
युवा कवयित्री।दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में शोधार्थी।
97 की गर्मियों की धूप में सोमा ने तिरिल को पहली बार देखा था। अपने नए स्कूल में। उसके पिता का ट्रांसफर हर तीन साल में होता रहता था। हर तीन साल में उसकी नन्ही जड़ें जमीन में नमी की तलाश शुरू करतीं।
सात-आठ वर्ष की अंतर्मुखी बच्ची के लिए यह अनुभव कुछ अलग तरह का था, जिसको परिभाषित करने के लिए उसकी तोतली भाव-भाषा के शब्दकोश का निर्माण नहीं हुआ था। इस बार मेरठ केंट के नगरीय जीवन से दूर बसे एक छोटे-से आदिवासी बहुल शहर ‘रांची’ में उन्हें जाना था। स्कूल में अभी भूगोल की कक्षाएं शुरू नहीं हुई थी वर्ना वह सबसे पहले अपनी अध्यापिका से पूछती- ‘रांची की दिशा दाएं हाथ की ओर है या बाएं… या फिर ये उनकी आंखों के सामने है या सिर के पीछे।’ इस नए शहर जिसकी दिशा का भी उसे बोध नहीं था। वह उसकी कल्पना की दिशा में बाधा नहीं बना। भूगोल की समझ वह किताबों से ज्यादा अपने अनुभव से कर रही थी। सोमा के लिए हर शहर और उसकी दुनिया नई होती थी। बस मन की दिशा को भूगोल की दिशा से मिलाना होता। हर तीन साल में।
नए शहर को लेकर कई कल्पनाएं उसके मन की दुनिया में बार-बार दस्तक दे रही थीं… पर जैसे तितली को पता नहीं होता कि उसके पंखों में कौन से जादुई रंग गहराई से ठहरेंगे और कौन से रंग बस छूकर फुर्र हो जाएंगे… सोमा के मन में भी नए रंगों की दस्तक शुरू हो गई थी। सोमा इस नई दुनिया के रंग को देखने के लिए बेताब थी। बच्चों की दुनिया भी तो ऐसी ही होती है न। सोमा भी इस नए शहर की कल्पनाओं में जी रही थी… लेकिन उतनी ही डरी हुई थी। और मेरा यकीन कीजिए बच्चों की दुनिया के दायरे और कल्पनाएं बड़ों की दुनिया-से छोटे नहीं होते हैं। बड़े चाहते है कि बच्चों की कल्पनाओं के बादलों का रंग उनके अनुसार निश्चित होकर किसी एक रंग में ढले। ऐसा न होना ही तो बचपन है।
उस दिन स्टापू खेलते हुए सोमा अपनी एकलौती दोस्त गिन्नी को अचानक बोली- ‘पता है, पापा का फिर ट्रांसफर हो गया है। कल मां भइया से कह रही थी कि अब हमें यहां से जाना होगा। जानती हो गिन्नी, अब हमें फिर से किसी नए शहर जाना है। मैं नहीं जानती कि वह शहर कैसा है? अगर जानती तो भी क्या यहां रुक सकती थी…नहीं!’
‘अच्छा’ गिन्नी ने बस एक शब्द में अपनी प्रतिक्रिया दी। गिन्नी और सोमा जानती थी कि यह होना है।
‘गिन्नी… मैं चली जाऊंगी तो तुम मुझे याद करोगी न!’ सोमा की आंखें जल में डूबती नाव की तरह अंतिम बार अपनी मांझी की ओर देख रही थी। जैसे नाव पूछ रही हो- तुम जब-जब नदी में लौटोगी मुझे याद करोगी न?
कुछ देर रुककर गिन्नी बोली- ‘तो अब तुम चली जाओगी… क्या रुक नहीं सकती? ठीक है… ठीक है, पता है तुम नहीं रुक सकती। पर कहां जा रही हो…?’
