
वरिष्ठ कवि। अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित। तीन कविता संग्रह– ‘अब भी’, ‘सामने से मेरे’, ‘डुमरांव नजर आएगा’।
वे मंज़िल नहीं जानती थीं
एक अरसे बाद दिखा
झुंड भेड़ों का सड़कों पर
अपने गड़रियों के साथ
वे चल रही थीं
बांस की पतली छड़ी के इशारों पर
डरी-सहमी-सकुचाई-सी
उनकी न तो कोई कतार बन पा रही थी
न उनको कोई अलग राह ही सूझ रही थी
वे गिर-भहरा रही थीं एक-दूसरे पर
वे मंजिल का पता नहीं जानती थीं
स़िर्फ चलना जानती थीं
अब तो बहुत ही कम बचे थे
उनके लिए घास के मैदान
पलिहर खेत
जहां उनको हिराया जाता रहा है
अपने-अपने पलिहर खेतों में
उनको हिरवाने के लिए आतुर-उत्सुक
खेतिहर किसान ही कितने बचे थे
जो बचे थे उनकी आंखों से
जैसे नीर नहीं
टपकता रहता मानो रक्त
बहरहाल, भेड़ें तो भेड़ें थीं
तमाम उम्र अपनी-अपनी पीठों पर
ऊन की बेहतरीन फसल उगाने के बाद भी
थीं वे किसी बुरे वक़्त के हवाले
वे भेड़चाल के क़िस्सों
और मुहावरों के नाम पर
पहले से बहुत बदनाम थीं!
संपर्क : 631/58,‘सुयश’, ज्ञानविहार कॉलोनी, कमता (अयोध्या रोड), लखनऊ-226028मो.7355644658


वरिष्ठ व चर्चित कवि चंद्रेश्वर की कविता वर्तमान समय पर तंज कसती उत्कृष्ट कविता। आज बहुसंख्यक लोग सत्ता के डिक्टेटेड पीस होकर रह गये हैं। पंछी के पर कतरे जा रहे हैं,वे उड़ नहीं सकते,बस रेंगने को मजबूर हैं तथापि उन्हें मिथ्या आभास हो रहा है कि वे उड़ ही तो रहे हैं।
@राजेश पाठक
गिरिडीह (झारखंड)
समकालीन कविता में लोक की बात कहना और व्यवस्था पर तंज कहते हुए सामंतवादी, फासीवादी और पूंजीवाद की बखिया उधेड़ना चन्द्रेश्वर के कविता में दिखाई देता है।
“सामने से मेरे” कविता संग्रह कवि का एक महत्वपूर्ण संग्रह है।