
कवि और पत्रकार।सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमान’ से संबद्ध।

भारतीय बुद्धिजीवी और देश के आम लोगों के बीच कितना संबंध बचा हुआ है, यह चिंता का विषय होना चाहिए।भारतीय बुद्धिजीवी समुदाय के साथ-साथ हिंदुस्तानी बौद्धिक समाज के बारे में सोचा जाना चाहिए कि वह किस संकट से गुजर रहा है और इस समाज में नया जागरण कैसे आ सकता है।हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों की क्या दशा है, वर्तमान परिदृश्य में उनका हस्तक्षेप कितना अर्थपूर्ण है, यह विचार का एक प्रमुख बिंदु है।यह भी देखना जरूरी है कि जो बुद्धिजीवी अंग्रेजी सांसार में हैं, उनके लिए ज्ञान उनकी महत्वाकांक्षा की सीढ़ी है या इस खास बौद्धिक तबके और समाजिक परिवर्तन के बीच कोई संबंध बचा है।बुद्धिजीवी सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच कहां खड़े हैं? परिचर्चा में यहां कुछ विशिष्ट लेखकों और विद्वानों के विचार दिए जा रहे हैं।प्रो.सतीश देशपांडे के विचार अलग से आलेख के रूप में है।
सवाल
(१) भारतीय बुद्धिजीवी खुद को समाज का आम नागरिक मानने के बजाय एक विशिष्ट वर्ग के तौर पर देखे जाने का आग्रह क्यों रखता है?
(२) क्या इस देश का बौद्धिक तबका भारतीय जनता से कटा हुआ है, वजह क्या है?
(३) हिंदुस्तानी बौद्धिकता का संकट क्या है?
(४) भारतीय बुद्धिजीवियों का अपने समाज पर कितना प्रभाव रह गया है?
(५) भारतीय बौद्धिक तबक़े की समाज के बृहत्तर जन समुदाय के प्रति असंपृक्ति और अलगाव के क्या कारण हैं?
(६) भारतीय बुद्धिजीवी समाज को ज्ञान के पश्चिमी औजारों से मापने का दोषी हैक्याइसआरोपमेंकोईसचाईहै?
(७) बौद्धिक समाज को सत्ता से आक्रांत नहीं होना चाहिए।हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों से प्रलोभन और दबाववश कई बुद्धिजीवियों का रुख बदल रहा है।इसे आप किस तरह देखते हैं?
(८) बौद्धिकता के भारतीयकरण की मांग का क्या अर्थ है?
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| प्रियदर्शन सुपरिचित कहानीकार और पत्रकार।अद्यतन आलोचना पुस्तक ‘इतिहास गढ़ता समय’।एनडीटीवी इंडिया में। |
क्या भारतीय परंपरा में वह मूल्यबोध है जिसपर हम तार्किक ढंग से अपने समाज को कस सकें?
(१) इसमें संदेह नहीं कि भारत के औपनिवेशिक अतीत की वजह से भारतीय बुद्धिजीविता का विकास अंग्रेजी में हुआ है और यूरोपीय भाषाओं में चल रहे विचार-विमर्श की छाया में हुआ है, लेकिन सिर्फ हमारे बुद्धिजीवी ही नहीं, हमारा समूचा कुलीन तंत्र, हमारा पूरा सत्ता प्रतिष्ठान, हमारी पूरी प्रशासनिक मशीनरी- सब अपने आपको विशिष्ट वर्ग में रखते हैं।आम जन की भाषा अगर हिंदी है या दूसरी भारतीय भाषाएं हैं तो विशिष्ट जन की भाषा अंग्रेजी है।ज्ञान-विज्ञान, अध्ययन-मनन, विवाद-संवाद सब अंग्रेजी में होते हैं- या तो हिंदी वाले उसे अनुवाद की मार्फत पढ़ते हैं या फिर खुद कोशिश करके अंग्रेजीवाला बन जाते हैं।तो जो दूरी जनता और शासक वर्ग के बीच स्वाभाविक तौर पर बनी है, वही दूरी आमजन और बुद्धिजीवियों के बीच भी है।इसके लिए अकेले बुद्धिजीवियों को दोषी मानना सही नहीं होगा।लेकिन फिर कहने की जरूरत है कि लोगों के लिए नहीं, इस बौद्धिकता के लिए जरूरी है कि वह सबसे जुड़े- इससे उसका फैलाव भी होगा, उसे स्वीकृति भी मिलेगी।
(२) जिस तबके का समूचा बौद्धिक विकास अंग्रेजी में हुआ हो, उसके लिए दूसरी भाषाओं के लोगों से जुड़ना एक मुश्किल काम है।लेकिन दो बातें और हैं।हमारे बीच बहुत सारे ऐसे बुद्धिजीवी रहे हैं जो आम जनता के सरोकारों को लेकर बहुत प्रतिबद्ध और ईमानदार रहे हैं।उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जमीन के बाहर जाकर भी बुनियादी सवालों पर काम और विचार करने की कोशिश की है।अरुंधति राय तमाम जनांदोलनों से जुड़ी दिखाई पड़ती हैं, प्रतिरोध के तमाम मोर्चों पर पहुंचती नजर आती हैं।यही बात कई उन इतिहासकारों के बारे में कही जा सकती है जो इतिहास बदलने की सरकारी कोशिशों के खिलाफ अपने तथ्यों और अपनी पूरी ताकत के साथ डटे हुए हैं।इसी तरह कई वकील हैं जो पूरी निष्ठा से मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।ज्यां द्रेज़ तो बिलकुल आम मजदूरों की तरह जीवन जी रहे हैं।हिंदी के बहुत सारे लेखक दलितों और अल्पसंख्यकों की लड़ाई में शामिल हैं।तो सारे के सारे बुद्धिजीवी जनता से कटे हुए हैं, यह मानना मेरे लिए कुछ मुश्किल है।लेकिन एक बात और है, जो सच है।
भारत का एक बड़ा बौद्धिक तबका उन परिवारों और समाजों से आया है जो जाति और पैसे से मजबूत माने जाते रहे।इस तबके के पास न तो पिछड़ी आबादी के जीवन का अनुभव है और न ही वह संवेदनशीलता, जिससे वह अपने दायरे से बाहर जाकर इस समाज को समझने का प्रयत्न करे।उलटे यह तबका इन जमातों के प्रति बहुत दूर तक अनुदार रहा है।
(३) यहां आपके दो प्रश्न हैं जो दो अलग-अलग उत्तरों की मांग करते हैं।निश्चय ही भारतीय बौद्धिकता का एक बड़ा संकट उसका जड़ों से कटा रहना है।हालांकि इस बात का वास्ता जितना उनकी बौद्धिक सीमा से है, उससे ज्यादा विराट भारतीय समाज की जटिलता से है।भारतीय समाज में इतनी सारी जड़ें हैं, उनकी इतनी शाखाएं-प्रशाखाएं हैं कि इसे ठीक से समझने का दावा हमेशा अधूरा रह जाता है।लेकिन बौद्धिकता की चुनौती भी यही होती है कि आप अंततः उसे समझने की कोशिश करें।बहुत सारे लोगों ने यह कोशिश की है।पिछले कुछ वर्षों में ऐसा वैचारिक साहित्य काफी प्रकाशित हुआ है जो भारतीयता और भारतीय समाज को देखने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
जो दूसरी बात आप कह रहे हैं, उससे मेरी सहमति नहीं है।यह मानना मुश्किल है कि वह अकसर जनता के व्यापक हितों के खिलाफ जाता है।हम देख रहे हैं कि पिछले काफी समय से कई बुद्धिजीवी जेल में हैं।वे जनता का सवाल उठाने की वजह से ही जेल में हैं।पिछले दिनों कृषि कानूनों के खिलाफ चले आंदोलन को देखें या फिर शाहीन बाग- उन्हें कई बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला।निस्संदेह बहुत सारे लेखक और बुद्धिजीवी ऐसे भी रहे जो चुप दिखे या सरकार की तरफ दिखे, लेकिन यह हमेशा होता है।इससे यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सभी मुद्दों पर बुद्धिजीवियों ने जनता के हितों के खिलाफ काम किया।
(४) यह सच है कि भारतीय बुद्धिजीवियों का अपने समाज पर बहुत प्रभाव नहीं रह गया है।लेकिन किस समाज में उसके बुद्धिजीवियों का प्रभाव रह गया है? हम जिस उपभोक्तावादी दौर में हैं, उसमें सबसे ज्यादा प्रभाव विज्ञापनबाज बाजार का है।इस दौर में अभिनेता और खिलाड़ी और मॉडल अपने बुद्धिजीवियों से ज्यादा प्रभाव रखते हैं।सोशल मीडिया ने इस प्रभाव को नई ताकत दी है।एक-एक खिलाड़ी, अभिनेता या टीवी एंकर के लाखों फॉलोअर्स होते हैं।यह भारत का नहीं, सारी दुनिया का सच है।लोगों को अब बड़े सवालों के उत्तर नहीं चाहिए, छोटे-छोटे संकटों के हल चाहिए।
लेकिन इससे यह नहीं मानना चाहिए कि बुद्धिजीवियों की भूमिका खत्म हो चुकी है।इस भूमिका को लोकप्रियता या तात्कालिक स्वीकृति के पैमाने पर नहीं देखना चाहिए।उनका काम बड़े सवालों के जवाब खोजना है।दूरस्थ संभावनाओं का पता लगाना है।यह बहुत अदृश्य ढंग से धीरे-धीरे चलने वाला काम है जो चल भी रहा है।
(५) मैंने पहले ही ऊपर कहा है कि जिस तरह की असंपृक्ति या जैसे अलगाव की बात आप कर रहे हैं, उससे मेरी सहमति नहीं है।जो असंपृक्ति या अलगाव है, उसकी कुछ वजह अगर औपनिवेशिक अतीत में है तो कुछ इस उदारीकृत वर्तमान में भी।मैं बुद्धिजीवियों को उनकी भूमिका के लिए बरी नहीं कर रहा, लेकिन उनसे बहुत आदर्श या हवाई किस्म की अपेक्षाएं रखने का कोई मतलब नहीं है।वे कहीं बाहर से आए लोग नहीं हैं।वे इसी समाज से निकले हैं।बेशक, मौजूदा दौर में उनको जितना साहस दिखाना चाहिए, वह नहीं दिखा पा रहे हैं।हमारे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय वस्तुतः अराजकता, अनमनापन और उदासी के केंद्रों में बदलते जा रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी भी बुद्धिजीवी वर्ग को लेनी होगी।
(६) इसमें कोई शक नहीं कि हमारा आधुनिक बौद्धिक संसार पूरी तरह पश्चिमी ज्ञान मीमांसा के बीच विकसित हुआ है।वह भारतीय दर्शन परंपरा को भी इसी पश्चिम के आलोक में देखने का आदी है।लेकिन क्या भारतीय परंपरा में वह मूल्यबोध है जिसकी कसौटी पर हम अपने समाज को तार्किक ढंग से कस सकें? दुर्भाग्य से जो सामाजिक विषमता हमारे पूरे इतिहास में दिखाई पड़ती है, हमारी बौद्धिक परंपरा भी उसी से निकलती है और उसी का पोषण करती है।इस परंपरा में पाखंड का विशेष स्थान है।हम सब घनघोर जातिवादी होते हुए भी जातिवाद का विरोध करते हैं।हम बहुत सहिष्णु और उदार समाज बनते हैं, लेकिन छुआछूत को बनाए रखना चाहते हैं।हम श्रम करने से बचते हैं, बल्कि मेहनत-मजदूरी को नीची निगाह से देखते हैं।आप देखेंगे कि सिर्फ मनुस्मृति ही नहीं, कई दूसरे बुद्धिजीवियों की किताबों में इस अतार्किक गैरबराबरी का खुला समर्थन है।
संभव है यह तर्क भी आपको पश्चिम से आयातित बौद्धिकता का हिस्सा लगे।लेकिन जब आपकी समूची जीवन–प्रणाली पश्चिम से आयातित और आक्रांत हो, जब आप कपड़ों से लेकर मनोरंजन तक में उसी के आसरे हों तो सिर्फ बौद्धिकता से भारतीयता की उम्मीद क्यों?
