शंभुनाथ

पश्चिमी कोण से एक चर्चित विभाजन है- ‘महान परंपरा-लघु परंपरा’।धारणा बनाई गई है कि वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, गीता, संस्कृत के अन्य क्लासिकल ग्रंथ और इनसे संबंध रखनेवाला साहित्य ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ है।कालिदास महान परंपरा हैं।रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य आदि महान परंपरा के अंग हैं।रामचरितमानस महान परंपरा है।जबकि बौद्ध-जैन रामायणें, अश्वघोष, वीरशैवों का आंदोलन, सिद्ध-नाथ पंथ, तंत्र-मंत्र, निर्गुण काव्य, संत-सूफी, स्थानीय देवता, स्थानीय रीति-रिवाज, लोक साहित्य तथा लोक कलाएं ‘लिटिल ट्रेडिशन’ हैं।यह विभाजन दोनों परंपराओं के नवोन्मेषों को ढकने के साथ-साथ सांस्कृतिक साझेदारी वाली ‘परंपराओं’ को ध्वस्त करने के लिए है, ताकि पब्लिक बंट जाए और वह कभी एक न हो सके।
देखा जा सकता है कि भारत की आदर्शवादी परंपराएं किस तरह महान परंपरा-लघु परंपरा के विभाजन की शिकार हुईं।आदर्शवादी परंपराओं में सबकुछ ‘मृत’ और भौतिकवादी परंपराओं में सबकुछ ‘जीवित’ माना गया।इस विभाजन का असर है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक मूल्यांकन ‘दूसरी परंपरा की खोज’ करने वाले के रूप में है।विडंबना यह है कि ‘महान परंपरा’ को एकरेखीय माना गया, इसकी विविधता को रौंदते हुए।क्या तमिल एक महान परंपरा नहीं है? क्या राज्य स्तर पर ग्रेट-लिटिल नहीं हैं? महान परंपरा-लघु परंपरा की धारणा में बड़ा हॉच-पॉच है।दरअसल भारत की परंपराओं को एक या दो बोरे में ठूंसा नहीं जा सकता।इस देश में सांस्कृतिक बहुलता है।सैकड़ों परंपराएं हैं, आंदोलन की सैकड़ों लहरें हैं और इन सभी के बीच आलोचनात्मक संवाद भी चलता रहा है।
आधुनिक साहित्यिक दुनिया पर जब शीत युद्ध का असर था तो प्रेमचंद-प्रसाद, रवींद्र-नजरुल, अज्ञेय-मुक्तिबोध जैसे धु्रवीकरण बने।राजनीतिक स्तर पर देखें तो गांधी-अंबेडकर जैसी विरुद्धताएं सामने आईं।भारतीय जीवन में आज भी ‘राष्ट्र-सबाल्टर्न’, ‘हम-वे’, ‘बाहरी-भीतरी’, ‘हमारा आदमी-उनका आदमी’ और कई अन्य नए रूपों में महान-लघु के पुराने विभाजन की शाखाएं हैं।यह किसी तरह महसूस नहीं होने दिया जाता कि अंतर्विरोधों के बावजूद भारत में हमेशा ‘साझी संस्कृति-साझा जीवन’ रहा है और वह आज भी ध्वस्त नहीं किया जा सका है।
‘लघु परंपरा’ की धारणा कैसे बनी
दरअसल १९३० के दशक में भारत-संबंधी पश्चिमी अध्ययन ने एक नव-औपनिवेशिक मोड़ लिया था।अमेरिका के एक नृवैज्ञानिक रॉबर्ट रेडफील्ड ने उस समय पहली बार ‘लघु परंपरा’ की धारणा दी।उन्होंने आगे चलकर लिखा, ‘किसी सभ्यता में एक महान पंरपरा बहुसंख्यकों की होती है और एक लघु परंपरा प्रायः उन लोगों की होती है जो अपने विचारों को मानक रूप में अभिव्यक्त नहीं कर पाते।’ (द लिटिल कम्युनिटी एंड पीजेंट सोसाइटी एंड कल्चर, १९५५)।इस कथन से लगता है कि देश के सारे बहुसंख्यक सिर्फ संस्कृत की क्लासिकल परंपरा से जुड़े रहे हैं।सभी लोग एक ही किस्म की उच्च रुचि से संपन्न रहे हैं।वे एकरेखीय वर्चस्व के समान रूप से अंग रहे हैं और हाशिये की लघु परंपराएं एकदम अलग मामले हैं।इनका महान पंरपराओं से कोई रिश्ता नहीं है।
