लघुकथा
जिस्मों का तिलिस्म : सतीश राठी

जिस्मों का तिलिस्म : सतीश राठी

वे सारे लोग सिर झुकाये खड़े थे।उनके कांधे इस कदर झुके हुए थे कि पीठ पर कूबड़-सी निकली लग रही थी।दूर से उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कई सिरकटे जिस्म पंक्तिबद्ध खड़े हैं।मैं उनके नज़दीक गया।मैं चकित था कि ये इतनी लंबी लाईन लगाकर क्यों खड़े हैं? ‘क्या मैं इस लंबी कतार की...

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निर्णय : पूजा भारद्वाज

निर्णय : पूजा भारद्वाज

रवि की मां का पांच दिन पहले निधन हुआ है।परिवार के लोग तेरहवीं के विषय में सलाह-मशविरा कर रहे हैं। रवि - चाचा जी, कितना खर्च हो जाएगा? चाचा - यही कोई डेढ़-दो लाख और बाकी तुम्हारी श्रद्धा है। रवि - ठीक है। चाचा - क्या ठीक है? क्या करना है, कैसे करना है कुछ बता ही नहीं...

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कबाड़ : ज्ञानदेव मुकेश

कबाड़ : ज्ञानदेव मुकेश

‘कबाड़ीवाले भैया, जरा रुकना!’ एक बच्चे ने आवाज दी तो कबाड़ीवाले ने पीछे मुड़कर देखा।एक उदास बच्चा बुला रहा था।कबाड़ी वाला ठेला डगराते हुए बच्चे के पास वापस आया।उसने बच्चे से पूछा, ‘तुम्हें कौन-सा पुराना सामान बेचना है?’ मगर बच्चे ने एक दूसरा सवाल रख दिया, ‘तुम कबाड़ी के...

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बहू या बेटी : पवित्रा अग्रवाल

बहू या बेटी : पवित्रा अग्रवाल

बेटा बाहर से आया।आते ही भुनभुनाते हुए उसने सबसे पहले टीवी बंद किया और मां को घूरते हुए बोला, ‘जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ रही है, अक्ल कम होती जा रही है।आप को नहीं मालूम कि गुड्डू की दसवीं की परीक्षा होने वाली है! कुछ दिन के लिए बेटे-बहू के आग्रह पर आई मां ने कुछ कहना...

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नीड़ : श्रवण कुमार सेठ

नीड़ : श्रवण कुमार सेठ

एक चिड़िया पेड़ की एक सुंदर डाल पर आकर बैठ गई। -यह पेड़ अच्छा रहेगा मेरे घोंसले के लिए, छायादार और फलदार है।वह खुद से बातें करने लगी।कुछ देर बाद वह उड़ी और चुन-चुन कर तिनके लाकर घोंसला बनाने में जुट गई।उसके साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे। यह देखकर पेड़ ने कहा- अरी चिड़िया!...

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और वह बंट गया : मार्टिन जॉन

और वह बंट गया : मार्टिन जॉन

नवनिर्मित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी थी।मंदिर की बाहरी-भीतरी सज्जा के लिए बशीर मियां की तारीफ हो रही थी।उसकी उम्दा कारीगरी से पूरा गांव अभिभूत था।शाम का वक्त था।वह टहलते-टहलते मंदिर के करीब पहुंचकर ठहर गया।प्यार और स्नेह आंखों में भरकर मंदिर को निहारने लगा।उसके...

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गोद : शशि बायंवाला

गोद : शशि बायंवाला

मैं दफ्तर के काम से बाहर गया हुआ था।सुबह आया तो सीधा दफ्तर ही चला गया।लौटने में देर हो गई।मीता से बात ही नहीं हो पाई।मैंने सोचा सब ठीक ही होगा, वरना वह ख़ुद ही कॉल कर लेती।इतनी रात को भी जब बहादुर ने दरवाजा खोला तो मेरा दिमाग ठनका।मैंने पूछा, ‘मैडम नहीं हैं?’‘नहीं,...

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खंडहर : श्रवण कुमार सेठ

खंडहर : श्रवण कुमार सेठ

‘बाबू जी! मंदिर के बगल वाला मकान बिलकुल खंडहर-सा हो गया है।अगर आप सहमत हों, तो उसे मेरे मित्र संतोष बाबू खरीदना चाहते हैं।उसकी मुंह मांगी कीमत भी देने को तैयार हैं।’ ‘वह उस खंडहर क्या करेंगे बेटे?’ पिता ने पूछा। ‘हमें इससे क्या लेना-देना बाबू जी...! वह कुछ भी करें,...

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भंवर : ॠचा शर्मा

भंवर : ॠचा शर्मा

रोज की तरह वह बस स्टैंड पर आ खड़ी हुई।शाम ६ बजे की बस में यहीं से बैठती है।काम निपटाकर सुबह पांच बजे वापस आ जाती है।आज घर से निकलते समय ही मन बेचैन हो रहा था।मिनी बड़ी हो रही है।रंग भी निखरता जा रहा है।दूसरी मांएं अपनी लड़की की सुंदरता देख खुश होती हैं, वह डरती है।आज...

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मोल-भाव : किंशुक गुप्ता

मोल-भाव : किंशुक गुप्ता

पापा के साथ नैनीताल के माल रोड पर घूम रहा था।तभी छलांग लगाने की मुद्रा में रखे हुए थर्मोकोल का मेंढक खरीदने की इच्छा हुई।दुकान लगाकर बैठी छोटी लड़की से दाम पूछा तो उसने 25 रुपये बताए। लड़की से पूछा- क्यों, कम में नहीं देगी? पांच-दस रुपये से ज्यादा का वैसे भी नहीं है।...

