
वरिष्ठ लेखक। पांच उपन्यास, नौ कहानी संग्रह, ग्यारह कविता संग्रह, चार भेंटवार्ताएं, दो साक्षात्कार और एक समीक्षा ग्रंथ प्रकाशित। संप्रति स्वतंत्र लेखन।

आज अभिजीत के अस्पताल के उद्घाटन पर शहर के नामी-गिरामी लोगों ने शिरकत की। शहर के मेयर, एम.पी.साहिबा और तमाम खास लोगों का जमावड़ा अभिजीत और मनीषा के लिए खास दिन बना गया। अभिजीत के माता-पिता और पूरे परिवार के लिए यह खास दिन था। अस्पताल के टेरेस पर शामियाना तानकर सबके लिए भोजन की व्यवस्था की गई थी। प्रारंभ में सांसद महोदया और मेयर का छोटा-सा भाषण हुआ तथा बाद में शहर के एक बड़े डॉक्टर ने अभिजीत और मनीषा के सम्मान में कुछ शब्द कहे। इन अतिथियों का सत्कार-सम्मान हुआ। अभिजीत और मनीषा आज सज-धजकर आए थे। मेहमानों की आवभगत में दोनों व्यस्त थे। माता-पिता और अभिजीत के भाई का परिवार पीछे बैठा था। मनीषा के पिता और मां इस कार्यक्रमनुमा उद्घाटन की निगरानी कर रहे थे। अभिजीत के पिता मन ही मन खुश हो रहे थे कि उनका बेटा एक बड़ा डॉक्टर बन गया। अमेरिका से ऊंची पढ़ाई कर लौटा है। बेटे को कामयाब होते देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। भाई चुपचाप बैठे सब देख रहा था। मां ने पिता से कहा था, आज आपको बुलाकर अतिथियों से आपका परिचय अभिजीत को करवाना चाहिए था। ‘कोई बात नहीं… पर बड़े लोग, शहर के खास लोग हमारे इस उद्घाटन पर आए, यही बड़ी बात है…!’ कहकर उन्होंने बड़े बेटे को देखा। वह मां की ओर देख रहा था, मानो मां का समर्थन कर रहा हो।
कोई तीस साल पहले आनंद प्रकाश और सुमति पाटिल ने पुणे के औंध इलाके से थोड़ा आगे नए बने प्लॉट में अपने दोनों बेटे अविनाश और अभिजीत के लिए पास-पास चार-चार हजार स्क्वेअर फुट के दो प्लॉट बुक किए थे। आनंद प्रकाश और सुमति दोनों पुणे विद्यापीठ में प्रोफेसर थे। उस जमाने में उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया था, जिस समय एक ही जाति की उपजाति में भी विवाह आसान नहीं था। आनंद प्रकाश शुरू से ही सरनेम नहीं लगाते और सुमति पाटिल ने अपना न सरनेम हटाया और न ही शादी के बाद नाम बदला। विद्यापीठ के पास ही औंध के परिहार चौक में उन्होंने छोटे-से प्लॉट पर छोटा ही सही लेकिन खूबसूरत बंगला बनाया था। बैंक से लोन लेकर उन्होंने अपना मकान बनाया। अच्छा सजाया। दो बेटे हुए अविनाश और अभिजीत। दोनों नौकरी करते थे। पर बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। दोनों की पदोन्नति होती रही और वेतन भी बढ़ता रहा। विद्यापीठ के साथी प्रोफेसरों ने एक सोसायटी बनाकर प्लॉट खरीदने की योजना बनाई। इसमें विद्यापीठ की क्रेडिट सोसायटी से कर्जा लेकर आनंद प्रकाश और सुमति पाटिल ने दो प्लॉट सटे हुए खरीदे और वेतन से धीरे-धीरे कर्ज चुकाते रहे।