(७) यह बात सही है कि बौद्धिक समाज को सत्ता से आक्रांत नहीं होना चाहिए।दुर्भाग्य से हमारे समय सत्ता का भय या प्रलोभन बौद्धिकता की सीमाओं का निर्धारण कर रहा है।लेकिन बुद्धिजीवी की ताकत जनता होती है।अगर जनता अपने विचारक के साथ न खड़ी हो, अगर वह गांधी को गोली मारने वाली हो, अगर वह किसी भी नवाचार को अपनी आस्था पर चोट की तरह देखने वाली हो तो फिर आम बुद्धिजीवी क्या करेगा? उसका साहस उसकी जनता का साहस होता है।हालांकि फिर यह याद दिलाऊं कि हमारे बहुत सारे बुद्धिजीवी सत्ता का विरोध करने की वजह से जेल में हैं।
(८) हिंदुस्तानी बौद्धिकता के भारतीयकरण की कामना करने वालों को पहले भारतीयता को ठीक से समझना होगा।बीते कुछ वर्षों से भारतीयता पर बहुत उद्धत किस्म का धार्मिक दावा कट्टर शक्तियां करती रही हैं।दरअसल इन दिनों भारतीयता की सबसे ज्यादा ओट लेती वही नजर आती हैं।उन्हीं की मांग है कि बौद्धिकता का भारतीयकरण हो।सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है, लेकिन व्यावहारिक रूप में इसका कोई स्पष्ट अर्थ नहीं है- या फिलहाल जो अर्थ है वह उसे कट्टरवाद की गली में ले जाने वाला अर्थ है।
ई–४, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर नौ, वसुंधरा, गाज़ियाबाद २०१०१२, मो. ९८११९०१३९८
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| रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार और समाज विज्ञानी।अद्यतन पुस्तक ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ (आत्मजीवनी)। |
क्या समाज से सरोकार रखने वाली बौद्धिकता जिंदा है?
पिछले दिनों अल्बर्ट आइंस्टीन की जीवनी पढ़ी।वैज्ञानिकों और रचनात्मक बौद्धिकों के संबंध में वे एक जगह कहते हैं कि सत्ता आधारित हठधर्मिता के हर प्रकार का विरोध किया जाना चाहिए।चिंतन, रचनात्मकता और विज्ञान को सभी प्रकार के सत्तावादी नियंत्रणों और सामाजिक पूर्वग्रह से मुक्त रखना चाहिए।स्वतंत्र चिंतन से ही विकास हो सकता है।
यह बात प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन ने लगभग ७५ साल पहले कही थी।पिछली सदी का यह वह दौर था जब हिटलर-मुसोलिनी के फासीवाद तथा नाजीवाद के सामने मानवता बेबस खड़ी थी।विख्यात वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी जर्मनी से पलायन कर रहे थे और अधिनायकवादी राजसत्ता का सामना करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर रहे थे।रूस में स्टालिन के सर्वसत्तावादी शासन का विरोध हो रहा था, बुद्धिजीवी यातना शिविर की यात्रा कर रहे थे और देश से पलायन।सारांश में, बौद्धिकता और प्रतिरोध परस्पर पर्याय थे।यह तब मुमकिन होता है जब बुद्धिजीवी के सृजनात्मक कर्मों में समाज और समय की संवेदनशीलता और चुनौतियां प्रतिबिंबित होने लगती हैं।विशुद्ध वैज्ञानिक होने के बावजूद आइंस्टीन ने युद्ध से मुक्ति पाने के लिए विश्व सरकार की अवधारणा सामने रखी, युद्ध का विरोध किया और निःशस्त्रीकरण की बात की।इतना ही नहीं, गैर बराबरी के विरुद्ध समाजवाद में आस्था दिखलाई।जहां वे स्टालिन की अधिनायकवादी राजसत्ता के विरोध में खड़े थे, वहीं साम्यवादी क्रांति के पक्ष में इसलिए खड़े दिखाई दिए, क्योंकि इससे रूस की आम जनता को ऐतिहासिक लाभ पहुंचे थे और शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति मिली थी।कहने का तात्पर्य यह है कि सक्रिय तथा संवेदनशील बौद्धिकता की पहचान यह है कि बुद्धिजीवी प्रतिगामी शक्तियों के साथ नहीं, समय-समाज की प्रगतिशील धारा के साथ कतारबद्ध खड़ा दिखाई दे।इस संकल्पबद्ध कर्म से ही इतिहास की रचना होती है।
मेरी दृष्टि में बुद्धिजीवी केवल डिग्रीधारी और ग्रंथधारी नहीं होते हैं।हर वह व्यक्ति बुद्धिजीवी है जो यथास्थितिवाद को ललकारता है और उत्पीड़क परंपराओं व दमनकारी व्यवस्थाओं के खिलाफ खड़ा होता है।राजसत्ता की ज्यादतियों का प्रतिरोध करता है।
इस दृष्टि से, मैं मध्ययुग के संतों (कबीर, रैदास, नानक, मीरा आदि) को प्रतिरोध के अग्रज बुद्धिजीवियों की कतार में शामिल करना चाहूंगा।उन्होंने अपने ढंग से यथास्थितिवाद को चुनौती दी थी।इसी ढंग से १९वीं सदी में चुनौती दी थी महात्मा फुले, सावित्री बाई फुले जैसे सामान्य श्रेणी के प्रतिरोधी बुद्धिजीवियों ने भी।
वास्तव में, भारत में पिछली दो सदियों के दौरान समाज के साथ बौद्धिक सरोकारों का उत्सव दिखाई देता है; बंगाल रहे या दक्षिण भारत या फिर हिंदी संसार, समाज के साथ जुड़ कर बुद्धिजीवियों ने अपनी रचनात्मक बौद्धिकता का सफर तय किया था।यह सच है १९वीं और २०वीं सदियों की चुनौतियां अलग थीं और उनका सामना करने के तरीके भी अलग थे।बुद्धिजीवियों ने समाजसुधार भी किए।शिक्षा का प्रचार किया, विधवा विवाह के पक्ष में और सती प्रथा, जातिवाद के विरुद्ध भी खड़े हुए।अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाया और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रोल अदा किया।समाज के साथ मन-वचन-कर्म से जुड़े बौद्धिक श्रम-कर्मियों (राजा राममोहन राय, अजीमुल्ला खां, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, नारायण गुरु, स्वामी सहजानंद सरस्वती, रामास्वामी नायक, प्रेमचंद, सज़्ज़ाद ज़हीर, गणेश शंकर विद्यार्थी, राहुल सांकृत्यायन, बाबा नागार्जुन आदि) की एक तगड़ी सेना देश भर में स्वतः तैनात दिखाई देती है।यही प्रतिबद्ध बौद्धिक श्रम इतिहास को रफ्तार देता है।आजादी के बाद भी यह सिलसिला विभिन्न रूपों में जारी रहा है।बुद्धिजीवियों की भूमिका को बिलकुल नकारात्मक नहीं कहा जा सकता।वजह है।
आजाद भारत के ‘चैलेंजेज’ और उनके ‘रेस्पोंसेज’ दोनों बदले हैं।नए प्रकार के अंतर्विरोध उभरे हैं।भारतीय समाज में सामंती और औपनिवेशिक काल की बीमारियों ने राजनीतिक पोशाक पहन कर नए अवतार में जन्म ले लिया।
ज़ाहिर है, बौद्धिक कर्मियों ने इसका सामना भी नए तर्जे बयां के साथ किया।पिछली आधी सदी में समाजविज्ञान, साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता के इलाके में बुद्धिजीवियों ने अच्छा हस्तक्षेप किया।इस संदर्भ में, एम.एन. श्रीनिवास, श्यामा चरण दुबे, ए. आर. देसाई, रजनी कोठारी, किशन पटनायक, डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा, कुमार सुरेश सिंह, इरफ़ान हबीब, शरतचंद्र, काज़ी नज़रुल इस्लाम, निराला, यशपाल, महादेवी वर्मा, महाश्वेता देवी, फणीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, रघुवीर सहाय, प्रभा खेतान, अवतार सिंह पाश, धूमिल, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, हबीब तनवीर, सफ़दर हाशमी जैसे प्रतिबद्ध बौद्धिक कर्मियों को याद किया जा सकता है।पत्रकारिता के क्षेत्र में जन, जनयुग, सामायिक वार्ता, दिनमान, धर्मयुग, रविवार, हंस, नई दुनिया, जनसत्ता, अमर उजाला, प्रभात खबर जैसी पत्र-पत्रिकाओं ने काफी हद तक सकारात्मक भूमिका निभाई थी।इन पत्रिकाओं के माध्यम से ऐसी बौद्धिक कर्मियों की पीढ़ी सामने आई जिनके चिंतन व लेखन में सामाजिक सरोकार केंद्र में रहा करते थे।ऐसा नहीं है कि इस दौर में फिसलन नहीं हुआ।हुआ जरूर।
आपातकाल में पत्रकारिता का लिजलिजापन देखने को मिला।यद्यपि कुलदीप नैयर जैसे पत्रकार जेल भी गए थे।नई दुनिया में राजेंद्र माथुर ने अपने सात संपादकियों में सात दिन तक आपातकाल को बुनियादी सवालों से घेरा था।गिरफ्तारी की नौबत पैदा हो गई थी।निखिल चक्रवर्ती ने अपनी पत्रिका ‘मैन स्ट्रीम’ में इंदिरा गांधी की आलोचना शुरू कर दी थी।लेकिन, प्रतिष्ठानी पत्रकारिता से जुड़े अधिकांश बुद्धिजीवियों ने रीढ़विहीनता का ही परिचय दिया।
मुझे याद है, १९७७ में हिंदी के कतिपय दिग्गज बुद्धिजीवियों ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के आंगन में एक सभा की थी और उसमें आपातकाल में पथविचलित भूमिका के लिए पश्चाताप किया था।
बुद्धिजीवी और बौद्धिकता समय-समाज सापेक्ष होते हैं।पिछली डेढ़-दो सदियों के सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाचक्र और आंदोलनों के नेतृत्व ने बुद्धिजीवियों को गढ़ा, तराशा और प्रतिरोधकर्मी बनाया था।
महात्मा गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर, नेहरू, राम मनोहर लोहिया, नरेंद्र देव और वामपंथी चिंतक नेताओं ने राष्ट्र की बौद्धिकता को झकझोर कर रख दिया था।वर्तमान दौर में इसका अकाल दिखाई देता है।विगत तीन दशकों से देश में भूमंडलीकरण की बयारें चल रही हैं और उपभोक्तावाद अपने उत्कर्ष पर है।
