लघुकथा
खंडहर : श्रवण कुमार सेठ

खंडहर : श्रवण कुमार सेठ

‘बाबू जी! मंदिर के बगल वाला मकान बिलकुल खंडहर-सा हो गया है।अगर आप सहमत हों, तो उसे मेरे मित्र संतोष बाबू खरीदना चाहते हैं।उसकी मुंह मांगी कीमत भी देने को तैयार हैं।’ ‘वह उस खंडहर क्या करेंगे बेटे?’ पिता ने पूछा। ‘हमें इससे क्या लेना-देना बाबू जी...! वह कुछ भी करें,...

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भंवर : ॠचा शर्मा

भंवर : ॠचा शर्मा

रोज की तरह वह बस स्टैंड पर आ खड़ी हुई।शाम ६ बजे की बस में यहीं से बैठती है।काम निपटाकर सुबह पांच बजे वापस आ जाती है।आज घर से निकलते समय ही मन बेचैन हो रहा था।मिनी बड़ी हो रही है।रंग भी निखरता जा रहा है।दूसरी मांएं अपनी लड़की की सुंदरता देख खुश होती हैं, वह डरती है।आज...

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मोल-भाव : किंशुक गुप्ता

मोल-भाव : किंशुक गुप्ता

पापा के साथ नैनीताल के माल रोड पर घूम रहा था।तभी छलांग लगाने की मुद्रा में रखे हुए थर्मोकोल का मेंढक खरीदने की इच्छा हुई।दुकान लगाकर बैठी छोटी लड़की से दाम पूछा तो उसने 25 रुपये बताए। लड़की से पूछा- क्यों, कम में नहीं देगी? पांच-दस रुपये से ज्यादा का वैसे भी नहीं है।...

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सरकारी आदमी : अरिमर्दन कुमार सिंह

सरकारी आदमी : अरिमर्दन कुमार सिंह

ट्रेन में बैठे बूटन बाबू ये बातें अपने एक दोस्त से साझा कर रहे थे- ‘कोरोना जब अपने पीक पर था तो पत्नी का इलाज पहले सरकारी अस्पताल में करा रहा था।फिर कुछ गंभीर होने पर प्राइवेट हॉस्पिटल में लेकर भागा।सरकारी डॉक्टर तो उसे मार ही देता, भाई! न समय से चेक-अप, न साफ-सफाई और...

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कारण :मीरा जैन

कारण :मीरा जैन

‘‘मम्मी! आज परिधि भाभी बाजार में मिल गई थीं।हम दोनों ने साथ-साथ ही खरीदारी की।आपको पता है, बातचीत के दौरान अधिकांश समय वे सासु मां को ही याद करती रहीं।उनकी बातों से ऐसा लगा कि वे उनके बगैर गिन-गिन कर एक-एक दिन निकाल रही हैं।जाते-जाते तो उन्होंने यहां तक कह दिया- ‘अभी...

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टीवी की करामात : चित्रगुप्त

टीवी की करामात : चित्रगुप्त

चचा चूड़ियां बेचकर आ रहे थे तो मैंने उन्हें रोक लिया। -कहां से आ रहे चचा? -मंगलपुरवा से आय रये बेटा।चचा ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए साइकिल खड़ी कर दी। -अरे चचा ऊ तो हिंदुओं का गांव है, वहां जाते डर नहीं लगा? -काहे का डर बच्चा, पीढ़ियां निकल गईं यही करते करते।चूड़ियां बेचते...

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जाति-कुजाति : चित्रगुप्त

जाति-कुजाति : चित्रगुप्त

पापा को एडमिट हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गए थे, पर किसी का मजाल था कि कोई कुछ बाहर से लेकर खा ले।छोटी बहन बाहर से लेकर कुछ खाने की जिद करती तो दादी झिड़क देतीं- ऊंचे कुल के हैं।नेम-धर्म से रहना पड़ता है ...कौनो जाति-कुजाति के हाथ का खाकर अपना धर्म थोड़ी न भ्रष्ट करना है।...

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थानेदार : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

थानेदार : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

बैग में कुछ नकदी कागजात के साथ नौ सौ रुपये थे।मुझे रुपयों से ज्यादा कागजातों की फ्रिक थी।जहां उच्चकों ने मेरा बैग उडाया था, उसके आधा किलोमीटर की दूरी पर किशनगंज पुलिस चौकी थी।रिपोर्ट दर्ज कराने की नीयत से मैंने थानेदार से कहा, ‘कागजात बेहद जरूरी हैं।मेरी गुजारिश है कि...

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मनहूस छाया : अभिषेक कुमार

मनहूस छाया : अभिषेक कुमार

‘सुनीतिया की मां अब यहां से उठकर चली जाए।सिंदूरदान के समय लड़की पर विधवा की मनहूस छाया नहीं पड़नी चाहिए’ - पंडित जी की कड़क आवाज गूंजी।सब लोग सकते में आ गए।आखिर सुनीता अपने मां की इकलौती बेटी थी।लेकिन मां चुपचाप आंचल से आंखों को पोछते हुए विवाह मंडप से जाने लगी। तभी...

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संवाददाता : सुरेश सौरभ

संवाददाता : सुरेश सौरभ

संवाददाता यूक्रेन के सैनिकों के साथ चल रहा था।यु़द्ध की विभीषिका को अपने कैमरे में कैद करता जा रहा था।तभी रूस का एक लड़ाकू विमान गरजता हुआ तेजी से ऊपर से गुजरा।संवाददाता अपना कैमरा संभालाते हुए तुरंत झुक गया।सैनिकों ने अपनी-अपनी पोजीशन संभाल ली।विमान निकल गया।सैनिकों...

