लघुकथा
थानेदार : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

थानेदार : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

बैग में कुछ नकदी कागजात के साथ नौ सौ रुपये थे।मुझे रुपयों से ज्यादा कागजातों की फ्रिक थी।जहां उच्चकों ने मेरा बैग उडाया था, उसके आधा किलोमीटर की दूरी पर किशनगंज पुलिस चौकी थी।रिपोर्ट दर्ज कराने की नीयत से मैंने थानेदार से कहा, ‘कागजात बेहद जरूरी हैं।मेरी गुजारिश है कि...

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मनहूस छाया : अभिषेक कुमार

मनहूस छाया : अभिषेक कुमार

‘सुनीतिया की मां अब यहां से उठकर चली जाए।सिंदूरदान के समय लड़की पर विधवा की मनहूस छाया नहीं पड़नी चाहिए’ - पंडित जी की कड़क आवाज गूंजी।सब लोग सकते में आ गए।आखिर सुनीता अपने मां की इकलौती बेटी थी।लेकिन मां चुपचाप आंचल से आंखों को पोछते हुए विवाह मंडप से जाने लगी। तभी...

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संवाददाता : सुरेश सौरभ

संवाददाता : सुरेश सौरभ

संवाददाता यूक्रेन के सैनिकों के साथ चल रहा था।यु़द्ध की विभीषिका को अपने कैमरे में कैद करता जा रहा था।तभी रूस का एक लड़ाकू विमान गरजता हुआ तेजी से ऊपर से गुजरा।संवाददाता अपना कैमरा संभालाते हुए तुरंत झुक गया।सैनिकों ने अपनी-अपनी पोजीशन संभाल ली।विमान निकल गया।सैनिकों...

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अनुष्ठान : समीर उपाध्याय

अनुष्ठान : समीर उपाध्याय

अजय - महेश, तुम्हें पता है आजकल चैत्र नवरात्रि के दिन चल रहे हैं? हम दोनों पति-पत्नी ने मां दुर्गा का अनुष्ठान किया है।नौ दिनों का उपवास रखा है।नौ दिनों तक मां दुर्गा के मंदिर जाकर लड्डू का भोग चढ़ाने का व्रत भी रखा है। महेश- दोस्त, तुम्हें पता है कि कल मैं तुम्हारे घर...

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सुबह कितनी दूर : जाफर मेहदी जाफरी

सुबह कितनी दूर : जाफर मेहदी जाफरी

मैं गलियों से गुजरता हुआ सड़क पर आ गया।हर तरफ रोशनी ही रोशनी थी।मैं टहलता हुआ नदी के तट पर पहुंच गया जिसके दोनों छोर अनगिनत दीयों से जगमगा रहे थे।लोगों के चेहरे दमक रहे थे।तभी मेरी नजर एक बूढ़ी औरत पर पड़ी जो बैठी अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा रखे उन जलते दीयों को एक...

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प्लास्टर : मीरा जैन

प्लास्टर : मीरा जैन

बीना ने फोन पर ही स्वाति को शिकायती लहजे में कहा, ‘स्वाति! एक बात मेरी समझ में नहीं आई, तुम छुट्टियों में अपने मायके जाने के लिए उतावली रहती थी। इस बार तुम्हारी सासू मां बार-बार कह रही हैं तुम्हें जाने के लिए, फिर भी तुम जाना नहीं चाहती, ऐसा क्यों?’ ‘बीना! बात दरअसल...

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कस्तूरी : सुनील गज्जाणी

कस्तूरी : सुनील गज्जाणी

पति मुस्कुराता हुआ अपने मोबाइल पर फटाफट उंगलियां दौड़ा रहा था! उसकी पत्नी उसके पास बैठी बहुत देर से खामोश देख रखी थी। यह रोज की बात थी। पत्नी जब भी कोई बात अपने पति से करती, उसका जवाब ‘हाँ’- ‘हूँ’ में ही होता। ‘किससे चैटिंग कर रहे हो?’ ‘फेसबुक फ्रेंड से’ ‘मिले हो कभी...

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उसकी खुशी : ज्ञानदेव मुकेश

उसकी खुशी : ज्ञानदेव मुकेश

हम एक विवाह में गए थे।वहां काफी अच्छे इंतजाम थे।हमने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों से अपनी पेट-पूजा की और संगीत के विविध कार्यक्रमों का जमकर आनंद उठाया।घर आया तो देखा, औरतें बड़ी उदास थीं।मैंने पूछा, ‘क्या हुआ? कितना अच्छा इंतजाम था।’ उन्होंने कहा, ‘लड़की अच्छी नहीं...

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सुबह का इंतजार : ज्ञानदेव मुकेश

सुबह का इंतजार : ज्ञानदेव मुकेश

हमारी कार चौराहे की तरफ बढ़ रही थी। मुझे चौराहे पर न जाने कितने रंगों के गुब्बारे दिखे।  रेड सिग्नल पर कार रुक गई। पास ही काले नंगे हाथों में डोर की अंतिम छोर देखकर मैं स्तब्ध रह गया। ये नन्हे अधनंगे बच्चे थे। कड़ी धूप में गुब्बारे बेच रहे थे।  तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ...

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उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उन्हें वर्तमान राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। वे आज  एक चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन करने आए थे। सबसे पहले सतपाल जी से मिले । स्वाभिमानी सतपाल जी ने अपने बारे में इतना ही बताया था -  'सर, पिछले दस वर्षो से मैंने सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर निजी...