महान परंपरा का संबंध शिक्षित और ज्ञानियों की उस प्रतिष्ठित परंपरा से जोड़ा गया जो किसी सभ्यता की प्रबल मूल्य व्यवस्था का स्रोत है।लघु परंपराओं का संबंध अनपढ़ों, वंचित जातियों-तबकों, उपेक्षित भाषाओं तथा सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से स्थापित किया गया।महान परंपरा ‘लिखित’ पर आधारित बताई गई, जबकि लघु परंरपराएं ‘मौखिक’ पर।महान परंपरा नगरीय एलीट का मामला हुआ, जबकि लघु परंपरा गांवों की चीज हुई।
रॉबर्ट रेडफील्ड के काम को मिल्टन सिंगर और मेकिम मेरिओट ने भारत के कुछ ऐसे दक्षिण भारतीय समुदायों का अध्ययन करके आगे बढ़ाया, जो ‘लघु परंपरा’ में जीते थे।दरअसल भारत की सांस्कृतिक-भाषाई बहुलता की व्यापक वस्तुपरक समझ न होने की वजह से यूरोपीय विद्वानों को भारत ही सामाजिक तोड़फोड़ के लिए सबसे उपयुक्त देश लगा है।वे वैज्ञानिक तरीके के नाम पर बाल से खाल निकालते रहे हैं और समझना नहीं चाहते कि भारत में कोई एक महान परंपरा कभी नहीं थी।
हर परंपरा में अंतर्द्वंद्व और हर परंपरा का दूसरी परंपराओं से आलोचनात्मक अंतर्मिश्रण होता रहा है।सभी परंपराएं आपस में टकराव, अंतर्मिश्रण और नवोन्मेष से गुजरती रही हैं।एक तरह से महान परंपराओं और लघु परंपराओं के बीच हमेशा संवाद रहा है।
रामचंद्र शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में लोकभाषाओं में रचित भक्ति साहित्य का मूल्यांकन करते हुए दिखाते हैं कि लोक के पास भी एक महान संस्कृति हो सकती है।ये लोग भी विवेकपूर्वक सोच सकते हैं और धार्मिक-राजनीतिक सत्ता-केंद्रों से अलग ज्ञान रखते हुए विभिन्न तरह से अपना सांस्कृतिक विकास कर सकते हैं।उन्होंने लोकधर्म, लोकमंगल और लोकबद्ध प्राणी की चर्चा की है।हजारी प्रसाद द्विवेदी शास्त्र और लोक का द्वंद्वात्मक संबंध बताते हैं; अर्थात द्वंद्व भी, संबंध भी।
आमतौर पर पश्चिमी विद्वान एक न एक विदेशी संस्थान से विपुल फंड पाकर निर्धारित परियोजनाओं के अंतर्गत काम करते हैं।उपनिवेशवादी मानसिकता की वजह से उनका लक्ष्य रहा है भारत में सांस्कृतिक तोड़फोड़।वे इस देश में सिर्फ ‘भिन्नता’ खोजते हैं और भारतीय बुद्धिजीवी भी अपनी बौद्धिक रिक्तता या आत्महीनता के कारण उस ‘भिन्नता’ को मान लेते हैं।
मिल्टन सिंगर ने भारत में ऐसे कामों को मिले अमरीकी प्रोत्साहन के संबंध में लिखा है, ‘१९५९ के बाद जब फाउंडेशन और यूनाइटेड स्टेट्स के शिक्षा विभाग ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई अध्ययनों के लिए शैक्षिक अनुदान दिए, तब इन कामों में गति आई।’ (भूमिका, व्हेन ए ग्रेट ट्रेडिशन माडर्नाइजेज)।सिंगर ने तमिलनाडु को लघु परंपराओं के अध्ययन के लिए चुना था।उसने रेडफील्ड के अध्ययन-मॉडल को सामने रखकर वर्ण व्यवस्था को अपने अध्ययन का मुख्य आधार बनाया था।एक तरह से यह तमिलनाडु में १९वीं सदी के राबर्ट काडवेल की आर्य-द्रविड़ विभाजन की परियोजना का ही अगला चरण था।
भक्ति काव्य में जाति भेदभाव और धर्माडंबर का विरोध क्यों है