राष्ट्रीय जीवन के तकरीबन सभी क्षेत्रों में मूल्यों का भूधसान हो चुका है।निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की मंडी लगती है।विपक्ष का दमन होता है और कोई हलचल नहीं होती, सन्नाटा छाया रहता है।नागरिक अधिकारों का दमन होता है और बुलडोज़र की सियासत रंग दिखाती है।कॉर्पोरेट पूंजी के नियंत्रण में मीडिया एकरंगी बन जाता है।राष्ट्र को हांकने लगती हैं संविधानेतर ताकतें और जनता के चारों तरफ देश का शिखर नेतृत्व ‘हवाई सत्यों-असत्यों का मायाजाल’ खड़ा कर देता है।फिर भी बौद्धिक दुनिया में क्रांतिकारी हरकत नहीं होती है।पिछले दिनों, किसान आंदोलन से कितने बुद्धिजीवी जुड़े थे? नगण्य।विशाल हिंदी या हिंदुस्तानी भारत के बौद्धिक क्षेत्रों में अधिकतर बंजर ही पसरा रहा है, अपवादस्वरूप योगेंद्र यादव जैसों को छोड़ दें।वर्तमान राजसत्ता ने बुद्धिजीवियों के लिए अनेक गलियां-उपगलियां उपलब्ध करा दी हैं।प्रतिबद्ध बौद्धिकता तथा समाज को झांसा देकर वे किसी भी गली-उपगली से सुविधापूर्वक खिसक भी सकते हैं।हिंदी क्षेत्र के कई बुद्धिजीवी ऐसा ही कर भी रहे हैं।एक तरह से बड़ी महीन कारीगरी के साथ जमीन जोत ली और अनुकूल बीजों को बो दिया है।इतिहास के पुनर्लेखन का समर्थन, महात्मा गांधी व नेहरू के प्रति उदासीनता जैसी बातों से सिंचाई की जा रही है, रासायनिक खाद डाली जा रही है।जाहिर है, हाई ब्रीड फसल भी होगी।भविष्य में यह सिलसिला फिर से एक बार बुद्धिजीवियों को पश्चाताप व प्रायश्चित के लिए विवश करेगा।मुझे डर है, इस बार ऐसा न हो! क्योंकि नई फसल के बुद्धिजीवियों के सामने गैंडे की चमड़ी भी शरमा चुकी है।
जहां तक सवाल पश्चिम-प्रेरित बुद्धिजीवियों का है, इस संबंध में मेरा मत है कि साहित्येतर चिंतन साहित्य में निश्चित ही पश्चिम का प्रभाव है।इसकी वजह है।पश्चिम में दर्शन, समाजविज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, शुद्ध विज्ञान जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से काम हुआ है।इसके ऐतिहासिक कारण रहे हैं।इस दृष्टि से पूर्व-औपनिवेशिक देश पिछड़े रहे हैं।असली वजह दासता रही।विवेचनात्मक चिंतन नहीं हो सका या नहीं होने दिया।इसलिए श्वेत साम्राज्यवादी देशों पर हमारी बौद्धिक आश्रिता बनी रही और आज भी परोक्ष रूप से है।वैसे इस संबंध में मेरा मत है कि मानवीय सरोकारों से जुड़ा कर्म, चिंतन व सृजन सार्विक होते हैं, राष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रवाद की जंजीरों से मुक्त होते हैं।लेकिन, सकारात्मक राष्ट्रीय परंपराओं, आवश्यकताओं, चुनौतियों और प्रति-उत्तरों को केंद्र में रख कर अपनी मातृभाषाओं में मौलिक चिंतन अपरिहार्य रूप से होना चाहिए।और इसी का अभाव हिंदी के बुद्धिजीवियों में खटकता है।
पर साहित्य की विभिन्न विधाओं में मौलिकता रही है, पिछली दो सदियों से।कथ्य स्वदेशी है।शैलियां जरूर पराई लगती हैं।गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि’ के टेक्स्ट को पढ़ना आसान नहीं है।दुरूह शैली में है।प्रेमचंद, यशपाल, अमृतलाल नागर, रेणु, भगवती चरण वर्मा, शैलेश मटियानी, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, इस्मत चुगताई, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी आदि की कृतियों से स्वदेशी रेत की सौंध उठती है।
याद रखें, समय तथा समाज सापेक्ष चिंतन और कर्म ही वैश्विक और कालजयी बनते हैं।उत्तरसत्य-मीडिया के दौर में वे ही बुद्धिजीवी याद रखे जाएंगे जिनकी बौद्धिकता राज्य की ज्यादतियों के प्रतिरोध और जन की हिमायत में लाभ-हानि से निःस्पृह खड़ी रहेगी।
१०५, समाचार अपार्टमेंट, मयूर विहार फेज–१, दिल्ली–११००९१, मो।०९८१०५२५०१९
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| हितेंद्र पटेल सुपरिचित लेखक और इतिहासकार।रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर।अद्यतन पुस्तक : ‘आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ’। |
भारतीय बौद्धिकता का अन–उपनिवेशीकरण जरूरी है
(१) भारत में बौद्धिक वर्ग औपनिवेशिक परिवेश में निर्मित हुआ।अशोक रुद्र ने संभवतः ईपीडब्ल्यू में भारतीय बौद्धिक वर्ग के साथ एलीट के संपर्क पर एक सुंदर आलेख लिखा था।इसका संपर्क जनता से कम था और एलीट से अधिक था।
कालांतर में पहले नवजागरण और फिर राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में भारतीय बौद्धिकों में आम लोगों की चिंता का समावेश हुआ।लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि अगर आप भारत में बौद्धिकता के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि उस दौर में भी जो महत्वपूर्ण बौद्धिक थे वे औपनिवेशिक परिवेश में एक खास तरीके से यूरोपीय ज्ञान के पीछे पीछे चलने वाले लोग ही थे।यहां तक कि जो लोग पश्चिम का विरोध कर रहे थे वे भी उन्हीं के हिसाब से सोच रहे थे।वे अपने इंटीमेट एनेमी (आशीष नंदी) से ही भिड़े हुए थे, उनसे मुक्त नहीं थे।
जो लोग सजग रूप से इस यूरोपीय औपनिवेशिक ज्ञान तंत्र से मुक्ति की चेष्टा कर रहे थे (श्रीअरबिंदो, आनंद कुमारस्वामी) उनको कम महत्व मिल पाया।
(२) यह सही है कि जो लोग जनता के बीच रहे उनका महत्व जनता के बीच में बना रहा, लेकिन जिसे हम आज बौद्धिकता कहते हैं उसका इतिहास जब निर्मित हुआ तो उस क्रम में हमने उन लोगों को ही महत्व दिया जो आधुनिक तंत्र के ज्ञान के साथ चलते हुए आए थे।आप गंभीरता से देखेंगे तो इस बात पर आपका ध्यान जाएगा कि स्वामी श्रद्धानंद कोई कम महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर रहे थे, पर उनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है।
आधुनिक बौद्धिकों का जनता से कट-कट कर रहना स्वाभाविक है, क्योंकि जनता के बीच संघर्ष करना होता है और औपनिवेशिक युग के परिवेश में ऐसा कर पाना दुष्कर कार्य होता है।दूसरे तरीके से देखें तो पहले आप प्रतिष्ठित होते हैं उसके बाद ही कुछ करने की स्थिति में होते हैं।अधिकतर जो बौद्धिक थे, भले ही वे गांव या छोटे शहरों से निकल कर आए हों, उनको पहले अपने को प्रतिष्ठित करना होता था और फिर वे देश और समाज के लिए काम करने की कोशिश कर सकते थे।
यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें जनता से जो ऑर्गेनिक संपर्क रखते हुए चलने की बात थी, वह कठिन थी।दयानंद सरस्वती बड़े सिद्ध पुरुष थे, पर वे कलकत्ता में टैगोर के घर गोष्ठी में जाते थे, ताकि सहयोग मिले और वे जो चाहते थे वे कर सकें।
(३) हिंदुस्तानी बौद्धिकता का मूल संकट यह है कि तत्वतः यह हिंदुस्तानी है ही नहीं।हिंदुस्तानी बौद्धिक होने का जो अर्थ होना चाहिए, वह है भारतीय संस्कृति बोध, अतीत के संबंध में स्पष्ट धारणा और अपनी बौद्धिक परंपरा का ज्ञान।
पश्चिम के ज्ञानी लोग अपनी परंपरा से परिचित होते हैं।वे अपने ज्ञान को यूनानी दार्शनिकों- प्लेटो, अरस्तू आदि की परंपरा में रखकर चलते हैं।लेकिन हमारे देश के बौद्धिक ऐसा नहीं करते।वे आयातित ज्ञान परंपरा में अपने को रखते हैं।कुछ भारतीय चिंतकों ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें कम सफलता मिली।पूरी सफलता के लिए जरूरी है डीकोलोनाइजेशन ऑफ माइंड, जो औपनिवेशिक ज्ञान के दबाव से मुक्त हुए बिना संभव नहीं है।
(४) बौद्धिकों का प्रभाव अभी तो है, लेकिन कब तक रहेगा यह बताना मुश्किल है।बौद्धिकों से समूहों की अपेक्षा अब अलग किस्म की हो गई है।अब समूहों के अपने अपने समर्थक बौद्धिकों का महत्व बढ़ता दिखाई दे रहा है।भारतीय जनता के विभिन्न समूहों के ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल (ग्राम्शी) बहुत शक्तिशाली नहीं हुए हैं, इसलिए अभी तक बौद्धिकों का सम्मान है।लेकिन धीरे-धीरे भारतीय समाज के समुदायों के अपने ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल्स उभर रहे हैं।जैसे-जैसे ये ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल आगे बढ़ेंगे, जिनको हम भारतीय बौद्धिक कहते हैं, उनका प्रभाव कम होता जाएगा।उसके बाद ऐसे भारतीय बौद्धिकों का प्रभाव ही बचा रहेगा जिनको लोग अपने सामुदायिक हितों के साथ खड़ा पाएंगे।
(५) जैसा कि मैंने पहले ही कहा, जन समुदाय से जुड़ाव ऐतिहासिक कारणों से बौद्धिकों का कम ही रहा है।अगर मैं अपनी बात को क्वालीफाई करूं तो कह सकता हूँ कि एक दौर था जब बौद्धिकों का एक बड़ा तबका राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव में जन समुदाय से जुड़ा था, लेकिन वह राष्ट्रीय आंदोलन के समाप्त होने के बाद खत्म हो गया।उसके बाद बौद्धिक मुख्यतः विभिन्न राजनीतिक धाराओं के प्रभाव में रहने वाले ही रह गए, अन्यथा जन समुदाय के साथ अपने को पूरी तरह जोड़कर एक खुली दृष्टि के साथ रहने वाले बौद्धिकों की संख्या हमारे देश में बहुत ही कम होती चली गई।अब तो ऐसे बौद्धिक ही दिखलाई पड़ते हैं जो किसी अकादमिक संस्थान से जुड़े हैं, नौकरी पेशा हैं और अपने हिसाब और अपनी सुविधा से ही जनता की बातें करते हैं।सत्ता के साथ संतुलन बना कर चलना उनका स्वभाव है और जो शक्तिशाली हैं उनके हिसाब से ही ये लोग चल पाते हैं।