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अनुष्ठान : समीर उपाध्याय

अनुष्ठान : समीर उपाध्याय

अजय - महेश, तुम्हें पता है आजकल चैत्र नवरात्रि के दिन चल रहे हैं? हम दोनों पति-पत्नी ने मां दुर्गा का अनुष्ठान किया है।नौ दिनों का उपवास रखा है।नौ दिनों तक मां दुर्गा के मंदिर जाकर लड्डू का भोग चढ़ाने का व्रत भी रखा है। महेश- दोस्त, तुम्हें पता है कि कल मैं तुम्हारे घर...

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सुबह कितनी दूर : जाफर मेहदी जाफरी

सुबह कितनी दूर : जाफर मेहदी जाफरी

मैं गलियों से गुजरता हुआ सड़क पर आ गया।हर तरफ रोशनी ही रोशनी थी।मैं टहलता हुआ नदी के तट पर पहुंच गया जिसके दोनों छोर अनगिनत दीयों से जगमगा रहे थे।लोगों के चेहरे दमक रहे थे।तभी मेरी नजर एक बूढ़ी औरत पर पड़ी जो बैठी अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा रखे उन जलते दीयों को एक...

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प्लास्टर : मीरा जैन

प्लास्टर : मीरा जैन

बीना ने फोन पर ही स्वाति को शिकायती लहजे में कहा, ‘स्वाति! एक बात मेरी समझ में नहीं आई, तुम छुट्टियों में अपने मायके जाने के लिए उतावली रहती थी। इस बार तुम्हारी सासू मां बार-बार कह रही हैं तुम्हें जाने के लिए, फिर भी तुम जाना नहीं चाहती, ऐसा क्यों?’ ‘बीना! बात दरअसल...

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कस्तूरी : सुनील गज्जाणी

कस्तूरी : सुनील गज्जाणी

पति मुस्कुराता हुआ अपने मोबाइल पर फटाफट उंगलियां दौड़ा रहा था! उसकी पत्नी उसके पास बैठी बहुत देर से खामोश देख रखी थी। यह रोज की बात थी। पत्नी जब भी कोई बात अपने पति से करती, उसका जवाब ‘हाँ’- ‘हूँ’ में ही होता। ‘किससे चैटिंग कर रहे हो?’ ‘फेसबुक फ्रेंड से’ ‘मिले हो कभी...

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उसकी खुशी : ज्ञानदेव मुकेश

उसकी खुशी : ज्ञानदेव मुकेश

हम एक विवाह में गए थे।वहां काफी अच्छे इंतजाम थे।हमने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों से अपनी पेट-पूजा की और संगीत के विविध कार्यक्रमों का जमकर आनंद उठाया।घर आया तो देखा, औरतें बड़ी उदास थीं।मैंने पूछा, ‘क्या हुआ? कितना अच्छा इंतजाम था।’ उन्होंने कहा, ‘लड़की अच्छी नहीं...

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सुबह का इंतजार : ज्ञानदेव मुकेश

सुबह का इंतजार : ज्ञानदेव मुकेश

हमारी कार चौराहे की तरफ बढ़ रही थी। मुझे चौराहे पर न जाने कितने रंगों के गुब्बारे दिखे।  रेड सिग्नल पर कार रुक गई। पास ही काले नंगे हाथों में डोर की अंतिम छोर देखकर मैं स्तब्ध रह गया। ये नन्हे अधनंगे बच्चे थे। कड़ी धूप में गुब्बारे बेच रहे थे।  तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ...

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उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उम्मीदवार : सीता राम शर्मा ‘चेतन’

उन्हें वर्तमान राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। वे आज  एक चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन करने आए थे। सबसे पहले सतपाल जी से मिले । स्वाभिमानी सतपाल जी ने अपने बारे में इतना ही बताया था -  'सर, पिछले दस वर्षो से मैंने सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर निजी...

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पहचान : राम करन

पहचान : राम करन

अधेड़ आदमी अभी भी बाहर खड़ा था। अंततः मीरा बाहर निकली। उसने कहा, ‘बेटी बता रही थी कि आप बहुत देर से इधर ही देख रहे हैं। मैंने भी देखा। किसी जान-पहचान वाले को ढूंढ रहे हैं या कोई और बात हैं?’ ‘नहीं.. कोई बात नहीं है।’ अधेड़ हकलाया। ‘कुछ तो जरूर है।’... ‘जी, बात ये है...

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हवा का मूल्य : चेतनादित्य आलोक

हवा का मूल्य : चेतनादित्य आलोक

 कोरोना से संक्रमित एक 70 वर्षीय वृद्ध ठीक होकर अस्पताल से घर जाने की खुशी में फूले नहीं समा रहा था| अस्पताल के बिल का भुगतान करने के बाद बेटा सामान ले जाने के लिए कमरे में आया, तब वृद्ध की नजर बिल पर पड़ी| बिल के संबंध में जानने के लिए वे उत्सुक थे, पर बेटे की...

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बदशगुनी : इश्तियाक़ सईद

बदशगुनी : इश्तियाक़ सईद

मैं किसी जरूरी काम से बाजार जा रहा था कि अचानक मेरी बाईं ओर की गली से एक बिल्ली दौड़ती हुई निकली, शायद उसे सड़क पार जाना था। वह मेरा रास्ता काटती तथा मैं बदशगुनी का शिकार होता, इससे पहले मैं लपक के आगे बढ़ गया, जबकि बिल्ली मुझे देख जहां थी वहीं दुबक गई थी। चंद कदम आगे...

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