‘रांची’ सोमा धीरे से बोली।
‘रांची… क्या वहां बेर के जंगल होंगे? तुम्हें याद है न! पिछले साल हम दोनों ने कितने बेर खाए थे। हमारे इस बेर के जंगल में सियार रहते हैं, जिनकी वक्त-बेवक्त हमने अनगिनत बार छापेमारी की है। वे पूरी दुनिया में सिर्फ हमारे दोस्त बने थे। तुम चली जाओगी तो मैं सियार से क्या कहूंगी? तुम्हारा पता पूछेंगे, क्या जवाब दूंगी? सियार तुमसे मिलने कैसे आएंगे? फिर उन्हें इस बेर के जंगल की रक्षा भी तो करनी है। नए सियार उनके करीब आते जा रहे हैं। दुखी और डरे हुए हैं। हमारे दोस्त दुखी होंगे और उनके दुख से बेर का पूरा जंगल दुखी हो जाएगा। फिर दुख से भरे जंगल के बेर मीठे कैसे होंगे सोमा?’
गिन्नी कुछ देर चुप रहने के बाद फिर बोली, ‘मैंने सुना है वहां आदिवासी रहते हैं। हां वही.. आदिवासी। तुम अपने पापा को बोल दो कि तुम्हें वहां नहीं जाना है। तुम्हें याद है, हमारी किताबों में उनके बारे में क्या लिखा था।’
सोमा को अपनी सामाजिक विज्ञान की किताब याद आई। आदिवासी जंगल में रहते हैं… शिकार करते हैं, जानवरों की छाल पहनते हैं। खाली समय में सोमा और उसके दोस्त जंगल-जंगल खेलते थे और आदिवासियों की दुनिया के बारे में कैसी-कैसी कल्पनाएं करते थे। अब वहीं जाना है। सोमा ने महसूस किया कि अब उसके मन में नए शहर के लिए कोई उत्साह शेष नहीं बचा। उसे समझ नहीं आया कि उसकी उदासी का कारण वहां बेर के जंगलों का न होना था, सियारों का दुखी होना था या फिर कुछ और।
उन दिनों मेरठ से रांची जाने के लिए ट्रेन दिल्ली से लेनी पड़ती थी। दिल्ली में मौसम बेहद गर्म और उमस वाला था। लगभग पच्चीस घंटे की यात्रा के बाद मौसम में बदलाव आना शुरू हो गया… भीषण गर्मी के बाद पहली बारिश शुरू हो गई… वह भी रांची की बारिश… ट्रेन में सोमा का स्वागत घनघोर बारिश और बारिश की पक्की सहेली मीठी जामुन ने साथ मिलकर किया। सोमा समझ नहीं पाई की यह शहर उसे ‘जोहार’ कहते हुए क्यों इतना खुश हो रहा है। खिड़की के बाहर जहां देखो बस पहाड़ ही पहाड़ और लगातार होने वाली बारिश नजर आ रही थी। उसने देखा, पहाड़ों के शिखरों पर बादल अपने दोस्तों के साथ स्टापू खेल रहे थे। कभी बादल बेर का जंगल बन जा रहे थे। और कभी सियार बनकर एक बड़े पहाड़ के पीछे छुप जाते थे। बड़ों को क्या पता स्टापू का खेल कितना दिलचस्प होता है। वह ध्यान से उन्हें देख रही थी कि किसी ने उससे कहा- ‘मइया जाम खाबे…?’ ट्रेन में जामुन बेचती हुई बूढ़ी दादी ने प्यार से सोमा से पूछा।
‘ये जाम क्या है? हम तो इसे जामुन कहते हैं, हैं न भइया!’ सोमा ने खुश होते हुए कहा।
बांस की टोकरी में काले जामुन लिए यह वृद्ध महिला उसकी तरफ प्यार से देख रही थी। शरीर पर जगह-जगह गोदना की विचित्र उपस्थिति थी। सोमा पहली बार ऐसी स्त्री देख रही थी जिसके जूड़े में कुछ जंगली फूल खोसे हुए थे जिनसे सोमा अपरिचित थी।
‘यह महिला आदिवासी है भइया’, कान में धीरे से बुदबुदाए।
सोमा ने ध्यान से देखा ये महिला अलग नहीं… नहीं… हां शरीर में बने गोदने और ये फूल उसके लिए नए और विचित्र जरूर हैं, पर यह महिला…!