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पहचान : राम करन

पहचान : राम करन

अधेड़ आदमी अभी भी बाहर खड़ा था। अंततः मीरा बाहर निकली। उसने कहा, ‘बेटी बता रही थी कि आप बहुत देर से इधर ही देख रहे हैं। मैंने भी देखा। किसी जान-पहचान वाले को ढूंढ रहे हैं या कोई और बात हैं?’ ‘नहीं.. कोई बात नहीं है।’ अधेड़ हकलाया। ‘कुछ तो जरूर है।’... ‘जी, बात ये है...

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हवा का मूल्य : चेतनादित्य आलोक

हवा का मूल्य : चेतनादित्य आलोक

 कोरोना से संक्रमित एक 70 वर्षीय वृद्ध ठीक होकर अस्पताल से घर जाने की खुशी में फूले नहीं समा रहा था| अस्पताल के बिल का भुगतान करने के बाद बेटा सामान ले जाने के लिए कमरे में आया, तब वृद्ध की नजर बिल पर पड़ी| बिल के संबंध में जानने के लिए वे उत्सुक थे, पर बेटे की...

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बदशगुनी : इश्तियाक़ सईद

बदशगुनी : इश्तियाक़ सईद

मैं किसी जरूरी काम से बाजार जा रहा था कि अचानक मेरी बाईं ओर की गली से एक बिल्ली दौड़ती हुई निकली, शायद उसे सड़क पार जाना था। वह मेरा रास्ता काटती तथा मैं बदशगुनी का शिकार होता, इससे पहले मैं लपक के आगे बढ़ गया, जबकि बिल्ली मुझे देख जहां थी वहीं दुबक गई थी। चंद कदम आगे...

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वरमाला : रीता कौशल

वरमाला : रीता कौशल

प्रवासी लेखिका। आस्ट्रेलिया में निवास। ‘रजकुसुम’ कहानी संग्रह व ‘चंद्राकांक्षा’ काव्य संग्रह लड़की वरमाला लिए अपनी सहेलियों के साथ स्टेज पर खड़ी थी। लड़के के यार-दोस्त लड़के को गोद में उठाए हो-हल्ला मचाकर मस्त हो रहे थे। लड़की जैसे ही लड़के के गले में वरमाला डालने को...

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उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उन्हें वर्तमान राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। वे आज  एक चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन करने आए थे। सबसे पहले सतपाल जी से मिले । स्वाभिमानी सतपाल जी ने अपने बारे में इतना ही बताया था -  'सर, पिछले दस वर्षो से मैंने सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर निजी...

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वरमाला : रीता कौशल

वरमाला : रीता कौशल

प्रवासी लेखिका। आस्ट्रेलिया में निवास। ‘रजकुसुम’ कहानी संग्रह व ‘चंद्राकांक्षा’ काव्य संग्रह लड़की वरमाला लिए अपनी सहेलियों के साथ स्टेज पर खड़ी थी। लड़के के यार-दोस्त लड़के को गोद में उठाए हो-हल्ला मचाकर मस्त हो रहे थे। लड़की जैसे ही लड़के के गले में वरमाला डालने को...

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अंतिम दर्शन : शंभू शरण सत्यार्थी

अंतिम दर्शन : शंभू शरण सत्यार्थी

अमेरिका में रह रहे दोनों बेटे को पिता ने फोन किया- बेटा, माँ की तबीयत बहुत ही खराब है। जितना जल्दी हो सके आ जाओ। तुम दोनों भाइयों को मां बहुत याद कर रही है। छोटे बेटा ने कहा-  मैं तो अभी किसी कीमत पर नहीं आ सकता। बेटी का स्कूल में नामांकन कराना है। स्कूल से कब कॉल आ...

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बदशगुनी : इश्तियाक़ सईद

बदशगुनी : इश्तियाक़ सईद

मैं किसी जरूरी काम से बाजार जा रहा था कि अचानक मेरी बाईं ओर की गली से एक बिल्ली दौड़ती हुई निकली, शायद उसे सड़क पार जाना था। वह मेरा रास्ता काटती तथा मैं बदशगुनी का शिकार होता, इससे पहले मैं लपक के आगे बढ़ गया, जबकि बिल्ली मुझे देख जहां थी वहीं दुबक गई थी। चंद कदम आगे...

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चिड़िया का इंटरव्यू : संजय कुमार सिंह

चिड़िया का इंटरव्यू : संजय कुमार सिंह

आदमी के पास चिड़िया आती थी जब-तब। एक दिन मजाक-मजाक में आदमी ने पूछा- ‘जंगल बेचोगी?’ ‘बेचा गया,’ चिड़िया ने धीरे से कहा। ‘नदी बेचोगी?’ आदमी ने मशीन की तरह दुहराया। ‘बेची गयी,’ वह उदास होकर बोली। ‘आसमान?’ ‘वह भी!’ ‘अब रहोगी कहां?’ ‘आदमी की बस्ती में!’ ‘मन लगेगा?’ आदमी ने...

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दान : श्रवण कुमार सेठ

दान : श्रवण कुमार सेठ

‘भैया..! जरा कंबल दिखाइए।’ ‘कैसा कंबल चाहिए भाई साहब...? कितने तक का दिखाऊं, ओढ़ने के लिए या बिछाने के लिए?’ ‘अपने यूज़ के लिए नहीं चाहिए।’ ‘फिर? भिखारियों को दान-वान के लिए तो नहीं चाहिए न...?’ ‘हां... बिल्कुल सही, दान के लिए ही चाहिए था।’ ‘तो ऐसे कहिए ना बाबूजी, उसे...

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