समय के साथ शहर का सीमोलंघन हर साल बढ़ता रहा। प्लॉट के पास से ही मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे निकल आया और अब मेट्रो भी पास से गुजरने वाली थी। यह इलाका पुणे का महंगा इलाका घोषित होता रहा। आसपास ऊंची इमारतें आती रहीं। बिल्डर तीन-चार प्लॉट्स को मिलाकर बहुमंजिली इमारतें खड़ी करने लगे। प्लॉट धारकों को बड़े फ्लैट और अच्छी-खासी रकम भी दे रहे थे। पर आनंद प्रकाश और सुमति पाटिल ने ये प्लॉट तो अपने दोनों बेटों के मकानों के लिए खरीदे थे। उन्होंने ऐसे बिल्डरों के प्रस्तावों में कोई रुचि नहीं दिखाई। आसपास धनाढ्यों की बस्ती आने लगी। प्लॉट के भाव सोने की तरह बढ़ने लगे। फिर भी आनंद प्रकाश ने उसे बनाए रखने का निर्णय लिया।
अविनाश पढ़ाई-लिखाई में ठीक-ठाक रहा। कभी-कभी सुमति उसे पढ़ने-लिखने के लिए डांट-डपट करती पर आनंद उसे इशारे से रोक देते और कहते बेटा बड़ा हो रहा है। सब्र से काम लेना चाहिए। परंतु, अभिजीत पढ़ाई में बहुत तेज निकला। उसने मैट्रिक मेरिट में पास की। आगे भी नब्बे से अधिक प्रतिशत लेता रहा और बाद में उसे मेडिकल में दाखिला मिल गया। आनंद प्रकाश की खुशियां सातवें आसमान पर। वे स्वयं डॉक्टर बनना चाहते थे, पर केमेस्ट्री की प्रोफसरी पर उन्हें संतोष करना पड़ा। बेटे ने सपना पूरा किया। उसकी पढ़ाई का खर्च बढ़ गया। अविनाश अब बी-एड हो चुका था और पुणे के एक स्कूल में शिक्षक बन गया। पर आनंद प्रकाश ने दोनों बेटों में कभी तुलना नहीं की। अविनाश भी भाई की उपलब्धि को लेकर कभी, हीन भावना से नहीं घिरा। उसे छोटे भाई पर गर्व ही था।
अविनाश की शादी के पहले ही आनंद प्रकाश ने ऊपर दो कमरे बढ़ा लिए थे। उनका रिटायरमेंट करीब आ रहा था। वे चाह रहे थे बड़े बेटे की शादी रिटायरमेंट से पहले हो जाए। रिश्तेदारी में फर्क पड़ता है। इस बीच अभिजीत बहुत उच्च श्रेणी में एमबीबीएस पास कर गया। पिताजी चाहते कि अच्छी-सी डिस्पेंसरी खोलकर वह अपनी प्रैक्टिस करे और दूसरे निजी अस्पतालों में भी सेवाएं दें। पर अभिजीत उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाना चाहता था। आनंद प्रकाश का मानना था कि अमेरिका गया हुआ कोई लौटता नहीं। उनकी बिलकुल इच्छा नहीं थी। पर सुमति की सलाह अंतिम निर्णय थी। सवाल काफी खर्च का था। एजुकेशन लोन और अपने पीएफ से फंड निकालकर विचार शुरू हुआ। एमबीबीएस में अच्छी उच्च श्रेणी मिली तो उसे न्यूयार्क के आइंस्टिन मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया। फिर दोनों की बचत, बीमा पॉलिसी, पीएफ को दांव पर लगाकर रकम जुटाई गई। वैसे अभिजीत को स्कॉलरशिप भी मिली थी, पर वह न्यूयार्क जैसे शहर में रहने के लिए काफी नहीं थी।