(६) भारतीय बुद्धिजीवियों पर पश्चिमी ज्ञान का दबाव है ही, इससे मुक्ति की छटपटाहट भी रही है।सत्ता तंत्र अब तक उस ज्ञान को ही प्रश्रय देता रहा था।अब सत्ता तंत्र के एक पक्ष (राजनीतिक पक्ष) का दबाव दूसरी तरह का है।सत्ता का एक बौद्धिक पक्ष है।वहां अभी भी पश्चिमी ज्ञान के पक्षधर ही अधिक प्रभावशाली हैं।एक दिलचस्प संघर्ष चल रहा है।राजनीतिक दबाव बनाने वाले पश्चिमी ज्ञान के दबाव को हटाने के प्रयास कर रहे हैं पर वे ये समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसा कैसे किया जाए।आने वाले समय में यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन सा पक्ष अधिक प्रभावशाली सिद्ध होगा।
(७) एक आइडियल सिचुएशन है और भारत में क्या पूरी दुनिया में ऐसा नहीं होता।सामान्यतः सत्ता के साथ चलना बौद्धिक सुविधाजनक पाता है।कई ऐसे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं।पश्चिमी देशों में भी वही अधिक प्रमुखता से अपनी बात को कह पाते हैं और उनकी बातों को लोग सुनते हैं जिनके संपर्क सत्ता तंत्र से होते हैं।हैबरमास के बारे में भी कहा जाता है कि उनका प्रभाव इसलिए भी अधिक था, क्योंकि सत्ता के गलियारे में उनकी पहुंच थी! उनके संबंध प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व मित्रों के साथ रहे।जब तक ये संपर्क बने रहे तब तक वे शक्तिशाली या महत्वपूर्ण बौद्धिक रहे।
हमारे भारत में भी आप पाएंगे कि नेहरू युग में जो लोग नेहरू जी के प्रभामंडल के आसपास थे उनका बड़ा महत्व रहा।उनकी बात ही ज्यादा सुनी जाती थी।फिर एक दौर आया जब इंदिरा गांधी के प्रभामंडल या उनके तंत्र के साथ जो लोग थे उनका प्रभाव बना रहा।आज की स्थिति मुझे बयान करने की जरूरत नहीं है।
हर किसी को पता है कि सत्ता तंत्र के नजदीक रहकर ही बौद्धिक सुविधाएं पा सकता है जिसकी आकांक्षा वह करता है।संघर्षशील बौद्धिक बहुत कम रह गया है।ऐसा नहीं है कि नहीं है।ऐसे बौद्धिक हमारे बीच में बहुत सारे रहे हैं, जिनसे हम प्रेरणा ग्रहण करते हैं।मैं एक या दो नाम ही लूंगा, आप उसमें कई और उदाहरण जोड़ सकते हैं।
मुझे याद आता है किशन पटनायक का उदाहरण …आज भी सच्चिदानंद सिन्हा जैसे लोग जीवित हैं।अपना काम कर रहे हैं।
कुछ अर्थों में हिंदी प्रदेश में ऐसे लोग रहे हैं जैसे रामविलास शर्मा, राहुल सांकृत्यायन।और भी बहुत सारे लोग थे, जिन लोगों ने पूरी निष्ठा से अपना काम किया और यह परवाह नहीं की कि सत्ता में कौन है और हमारे लिखे-पढ़े बड़े लोग पसंद करेंगे या नहीं करेंगे।धीरे-धीरे ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं जिनके संपर्क सत्ता तंत्र में किसी न किसी रूप में न हो।
(८) आज भारतीयता की मांग असली भारतीयता की मांग शायद नहीं है, यह एक प्रकार से विशेष इतिहास दृष्टि को समर्थन देने के लिए की जा रही चेष्टा है।मुझे के सी भट्टाचार्य का स्मरण होता है जिन्होंने सबसे पहले भारत दृष्टि पर भारतीयता की बात की थी।वह एक गंभीर बात थी।कुछ संदर्भ में निर्मल वर्मा ने भी प्रयास किया था।भारतीयता का मसला एक बौद्धिक मसला है।उसके संदर्भ में जाने पर आपको जो भारतीय संस्कृति का सवाल है उस पर विचार करना होगा।लेकिन एक राजनीतिक दृष्टि से जो संचालित भारतीयता की खोज हुई है वह प्रॉब्लमेटिक है।भारतीयता की एक खोज ‘इंडियन आडियोलॉजी’ की दृष्टि से पहले होती रही है।अब हिंदुत्ववादी दृष्टि से हो रही है।मुझे लगता है कि रवींद्रनाथ जैसे लेखक भारतीयता की बात करते हुए भारतीय संस्कृति के ‘महासागर’ रूप तक पहुंचे थे।उनका स्मरण किया जाना चाहिए।राहुल सांकृत्यायन ने भी प्रैक्टिकल तरीके से भारतीयकरण पर बात की थी।यह एक लंबा प्रसंग हो जाएगा कि उनकी भारतीयता की दृष्टि के कारण उनको हिंदू दृष्टि की तरफ झुका हुआ मान लिया गया।लेकिन मुझे लगता है कि अगर बहुत ध्यान से देखा जाए तो भारतीयता के संबंध में सबसे स्वस्थ दृष्टि मुझे राहुल सांकृत्यायन में दिखलाई पड़ती है।उनमें परंपराबोध है, आर्य, किरात, बौद्ध, भांति-भांति के हिंदू, मुसलमान सब हैं।और उनकी दृष्टि राष्ट्रीय भी है।भारतीयता के दोनों पक्षों के ठेकेदारों के लिए ऐसी दृष्टि सही नहीं है।वे अपने मन के इतिहास और अपने मन की भारतीयता के लिए लड़ रहे हैं, एक समन्वयवादी महासागर-सम भारतीयता के लिए नहीं।
प्रथम तल, आयशिकी अपार्टमेंट, बोरोपोल के निकट, बैरकपुर, ३६/७१ ओल्ड कोलकाता रोड, कोलकाता–७००१२३ मो. ९८३६४५००३३
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| जसिंता केरकेट्टा युवा आदिवासी लेखिका, स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता। |
आज बैद्धिकता रोजगार का हथियार और प्रसिद्धि का यंत्र होकर रह गया है
(१) बौद्धिक काम की सारी जिम्मेदारी दरअसल वही लोग संभाल रहे हैं जो किसी न किसी तरह से संपन्न हैं।उनका पीड़ा, दुख, संघर्ष से कोई वास्ता नहीं होता।पर वे खूबसूरती से पीड़ा, दुख, संघर्ष को अलग-अलग विधाओं में दर्ज करने का काम करते हैं।उनके पास इतनी तो संपन्नता होती है कि बैठकर जीवन से जूझते लोगों के सच को, संघर्ष को, पीड़ा को तटस्थ होकर देख सकें और दर्ज कर सकें।लिखने के क्रम में अक्सर लोगों के दिमाग में संपन्न लोग होते हैं जिनके जीवन को वे रोमांच से भरना चाहते हैं जैसा स्वयं महसूस करते हैं।चूंकि अभिजात वर्ग के पास ही शक्ति होती है, वह सत्ता के करीब होती है, उसके बदलने से समाज में बदलाव की उम्मीद रहती है इसलिए लेखन के माध्यम से उन्हें प्रभावित करने की कोशिश भी रहती है।इस क्रम में बौद्धिक तबका अभिजात वर्ग की दुनिया में घूमता रहता है और धीरे-धीरे खुद को विशिष्ट महसूस करता है।
(२) बौद्धिक तबका अक्सर हाशिए के लोगों की बात करते-करते अभिजात वर्ग की जमात में शामिल हो जाने, उनके बीच सम्मानित हो जाने, उनके द्वारा स्वीकृत हो जाने की जद्दोजहद करता दिखाई पड़ता है।इस प्रक्रिया में संघर्ष करते आम लोग सिर्फ कच्चे माल की तरह इस्तेमाल होते हैं।यही कारण है कि बौद्धिक तबका जिनके लिए लिखने का दावा करता है, उसे वही तबका नहीं पढ़ता है।
किसान पर लिखने वालों को किसान नहीं जानते, मजदूरों पर लिखने वालों को मजदूर नहीं जानते, गरीबों की बात लिखने वालों को गरीब नहीं जानते।यह विडंबना है कि जिनकी बातें चारों तरफ होती हैं, लिखी और पढ़ी जाती हैं, वे इन बातों से कोई जुड़ाव नहीं महसूस करते।यही सारी बातें हिंदुस्तानी बौद्धिक तबके को उसकी जड़, जमीन से काटती है।
(३) भारतीय बुद्धिजीवियों में साहस की कमी है।एक लेखक जो लिखता है, कहता है, उसे जी पाने का साहस उसमें जब तक नहीं आ सकता, यह संकट बना रहेगा।वह जनता के जिन व्यापक हितों की बात करता है अंततः उसका पूरा जीवन उसके ही खिलाफ चलता हुआ दिखाई पड़ता है।सुरक्षा पाने की चाहत के साथ अपनी और दूसरों की, सबकी स्वतंत्रता की बात सबकुछ एक साथ नहीं हो पाता।स्वतंत्रता के लिए हर किसी को जोखिम उठाना पड़ता है।व्यवस्था के भीतर सुरक्षित रहने के लिए आदमी जो समझौता करता है, उसमें उसकी स्वतंत्रता बची नहीं रहती।खुद सुरक्षित रहकर दूसरों की स्वतंत्रता की बात दोहराते रहने वाला बौद्धिक तबका एक दिन ढोंगी और झूठा साबित होने लगता है।वह अंत में जुगाली करता रह जाता है और स्वतंत्रता पर खतरे बढ़ते चले जाते हैं।
(४) निरंतर सिखाने की चाहत रखने वाले बौद्धिक लोगों में दूसरों से सीखने की क्षमता कम होने लगती है।यह समय है खुद को डीस्कूलिंग करने की भी।लोगों से, जमीन से, जड़ों से सीखने की।वास्तव में बौद्धिक लोगों में बौद्धिकता के प्रति बहुत लगाव तो रहता है, लेकिन समाज के प्रति गहरा प्रेम नहीं रहता।यह प्रेम नहीं होने के कारण समर्पण भी नहीं आता।बौद्धिकता जूते बनाने, लकड़ी का सामान बनाने वाले की तरह रोजगार का हथियार होकर रह गया है या प्रसिद्धि का यंत्र।यह वास्तविक पक्षधरता से नहीं पैदा हो रहा है।बौद्धिकों में खुद के भीतर ही बहुत-बहुत आत्ममंथन की जरूरत है।
(५) अकादमिक जगत के लिए लिखे गए शब्दों का बहुत महत्व है।किताबों का बहुत महत्व है पर एक समाज जो पढ़कर नहीं, बल्कि जीकर, जूझकर जीवन को जी रहा है।उनके लिए लिखी गई चीजें बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं।वह बोलने, सुनने, समझने, महसूस करने पर भरोसा करता है।पर बौद्धिक तबका तो अपने कमरे में कुछ महान रचने में व्यस्त रहता है।संवाद करने का समय उनके पास कम होता है।आम लोग संवाद चाहते हैं।यही कारण है कि बौद्धिकों का अपने ही समाज में प्रभाव कम रह जाता है।
(६) यह आरोप एक सचाई भी है।पश्चिमी ज्ञान का अपना एक ढांचा है।अपने बनाए ढांचे से बाहर की चीजों या बातों को वह ज्ञान की श्रेणी में रखता भी नहीं है।मसलन आदिवासियों के पास जो ज्ञान है, अनुभव है उसे वह किसी ज्ञान के दायरे के भीतर नहीं रखना चाहता।हां, वहां से चीजें उठाकर अपने हिसाब से उसे ढालकर दुनिया के सामने रखता है और उसे सही बताता है।शासन, वर्चस्ववादी नजरिया खुद के द्वारा स्थापित पैमाने से बाहर हर बात को हेय की दृष्टि से देखता है।हिंदुस्तानी बौद्धिक लोगों के मुंह से भी कई बार ऐसी ही बातों, दुर्भावनाओं की बास आती है।वे आसमान (पश्चिम) से बहुत प्रभावित रहते हैं और जमीन का पता नहीं।इसलिए आज हालात यह है कि ऐसे लोग बीच में टंगे हुए हैं।