सोमा और उसके भाई ने पहली बार किसी आदिवासी को देखा था… हजारों स्टापू का रोमांच मन में नाच उठा। बेर के जंगल में रहने वाले सारे सियार झूमकर एकसाथ बोल उठे। जामुन खाते हुए सोमा सोचने लगी, जामुन ज्यादा मीठे हैं या दादी की आवाज। उसे अपनी दादी की फोटो की याद आई, उसे नहीं लगा कि यह चेहरा उनकी दादी या नानी-सा नहीं है। हां, उसकी दादी होती तो क्या उससे ऐसे ही पूछती-‘मइया जाम खाबे…!’
‘भइया, क्या ये वाकई आदिवासी हैं?’ सोमा आश्चर्य से भर उठी।
‘हां, देखती नहीं। …कैसे बोलती है और तो और साड़ी भी हमारी मां जैसी नहीं पहनी है।’ भइया ने रुककर जवाब दिया।
‘पर सींग…’ सोमा चुप हो गई।
उसने बहुत ध्यान से देखा उस बूढ़ी स्त्री को। न तो उसके पास बड़े दांत थे न ही बड़े सींग। कुछ भी तो अलग नहीं। उफ्फ उसे अपनी दोस्त गिन्नी की बातों पर पहली बार अविश्वास हुआ। रेलगाड़ी तय समय से कुछ देर से पहुंची। तेज बारिश में घरवालों के साथ वह भी स्टेशन में भीग चुकी थी …इसी अवस्था में बहुत देर तक सबको इंतजार करना पड़ा। क्योंकि जो गाड़ी उन्हें लेने आनेवाली थी, लेट हो गई थी। गाड़ी शाम को देर से आई और स्टेशन से सरकारी आवास की यात्रा शुरू हुई।
स्टेशन से आवास तक की यात्रा में सोमा ने अवाक होकर देखा कि यहां हर तरफ छोटे-छोटे जंगल हैं। जंगली झाड़ियों और फूलों से भरा है यह शहर। स्टेशन से घर तक के रास्ते में जहां देखो वहां खेतों में छोटे-छोटे पौधे लगे थे। खेतों की जमीन एक बराबर न होकर ऊपर-नीचे थी। पानी एक खेत से दूसरे खेत में धीरे-धीरे जा रहा था।
‘पापा ये क्या लगा है खेतों में?’ सोमा बोली।
‘धान है बेटा… इसी से तो चावल आता है।’
‘अच्छा! पर ये खेत किसके हैं पापा?’ सोमा की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।
‘जो यहां रहते हैं उनके खेत हैं बेटा’, पापा ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘यहां तो आदिवासी रहते हैं! ये खेत उनके ही हैं और रास्ते में मिले जंगल भी क्या उनके ही हैं? और ट्रेन में मिले मीठे जामुन के पेड़ भी उनके ही हैं!’ सोमा के इन प्रश्नों के उत्तर उसे स्वयं मिल गए।
‘हां, उनके ही हैं।’ पापा ने कहा और काम करने लगे।
सोमा सोचने लगी कि यहां के आकाश में बादल ही बादल हैं और जमीन पर धान ही धान …आखिर यह कैसी दुनिया है जहां आ गई है वह! सोमा वापस अपने पुराने शहर की यादों में डूब गई। मेरे बेर के जंगल न जाने कैसे होंगे… क्या अब सियारों को पता चल गया होगा कि हम उसके घर में कितनी बार बिन बुलाए मेहमान बनकर चले जाते थे। बेर की झाड़ियों में बना उसका घर… क्या सियार हमें अपनी दुनिया में आने देते… क्या किसी की भी दुनिया में अचानक चले जाना ठीक होता है… सोचते-सोचते वह सो गई।
नए शहर की नई सुबह सोमा के लिए अनोखी थी।