आनंद प्रकाश चाहते थे कि अभिजीत के अमेरिका जाने से पहले अविनाश की शादी हो जाए, क्योंकि इतनी जल्दी अमेरिका से उसे आने में आसानी नहीं होगी। अविनाश की उम्र भी छब्बीस पार हो गई थी। उसके अधिकांश मित्रों की शादियां हो चुकी थीं। वह भी अनुकूल ही नहीं, उत्सुक भी था। नौकरी स्थायी थी। रहने के लिए घर अच्छा था। उसकी कोई विशिष्ट महत्वाकांक्षा नहीं थी। परिवार का अच्छा नाम था। कई दिनों से कुछ रिश्तेदार पूछताछ कर ही रहे थे। अभिजीत के अमेरिका जाने से पहले अविनाश की शादी हो गई।
अभिजीत का अमेरिका जाना जब तय हो गया तो सुमति को अपने कॉलेज के दिनों की सहेली आशा देवी का ध्यान आया। कॉलेज के सुनहरे दिन और दोनों की साहित्यिक दोस्ती दूर देश रहने के बावजूद ताजा रही। आशा देवी शादी के बाद न्यूयॉर्क बस गई। उसकी शादी अजय से हुई जो यूएनओ में एक बड़ा अधिकारी था। आशा देवी कोलंबिया युनिवर्सिटी में इंडियन फिलॉसफी की गेस्ट फेकल्टी के रूप में काम करती है। भारत-पुणे आने पर सुमति के साथ ही रुकती है, हालांकि उसके भाई भी इसी शहर में रहते हैं। उनसे मिलने तो जाती है, पर ठहरती है- सुमति के साथ। पुराने संबंधों की जड़ें बहुत गहरी हैं और अब भी हर मौसम के साथ नई कोंपलें फूटती रहती हैं। अब जब अभिजीत को न्यूयार्क जाना हो रहा है, आशा देवी की याद सहज ही हो आई। आशादेवी और अजय का दो मंजिला मकान है, तलघर में भी कमरे हैं। उन्हें कोई संतान नहीं है। आशादेवी के लिए खुशी की बात थी कि उसकी पुरानी सहेली का बेटा यहां आ रहा है। अभिजीत के लिए बेसमेंट का एक कमरा तैयार कर दिया गया। अभिजीत सुखद विस्मय में रहता कि किस तरह उसकी सारी अपेक्षित सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। मां की याद की जगह उसे अपनी प्रतिभा को अधिक श्रेय देने का उसका मन होता है।
आशादेवी और अजय, अभिजीत का ध्यान रखते। वे लगभग उसके स्थानीय पालक ही बन गए थे। एक दिन वह अपनी सहपाठी मनीषा जोशी के साथ लौटा। आशादेवी से परिचय कराया। आशादेवी के कुतूहल, जिज्ञासा ने कुछ प्रश्न किए। प्रश्न वैसे तो सामान्य जानकारी के तौर पर थे, पर अभिजीत को कुछ ठीक नहीं लगा। वह कयास लगाने लगा कि आंटी जरूर मां को कुछ बताएगी। अमेरिका में भी भारतीय मन सही-गलत की परिभाषा बूझने लगा।
अभिजीत सालभर तो आशादेवी के घर रहा। बाद में, अपने प्रयासों से उसने होस्टल में जगह हासिल कर ली। अब वह मेडिकल शॉप पर कभी किसी डॉक्टर के सहायक के रूप में प्रति घंटे के हिसाब से पचास-साठ डॉलर प्राप्त कर लेता था। फिर भी घर से कुछ पैसे उसे मंगवाने पड़ते थे। आनंद प्रकाश किसी तरह उसकी जरूरतें पूरी करते रहते।