(७) इस देश के भीतर कई देश हैं।मुंडारी भाषा में इसलिए लोग दिशुम की बात कहते हैं।भारत विविधता का देश है।इस विविधता की जमीन को समझे बिना, महसूस किए बिना, उनको साथ लाए बिना, सुने बिना, उनका सम्मान किए बिना इस देश में भारतीयकरण का रूप-रंग कैसा होगा? इसकी मुझे जानकारी नहीं।शायद वह ऐसा ही होगा जैसा वर्तमान में दिखाई पड़ता है।अगर भारत ठीक से भारतीय नहीं हो पा रहा है, इसके पीछे यही कारण है।हिंदुस्तानी बौद्धिकता की समस्या भी यही है।
(८) हिंदुस्तानी बौद्धिकता इस देश के भीतर बसे कई देशों और दिशुम की आवाज को सुनने, समझने, उनके संघर्ष के साथ सच में खड़े होने लगेगी तो इसकी दिशा-दशा जरूर बदल जाएगी।भारतीयकरण का अर्थ मैं यही समझती हूँ।
बौद्धिक समाज सत्ता से आक्रांत न हो यह तो ठीक है, लेकिन सत्ता बौद्धिक समाज से आक्रांत न हो, तब तो बौद्धिक समाज को फिर से मंथन करने की जरूरत है।ऐसा तो नहीं कि वह सत्ता का कवच बन रहा? जबकि होना यह चाहिए कि उसे समाज और समाज के अंतिम आदमी की आवाज होना चाहिए।वह सत्ता को सही दिशा में चलने की दिशा दिखाने वाला, उसका असली चेहरा दिखाने वाला आईना हो।
आज बौद्धिक समाज सत्ता से आक्रांत है, सत्ता बौद्धिक समाज से आक्रांत नहीं है।सत्ता कवच के रूप में बौद्धिक समाज का इस्तेमाल कर रही है।यह डरावनी बात है।बौद्धिक तबके में साहस और समझौते के बीच चुनाव करने का विवेक बचा रहे, तभी वह समाज के भीतर विवेक को बचा सकता है।
सी/ओ मनोज प्रवीण लकड़ा, म्युनिसिपल स्कूल के बग़ल में, ओल्ड एच.बी रोड,खोरहटोली, कोकर, रांची, झारखंड ८३४००१ मो. ७२५०९६०६१८
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| सुभाष शर्मा सुपरिचित पर्यावरणविद और रचनाकार।कविता संग्रह ‘हम भारत के लोग’।कहानी संग्रह ‘बेजुबान, भूख तथा अन्य कहानियां’ आदि। |
बुद्धिजीवियों के जनता से अलगाव के कई कारण हैं
आधुनिक बुद्धिजीवी, भारतीय हो या यूरोपीय-अमरीकी, कमोवेश सदा और सर्वत्र अपने को विशिष्ट मानता रहा है।पहले के कम्युनिस्ट नेताओं से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों तक के विचारों और कर्मों में फांक नहीं थी।वे जो सोचते और बोलते थे, वही करते थे- मनसा, वाचा, कर्मणा दुविधा नहीं थी।आजादी की लड़ाई में शामिल तमाम नेतागण अधिकाधिक त्याग करते थे।वे ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई/पर पीड़ा सम नहिं अधमाई’ के पथ पर अग्रसर होते थे।अब ऐसा नहीं है।
अंतोनिओ ग्राम्शी ने अपनी ‘प्रिजन नोटबुक’ में लिखा है कि हर मनुष्य बुद्धिजीवी होता है, मगर हर व्यक्ति दैनिक जीवन में बुद्धिजीवी का काम नहीं करता है।कहने का आशय यह है कि आनुवंशिकी के आधार पर बुद्धिजीवी की कोई खास प्रजाति नहीं होती।एक गांव का किसान-मज़दूर भी एक मायने में बुद्धिजीवी है, क्योंकि उसे ज्ञात है कि किसी खेत में जुताई से लेकर बुआई तक मिट्टी में कितनी नमी जरूरी है, कितनी बार जुताई किस फसल के लिए की जानी है (चना की फसल के लिए कम, गेहूं की फसल के लिए ज्यादा), कब और कितनी बार सिंचाई की जानी है, किस फसल के बीज को कैसे हिगराना और संरक्षित करना है, बीज की कौन प्रजाति कितने माह में तैयार होगी, कब निकाई-गुड़ाई करनी है, कब खाद डालनी है, कब फसल काटनी है, कब और कैसे मड़ाई और ओसाई करनी है, वगैरह-वगैरह।ये सारी जानकारी शहरी मध्य वर्ग का प्रोफेसर, इंजीनियर, चिकित्सक, वकील आदि नहीं बता सकता।मगर अफसोस कि इस स्थानीय देशज ज्ञान पद्धति का अत्यंत अवमूल्यन हो गया है, जैसे डॉलर के बरक्स रुपये का अवमूल्यन प्रतिदिन हो रहा है।इसका कारण शारीरिक और मानसिक श्रम में दो ध्रुवीय अलगाव है।
यह अलगाव औद्योगीकरण की प्रक्रिया के साथ तेजी से शुरू हुआ।दूसरी ओर, महात्मा गांधी ‘श्रम की गरिमा’ पर जोर देते थे।वे शारीरिक तथा मानसिक श्रम में फांक नहीं करके दोनों को बराबर महत्व देते थे।यूरोप-अमरीका में स्थिति बदल रही है, वहां अब शारीरिक श्रम वाले कामों की मजदूरी बढ़ी है।
मगर हिंदुस्तान में ‘थोथा चना बाजे घना’ का रिवाज चल रहा है।भारतीय बुद्धिजीवी न जमीन से जुड़ा है और न उत्पादन कार्य से।वह आरामपसंद, बतकहीपसंद, ख़ुशामदपसंद हो गया है।वह एक तीर से कई निशाने साधता है, ताकि ‘हर्रे लगे न फिटकरी, माल चोखा हो’ की कहावत चरितार्थ हो।
भारतीय बुद्धिजीवी सत्तालोलुप है।वह येन-केन-प्रकारेण मलाई वाला पद हासिल करने के चक्कर में ज्यादा रहता है।उसकी गोटी अतिरिक्त आय के सरल साधन जुटाने में फिट होती रहती है।मजेदार यह है कि जो बुद्धिजीवी किसी सत्ताधारी दल को पानी पी-पीकर कोसता था, वही कोई ‘टुकड़ा’ मिल जाने पर प्रशंसा में तल्लीन हो जाता है।उसे आम जनता से कुछ लेना-देना नहीं है, जनता जाए भाड़ में- ‘आप सुखी, संसार सुखी, आप दुखी संसार दुखी’! मगर सिक्के का दूसरा पहलू भी है।यदि कोई बुद्धिजीवी आम जनता के बीच लेखन, भाषण, चर्चा-परिचर्चा आदि के जरिए मित्रवत शत्रुओं से सावधान रहने और पहचान कर, ठोंक बजाकर विवेक से मतदान करने की अपील करता है, तो भी जनता नहीं सुनती-मानती, क्योंकि उसे जाति तथा पंथ की अफीम ज्यादा सुकून देती है और वह मंदिर-मस्जिद के गड़े मुर्दों को उखाड़ने वालों का जी भरकर साथ देती है।
कहा जाता है, ‘जनता को वही सरकार मिलती है जिसके लायक वह होती है।’ महिलाएं इस मायने में उनसे कई कदम आगे हैं, क्योंकि पंथ और रीति-रिवाज मानने में वे प्राय: माहिर हैं।सत्ता लोगों को आकर्षक नारों का झुनझुना पकड़ा देती है, कुछ वादों में भुला देती है, कुछ नए प्रलोभन दे देती है और कुछ के जरिए उन्हें आपस में लड़ा देती है।मगर बुद्धिजीवी आम जनता का सचेतनीकरण नहीं करते।यदि थोड़ा-बहुत सचेतनीकरण करते हैं, तो उसको तत्काल वसूलना भी चाहते हैं, जबकि सामूहिक सचेतनीकरण की प्रक्रिया सतत, दीर्घकालिक और श्रमसाध्य है।
भारतीय बुद्धिजीवी आम जनता से निरंतर, व्यापक संपर्क और संवाद कायम नहीं करता, बल्कि सतही तरीके से ऊपर-ऊपर निकल जाता है।इसका कारण यह है कि जिस तरह जनप्रतिनिधियों के हित जनता के हितों से अलग हो जाने के कारण वे जनता का सामना नहीं कर सकते, वैसे ही बुद्धिजीवी आराम फरमाने के कारण जनता के सच का सामना नहीं कर सकते।उनका दोहरा चरित्र है।वे दहेज न लेने की बात करते हैं, मगर अपने बेटों-भतीजों, नाती-पोतों के शादी-ब्याह में ढेर सारा दहेज लेते हैं, स्वागत, इज्जत और सत्कार के नाम पर।बुद्धिजीवियों के जनता से अलगाव के कई कारण हैं :
भारत के बुद्धिजीवी स्वतंत्रता संग्राम में प्राय: कई भाषाएं जानते-समझते थे, मगर अब उनका भाषा-ज्ञान अपेक्षाकृत कम हो गया है।भाषा, विशेषकर हिंदी दक्षिण प्रदेशों में राजनीति का शिकार ज्यादा है, मगर बुद्धिजीवी चुप हैं।
दूसरे, अकसर बुद्धिजीवी पहले ज्ञान-उत्पादन सिद्धांत और व्यवहार के दोनों पलड़ों में संतुलन बनाकर रखते थे- उपदेश के बजाए स्वयं करके दिखाने में विश्वास रखते थे।वे सादा जीवन उच्च विचार पर चलते थे।मगर अब रंग-बिरंगा जीवन, नीच विचार ज्यादा देखने को मिलता है।कुछ तो विचारहीनता के शिकार हो गए हैं।अफसोस है कि दलितों-पिछड़ों के बीच से जो नए ‘आवयविक’ बुद्धिजीवी उभरकर सामने आए, उनकी भी कथनी और करनी में काफी अंतर है।कई दलित लेखक अपनी रचनाओं में सवर्णों के विरुद्ध आग उगलते हैं तथा लंबी-चौड़ी बातें करते हैं, मगर अपने निजी घर-परिवार में महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं।कौशल्या वैश्यंत्री ने ‘दोहरा अभिशाप’ की बात सही कही है।दलित नए सवालों की व्याख्या नहीं कर रहे हैं, दुनिया बदलने की बात तो दूर की कौड़ी है।
तीसरे, बुद्धिजीवियों में संवेदना, प्रतिबद्धता और सामाजिकता का भाव कम हो गया है, क्योंकि वे अपने दड़बे में सिमट गए हैं– ‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’ जैसा अन्यमनस्क भाव उनके भीतर घर कर गया है।हालांकि रामचंद्र गुहा, पार्थ चटर्जी, दीपंकर गुप्ता, अशोक बाजपेयी, रोमिला थापर, इरफान हबीब, शमसुल इस्लाम, हरबंश मुखिया, प्रभात पटनायक, चमन लाल, पुरुषोत्तम अग्रवाल, के. एल. शर्मा, मुचकुंद दुबे, मनोरंजन मोहंती, पवन कुमार वर्मा आदि अपवादस्वरूप सक्रिय हैं।
चौथे, अधिकांश बुद्धिजीवी व्यवस्था की मार से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से त्रस्त हैं, क्योंकि उन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहकर अपमानित किया जाता है अथवा दूसरों की दुर्दशा देखकर, या दबाव में भयभीत होकर वे फेंस के इधर से उधर हो गए हैं, यानी उन्होंने पाला बदल लिया है।
अंतिम बात यह है कि उदारीकरण, निजीकरण, और भूमंडलीकरण की प्रक्रियाओं के प्रभाव के कारण तमाम बुद्धिजीवियों ने प्रगतिशील विचारों और सपनों को एकमुश्त या किश्तों में छोड़ दिया है।जैसा कि बाइबिल में कहा गया है, ईश्वर उन्हें माफ कर दे, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं!