‘चलो तुम्हें जादू दिखाता हूँ’ पापा बोले और उसे क्वाटर्स के बीच में बने पार्क में ले गए। और सच में जादू हुआ। उसके पापा ने एक छोटे से पौधे की पत्तियों को हलके हाथों से छुआ और सच में कुछ हुआ। सोमा ने देखा पत्तियां शरमाते हुए बंद हो गईं। इमली की तरह छोटी-छोटी पत्तियां और उनके बीच में खिले गुलाबी फूलों को अपने शीर्ष पर धारण की हुई जैसे कोई शर्मीली लड़की थी।
पापा बोले- ‘तुम भी छू कर देखो।’
सोमा ने धीरे-से एक पत्ती को छुआ। वह सच में बंद हो गई। तो क्या यह शहर जादुई है? यहां के पौधे, बादल, खेत क्या सब जादुई हैं? सोमा सोचने लगी।
‘छुईमुई कहते है इसे’, पापा ने बताया।
हां छुईमुई… तो यह शहर आदिवासियों के साथ-साथ शर्मीली छुईमुई का भी है। क्या आदिवासी भी छुईमुई जैसे हैं। इन्हें भी प्यार से छूना होगा। छुईमुई के बाद सोमा को एक और जादुई वस्तु मिली जो लाल और पथरीली मिट्टी में थी। मिट्टी में पारदर्शी, चमकीली पापड़ी जैसा कुछ था जिसे गाल में लगाते ही कितने सूरज वहां खिल जाते हैं। जहां लग जाए मानो ब्रह्मांड के सारे सितारे वहां झर रहे हों। कितना चमकीला हो जाता है उसका चेहरा इससे। ओह यह जादुई शहर है! काश वह गिन्नी को बता पाती। यहां बेर के जंगल नहीं हैं पर जंगलों की कमी नहीं है। हर दूसरे दिन बारिश हो जाती है। बारिश के बाद जैसे आकाश साफ हो जाता है, वैसे ही सोमा के दिल की शंकाए जो इस शहर के लिए थीं धीरे-धीरे दूर होने लगीं।
गर्मी की छुट्टियों के कारण शहर के सारे स्कूल बंद थे, जून के अंतिम सप्ताह में स्कूल खुले। सोमा अपने नए शहर के नए स्कूल के बारे सोचने लगी। मेरठ के उसके पुराने स्कूल के पास से ट्रेन की पुरानी पटरी थी। वह हमेशा उसपर एक रुपए का सिक्का यह सोच कर रख देती थी कि कभी तो कोई गाड़ी वहां से गुजरेगी और लोहे को चुंबक में बदल देगी। लेकिन न कभी ट्रेन वहां से गुजरी न ही लोहा चुंबक में बदला। क्या नए स्कूल के पास से भी रेल की कोई लाइन गुजरती होगी! मासूम मन की कल्पनाएं। सोमा ने अपने नए स्कूल को अच्छे से देखा, उसे कहीं कोई पटरी नहीं दिखी। उसे लगा जैसे खुशियों का चुंबक जीवन के लोहे से कितना दूर हो गया है। इसी बीच लंच की घंटी बजी, बच्चे गेट के बाहर दौड़े पड़े। सोमा भी उनके पीछे-पीछे गेट की ओर चल पड़ी।
इस नई दुनिया में जामुन… छुईमुई… अभ्रक से हमारी सोमा मिल चुकी थी। गेट के बाहर पेड़ों की छांव में कुछ आदिवासी महिलाएं बांस की टोकरी लिए बैठी थीं। बांस की टोकरी में एक के ऊपर एक लुढ़कता हुआ उसे कुछ दिखा। कुछ-कुछ गेंद की तरह। टोकरी में लड्डुओं के आकार का कोई फल था। चिकना और चमकीला।
‘दादी, ये क्या है?’ सोमा ने पूछा।
‘मइया इ तिरिल हेके। खाबे होले तो बेस लागी।’
तिरिल… क्या ये भी कोई जादुई फल है! सोमा से रहा नहीं गया।
‘एक रुपए के कितने मिलेंगे?’