सोचने की बात है कि खुद ‘महान परंपरा-लघु परंपरा’ के पश्चिमी सिद्धांतकारों ने अपनी धारणाओं को संशोधित किया।इसके बावजूद कई भारतीय बुद्धिजीवियों ने राजनीतिक सत्ता संघर्ष के सांस्कृतिक उर्वरक के रूप में ऐसे विभाजनकारी अध्ययन जारी रखे।ऐसा अध्ययन आज भी एक फैशन है।
कुछ समय पहले रोमिला थापर ने दक्षिण भारतीय रामायणों पर पॉल रिचमैन की किताब की भूमिका लिखी थी।उन्होंने रिचमैन द्वारा प्रस्तावित उपर्युक्त ढंग की ही एक श्रेणी ‘आधिकारिक कथा’ और ‘विरोधी कथा’ का समर्थन किया था।उन्होंने वाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’ को रामकथा के ‘डामिनेंट वर्सन’ के रूप में देखा और बताया, ‘अयोध्या और रामराज्य राजतंत्र के सूचक हैं तो राक्षसों की जीवनशैली गणसंघों के काफी नजदीक एक वैकल्पिक समाज का चित्र है।’ (क्वेश्चनिंग रामायनाज : ए साउथ इंडियन ट्रेडिशन)।यह निष्कर्ष मिथक और इतिहास को एक-दूसरे का पर्याय बना देने का नतीजा है।इससे अहिंसा पर आधारित बौद्ध ‘गणसंघों’ की धारणा धूमिल होती है और इतिहास की औपनिवेशिक समझ का प्रचार होता है।
रोमिला थापर ‘लघु परंपरा’ जैसी ही ‘विरोधी कथा’ के उदाहरण के रूप में बौद्धों के ‘दशरथ जातक’ का उदाहरण देती हैं।कौन नहीं जानता कि बौद्ध-जैन रामायणें अपने-अपने धर्म या मत के प्रचार के उद्देश्य से लिखी गई थीं और इन्हें उसी तरह इतिहास नहीं माना जा सकता, जिस तरह वाल्मीकि ‘रामायण’ को इतिहास नहीं माना जा सकता।बौद्ध-जैन रामायणें वाल्मीकि ‘रामायण’ के ‘रूपभेद’ नहीं हैं, बल्कि ये रामकथा की लोकप्रियता को देखकर उसका धार्मिक इस्तेमाल हैं। ‘रूपभेद’ और ‘प्रचारात्मक उपयोग’ में फर्क होता है।
उपर्युक्त पद्धति से रामकथा क्या किसी भी उस पौराणिक कथा को कभी समझा नहीं जा सकता, जिसकी भक्ति आंदोलन के दौर में तमिलनाडु, महाराष्ट्र और हिंदी क्षेत्र में काव्यात्मक पुनर्रचना हुई है, क्योंकि भक्ति आंदोलन यदि संस्कृत की क्लासिकल ज्ञान- व्यवस्था से प्रस्थान है तो यह संकीर्ण पौराणिकता से भी प्रस्थान है।इसके अलावा, भक्ति काव्य दोनों से सृजनात्मक संवाद भी है।उसमें पौराणिक कथाओं के चरित्र हैं।उसमें ‘क्लासिकल’ के प्रति आलोचनात्मक के साथ-साथ समावेशी रुख है।दूसरी तरफ, वह बौद्ध, सिद्ध-नाथ, सूफी आदि ‘लघु परंपराओं’ से विच्छिन्न नहीं है।यदि ऐसा होता तो भक्ति काव्य में जाति भेदभाव और धर्माडंबर का विरोध नहीं होता।

भारतीय जीवन में अ–विशुद्धता एक गुण है
इस तरह देखा जाए तो ‘महान परंपरा-लघु परंपरा’ भारत में राज्य स्तर पर भी मौजूद है।यह संभव है कि एक जगह जो लघु परंपरा है, वह दूसरी जगह महान परंपरा हो! दरअसल हर समाज के सांस्कृतिक बोध में क्लासिकल परंपराओं, लोक परंपराओं और नवोन्मेषों का एक मिलाजुला रूप होता है।इन्हें कठोरतापूर्वक अलग-अलग नहीं किया जा सकता।भारतीय जीवन में सबकुछ ‘अ-विशुद्ध’ है।यह अ-विशुद्धता एक गुण है।यहां न महान और न लघु, किसी भी परंपरा में शुद्धतावाद चल नहीं सका।शुद्धतावाद और ज्ञान दोनों एक साथ संभव नहीं है।कहना न होगा कि किसी भी महान परंपरा की महानता सिर्फ उसकी निरंतरता में नहीं है, यह उसकी आलोचनात्मक समावेशिकता और नवोन्मेषशीलता में भी देखी जानी चाहिए।
