लघुकथा
घरौंदा : राजेंद्र कुमार कनौजिया

घरौंदा : राजेंद्र कुमार कनौजिया

बेटा बहू घर छोड़ कर जा रहे हैं। गाड़ी पर सामान लादा जा रहा है। ‘क्या यह जरूरी है, बेटा’, मां ने धीरे से बेटे को एक कोने में ले जा कर पूछा। ‘लोग क्या कहेंगे। हमारा घर टूट जाएगा, बेटा, प्लीज।’ पिता जी ने बेटे का हाथ पकड़कर कहा। बेटा चुपचाप सामान रखे जा रहा था। बहू गाड़ी...

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चिह्न : महावीर राजी

चिह्न : महावीर राजी

  दोनों घनिष्ठ दोस्त थे - शंकर और शाहरुख। शंकर की बाईं टांग घुटने से नदारद तो  शाहरुख की बाईं बांह कुहनी से गायब। शंकर हनुमान मंदिर के पास बैठता और शाहरुख झंडा चौक वाली जामा मस्जिद के करीब। शाहरुख हँस कर कहता- ‘यार,  मंगतई अपुन का सांझा दुख है। सांझा दुख लोगों को...

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बुद्धिमान : उमाकांत भारती

बुद्धिमान : उमाकांत भारती

  एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। पंडितजी, पंडिताइन और उनकी इकलौती संतान बारह साल की पुत्री के अलावा उनके परिवार में और कोई नहीं था। जब तक पंडितजी जिंदा रहे, उन्होंने कथा-पुराण बांचकर अपनी गृहस्थी की गाड़ी घसीटी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी अधेड़ उम्र की...

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बराबरी : रविशंकर सिंह

बराबरी : रविशंकर सिंह

  जया अपने पिता के सामने आई, कुछ उदास थी। उसने पिता से कहा, ‘पापा! मैंने अंकल के घर में इंसल्ट फील किया।’ पिता ने पूछा, ‘क्यों, अंकल ने तुम्हें कुछ कहा क्या?’ ‘हां, डायनिंग टेबल को हटाने के लिए उन्होंने एक लड़के को बुलाते हुए मुझसे कहा कि तुम हट जाओ बेटी!’ ‘...तो...

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अन्य की चिंता : पूनम पांडे

अन्य की चिंता : पूनम पांडे

  इलिका को चैन न था। उसने अपने दिल की बेचैनी पर काबू पाना चाहा। मगर बेचैनी बढ़ती गई। सड़क पर लोग बात कर रहे थे। घबराहट में भरकर इलिका गेट से ही बोले जा रही थी, ‘हद है, यह भी कोई बात हुई। अचानक ही हिंसा भड़क गई। आखिर यह प्रशासन कर क्या रहा है। बसें जलाई जा रही हैं।...

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इलाज का धंधा : कैलाश केशरी

इलाज का धंधा : कैलाश केशरी

  रामशरण की पत्नी सीने में दर्द से तड़प रही थी। वे अपनी पत्नी को लेकर शहर के सबसे बड़े हॉस्पिटल में पहुंचे। रिसेप्शनिस्ट ने काउंटर पर मुस्कराकर कहा, ‘चिंता मत कीजिए, हमारे पास वर्ल्ड-क्लास इलाज है। कोई एक पैकेज चुन लीजिए- गोल्ड, प्लेटिनम या डायमंड?’ घबराए रामशरण ने...

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असमिया- रास्ते की मटरगश्ती :मणिका देवी, अनुवाद :दिनकर कुमार

असमिया- रास्ते की मटरगश्ती :मणिका देवी, अनुवाद :दिनकर कुमार

मणिका देवी(जन्म 1979) पेशे से शिक्षिका। दस कहानी संग्रह प्रकाशित। चर्चित पुस्तक ‘जहर महर’। साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित।     अब इसकी रास्ते की मटरगश्ती शुरू हो चुकी है, मां ने बड़बड़ाते हुए कहा था। पिताजी ने  कहा- रहने दो। घर में ही घुसी रहती है...

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अविश्वास – रविशंकर सिंह

अविश्वास – रविशंकर सिंह

  एक आदिवासी गांव। एसडीओ अपनी टीम और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ वहां मौजूद थे। उन्होंने  गांववालों की ओर देखकर मृदु स्वर में कहा, ‘आप सबको साक्षरता अभियान के तहत पढ़ना-लिखना सिखाया गया है, है न?’ सामाजिक कार्यकर्ताओं आत्मविश्वास से कहा, ‘जी हां, सर! हमने यहां के...

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एक नई लकीर : पवन शर्मा

एक नई लकीर : पवन शर्मा

कमरे की फर्श पर सफेद चूने से एक मोटी लकीर खींच दी गई थी। इधर थीं किताबें, खिलौने और एक बेमन-सी खामोशी और उधर दोस्त, पार्क, खुले मैदान। ‘यह क्या है, मां?’ बच्ची ने पूछा। ‘तेरी हिफाज़त की लकीर है।’ मां ने दीवार की ओर देखते हुए कहा, ‘इससे बाहर खतरा है। वहां बहुत शोर है,...

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अंतिम इच्छा : गोविंद भारद्वाज

अंतिम इच्छा : गोविंद भारद्वाज

जिंदगी के पचास साल राजनीति में गुजार देने के बाद उनका अंतिम समय आ चुका था। ‘पिता जी की सांसें अटक रही हैं ...शायद इनकी कोई अंतिम इच्छा है, जो कहना चाह रहे हैं किंतु कह नहीं पा रहे हैं।’ बड़े बेटे ने कहा। ‘भैया आप ही समझो, क्योंकि आप भी राजनीति में हैं और मैंने तो सुना...