‘मइया दस गो तिरिल मिली।’ हँसते हुई दादी बोली।
सोमा की आंखों में खुशी की दो चिड़ियां फुदक पड़ीं, एक रुपए के दस तिरिल उसे मिल गए। हाथ और मन की दुनिया में वह समा नहीं पा रहे थे। फिर जब तक मौसम रहा हर रोज तिरिल स्कूल आया और सोमा उससे मिलती रही। उसकी दुनिया में कितनी नई दुनियाएं समा गई थीं।
काश! आज गिन्नी होती उसके पास तो दोनों तिरिल को साथ बैठ कर खाते। वह एकटक अपनी दोनों हथेलियों को देखती रही।
हथेलियां धीरे-धीरे बड़ी होती गईं। सोमा इस दुनिया के साथ जुड़ने की कोशिश करने लगी। उस दिन ऊन के धागों को उंगुलियों में फंसाए खेल रही थी कि अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया। सोमा ने देखा उसके घर में दूध देने वाली महिला सिर के ऊपर कच्चे पत्थरों से बना सिलबट्टा लिए हांफती हुई खड़ी है।
‘मां, फुआ आई है।’
सोमा की ये मुंहबोली फुआ जोबा का घर सरकारी आवास परिसर के पास ही बसे गांव में था। गांव के लोग क्वार्टर्स में दूध, सब्जियां बेचने का काम करते थे। प्रायः परिसर के लोग उनसे ही दूध लेते थे।
फुआ बोली, ‘तोहनी खातिर सिलबट्टा लाय हौं। अब खूब बेस-बेस भात तीयन खाबे।’
मां मुसकुराते हुए उन्हें चाय पिलाती है। फुआ को चाय पीना बहुत पसंद था। सोमा ने इस बार फुआ को बहुत ध्यान से देखा। उसके पिता को भाई मानने वाली, उसे मइया कहने वाली इस आदिवासी महिला के नुकीले दांत या सींग का तो कहीं कोई नामोनिशान ही नहीं है। क्या उन्होंने यहां आने से पहले उसे कहीं छुपा दिया है।
‘आपके सींग और नुकीले लंबे दांत कहां हैं फुआ?’ सोमा बोली।
‘सींग और लंबे दांत…’ फुआ ने इस प्रश्न की कल्पना नहीं की थी।
‘आपको पता है, मेरठ में मेरे दोस्त कहते थे कि आदिवासियों के सिर में सींग होते हैं… और लंबे नुकीले दांत होते हैं। हर वक्त उनके पास तीर-कमान होता है।’
कुछ देर सोचने के बाद फुआ हँसते हुए बोली, ‘ऊ गो दिकू मन लागिन हेके, तोर लागिन न लागे। दिकू मन हमर मुर्गी भइर नाहीं, हमर खेत-टांड केयो चोराय लेन। हमर देस में दिकू मन भाईर जा थैं। ई मन अब हमर केंऊंद, साल और माटी काटी में नजईर गाईड़ हैं।’ (केवल दिकु शिकारियों के लिए है मइया, तुम्हारे लिए नहीं। वे अब न सिर्फ हमारी मुर्गियों को चुराते हैं बल्कि हमारे धान के खेत भी चुरा रहे हैं। हमारी दुनिया नए-नए शिकारियों से भरती जा रही है। मुझे लगता है अब हमारे साल, तिरिल, मिट्टी पर भी उनकी नजरें हैं।)
‘हमारे स्कूल में तो पेंसिल, किताबें, पैसे तो चोरी होते रहते हैं; पर खेत, तिरिल, साल… आखिर इन्हें कौन चुरा सकता है फुआ?’