अकसर कहा जाता है कि अधिकतर भारतीय बुद्धिजीवी भारतीय समाज को ज्ञान के पश्चिमी औजारों से नापने और आंकने के दोषी हैं।यह अधूरा सच है।माना कि पाश्चात्य आधुनिक ज्ञान पद्धति का उपयोग कई क्षेत्रों, विशेषकर प्राकृतिक विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि के क्षेत्र में किया जाता है, मगर उन्हीं ज्ञान-पद्धतियों और मशीनों का उपयोग यहां भी किया जाता है जो विभिन्न कालखंडों और स्थानों पर प्रयोगों में सही सिद्ध हुए हैं।न्यूटन, आर्किमिडीज, आइंस्टीन, ग्राहम बेल, थामस एडिशन जैसे प्रमुख वैज्ञानिकों के सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से सच साबित होते हैं भारत में, ब्रिटेन में, अमरीका में और अफ्रीका में भी।ऐसी ज्ञान-पद्धतियों और औजारों का उपयोग बुरा नहीं है।मगर आयुर्वेद, योग, होम्योपैथी, सिद्ध जैसी चिकित्सा पद्धतियों ने भी समय-समय पर (हाल के कोविड-१९ के दौरान) अपने अनुभवसिद्ध एवं समयसिद्ध ज्ञान से मानवता की यथासंभव सेवा की है।इसको तमाम पश्चिमी बुद्धिजीवी और भारतीय बौद्धिकगण मान्यता नहीं देते।अतः जरूरत एक दूसरे को विवेक के आधार पर परखकर परस्पर पूरक बनकर मानवता के कल्याण के लिए सहायता करने की है।
भारत, चीन, सुमेर, लातीनी अमरीका और अफ्रीका की सभ्यताओं ने कृषि, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा, नगर योजना एवं विकास आदि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, मगर पाश्चात्य औपनिवेशीकरण और गोरों की नस्लवादी सोच (‘व्हाइटमैन्स बर्डेन’ की नीति के तहत) ने दक्षिण के देशों के ज्ञान को हीनतर और अप्रभावकारी बना दिया।इसमें लार्ड मैकाले जैसे संकीर्ण शासकों/प्रशासकों की चाल कामयाब हुई, जो मानते थे कि भारत और अरब के सभी पुस्तकालयों का संपूर्ण ज्ञान यूरोप के किसी विद्यालय के एक पुस्तकालय की एक अलमारी के ज्ञान से कमतर है।दूसरी ओर, भारत के कुछ लोग, ख़ासकर कई राजनेतागण, यह मानते हैं कि प्राचीन भारत ‘सोने की चिड़िया’ था, यहां दूध की नदियां बहती थीं और यहां परमाणु, विमान तथा शल्य चिकित्सा (सर्जरी) अत्यंत उन्नत थी।वास्तव में, साक्ष्य के आधार पर विवेकशील व्यक्ति को नीर-क्षीर विवेक करना चाहिए, न कि अतिशयोक्तिपूर्ण कथन द्वारा, जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य न हो।
बुद्धिजीवियों का एक बड़ा भाग मीडिया से संबद्ध है, जिसे लोकतंत्र का ‘चौथा खंभा’ कहा जाता है।मगर प्रलोभन और सत्ता की मलाई खाने के चक्कर में तमाम पत्रकार अपना उत्तरदायित्व भूल गए हैं।यदि कोई ऊपर से जरा भी संकेत करता है झुकने के लिए, तो वे रेंगने लगते हैं।
आज तमाम पत्रकारों के अन्य कारोबार या गैऱ-सरकारी संगठन फूल-फल रहे हैं।वे सत्ता की सोहबत में मगन हैं।दरबारी संस्कृति-‘जी हुज़ूरी’-अपने चरम पर है, जिसके कारण वे अपना विवेक सत्ता की ख़ामियों को उज़ागर करने और उनका विकल्प सुझाने में कतई नहीं करते।
अब ‘पेड न्यूज’ का ज़माना है-सही कहते हैं कि पहले अख़बार छपकर बिकते थे, आजकल बिककर छपते हैं।मगर नीति और नीयत गड्डमड्ड होने से, राजनीतिक नेतृत्व के नजदीक आलोचक नहीं होने से, तमाम कुपरिणाम सामने आ रहे हैं।इक्के-दुक्के पत्रकार, अख़बार या चैनल सच का आईना दिखाते हैं, तो शोषक व्यक्ति, समूह, दल तिलमिलाने लगते हैं।वे आक्रामक तरीक़े से उन्हें बिना तर्कों और साक्ष्यों के काटने की असफल कोशिश करते हैं।
अंत में मैं यह ज़ोर देकर कहना चाहूंगा कि यह विडंबना है कि भारतीय मार्क्सवादियों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सच्ची नीयत, नीति, विचार एवं कर्मयोग को ठीक से नहीं समझा-या तो उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर नजरअंदाज किया अथवा उनके विचारों (‘हिंद स्वराज’ में प्रमुखता से वर्णित) की गलत व्याख्या की।दूसरी ओर, तमाम गांधीवादियों ने मार्क्स के महत्वपूर्ण विचारों से दूरी बनाए रखी और विदेशी विचारधारा के नाम पर अथवा एक वर्ग मात्र का पक्षधर होने का आरोप लगाकर उन्हें प्रथम द़ृष्टया ही खारिज करने की हरसंभव कोशिश की।मार्क्सवाद में तमाम खूबियां हैं, मगर खामियां भी हैं।इसी प्रकार गांधीवाद में कई खूबियां हैं और कमियां भी हैं।अतः भारतीय समाज के संदर्भ में दोनों के गुणों को एक साथ पूरक बनाने से बात बन सकती है।इस दिशा में भारतीय बुद्धिजीवियों को सोचना-विचारना चाहिए।दोनों के बीच परस्पर संवाद से नई दिशा मिल सकेगी, अन्यथा कट्टर ताकतें अंधविश्वासों को स्थापित करेंगी तथा विभिन्न समुदायों/संप्रदायों में अविश्वास और विसंगतियां पैदा करती रहेंगी, जो देश के भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।बुद्धिजीवियों की सोच अग्रगामी, समतामूलक और समावेशी होनी आवश्यक है।
१४, अल्पाइन सहकारी आवास समिति, सेक्टर पी–२ ओमेगा–१ ग्रेटर नोयडाउत्तर प्रदेश–२०१३१५
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| विनीत कुमार मीडिया विश्लेषक और लेखक।पुस्तक ‘मंडी में मीडिया’ प्रकाशित। |
ज्ञान की दुनिया में भारतीय और पाश्चात्य का विभाजन तंग नजरिये का सूचक है
(१) मौजूदा दौर में भारत सहित दुनिया भर के दूसरे देशों में बौद्धिकता और बौद्धिक वर्ग को बहुमत द्वारा एक खास तरह से नकार दिए जाने और उसकी शह पाकर कारोबारी मीडिया की ओर से नागरिक समाज में उनके प्रति शत्रुता का भाव पैदा करने का अभियान चलाया जा रहा है, ऐसे में यह सवाल कि बौद्धिक तबका खुद को समाज का आम नागरिक मानने के बजाय विशिष्ट वर्ग के तौर पर देखे जाने का आग्रह क्यों करता है, दरअसल इस अभियान के औचित्य को जायज ठहराने जैसा है।सवाल यह भी बनता है कि आखिर पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हो गया कि आम नागरिकों ने बौद्धिक समाज को न केवल अपने से अलग, बल्कि अपने और नागरिक समाज के हितों के लिए हानिकारक मानने लगा है।मामले में आम नागरिक जोड़कर पूरे सवाल में एक खास किस्म की मासूमियत तो पैदा की जा सकती है, लेकिन जिस आम नागरिक को बुद्धिजीवियों के खिलाफ खड़ा कर दिए जाने का दुश्चक्र रचा जा रहा हो, उसमें यह सवाल कहीं जरूरी है कि एक सामान्य नागरिक के बौद्धिक होने की प्रक्रिया क्या होती है।उस प्रक्रिया के भीतर दिए जानेवाले समय, श्रम और संघर्ष के प्रति नागरिक समाज के भीतर किस तरह से सम्मान भाव पैदा हो रहा है, या फिर इस भाव को सायास नष्ट करने का काम हो रहा है? बौद्धिकता कोई पुश्तैनी या जन्मना स्थिति नहीं है, बल्कि नागरिक इसे अपने श्रम और लगातार कोशिशों के बाद अर्जित कर पाता है।ऐसे में यह किसी भी दूसरी लोकतांत्रिक परियोजना की तरह एक खुली प्रक्रिया है जिस पर एक विशिष्ट वर्ग का लेबल चस्पां कर इस पूरी प्रक्रिया को कमतर करके देखना है।वैसे लोकतंत्र को जिस तेजी से भीड़तंत्र और नागरिकों को नागरिकता के खिलाफ तैयार करने की कोशिशें तेज हुई हैं, उस हिसाब से देखा जाए तो भीड़ से अपने को अलग करते हुए विशिष्ट वर्ग का मानने में एक हद तक कोई बुराई नहीं है।हमारी कामना है कि यह विशिष्ट वर्ग आगे चलकर सामान्य वर्ग में तब्दील हो जाए।
(२) मैं इस बात को दोहराना चाहूंगा कि भारत का बौद्धिक तबका व्यापक भारतीय जनता से जितना कटा हुआ है, उससे कई गुणा और बुरी तरह जनता से न केवल काटने, बल्कि उनके खिलाफ माहौल तैयार करने की कवायदें चल रही हैं।यहां तक तो ठीक है कि बौद्धिक वर्ग अपनी अभिरुचि, जीवनशैली, विचार तथा अभिव्यक्ति के स्तर पर आम नागरिकों से अलग होने की लगातार कोशिशें करता है।