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सेवा : गीता चौबे

सेवा : गीता चौबे

पतिदेव के साथ कुछ सामान खरीदने बाहर निकली तो मैं एक बोर्ड देख कर ठिठक गई। उसपर लिखा था- नवरात्रि में कन्या-पूजन के लिए यहां संपर्क करें -मां अंबे इंटरप्राइजेज! पति को बोर्ड दिखाते हुए मैंने कहा, ‘अरे, यह क्या! कन्या उपलब्ध कराने की कंपनी!’ ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी...

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दरवाजा, दीवारें और छत : संतोष सुपेकर

दरवाजा, दीवारें और छत : संतोष सुपेकर

आज सुबह पैदल घूमते हुए उन्हें रोना आ रहा था। अभी कुछ देर पहले सुनी बेटे की कर्कश आवाज उन्हें बेचैन किए हुए था। कुछ दिन पहले मित्र दिलीप के आगे अपने अकेलेपन की बात की तो चार लोगों के बीच बोले उसके शब्द उनके कानों में पड़ ही गए थे- ‘ये राजेंद्र तो कायर ही है यार! जब देखो...

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इंजेक्शन : अरुण अर्णव खरे

इंजेक्शन : अरुण अर्णव खरे

रघु फिर साप्ताहिक हाट से निराश लौटा था। उसे जितनी उम्मीद थी, उससे बहुत कम दाम में सब्जियां बिकी थीं। हाट से लौटकर चुपचाप चारपाई पर लेट गया। फिर पत्नी से बोला- ‘बड़ी मुश्किल से लागत निकल रही है। मेहनत का कोई मोल ही नहीं जैसे। ‘ननकू को तो बहुत फायदा हो रहा है, कल ही उसने...

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सच और झूठ : चेतनादित्य आलोक

सच और झूठ : चेतनादित्य आलोक

एक राज्य में झूठ और सच दो इंसान रहते थे। उस राज्य में जब भी आपराधिक घटना घटती, राजा के दरबार में सुनवाई के दौरान अन्य पक्षों के अतिरिक्त झूठ और सच को बुलाया जाता। प्रायः सच जिसके पक्ष में गवाही देता, राजा उसे निर्दोष बताकर छोड़ देता। झूठ के पक्ष वाले व्यक्ति को सजा...

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एंटीक : अमृता पांडेय

एंटीक : अमृता पांडेय

बेटे और बहू की आज छुट्टी थी। वे लगभग चार घंटे बाद बाजार से लौटे थे। ढेर सारी चीजें खरीद लाए थे और लिविंग रूम और उन्हें अपने बेडरूम में सजाने की चर्चा कर रहे थे। उन चीजों में पुरानी घड़ी थी, टेबल लैंप था, कुछ कलाकृतियां थीं। धातु की बनी कुछ मूर्तियां, लकड़ी और कांच के...

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आत्मग्लानि : गोविंद भारद्वाज

आत्मग्लानि : गोविंद भारद्वाज

‘पापा, देखो इस फोटो प्रदर्शनी में सबसे संवेदनशील फोटो यही लगी।’ ‘हां बेटा, इस फोटो के लिए ही इसके फोटोग्राफर को बेस्ट फोटोग्राफी का पुरस्कार मिला था... लेकिन कुछ दिनों बाद...।’ ‘कुछ दिनों बाद क्या पापा...?’ ‘बेटा इस फोटोग्राफर ने पुरस्कार लेने के बाद हमेशा-हमेशा के...

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एंग्री बर्ड : यशोधरा भटनागर

एंग्री बर्ड : यशोधरा भटनागर

‘क्यों बहन! बड़ी उदास दिख रही हो। क्या बात है?’ ‘कुछ नहीं, समय तेजी से बदला है। बदलते समय के साथ इंसान बिलकुल बदल गया।’ गुलमोहर की शाखा पर, घने हरे पत्तों की छांह में बैठी चिड़ियां बतिया रही थीं। ‘देखो न! हम इनके साथ इनके घरों में कितने प्यार से रहते थे।’ ‘हमारी...

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कड़वी घूंट : सारिका भूषण

कड़वी घूंट : सारिका भूषण

‘दीदी, आपके घर में कौन आया हुआ है, नीचे बंदूक लिए पुलिस वाले खड़े हैं। मैं तो डर ही गई!’ उसकी कामवाली बाई ने घर के अंदर घुसते ही नीमा से कहा। ‘अरे! मेरे जेठ आए हुए हैं, बड़े नेता हैं। जल्दी से जाकर रात के डिनर की तैयारी कर। डाइनिंग टेबल पर कुछ ड्राई फ्रूट्स रखे हैं।...

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तुषारापात : राधेश्याम भारतीय

तुषारापात : राधेश्याम भारतीय

हर रोज की भांति रिटायर्ड पर्सन सुबह पार्क में इकट्ठा होते, हलका-फुलका व्यायाम करते, हा!... हा! कर ठहाका लगाते, फिर थोड़ा आराम करके अपने-अपने घर को चल देते। ‘श्याम बाबू, क्या बात है, चेहरा क्यों उतरा हुआ है? भाभी ने डांट दिया क्या?’ हरदयाल ने पूछा। ‘हरदयाल भाई, क्या...

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नेत्रहीन : गोविंद भारद्वाज

नेत्रहीन : गोविंद भारद्वाज

‘सर कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए आज आप आ रहे हैं न?’ ‘बिलकुल आ रहा हूँ... पहले ये बताओ कि भीड़ कितनी आ जाएगी।’ ‘भीड़-भाड़ का कोई कार्यक्रम नहीं है सर... नेत्रहीनों के लिए कुछ गिफ्ट भेंट करने हैं... उनको प्रोत्साहित करने की कुछ योजनाओं की शुरुआत करनी है।’ ‘नेत्रहीनों का...

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