भारतीय बौद्धिकता के टेबल पर ‘महान परंपरा’ और ‘लघु परंपरा’ की तरह ‘उच्च संस्कृति’ और ‘निम्न संस्कृति’ (हाई कल्चर–लो कल्चर) की धारणा लाई गई।सूर या तुलसी का काव्य ‘उच्च संस्कृति’ की देन है, कबीर का काव्य ‘निम्न संस्कृति’ की देन है! इस तरह की धारणा भी एक औपनिवेशिक अवशेष है।यह लोक संस्कृति, वंचितों की संस्कृति, यहां तक कि स्त्री को निम्न समझने की एलीट बौद्धिक दृष्टि का उदाहरण है।
इस विभाजन में मानकर चला जाता है कि लोक परंपराओं में कुछ भी महान और उदात्त नहीं हो सकता, जबकि भारतीय स्थितियों में लोक परंपराएं ही महान और उदात्त का वहन करती हैं।कहा जाना चाहिए, किसी खास संस्कृति को ‘उच्च’ और बाकी संस्कृतियों को, विश्वासों को ‘निम्न’ मानना अंध-राष्ट्रवादी अहंकार है या पृथकतावादी हीनता-भाव।खासकर जब वैश्वीकरण युग का आधुनिक मनुष्य एक साथ कई संस्कृतियों के बीच जी रहा है और हर तरफ व्यापक आदान-प्रदान चल रहा है, इस तरह के विभाजन अर्थहीन हैं।
मुख्य सवाल है, किसी भी परंपरा के खास सांस्कृतिक ‘चिह्न’ का प्रदर्शन प्रेम, न्याय और शांति के लिए है या वह पृथकता के लिए सत्ता संघर्ष का चिह्न है!
मैसूर में जन्मे प्रसिद्ध लेखक ए के रामानुजन (१९२९-१९९२) परंपराओं को परस्पर विच्छिन्नता में नहीं देखते।वे ज्यादा स्पष्ट सोच रखते हैं, ‘‘हमें महान परंपरा और लघु परंपरा जैसे पदों को बदलना होगा।इन तमाम सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को एक श्रृंखला के रूप में रखकर देखना होगा, जिसकी कड़ियां एक-दूसरे के साथ मजबूती से जुड़ी हुई हैं।इनका एक-दूसरे से गहरा सरोकार है और जिनमें निरंतर सक्रिय संवाद है।अतीत और वर्तमान, बृहत भारतीय और आंचलिक, लिखित और मौखिक, शाब्दिक और शब्दातीत-सब एक-दूसरे को पुनर्सृजित और रूपांतरित करते हैं। ‘शास्त्रीय’ हो, ‘लोक’ हो या ‘लोकप्रिय’, भारतीय संस्कृति के विभिन्न प्रकारों को अंतःक्रियात्मक निरंतरता के रूप में देखा जाना चाहिए।’’ (भूमिका, भारत की लोककथाएं)।भारतीय संस्कृतियों की प्रधान खूबी अ-विशुद्धता या अंतर्मिश्रण है।उनमें निरंतरता के अलावा आलोचनात्मकता, समावेशिकता और नवोन्मेषशीलता-ये मुख्य गुण हैं।देखा जा सकता है कि भारत बार-बार अपनी उदात्त जीवनोन्मुखी परंपराओं से गिरकर अधःपतन का शिकार हुआ तो उसने धूल झाड़कर फिर नई जमीन पर प्रगति करने की कोशिश की।
हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व में कालिदास और कबीर गले मिलते हैं
हिंदी में कबीर में काव्यत्व नहीं देखने और तुलसी में काव्यत्व देखने के आचार्य शुक्ल के दृष्टिकोण की नामवर सिंह ने ठीक ही आलोचना की है।इसके तुरंत बाद, उन्होंने ‘महान परंपरा’ के समानांतर ‘दूसरी परंपरा’ खोज ली।इस प्रवृत्ति पर रेडफील्ड और सिंगर की धारणाओं के असर से इनकार नहीं किया जा सकता।तुलसी में ही काव्यत्व देखने के मुद्दे पर नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में प्रश्न किया, ‘क्या इसलिए कि एक प्रभुवर्ग की संस्कृति के पक्ष में बोलता है और दूसरा उस संस्कृति का विरोध करता है?’ उनके कहने का आशय है, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को साहित्यिक प्रतिष्ठा दी, इसलिए वे रामचंद्र शुक्ल से भिन्न ‘दूसरी परंपरा’ हुए।वे कबीर ही नहीं सिद्धों-नाथों और सिख गुरुओं को भी महत्व देते हैं।