मनीषा जोशी-अभिजीत का साथ बढ़ता गया। वह मुंबई से थी। उसके पिता विनायक जोशी मुंबई के नामी सर्जन थे। उनका अपना अस्पताल था। बहुत समृद्ध थे। उन्होंने अपनी बेटी मनीषा की व्यवस्था बहुत अच्छी तरह कर दी थी। उसके लिए उन्हें काफी पैसा भेजना पड़ता था। पर उन्हें इसकी कोई परेशानी नहीं थी। मनीषा इकलौती संतान थी और डॉ. जोशी की समृद्धि में कोई कमी नहीं थी।
दो साल बाद अभिजीत का भारत आना हुआ। मनीषा जोशी से करीबी काफी बढ़ती गई थी। फ्लाइट मुंबई ही छोड़ती थी, वहां से पुणे आना होता था। मनीषा की इच्छा थी कि अभिजीत एक दिन उसके घर रुके और दूसरे दिन पुणे जाए। अभिजीत के लिए ‘ना’ कहना संभव नहीं था। मुंबई के दादर इलाके में डॉ. विनायक जोशी का बड़ा-सा बंगला था। अभिजीत रुक गया। अभिजीत का परिचय मनीषा ने अपने माता-पिता से करवाया। अभिजीत का व्यक्तित्व, व्यवहार, बातचीत बहुत प्रभावित करता। माता-पिता को अच्छा लगा। जल्दी ही वह जोशी परिवार से घुल-मिल गया। दूसरे दिन वह टैक्सी लेकर पुणे रवाना हो गया। भोजन पूरा होने से पहले उसने जोशी परिवार को पुणे आने का निमंत्रण दिया। मनीषा ने और उसके माता-पिता ने हामी भरी। मनीषा और अभिजीत को एक महीने बाद वापस न्यूयॉर्क पहुंचना था।
अभिजीत पुणे आने के बाद अधिकतम समय अपने पुराने मित्रों के साथ बिताता। पिता तो रिटायर हो चुके थे। पर मां अभी यूनिवर्सिटी जाती है। पिता उसे हर दूसरे-तीसरे दिन पांच-दस हजार रुपए देते ताकि वह आराम से अपना खर्च करता रहे। मां ने उसके खाते में पचास हजार डाल दिए। वह ऑनलाइन खर्च करता रहा, इसमें अधिकांश खर्च कपड़े और होटल का होता। जब तक वह यहां है, कार उसी के लिए सुरक्षित रहती है। इस बीच वह मुंबई भी हो आया, मनीषा से मिलने।
आनंद प्रकाश को लगने लगा कि अब घर कुछ छोटा लग रहा है। हालांकि तीन बेडरूम तो हैं। पर एक दिन जब मनीषा मिलने आई तब उन्हें लगा कि एकाध कमरा और होता तो बेहतर था। उनके दिमाग में यह बात बैठ गई कि ऊपरी मंजिल पर टेरेस बहुत बड़ा है, वहां एक कमरा अच्छी तरह बन सकता है। कोई घर पर यदि एकाध दिन रुकना चाहे तो ‘एडजेस्ट’ नहीं करना पड़ेगा। इसी समय उन्हें यह भी ध्यान आया कि बरसों पहले जो प्लॉट खरीदा था उस पर कभी एक-से दो मकान दोनों बेटों के लिए बनाकर उन्हें सौंप देंगे। पर अभी तो अभिजीत की पढ़ाई पूरी होनी है।