‘मइया शिकारी बहुत होशियार आहैं… वो मन अनजान बनकर चोरी नी करेन …आगे वो हमारे सहिया बनेन। हमर विश्वास जीत कर ऊ मन हमर पुरखा मनक चीज में दखल करेन। जखन तोंय बढ़बे तखन समझ में आवी।’
सोमा सोचने लगी कि खेत तो जादुई होते हैं, उसे भला आदिवासियों से कौन चुरा रहा है। वह भी दोस्त बनकर। ‘फुआ, तो क्या एक दिन मेरे सारे छुईमुई, जंगल, अभ्रक… और मेरे तिरिल भी चोरी हो जाएंगे।’
फुआ प्यार से बोली- ‘उदास मत हो मइया, आखिर हमारे सींग और नुकीले दांत हैं न उनकी रक्षा के लिए। फिर जब तुम बड़ी हो जाओगी तो अपने नुकीले दांतों और सींगों से उनकी रक्षा करना।’ सोमा को अचानक गिन्नी की याद आ गई। फुआ को कैसे समझाऊं, मैं आदिवासी नहीं हूँ। न मेरे नुकीले दांत होंगे न सींग। सोमा ने फुआ से उदास हो कर कहा- ‘फुआ, मेरे न तो सींग होंगे और न ही नुकीले दांत।’
…मइया जे मन खेत-टांड़, बोन-जंगल, तिरिल और माटी से प्रेम करेना… उनकर सींघ और तेज दांत अपने से उगेल। पुरखिन सिनगी दाई, कैली दाई, फूलो-झानो तोके आशीष देंबैं। फुआ किसी विचार में डूब गई और गीत गाने लगी… ‘फूलो झानो आम दो तीर रे तलरार रेम साअकिदा… आम दो लट्टु बोध्या खोअलहारे बहादुरी उदुकेदा… भोगनाडीह रे आबेन बना होड़ किरियाबेन… आम दो महाजन अत्याचार बाम सहा दाड़ी दा…’
सोमा न जाने कितनी देर तक हैरान रही। फुआ किस सिनगी दाई, कैली दाई, फूलो- झानो की बातें करती हैं। मां, भइया या गिन्नी ने भी उसे कभी इनके बारे में नहीं बताया। हमारी टीचर तो सब जानती हैं उनसे ही पूछूंगी।
इस शहर में आए उसे एक साल हो गए हैं और आज सोमा पहली बार इस शहर में फुआ के साथ मेहमानी में जा रही है। फुआ ने अपने माथे पर एक बोरी चावल रखा और एक जोड़ी खस्सी न्योता भीतराने के लिए ले गई। ऐसा सामूहिक उत्सव उसने पहली बार देखा था। वहां औरतें, मर्द, बच्चे सब पंक्तिबद्ध वृत्ताकार नाच रहे थे। मादल को उसने पहली बार देखा था, जिसकी ध्वनि उसे रोमांचित कर रही थी। सोमा ने पहली बार औरतों को मर्दों के साथ हाथ पकड़े, कदमों को एक गति में आगे-पीछे करते हुए इतना नाचते-गाते देखा था। मां या अपने घर की किसी महिला को उसने कभी ऐसे सामूहिक कार्यक्रम में नहीं देखा था। ये नाचती स्त्रियां उसे विचित्र लगीं। उसने देखा, फुआ भी उनके साथ नृत्य में शामिल हो गई। चालीस साल की अधेड़ महिला हड़िया के रस में डूबी हुई फुआ को पहली बार इतना नाचते देख रही थी। बच्चे सोमा को भी अपने साथ नाचने ले गए, पहले तो वह झेंप गई पर बाद में फुआ के साथ अपने डगमगाते कदमों से सोमा उनकी लय छूने की कोशिश करने लगी।
फुआ और उन जैसी आदिवासी स्त्रियों को उसने शरीर तोड़ मेहनत करते देखा था। जानवरों की देखभाल से लेकर खेती की सारी जिम्मेदारी उनकी है। उन्होंने जीवन में श्रम से कभी कोई समझौता नहीं किया पर जब उत्सव का अवसर आया तो उसमें भागीदारी में कभी पीछे नहीं हटीं।
