर 2020 : गांधी का धर्म

संपादकीय अक्टूबर 2020 : गांधी का धर्म

शंभुनाथ आधुनिक युग में खूब अंग्रेजी पढ़ लेने के बावजूद गांधी ने कहा था, ‘मैं हिंदू पहले हूँ...’ वे तर्क के युग में आस्था की शक्ति को समझते थे, क्योंकि कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ भारतीयों के पास तर्क की जगह आस्था की शक्ति ज्यादा थी। यह ‘पर्वतों को हिला’ सकती थी और आजादी की...

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