वास्तविकता यह है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तुलसी पर कम लिखा है, पर आदर्श कवि तुलसी को ही घोषित किया है, उनकी कबीर से ज्यादा सराहना की है।बल्कि उन्होंने कबीर की खंडनपरक उक्तियों को, मुख्य चीजों को ‘फोकट का माल’ बताया है।वे अपने को तथाकथित महान परंपरा से विच्छिन्न नहीं मानते थे, अर्थात वे खुद संस्कृत के प्राचीन क्लासिकल साहित्य और कालिदास से संबंध रखते थे।कहना चाहिए, हजारी प्रसाद द्विवेदी ऐसे व्यक्तित्व थे, जिसमें कालिदास और कबीर परस्पर गले मिलते हैं!
हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह अवदान जरूर रेखांकित करने योग्य है कि उन्होंने हिंदी में कम चर्चित सिद्धों, नाथों, कबीर तथा सिख गुरुओं की परंपराओं को पूरी गरिमा के साथ प्रतिष्ठित किया।लेकिन इससे रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी दो परंपराएं नहीं हो जाते, क्योंकि दोनों की बुनियादी कसौटी और आदर्शों में बहुत भिन्नता नहीं है।एक ‘लोकमंगल’ की बात करता है तो दूसरा ‘लोककल्याण’ की।दोनों तुलसी को महान कवि मानते हैं और दोनों सौंदर्य प्रेमी चित्त के हैं।
ए के रामानुजन क्या कहते हैं
ए के रामानुजन आम भारतीय चित्त के बारे में बताते हैं, ‘हर कोई चाहे वह गरीब हो या अमीर, सवर्ण हो या शूद्र, प्रोफेसर हो या पंडित अथवा अज्ञानी, इंजीनियर हो या फेरीवाला-अपने भीतर एक बड़ा निरक्षर उपमहाद्वीप लिए हुए होता है।… लोक वांङ्मय समाज के हर स्तर और हर वर्ग के वाङ्मय में घुला-मिला है, न कि सिर्फ देहातियों और निरक्षरों में।शहर और गांव, कल-कारखाना और रसोई, हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई और मुसलमान, हर जाति और वर्ग में (जीर्ण-शीर्ण पंचांग खराब कंप्यूटर से बदतर नहीं होता) मौखिक परंपराएं व्याप्त हैं।’ (वही)।
कहा जाता है कि २१वीं सदी में ऐसे लोग हैं, ऐसी पीढ़ियां हैं जो जड़विहीन हो चुकी हैं, पर यह आम घटना नहीं है।यदि कुछ लोगों के लिए जड़ों से जुड़ने का अर्थ जड़ हो जाना है तो कई लोग अपनी जड़ों से आलोचनात्मक और समावेशी संबंध बनाते हैं।हमारी भारतीयता का निर्माण आलोचनात्मक समावेशिकता से हुआ है।इसका अर्थ है, हम अपनी परंपराओं की आलोचना करते हैं, पर उनसे विच्छिन्न होने की जगह उनकी आत्मीय आलोचना के साथ बुद्धिपरक समावेशन भी करते हैं।
किसी देश की मौखिक परंपराओं से आशय है-लोक कथाएं, लतीफे, विश्वास और प्रचलित नियम, जो ‘ग्रंथों’ में नहीं मिलते।रामानुजन अपनी सोच को आगे बढ़ाते हैं, ‘‘तथाकथित लघु परंपराएं भी आवश्यक रूप से या आमतौर पर छोटी जगहों और बोलियों तक सीमित नहीं रहती हैं।… यह सर्वविदित है कि लोक वाङ्मय (सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अन्य रूपों की तरह) स्वतः प्रसारित होता है-यानी आबादियों के स्थानांतरित हुए बिना ही अक्सर वह स्वयं यात्राएं करता है।… मिसाल के तौर पर ‘दीया तले अंधेरा’ कहावत कन्नड़ और कश्मीरी दोनों में है, जबकि दोनों भारत के दो छोरों पर हैं।’ (वही)।तमिल के जिस प्राचीन संगम साहित्य की चर्चा होती है, उसका ‘संगम’ शब्द संस्कृत का है!