मनीषा जब अभिजीत के घर आने वाली थी, तब उसने बताया था कि उसके पिता मुंबई के कितने बड़े डॉक्टर हैं, मुंबई के दादर में उनका कितना बड़ा बंगला है, हॉस्पिटल कितना बड़ा है, रत्नागिरी में उनकी खेती-बाड़ी है… आदि-आदि! मां सुमति, अभिजीत का यह बयान सुन रही थी और अपने लाड़ले बेटे को गौर से देख भी रही थी। पिता आनंद प्रकाश को यह सुनकर पता नहीं क्यों अटपटा लग रहा था। वे दोनों नौकरी करते हैं, किसी बात की कमी नहीं। बेटा अमेरिका में डॉक्टरी पढ़ रहा है… पर डॉ. विनायक जोशी का पूरा बायोडॉटा अपने बेटे के मुंह से सुनते हुए बहुत अजीब लगा। जब मनीषा उनके घर सबसे मिलने आई तो आनंद प्रकाश उसके सामने अपने आपको गरीब महसूस कर रहे थे और आज उन्हें अपना घर बहुत छोटा लग रहा था। पर मां सुमति कुछ और ही महसूस कर उन दोनों को निहार रही थी।
देखते-देखते चार वर्ष बीत गए। इन चार वर्षों में आनंद प्रकाश और सुमति पाटिल की बचतें और बैंक बैलेंस बहुत नीचे आ गया। पर बेटा अभिजीत ‘हार्ट स्पेशलिस्ट’ बनकर अमेरिका से भारत लौटा। वैसे वह भारत लौटना ही नहीं चाहता था। वह अमेरिका में ही संभावनाएं तलाश लेता और ऐसे प्रस्ताव उसे मिले भी। पर अब उसकी भीतरी डोर मनीषा के साथ उलझ रही थी। मनीषा के पिता चाहते कि मनीषा मुंबई या भारत में ही रहे और यहां की संपत्ति संभाले। दूसरे, पता नहीं क्यों उन्हें अमेरिका का जीवन बहुत अच्छा नहीं लगता था।
मनीषा, विनायक जोशी अस्पताल में रम गई और अभिजीत पुणे के कई बड़े निजी अस्पतालों में ‘हार्ट स्पेशलिस्ट’ के रूप में बोर्ड पर अपना नाम देखने लगा। सबको लग रहा था- अभिजीत और मनीषा की शादी होगी। शादी हो गई! आनंद प्रकाश को अपना घर और छोटा लगने लगा। अभिजीत का एक पैर पुणे, तो दूसरा मुंबई में होता। हार्ट-सर्जरी में उसका नाम सफल डॉक्टरों में गिना जाने लगा। पिता को गर्व होता और कभी-कभी लगता कि अभिजीत की उड़ान आकाश की सीमा न लांघ जाए और वे जमीन पर ही बिछड़ जाएंगे! मकान छोटा लगता जा रहा था और पता नहीं क्यों वे कुछ कसाव महसूस कर रहे थे।
एक दिन अभिजीत ने पिता के सामने एक प्रस्ताव रखा। घर पर सभी असमंजस में पड़ गए। पर अंत में यह तय हुआ कि दोनों प्लॉट को मिलाकर अभिजीत का अस्पताल खड़ा होगा। बहुमंजिला अस्पताल और ऊपरी मंजिल पर अभिजीत का डॉक्टर का निवास ताकि हर इमरजेंसी का निदान सहजता से हो सके। इसके ऐवज में मूल बंगला पूरा अविनाश का हो जाएगा। बातचीत के लिए कोई विकल्प नहीं बचा। बैंक लोन, डॉ. विनायक जोशी की मदद और एक वैभवी सपने की बुनियाद तीस साल पहले खरीदे गए प्लॉट पर रखी गई।
‘जीत हार्ट केयर एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट’ के रूप में इस अस्पताल का नामकरण हुआ। ‘जीत’ इसलिए कि मनीषा अभिजीत को इसी नाम से बुलाती है। पुणे शहर की कई हस्तियां इस अस्पताल के उद्घाटन पर आई थीं। अभिजीत-मनीषा का उत्साह देखते ही बनता रहा और मनीषा के माता-पिता अगवानी करने में व्यस्त रहे। आनंद प्रकाश, सुमति, अविनाश आदि की भूमिका किनारे-किनारे ही रही। आनंद प्रकाश कुछ गंभीर, शांत और चुपचाप ही रहे।