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सरकारी आदमी : अरिमर्दन कुमार सिंह

सरकारी आदमी : अरिमर्दन कुमार सिंह

ट्रेन में बैठे बूटन बाबू ये बातें अपने एक दोस्त से साझा कर रहे थे- ‘कोरोना जब अपने पीक पर था तो पत्नी का इलाज पहले सरकारी अस्पताल में करा रहा था।फिर कुछ गंभीर होने पर प्राइवेट हॉस्पिटल में लेकर भागा।सरकारी डॉक्टर तो उसे मार ही देता, भाई! न समय से चेक-अप, न साफ-सफाई और...

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कारण :मीरा जैन

कारण :मीरा जैन

‘‘मम्मी! आज परिधि भाभी बाजार में मिल गई थीं।हम दोनों ने साथ-साथ ही खरीदारी की।आपको पता है, बातचीत के दौरान अधिकांश समय वे सासु मां को ही याद करती रहीं।उनकी बातों से ऐसा लगा कि वे उनके बगैर गिन-गिन कर एक-एक दिन निकाल रही हैं।जाते-जाते तो उन्होंने यहां तक कह दिया- ‘अभी...

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टीवी की करामात : चित्रगुप्त

टीवी की करामात : चित्रगुप्त

चचा चूड़ियां बेचकर आ रहे थे तो मैंने उन्हें रोक लिया। -कहां से आ रहे चचा? -मंगलपुरवा से आय रये बेटा।चचा ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए साइकिल खड़ी कर दी। -अरे चचा ऊ तो हिंदुओं का गांव है, वहां जाते डर नहीं लगा? -काहे का डर बच्चा, पीढ़ियां निकल गईं यही करते करते।चूड़ियां बेचते...

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जाति-कुजाति : चित्रगुप्त

जाति-कुजाति : चित्रगुप्त

पापा को एडमिट हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गए थे, पर किसी का मजाल था कि कोई कुछ बाहर से लेकर खा ले।छोटी बहन बाहर से लेकर कुछ खाने की जिद करती तो दादी झिड़क देतीं- ऊंचे कुल के हैं।नेम-धर्म से रहना पड़ता है ...कौनो जाति-कुजाति के हाथ का खाकर अपना धर्म थोड़ी न भ्रष्ट करना है।...

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थानेदार : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

थानेदार : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

बैग में कुछ नकदी कागजात के साथ नौ सौ रुपये थे।मुझे रुपयों से ज्यादा कागजातों की फ्रिक थी।जहां उच्चकों ने मेरा बैग उडाया था, उसके आधा किलोमीटर की दूरी पर किशनगंज पुलिस चौकी थी।रिपोर्ट दर्ज कराने की नीयत से मैंने थानेदार से कहा, ‘कागजात बेहद जरूरी हैं।मेरी गुजारिश है कि...

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मनहूस छाया : अभिषेक कुमार

मनहूस छाया : अभिषेक कुमार

‘सुनीतिया की मां अब यहां से उठकर चली जाए।सिंदूरदान के समय लड़की पर विधवा की मनहूस छाया नहीं पड़नी चाहिए’ - पंडित जी की कड़क आवाज गूंजी।सब लोग सकते में आ गए।आखिर सुनीता अपने मां की इकलौती बेटी थी।लेकिन मां चुपचाप आंचल से आंखों को पोछते हुए विवाह मंडप से जाने लगी। तभी...

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संवाददाता : सुरेश सौरभ

संवाददाता : सुरेश सौरभ

संवाददाता यूक्रेन के सैनिकों के साथ चल रहा था।यु़द्ध की विभीषिका को अपने कैमरे में कैद करता जा रहा था।तभी रूस का एक लड़ाकू विमान गरजता हुआ तेजी से ऊपर से गुजरा।संवाददाता अपना कैमरा संभालाते हुए तुरंत झुक गया।सैनिकों ने अपनी-अपनी पोजीशन संभाल ली।विमान निकल गया।सैनिकों...

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अनुष्ठान : समीर उपाध्याय

अनुष्ठान : समीर उपाध्याय

अजय - महेश, तुम्हें पता है आजकल चैत्र नवरात्रि के दिन चल रहे हैं? हम दोनों पति-पत्नी ने मां दुर्गा का अनुष्ठान किया है।नौ दिनों का उपवास रखा है।नौ दिनों तक मां दुर्गा के मंदिर जाकर लड्डू का भोग चढ़ाने का व्रत भी रखा है। महेश- दोस्त, तुम्हें पता है कि कल मैं तुम्हारे घर...

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सुबह कितनी दूर : जाफर मेहदी जाफरी

सुबह कितनी दूर : जाफर मेहदी जाफरी

मैं गलियों से गुजरता हुआ सड़क पर आ गया।हर तरफ रोशनी ही रोशनी थी।मैं टहलता हुआ नदी के तट पर पहुंच गया जिसके दोनों छोर अनगिनत दीयों से जगमगा रहे थे।लोगों के चेहरे दमक रहे थे।तभी मेरी नजर एक बूढ़ी औरत पर पड़ी जो बैठी अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा रखे उन जलते दीयों को एक...

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प्लास्टर : मीरा जैन

प्लास्टर : मीरा जैन

बीना ने फोन पर ही स्वाति को शिकायती लहजे में कहा, ‘स्वाति! एक बात मेरी समझ में नहीं आई, तुम छुट्टियों में अपने मायके जाने के लिए उतावली रहती थी। इस बार तुम्हारी सासू मां बार-बार कह रही हैं तुम्हें जाने के लिए, फिर भी तुम जाना नहीं चाहती, ऐसा क्यों?’ ‘बीना! बात दरअसल...

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