ग्रंथिकी और मौखिकी के संबंध के बड़े उदाहरण खुद रामायण और महाभारत महाकाव्य हैं।महाकाव्य के दबे प्रसंग लोककथाओं और विश्वासों में उभरते रहे हैं, जैसे रामकथा के प्रसंग में हिरणी का शोकगीत।इसी तरह लोक कथाओं और लोक विश्वासों की चीजें महाकाव्यों में शामिल होती रही हैं, जैसे महाभारत में नल-दमयंती, दुष्यंत-शकुंतला की लोक कथाएं हैं।रामकथा की तरह ऐसी लोक कथाएं निरंतर रूपांतरित होती रही हैं, क्योंकि मनुष्य का सौंदर्यबोध विकसित होता रहा है।देखा जा सकता है कि कृष्ण की कथा ‘महाभारत’ से जयदेव, विद्यापति, सूरदास और मीरा के पदों में कहां से कहां पहुंच गई, अर्जुन का रथ पीछे छूट गया! कृष्ण भक्त कवियों ने प्राचीन रूढ़ियों से टकराकर सौंदर्यबोध के न जाने कितने नए स्तरों को उद्घाटित किया है।
क्लासिक और फोक दोनों का सृजनात्मक रूपांतरण होता रहा है
सनातनता और सृजनात्मकता के बीच अंतर्क्रिया भारतीय परंपरा की एक बड़ी खूबी है।ए के रामानुजन ने एक कथा के जरिए परंपरा और इसके सृजनात्मक रूपांतरण के संबंध को बड़े रोचक ढंग से रखा है, ‘‘एक दार्शनिक किसी सुथार से पूछता है- यह चाकू तुम्हारे पास कब से है? सुथार जवाब देता है- यह कई पुश्तों से हमारे पास है।कई बार इसका हत्था बदलना पड़ा और कई बार इसमें पत्ती भी नई लगाई गई, पर चाकू वही है! इस तरह एक लोक कथा जो अपने बातपोश के मुताबिक ढल जाती है- उसका ढांचा भले वही रहता है, जबकि उसके सांस्कृतिक विवरण बदलते जाते हैं।नई कथा अपने सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप एक नया सौंदर्य और एक नया नैतिक बोध व्यक्त करती है।
यह कथा जब अलग समय और स्थान पर सुनाई जाती है तो उसमें कई नवीन और प्रासंगिक चीजें जुड़ जाती हैं, पर कथानक वही रहता है।यह अपरिवर्तनशीलता, या कहें आदिरूप की पुनर्सृष्टि ही गल्प है, पहचान है, सुविधा है।’ (वही)।हम कई बार अपने घर की कुर्सियों की सीट, पीठ, पैर बदलते रहते हैं, लेकिन कुर्सी वही रहती है! किचन की सजावट बदलती रहती है, पर किचन वही रहता है!