पर उस दिन पहली बार सोमा ने फुआ को विचलित देखा था। वह बेबाक और साहसी महिला थी। सोमा को फुआ और अपनी मां की बातचीत से बस इतना समझ आया कि परिसर में रहने वाले किसी उच्च अधिकारी ने जबरदस्ती उनका हाथ पकड़ लिया था। उन्होंने उसके खिलाफ शिकायत भी की थी, लेकिन फैसला उस अधिकारी के पक्ष में आया था। फुआ खूब हड़िया पीती थी, नाचती थी। ये उनके जीवन के अभिन्न अंग थे। पर अब वही उनके खिलाफ हो गए। क्वाटर्स के लोगों ने उनके ही चरित्र और आदतों पर सवाल उठाए। दिकुओं की दुनिया में न्याय की पराजय हुई। फुआ पर इस घटना का गहरा असर पड़ा। वो समझ गई थी कि शिकारी उनकी जमीन पर सेंधमारी कर चुका है। उनके और उन जैसे लोगों के अस्तित्व पर आए खतरे को वह पहचान गई थी। इस घटना के बाद फुआ उस सरकारी परिसर में कम दिखने लगीं। उन्हें वहां आने पर प्रतिबंधित कर दिया गया था या उन्होंने स्वयं ऐसा किया, सोमा समझ नहीं पाई। न ही घरवालों ने उसे बताना उचित समझा। फिर एक दिन सोमा को ऐसा लगा कि परिसर के सारे छुईमुई के पौधे बिना छुए ही मुरझा गए हैं। उसके गुलाबी फूलों के रेशों को इन दिकुओं ने नोच डाला था।
छुईमुई के मुरझाने की पीड़ा का अनुभव सोमा जानती थी। उसके पूरे क्लास में केवल एक ही आदिवासी लड़की सिबिल सांगा पढ़ती थी जो उसकी एक मात्र दोस्त बनी। उन दोनों ने न जाने कितने तिरिल एकसाथ खाए थे। सरहुल और मंडा की बातें साथ में करते थे। वह सभी बच्चों में एक मात्र ऐसी लड़की थी जो ये बता सकती थी कि महुआ कब पक जाता है, तिरिल किस मौसम में खाए जाते हैं या संथाली गीतों पर कैसे नाचते हैं, पर उससे शिक्षक-शिक्षिकाओं ने कभी उससे ऐसे प्रश्न नहीं पूछे और जो पूछे उसका दायरा किताबों की दुनिया तक ही सीमित था। उसके जीवन का पाठ्यक्रम उसके स्कूल के पाठ्यक्रम से मेल न खा सका। दो बार स्कूल में फेल होने बाद वह हमेशा के लिए चली गई। सोमा इस शहर में नई थी पर सिबिल की जड़ें, उसकी नमी तो मजबूती से… उसे भी क्या फिर किसी नई जमीन की…।
उस दिन सोमा को समझ में आया सिबिल, तिरिल, छुईमुई और उसके सारे जादुई दोस्त इस नई बनती दुनिया में फिट नहीं हो पा रहे हैं। मेरे दोस्त सियार पता नहीं कैसे होंगे? अब तक तो शहरी सियार उनके जंगल के भीतर आ गए होंगे। मेरे दोस्तों की दुनिया जंगल तक ही तो थी, कभी बाहर नहीं गए, यहां तक कि मुझसे अंतिम बार मिलने भी नहीं आए। अब कैसे होंगे?
अब सोमा को इस शहर में रहते हुए बीस बरस हो गए हैं। उसकी जादुई दुनिया खत्म हो गई है। धान के खेत दूर जा रहे हैं… धान के पौधों और लोगों के चेहरे जैसे किसी रसायन की वजह से चमक रहे हैं। जिन खेतों में धान उगा करते थे अब वहां कंक्रीट ही कंक्रीट है। कंक्रीट जैसे शहरों में लोग भी धीरे-धीरे कंक्रीट बनते चले जाते हैं। फर्क नहीं पड़ता उन्हें, मौसमों का कोई असर नहीं उन पर।
जब भी सोमा चावल की थाली देखती तो लगता फुआ मानो अपने खेतों में उगे देशी चावल लिए उसे पुकार रही हैं और उनकी चावल की बोरी न जाने कितने छेदों से भर गई है। बुआ बार-बार सिनगी दाई, कैली दाई, फूलो-झानो को पुकार रही हैं। पर धान के खेत नजरों से ओझल हो रहे हैं। सिनगी दाई, कैली दाई, फूलो-झानो क्या ये वही शहर है जहां गर्मियों में आंधी आने के बाद आमों के तिकोलों को लूटने की होड़ मची बच्चों में होती थी।