यह उच्च संस्कृति और निम्न या पॉपुलर संस्कृति के बीच की रस्साकशी का मामला हो सकता है, लेकिन यह कहना कि वह स्वाभाविक ढंग से आम नागरिकों से खुद को काटकर रखता है या कटा हुआ है, यह दरअसल बहुमत की सत्ता की ओर से चल रही कवायदों की गति को बढ़ाने जैसा है।
आम नागरिकों के सवाल को चंद वस्तुओं और सुविधाओं के बीच इस कदर सीमित करने का काम चल रहा है कि इसके अलावा बौद्धिक वर्ग की ओर से की गई बातें गैरजरूरी और अब तो लोकतंत्र के खिलाफ बताई जाने लगी हैं।ऐसे में यदि बौद्धिक वर्ग पहले से आम नागरिकों से यदि कटा रहा है और अब यदि कटता चला जा रहा है तो साथ ही साथ इस सिरे से भी बात हो कि इसके बीच कौन सी वे शक्तियां हैं जो नागरिकों को उनके ख़िलाफ खड़ा कर रही हैं और बौद्धिक वर्ग के न चाहने के बावज़ूद यह खाई और गहराती चली जा रही है।
(३) हिंदुस्तानी बौद्धिकता का मूल संकट विचारना या उठाए गए मुद्दे के स्तर पर नहीं है।उसका मूल संकट आम नागरिकों की भाषा और मुहावरे के प्रति सुस्त या लापरवाह रवैया है।दूसरी तरफ, सत्ता जिन पीआर एजेंसियों और आईटी सेल की ताकतों से नागरिकों को चौबीस घंटे मतदाता के हिसाब से देखकर विज्ञापन की भाषा में अपनी बात प्रसारित कर पाने में सफल नजर आती है, उसके आगे बौद्धिक वर्ग बेहद कमजोर जान पड़ता है।उसके पास तेजी से ऐसे माध्यम छूटते चले जा रहे हैं जिनसे व्यापक स्तर पर अपनी बात आम नागरिकों तक पहुंचा सके।ऐसे में यह कहना कि वह अकसरहां जनता के व्यापक हितों के खिलाफ चला जाता है, उसकी वस्तुस्थिति पर चिंता करने के बजाय थोड़ी शालीन भाषा में ही सही, लेकिन वैसा ही आरोप लगाने जैसा है जो आए दिन कारोबारी मीडिया और राजनीतिक दलों की आईटी सेल किया करती हैं।
आम नागरिक के व्यापक हित नागरिकता के सवाल से अलग नहीं हो सकते।शुद्ध हवा, पानी, भोजन, जीने के अवसर और संसाधन की उपलब्धता में अधिक से अधिक समानता जैसे मुद्दे इस नागरिकता के सवाल से अलग नहीं हैं।एक नागरिक के लिए नागरिकता के बरकरार रहने से व्यापक सवाल और क्या हो सकता है? बौद्धिक वर्ग यदि नागरिकता के इस सवाल से हटकर, जिसमें बराबरी और जीने के समान अवसर जैसे मुद्दे भी शामिल हैं, कुछ और बात करता हो तब जाकर ऐसा कहा जा सकता है कि वह नागरिकों के व्यापक हितों को नजरअंदाज कर रहा है या फिर उसके खिलाफ जा रहा है।लेकिन व्यापकता का अर्थ यदि महज नागरिकों की संख्या से लगा लिया जाए, तब तो यह अलग ही किस्म की जल्दीबाजी होगी।
(४) यह सही है कि भारतीय समाज में बुद्धिजीवी वर्ग का प्रभाव तेजी से घटता चला जा रहा है।ऐसा किए जाने के पीछे बहुमत की सत्ता की ओर से भरपूर संसाधन और ताकत झोंकी जा रही है।स्थिति यह है कि असहमति को शंका और शंका को शत्रु और शत्रु को निर्मूल करने का ऐसा माहौल बनना शुरू हुआ है कि बुद्धिजीवियों को समाज का एक गैर-जरूरी तबका बताए जाने में सुविधा हो।मेरे लिए इस घटते प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त किया जाना ज्यादा जरूरी मसला है, बजाय इसके कि इसके लिए सीधे-सीधे स्वयं बुद्धिजीवी वर्ग को जिम्मेदार मान लिया जाना।
ऐसा नहीं है कि आज भारतीय समाज के बीच बुद्धिजीवी वर्ग की जो स्थिति हुई है उसके लिए वह स्वयं एक हद तक जिम्मेदार नहीं है।प्रतिभा, परिश्रम और संघर्ष करके यदि कोई सामान्य नागरिक बौद्धिक वर्ग में शामिल होता है तो बजाय इसके कि वह श्रेष्ठता-भाव से तन जाए, वापस झुककर उसे अपने नागरिक समाज में घुल जाना चाहिए, जिस समाज के बीच से वह आया है।लेकिन उसके भीतर का श्रेष्ठता-भाव यदि बाकी लोगों के मन में कमतर होने का भाव पैदा करता हो तो उसे लगातार अपने ऊपर काम करते रहना चाहिए।यह सब उसके प्रयास और मनन-मंथन का हिस्सा हो, लेकिन महज इस कारण से उसका प्रभाव कम हो जा रहा है, ऐसा नहीं है।इसके पीछे पूरी ताकत झोंक दी जा रही है।
एक तरफ जहां अपनी सुविधा और हित के लिए नए प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं, उन्हें ज्यादा ताकतवर प्रतीकों में बदलने का काम हो रहा है तो दूसरी तरफ बौद्धिक, तार्किक और बराबरी की पक्षधरता के प्रति हिकारत भाव पैदा करने की कोशिशें निर्ममता के साथ तेज हुई हैं।ऐसा करने के क्रम में इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि बौद्धिक होना लगातार अभ्यास, श्रम और ज्ञान के प्रति निष्ठा भाव रखने का मामला है।
यह सब बरत पाना आसान काम नहीं है।दरअसल जिस सपाट ढंग से ज्ञान, तर्क और मानवीय मूल्यों को दरकिनार करके तात्कालिक ढंग से हितों को साधने के फॉर्मूले उछाले जा रहे हैं, ऐसे में बौद्धिक वर्ग का प्रभाव कम होते चले जाना स्वाभाविक है।हम जब ऐसा सवाल रखते हैं कि क्यों प्रभाव कम हो रहा है तो इसमें यह सवाल भी शामिल करना चाहिए कि क्या ज्ञान, तर्क और समन्वय के विवेक का प्रसार तेजी से हो रहा है और क्या इन सबके बीच बौद्धिक वर्ग का समाज में प्रभाव तेजी से घट रहा है?
(५) हिंदुस्तानी बौद्धिक तबके की समाज के बृहत्तर जन समुदाय के प्रति असंपृक्ति और अलगाव का मूल कारण है कि नागरिक समाज की बाकी एजेंसियां, जिनमें बहुमत की सत्ता, कारोबारी मीडिया और तात्कालिक लाभ के लिए विकसित किए गए विविध तंत्र हैं, वे तेजी से अपने पक्ष में पॉपुलिस्ट नैरेटिव तैयार करने में सक्षम है।उनके मुकाबले बौद्धिक समाज बेहद सुस्त है।वह न उनकी तरह आक्रामक है और न ही चौबीस घंटे उनकी तरह उपलब्धता है।
पॉपुलिस्ट नैरेटिव जिस तरह ३६० फॉर्मेट में, यानी अभिव्यक्ति के जितने रूप हो सकते हैं, उन सभी में मौजूद रहते हैं, बौद्धिक वर्ग उस तरह अपने विचार, तर्क और परिकल्पना के साथ नागरिक समाज के बीच उपलब्ध नहीं रहता।नागरिक समाज का झुकाव जिस तेजी से दूसरी गतिविधियों की तरफ बढ़ा है और वह अपनी बुनियादी जरूरतों के विकल्प तलाशने में जुटा है, भारतीय बौद्धिक वर्ग उन्हें ठीक-ठीक समझ पाने में चूक जा रहा है।एक तो उसके समझने के औजार भोथरे हो चले हैं और दूसरा कि एक हद तक उसकी अपनी हठधर्मिता भी हुआ करती है कि वह जिस अंदाज में बदलाव चाहता है, वह सबसे बेहतर तरीका है।आप कह सकते हैं कि इस मोर्चे पर बौद्धिक वर्ग को अपने ऊपर बहुत मेहनत करने की जरूरत है।
(६) पहली बात तो यह कि यदि हिंदुस्तान का बौद्धिक तबका अपने समाज को ज्ञान के पश्चिमी औजारों से नापता आया है तो विशुद्ध भारतीय या प्राच्य औजारों को विकसित करने के लिए किसने किसको रोक रखा है? या अध्ययन-अनुशासन के जिन क्षेत्रों में ये औजार पहले से मौजूद हैं, उन्हें कौन पूरी तरह नजरअंदाज करके ज्ञान-पताका लहरा सकता है? मसलन यदि किसी को शास्त्रीय संगीत पर बात करनी है, क्या वह भारत की बृहत संगीत परंपरा को नजरअंदाज करके बात कर सकता है? जिन्हें साहित्यिक सिद्धांतों पर बात करनी है, क्या वे संस्कृत काव्यशास्त्र की सैद्धांतिकी का अध्ययन किए बिना आगे बढ़ सकते हैं? ज्ञान के ऐसे और भी क्षेत्र हो सकते हैं, लेकिन अब भारतीय और पाश्चात्य का विभाजन करते हुए यदि नगाड़े पीटने का काम और शुद्धता की तलाश होने लग जाए तब तो सवाल यह भी उठेगे कि क्या ज्ञान का संबंध आर्थिक क्षमता, तकनीकी दक्षता एवं संसाधनों की उपलब्धता और इसी तरह उसकी व्यापकता से नहीं है?