अभिजीत पूरे इलाके में ‘हार्ट’ के एक मशहूर डॉक्टर के रूप में विख्यात हो गया। बहुत अधिक व्यस्त हो गया। रोज कहीं न कहीं ऑपरेशन। हेलीकॉप्टर से आसपास तक जाना और इमरजेंसी ऑपरेशन। इतने क्या हार्ट के पेशंट फैल गए चारों ओर! व्यस्त, व्यस्तता और व्यस्ततम डॉक्टर- अभिजीत! उसकी विशेषज्ञता कीर्ति के पंख लगाकर चारों ओर मंडराने लगी। लक्ष्मी उसपर अतिरिक्त रूप से प्रसन्न थी। लक्ष्मी बढ़ती गई। उसका समय घटता गया। अब वह परिवार के लिए भी समय न निकाल पाता। अफसोस तो होता उसे, पर बैंक का बढ़ता खाता उसे सहला देता। अब उससे संपर्क करना दूभर होता जा रहा था। बीच में रिसेप्शनिस्ट की पूछताछ के बाद ही उस तक पहुंचा जा सकता था। ऑपरेशन में होते हुए तो सवाल ही नहीं उठता। सारे संदेश नोट किए जाते। बाद में चुनिंदा फोन करता।
एक दिन बड़े भाई अविनाश के तीन फोन आए हुए थे। उसे फोन मिलाया तो मालूम हुआ मां की तबीयत ठीक नहीं है। उसने अपने सहयोगी डॉक्टर को घर भेज दिया। मां उसके आने का इंतजार कर रही थी। आनंद प्रकाश को भी उम्मीद थी कि अभिजीत मां से मिलने आ जाएगा। पर सबको निराशा हुई। सहयोगी डॉक्टर ने बहुत बारीकी से जांच की और बुखार की गोलियां लिखकर चला गया। अभिजीत का न आना सुमति पाटिल की तपन बढ़ा गया। उसकी इच्छा ही नहीं हुई कि वह दवाई ले। दवाई न भी मिलती पर अभिजीत आ जाता तो उसका बुखार अपने आप उतर जाता। पर बुखार चढ़ता ही रहा। फिर आनंद प्रकाश ने भी फोन किया। इस बार अभिजीत ने फोन उठा लिया और बोला कि मेरे साथी डॉक्टर ने बताया कि बुखार है। जो दवाई दी है उससे मां ठीक हो जाएगी। एक जरूरी ऑपरेशन के लिए मैं नागपुर जा रहा हूँ। लौटते ही घर आऊंगा। आनंद प्रकाश ने इतना ही कहा – माँ तुम्हें बहुत याद करती है… ! अभिजीत ने बस इतना कहा कि नागपुर से लौटकर घर आता हूँ।
मां सुमति पाटिल का बुखार नहीं उतरा, पर उनकी जिद कायम थी कि बेटा अभिजीत आएगा तो ही दवाई खाऊंगी…! अब अविनाश को अभिजीत पर गुस्सा आ रहा था कि अपनी मां के लिए इस आदमी के पास समय नहीं है और यह दुनियाभर में हृदय का ऑपरेशन कर रहा है। कुछ कठोर शब्द मन में रखकर उसने मोबाइल उठाया। परंतु दो बार फोन करने पर भी अभिजीत का फोन नहीं उठा। गुस्सा और बढ़ गया। भीतर शब्द और कठोर होते जा रहे थे। तीसरी बार फोन उठाया। अविनाश ने ऊंची आवाज में बोलना शुरू किया। मां की तबीयत की चिंता जताई। अभिजीत को लगभग डांटते हुए कहा कि बुखार से भी ज्यादा मां तुमसे मिलने के लिए व्याकुल है। अभिजीत ने बड़ी बेरूखी से कहा- ‘आप लोग समझते क्यों नहीं। अभी मैं मुंबई में हूँ। पुणे लौटते ही घर आऊंगा।… एक बार कह दिया न!’ अविनाश को यह जवाब एक बड़े डॉक्टर का लगा, जो बहुत व्यस्त है। यह आवाज एक बेटे या भाई की बिलकुल नहीं थी। अविनाश ने गुस्से से फोन काट दिया। मां को हूबहू सारी बातें जस की तस सुना दी। निर्णायक रूप में यह भी कह दिया कि उसने अपने फैमिली डॉक्टर सुधीर पांडेय को फोन कर दिया है। वे आते ही होंगे। सुमति पाटिल भारी मन और डबडबाई आंखों से मना करती रही। पर थोड़ी देर में डॉक्टर पांडे आ गए।