अब वह भी इस नई दुनिया में अनफिट हो रही है तो क्या उसे भी अब नई दुनिया में जीना सीखना होगा, हाइब्रिड बनकर। जामुन के लंबे-घने पेड़ों का कहीं कोई अता-पता नहीं। क्या अब इस शहर में मीठे जामुनों से किसी बच्चे का स्वागत नहीं होगा। फिर एक दिन मां ने कहा- ‘तुम्हारी फुआ अब नहीं रही।’ …सोमा को लगा उसका शहर अब उसका शहर नहीं रहा। उसकी छुईमुई तो बहुत पहले ही रूठ गई है इस शहर से। अभ्रक में मौजूद नक्षत्रों को उसके तारों समेत दिकु शिकारियों ने चुरा लिया है।
सोमा गौर से अपने हाथों को देख रही है। तिरिल कहां है? वह अब न इन हथेलियों में है न इस शहर में। हमने खो दिया है उसे। हमने क्यों जाने दिया उसे। काश! उसके पास सींग और नुकीले दांत होते। सोमा सोचती रही, मैं अपनी फुआ की तरह लड़ाकू क्यों नहीं हूँ। मैंने कुछ नहीं किया अपने शहर के लिए। यहां बेर का जंगल कभी नहीं मिला, पर ये मेरा शहर था। इस शहर ने मुझे बेर के जंगल के बदले अपना तिरिल दिया था।
फुआ को गए एक महीने हो गए। उस रोज सोमा सुबह-सुबह अपने बगीचे की घास छील रही थी। मां ने पूछा, ‘आज सुबह-सुबह क्या बागवानी हो रही है?’
‘कुछ नहीं मां, बस कुछ छुईमुई के पौधे लगा रही हूँ।’
मां ने हँसते हुए कहा, ‘छुईमुई के पौधे घर में कौन लगाता है पगली। ये जंगली होते हैं। कहीं भी उग जाते हैं।’
‘मां इस सभ्य शहर में अब छुईमुई तो क्या जंगली फूल भी नहीं उगते। कहां देखा था उन्हें अंतिम बार?’
मां मुस्कुरा कर चली गई। सोमा ने महसूस किया कि उसके दांत नुकीले हो रहे हैं, सिर पर सींग निकल रहे हैं।
उसकी परछाई बुआ, सिबिल और सियार में बदल रही है ।
‘संताल मा दिसोमरे…. सिदो कान्हु कीन राज लेना हो, ती काटुप कोलेम ताकीन…. होड़मों मायाम सिहाय ताकीन…… संताल परगना कीन बेगारलेदा….!’
संपर्क :द्वारा उदय कांत झा, बिट कॉलेज के पास, गेटलातु, रांची, झारखंड-835217 मो.9110909419



सर नमस्ते,
वागर्थ के जनवरी 2026 अंक में चाहत अन्वी जी की कहानी तिरिल पढ़ी।
बहुत बेहतरीन कहानी।
सर्वप्रथम पूरी वागर्थ टीम के संपादकीय विवेक को साधुवाद, जो इस प्रकार की उम्दा कहानियां पढ़ने को मिलती हैं।
आदिवासी समूह के प्रति हमारे मन में जो (गलत) धारणाएं निर्मित की जाती हैं, उसको उजागर करती हैं।
यह कहानी जंगल और इसकी संपदा के संरक्षण के प्रति इनके प्रेम को प्रकट करती है। यह कहानी बताती है कि कैसे हमारी प्रकृति विरोधी और पूँजीवादी व बाजारवादी सोच जल,जंगल और जमीन के आदिवासी हितों पर कुठाराघात कर रही है। प्रकृति को हम शहरी या कस्बाई लोग तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम ‘सोमा’ की भूमिका में किसी ‘फुआ’ के सानिध्य में न रहे। हम सब भी प्रकृति के इन संरक्षकों के प्रति ‘गिन्नी’ की तरह दिग्भ्रमित ही रह सकते हैं। हालांकि इसके लिए गिन्नी से ज्यादा हमारा शैक्षणिक माहौल और शिक्षण पद्धति उत्तरदायी है।
बेहतरीन कहानी हम तक पहुंचाने हेतु वागर्थ की पूरी टीम का आभार।
सादर