मिसाल के तौर पर चिकित्सा की भारतीय सहित कई दूसरी पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन किस मद में कितने संसाधन और आर्थिक स्तर पर निवेश किए जाते हैं, क्या यह कम जरूरी सवाल है? जनसंचार, प्रबंधन, सूचना तकनीक आदि ऐसे दर्जनों अध्ययन क्षेत्र हैं जिनमें भारतीय ज्ञान के कदम बहुत पीछे हैं।उपभोक्ता के तौर पर वह भले ही कदमताल करता जान पड़ता हो, किंतु शोध और अध्ययन के सिरे से देखा जाए तो बहुत पीछे है।ऐसे में जिन्हें इन विषयों का अध्ययन करना है, उनकी प्राथमिकता क्या होगी? किसी भी भारतीय के लिए ज्ञान के आगे भारतीय जोड़कर बात करना एक सुखद स्थिति हो सकती है, किंतु अध्ययन पद्धति के स्तर पर विभाजन किए जाने के बावज़ूद व्यावहारिक तौर पर ज्ञान के कई क्षेत्रों में क्या यह संभव है? आखिर उपभोक्ता के स्तर का अध्ययन ही तो किसी अनुशासन का व्यापक अध्ययन नहीं है।
पाश्चात्य के औजार से यदि ज्ञान को देखा-समझा जाता रहा है तो इसे सीधे-सीधे दोष करार देना दरअसल ज्ञान परंपरा को बहुत तंग नजरिए से देखने जैसा है।
ऐसा नहीं होता कि कोई पाश्चात्य अध्ययन पद्धति से अध्ययन करते हुए अपने परिवेश, परिस्थितियों और संदर्भों के अनुरूप उनका निर्धारण नहीं करता या कर सकता है।ज्ञान और अनुशासन की दुनिया कल–पुर्जे की तरह तो नहीं होती कि जहां से जिस रूप में लाया, वैचारिकी के साथ फिट कर दिया।यह एक तरह की मशीनी समझ है जिसपर ठहरकर और गहरे जाकर सोचने की जरूरत है।
(७) निस्संदेह बौद्धिक समाज को सत्ता से आक्रांत नहीं होना चाहिए, बल्कि बहुमत की सत्ता को लगातार इस बात का एहसास कराते रहना चाहिए कि एक जिंदा लोकतंत्र हमेशा ज्ञान और विवेक से संचालित होता है और जरूरी नहीं कि यह सत्ता से संचालित हो।बावजूद इसके किसी तरह के पद या प्रलोभन में आकर बुद्धिजीवी अपना रुख बदलते हैं और राजनीतिक दलों की तरह विमर्श की दुनिया में उछल-कूद, उठापटक का माहौल पैदा करते हैं तो यह अफसोसनाक है।कोई बौद्धिक लंबे समय तक अपने अध्ययन और प्रयोग से अपने पूर्ववर्ती काम और विचार के प्रति असहमति व्यक्त करते हुए खुद को दूसरी दिशा में ले जाता है तब तो वह स्वाभाविक और स्वागत योग्य है।एक सतत चिंतनशील व्यक्ति के लिए यह स्वाभाविक माना जाएगा।लेकिन यदि यह किसी प्रलोभन या दबाव के कारण होता है तो यह न केवल उनके काम में बेईमानी के घुस आने के, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर एक अराजक स्थिति में उसके होने का संकेत है।बौद्धिक वर्ग को सत्ता के दबाव और प्रलोभन से खुद को बचाए रखने का कौशल विकसित करना चाहिए और दिमागी तौर पर खुद को तैयार करना चाहिए कि जिन सुविधाओं के पीछे वह अपनी प्रतिबद्धता और असहमति के साहस को छोड़ने जा रहा है, वह सुविधाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा मूल्यवान है।ऐसा इसलिए कि इस प्रतिबद्धता और साहस के निर्माण में उसके जीवन के कई साल और श्रम शामिल होते हैं।किसी बुद्धिजीवी के लिए यदि भौतिक सुविधाएं और पद ज्यादा जरूरी लगते हैं तो उसे अपना पेशा बदल लेना चाहिए, क्योंकि ज्ञान की दुनिया में सिर्फ और सिर्फ ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता होती है और उसी के प्रति जवाबदेही भी।
(८) हिंदुस्तानी बौद्धिकता के भारतीयकरण की मांग करने के क्रम में भौगोलिक सीमा-रेखा और उसके भीतर पैदा होनेवाली भावनात्मक आकांक्षा के प्रति रूढ़ हो जाने से पहले बौद्धिकता के मानवीय पक्ष के प्रति गंभीरता से सोचा जाना चाहिए।एक निर्धारित मानचित्र से किसी राज्य की शासन व्यवस्था चलती है और वह जरूरी भी है, लेकिन ज्ञान और विमर्श की दुनिया मानवीय धरातल पर इसे लांघकर सोचती है और वह जरूरी भी होता है।ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि यह मांग स्वयं बौद्धिक समाज के अध्ययन और प्रयोग के बीच की जरूरतों के बीच से निकलकर आए, न कि वह बहुमत की सत्ता के झुनझुने के बीच एक और झुनझुना बनकर।आखिरकार ज्ञान और विमर्श की दुनिया तभी विस्तार पाती है जब वह उसके भीतर की स्वाभाविकता की पहचान कर पाती है और उसी अनुपात में उसके पनपने के परिवेश निर्मित कर पाती है।
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| परवेज अहमद विशिष्ट पत्रकार।लगभग चार वर्षों तक ज़ी न्यूज़ में एसोसियट एडिटर।चार नाटक और एक उपन्यास ‘मिर्ज़ावाड़ी’ प्रकाशित। |
मेनस्ट्रीम मीडिया में अच्छे साहित्य की जगह नहीं है
(१) समाज का ‘बौद्धिक तबक़ा’ एक बहुत व्यापक दायरा है।इसमें वैज्ञानिक, क़ानूनदां, इतिहासकार, पत्रकार, साहित्यकार और कई विषयों के विशेषज्ञ शामिल हैं।अगर साहित्यिक दुनिया की बात करें तो कोई भी लेखक या कवि अपने आप विशिष्ट नहीं बनता है।उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति मुझसे मिलता है और बताता है कि वह उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार या कवि है तो मेरी नजर में उसका सम्मान बढ़ जाता है।वह मेरी नजर में विशिष्ट हो जाता है।इसी तरह वह व्यक्ति धीरे-धीरे विशिष्ट बनता जाता है।किसी भी व्यक्ति को लोग विशिष्ट बनाते हैं।ख़ुद से चाहकर कोई विशिष्ट नहीं बन सकता।
(२) बौद्धिक तबका जनता से बिलकुल कटा हुआ नहीं है।कटे होने की मान्यता एक जुमले की तरह प्रचारित की गई है।समाज की नब्ज जानने के लिए मुहल्लों में या पिछड़ी बस्तियों में रहना जरूरी नहीं होता।बड़े से बड़ा लेखक-कवि, न एवरेस्ट पर रहता है और न ही किसी द्वीप पर।पॉश कॉलोनियों और आलीशान बंगलों में रहनेवाले लेखक-कवि भी अपने घर में काम करनेवालों, अपने ड्राइवर, चौकीदार और अपने दफ्तर के सहयोगियों और कर्मचारियों की मार्फत समाज से जुड़े रहते हैं।
इन तमाम लोगों की वजह से समाज में व्याप्त समस्याओं और आम आदमी के सुख-दुख की जानकारियां मिलती रहती हैं।अगर लेखक वर्ग व्यापक समाज से कट जाएगा तो वह लिख ही नहीं सकता।उसकी सर्जनात्मकता सूख जाएगी।
(३) हिंदुस्तानी बौद्धिकता के संकट का प्रश्न सांप्रदायिकता के संबंध में महत्वपूर्ण है।दुर्भाग्य से,आज एक बड़ा पढ़ा-लिखा तबक़ा, सांप्रदायिकता की हवा में बह रहा है।आमतौर पर रचनाकार का रवैया जनता के हितों के खिलाफ नहीं जाता है, क्योंकि साहित्य के विषय समाज के बीच से ही निकल कर आते हैं।जनता के बीच से उभरे चरित्रों की आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्थितियों और समस्याओं से साहित्य उपजता है।कोई भी रचना हवा में नहीं लिखी जाती।फिर चाहे वह निम्न वर्ग, मध्य वर्ग या उच्च वर्ग के बारे में हो, या उनके लिए लिखी गई हो।हर वर्ग समाज का हिस्सा होता है और विभिन्न वर्गों पर लिखे गए साहित्य से समाज की मुकम्मल तस्वीर बनती है।हां, उसमें वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।वह किसी वर्ग के पक्ष में या किसी वर्ग के खिलाफ हो सकता है।
(४) बुद्धिजीवियों का राजनेताओं की तुलना में निश्चय ही बहुत कम प्रभाव है।बौद्धिक वर्ग या लेखकों का रिश्ता, समाज के पढ़े-लिखे वर्ग से रहता है।पढ़े-लिखों में भी वे, जिनकी गंभीर साहित्य में रुचि रहती है, उनसे रहता है।अब यह दायरा और सिकुड़ गया है, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया में अच्छे साहित्य की जगह नहीं बची है।
किताबें ख़रीद कर पढ़ने के मामले में हम काफी पिछड़े हुए हैं।सोशल मीडिया में साहित्य की बाढ़ आई हुई है, खास तौर पर कविता की।वहां अच्छे और कम अच्छे में भेद करना मुश्किल हो जाता है।लेकिन यह सही है कि जहां तक अच्छे साहित्य की पहुंच होती है, उसका प्रभाव जरूर पड़ता है।
(५) मुझे नहीं लगता कि बौद्धिकता का समाज से कोई अलगाव है।
(६) जब हमारे पास अपने औजार होंगे नहीं और होंगे तो जरूरत के मुताबिक कारगर नहीं होंगे तो बेहतर औजारों का उपयोग करना पड़ेगा, फिर चाहे वह पश्चिमी ही क्यों न हों।साहित्य जगत में भी आदान-प्रदान की पुरानी रिवायत रही है।आज जब हमारा जीवन पूरी तरह पश्चिमी प्रभावों में डूबा हुआ है तो बौद्धिकता के पश्चिमी औजारों से कैसे बचा जा सकता है?
(७) सत्ता में आक्रांत नहीं होना चाहिए, लेकिन आक्रांत होना भी मनुष्य की प्रवृत्ति है।जो सच्चे साहित्यकार हैं, वे डर के बावजूद लिख रहे हैं।वे अपनी बात इशारों में कह रहे हैं, लेकिन बड़ी बात यह है कि कह रहे हैं।दबाव में रुख बदलनेवालों की भी कमी नहीं है।रुख बदलने वालों में ज्यादातर प्रलोभन वाले हैं।ऐसे लोग सत्ता के गुणगान में लग गए हैं।साहित्य जगत में भी बेपेंदी के या हवा के रुख के साथ बहनेवाले लेखकों-कवियों की कभी कमी नहीं रही है।यह सच है कि ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
(८) यह वैश्वीकरण का युग है।दुनिया एक बड़े गांव में तब्दील होती जा रही है।ऐसे समय में भारतीयकरण की मांग करना टाइम मशीन को उल्टा चलाने की तरह है।फिर हिंदुस्तानी और भारतीय में क्या अंतर है? मेरी नजर में हिंदुस्तानी और भारतीय एक ही चीज है।यह मांग विस्तार के दौर में खुद को एक छोटे दायरे में समेटने जैसी ही है।
२१९, समाचार अपार्टमेंट, मयूर विहार–१ एक्सटेंशन, दिल्ली–११००९१
संपर्क प्रस्तुतिकर्ता : एलपी-६१/बी,पीतमपुरा, दिल्ली-११००३४ मो.८५०६०१४९१७