डॉक्टर पांडेय की सलाह के अनुसार कुछ टेस्ट करवाए गए। उन्होंने कुछ दवाइयां लिखीं। अविनाश सारी दवाइयां ले आया। परंतु, तमाम कोशिशों के बाद भी सुमति पाटिल ने कोई दवाई नहीं खाई। वह यही रट लगाती रही- बेटा अभिजीत आएगा, जो दवाई देगा मैं खा लूंगी। और वह दरवाजे की ओर ताकती रहती। थोड़ी भी आहट होती, वह उधर आंखें टिका देती। आनंद प्रकाश चिंतित होकर, लगभग विह्वल होते पत्नी को अनुनय करने लगे। तब कहीं जाकर सुमति पाटिल ने एक गोली खाई। दूसरे दिन सुबह तक सबने बुखार उतर जाने की उम्मीद की। पर बुखार उतरा नहीं और न अभिजीत के आने की कोई खबर ही आई। डॉ. पांडेय को फिर बुलाया गया। फिर जांच-पड़ताल हुई।
अब सुमति पाटिल की तबीयत काफी नाजुक होती जा रही थी। जांच रिपोर्ट में मालूम हुआ कि उन्हें निमोनिया है और शुगर बहुत बढ़ जाने के कारण कई परेशानियां बढ़ गई हैं। लंबे समय से उन्होंने शुगर की गोलियां खानी भी बंद कर दी थीं। खाने में रुचि नहीं बची थी। अब वे अपने बेटे अभिजीत का इंतजार भी नहीं करतीं। कोई जिद नहीं… शायद कोई उम्मीद भी नहीं। कभी-कभी वे अर्धचेतन स्थिति में चली जातीं… शिशु अभिजीत ने उन्हें नए जन्म की तरह खुशियां दी थीं। एक दिन भी आंख से ओझल नहीं होने दिया। अपने सारे सपने अभिजीत पर न्योछावर कर दिए थे। अमेरिका भेजते समय खुशी और चिंता दोनों थीं। चिंता ही अधिक थी। अभिजीत के न रहने पर उनका समय कैसा कटा वे ही जानती हैं। दोनों की नौकरियां और खुशहाल जिंदगी के बावजूद पैसों के जुगाड़ की स्थिति भी उनके जगते-सोते पर देखी जा सकती है। आनंद प्रकाश और अविनाश हमेशा उसके पास रहते। अविनाश की पत्नी और बच्चे भी उसके पास होते… सुमति पाटिल के अंतर्मन में कितनी साध थी कि अभिजीत और अविनाश के बच्चे हिल-मिलकर आंगन में खेल रहे हैं और आनंद प्रकाश तथा वह बच्चों को जी भरकर देख रहे हैं।… कल से उन्होंने न कुछ खाया न कोई बात की। चुपचाप रहीं।
अचानक आनंद प्रकाश और अविनाश चौंक गए, क्योंकि लगभग छह घंटे बाद सुमति ने आंखें खोलीं। अविनाश ने पानी देना चाहा। उसने हाथ के इशारे से मना कर दिया… अधखुली आंखों से उन दोनों को देखकर कहा- ‘मेरी अंतिम इच्छा है कि अब अभिजीत आ भी जाए तो उसे मेरी देह छूने मत देना…!’
संपर्क : बी-503-504 हाई ब्लिस,धायरी, पुणे-411041, मो. 9850088496
Image Credit : Sushil Nimbark


अंतिम पंक्ति ने झकझोर दिया।