भक्ति काव्य की प्रकृति निश्चय ही लोक कथाओं से भिन्न है, क्योंकि इसमें ‘अपरिवर्तनशीलता’ से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं- ‘प्रस्थान’, ‘सुधार’ और ‘परिवर्तन’।भक्ति काव्य का महत्व इसमें है कि यह निरंतरता से पूर्ण विच्छेद नहीं है, क्योंकि भक्त कवियों ने नए सामाजिक मूल्यों की प्रस्तावना करते हुए भी उस प्राचीन सकारात्मक सांस्कृतिक थाती से हमेशा संबंध रखा जो लोक की साझी थाती है।भक्त कवियों ने उन रूढ़ियों-बंधनों का विरोध किया जो शास्त्र और लोक दोनों में मौजूद थीं।इस तरह उन्होंने अपनी-अपनी सोच से ‘क्लासिक’ और ‘फोक’ दोनों से न सिर्फ नाता रखा, बल्कि अपनी नई कल्पनाशील सोच से दोनों को रूपांतरित भी किया।यह चीज १२०० सालों के भक्ति आंदोलन में लक्षित की जा सकती है।
भक्ति आंदोलन ने महान और लघु दोनों परंपराओं के क्षयशील तत्वों को खारिज किया
रामानुजन ने हेनरी व्हाइटहेड की किताब ‘विलेज गाड्स ऑफ साउथ इंडिया’ (१९१६) से मरिअम्मा की एक कथा उद्धृत की है।इसके जरिए उन्होंने ‘महान परंपरा और लघु परंपरा’ के मिश्रण का विश्लेषण करते हुए कर्नाटक के वीरशैवों की भक्ति की विशिष्टता स्पष्ट की।
एक ब्राह्मण साधु ने गुस्से में अपनी पत्नी मरिअम्मा को मृत्युदंड दिया।उसने दंड से पहले निम्न जाति की एक स्त्री एल्लमा को अपनी पीड़ा के क्षणों में सहानुभूति के लिए बाहों से जकड़ लिया।इस होड़ाहोड़ी में दोनों के सिर कट गए।अंततः पति को पश्चाताप हुआ।उसने दोनों को क्षमा कर दिया और अपनी आध्यात्मिक शक्ति से उनके सिर जोड़ दिए।हालांकि गलती से ब्राह्मण स्त्री का सिर निम्न जाति की स्त्री के शरीर से तथा निम्न जाति की स्त्री का सिर ब्राह्मण स्त्री के शरीर से जुड़ गया।निम्न जाति का शरीर लिए ब्राह्मण सिर वाली मरिअम्मा के लिए बकरे और मुर्गे की बलि दी गई, जबकि उच्च जाति का शरीर और निम्न जाति का सिर ली हुई एल्लमा के लिए भैंस की।
लघु परंपरा से जुड़ी जातियों के अपने अलग विश्वास, देवता, बलि के नियम, रीतियां हैं।उपर्युक्त कथा को रखने के बाद वीरशैव संतों के ‘वचन’ के संदर्भ में ए के रामानुजन कहते हैं, (कर्नाटक के) ‘वीरशैवों ने न सिर्फ वैदिक धर्म की महान परंपरा खारिज की, बल्कि उन्होंने स्थानीय लघु परंपराओं को भी अस्वीकृत कर दिया।’
कन्नड़ भक्त कवि बसवण्णा के प्रश्न हैं, ‘तोता ईश्वर का नाम बार-बार लेता है, क्या इससे वह ईश्वर तक पहुंच जाएगा? (महान परंपरा)।… बलि दिए जाने वाले मेमने को त्योहार में बलि के लिए बड़ा सजा-गुछाकर लाया जाता है।उसे हरी पत्तियां खिलाई जाती हैं।यह पेट भरने के लिए है, जानते हुए भी कि वह मारा जाएगा।लेकिन मुझे बताओ, हे कूडल संगम देव, मेमने की बलि चढ़ाने वाला खुद क्या हमेशा बचा रहेगा?’ (लघु परंपरा)।वीरशैव वचनकारों ने दोनों परंपराओं की आलोचना की।
बसवण्णा ने शिव के उभयलिंगी स्वरूप अर्धनारीश्वर की कल्पना की, ‘कभी मैं पुरुष हूँ, कभी मैं स्त्री हूँ!’(स्पीकिंग ऑफ शिवा)।इसी तरह कबीर ने बलि और हिंसा का विरोध किया, तुलसी ने पंडितों को ‘श्रुति बेचक’ कहा, तो रामकथा के समानांतर कोल–भील और शबरी को चुना, प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।दोनों भक्त कवि विभिन्न परंपराओं से आलोचनात्मक संवाद करते हैं और निश्चय ही दोनों की अपनी–अपनी सीमाएं हैं।
भक्ति आंदोलन ने तथाकथित महान और लघु दोनों परंपराओं के क्षयशील तत्वों को खारिज किया।ए के रामानुजन कहते हैं, ‘मैं सोचता हूँ, इसकी वजह यह है कि दोनों परंपराएं ही कई अर्थों में अपनी एक सत्ता-व्यवस्था बना लेती हैं।वे ऐसी व्यवस्था का रूप धारण कर लेती हैं, जो स्थिर सुरक्षित, जड़ता के समान होती हैं।वे सृष्टि को अपने-अपने हित में मोड़कर अपने स्थिर प्रतीक रचती हैं।दोनों ही परंपराएं विश्व को जोड़-तोड़ करके अपने स्वार्थों के अनुरूप ढाल देना और सुरक्षित बना लेना चाहती हैं।उनमें निर्धारित हर धार्मिक अनुष्ठान या तंत्र-मंत्र फल प्राप्ति के लिए होता है।’ (वही)।
हम देखते हैं कि भव्य यज्ञ, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, कथा-जागरण, तीर्थ यात्रा, व्रत-उपवास, झाड़-फूंक, बलि, या कोई भी कर्मकांड फल के लोभ से किया जाता है।इन चीजों को लेकर सामान्यतः हर प्रांत के भक्ति-साहित्य में विरोध व्यक्त हुआ।भक्त कवि इन प्रपंचों में न फँसे, उन्होंने ईश्वर की अनुभूति और प्रेम का संदेश दिया।
२१वीं सदी में ध्रुवीकरण का चरित्र
महान परंपरा और लघु परंपरा की अवधारणाएं दोषपूर्ण बताई गई हैं, लेकिन भाषा, साहित्य और संस्कृति की सुविधाजनक समझ के लिए इनका उपयोग होता रहा है।खुद ए के रामानुजन ने विरोध करने के बावजूद इनका उपयोग किया।महान और लघु, शास्त्र और लोक, आधिकारिक और विरोधी, लिखित और मौखिक, पांडित्य और निरक्षरता, भक्त और संत, परंपरा और आधुनिकता, प्रयोग और प्रगतिशीलता आदि परस्पर विरोधी युग्म की तरह दिखाए जाते हैं।किसी एक पक्ष में खड़ा होना या किसी साहित्य को एक धारा में अंतिम रूप से रख देना और धु्रवीकरण बड़ा आसान है।
वैश्वीकरण के युग में लक्षित किया जा सकता है कि बुद्धिजीवियों में ध्रुवीकरण के प्रति कितनी ललक है और यह कितना आत्मघातक साबित हुआ है।ध्रुवीकरण ने समाज में अब तक सिर्फ जाति-भेदभाव, धार्मिक कट्टरता और प्रांतीयतावाद को बढ़ावा दिया है, समाज में ‘साझा जीवन-साझी संस्कृति’ को मुश्किल में डाल दिया है और ‘अभेद में भेद’ पैदा कर उत्पीड़ित मनुष्यता को विभाजित कर दिया है।दरअसल कोई सांस्कृतिक चिह्न जब सत्ता-संघर्ष के खेल का औजार बना दिया जाता है तो उसका लक्ष्य तात्कालिक फायदा होता है, भले उससे दीर्घकालिक नुकसान हो।
हमारी दुनिया में बड़े परिवर्तन आ चुके हैं।कहा जा रहा है, एक्ट ग्लोबली – थिंक लोकली! भक्ति आंदोलन और नवजागरण के युगों में लोगों का तरीका था, एक्ट लोकली – थिंक ग्लोबली! वे बड़े चित्त के लोग थे, जबकि इस जमाने में छोटे चित्त के बड़े बुद्धिजीवी ज्यादा हैं!
(Image : MIRÓ, Joan)

वाकई ध्रवीकरण राजनीति में सदैव अनिवार्य तत्त्व रहा है लेकिन यह किस क़दर इतिहास और साहित्यिक वैचारिकी में भी प्रवेश कर जाता है,उसका हिस्सा बन जाता है या बनाए जाने की योजना में इसे शामिल कर लिया जाता है यह इस लेख में हमें पढ़ने को मिला।
सर ने लेख में जिस तरह शास्त्रीयता और लोक के मेल को दिखाया है, जिस तरह इन दोनों को समानांतर सामाजिक लोकमंगल का अभिन्न अंग बताया है उसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। एक ज़रूरी लेख है यह इस समय में।
साधुवाद।
वागार्थ अंक दिसंबर 2022 में प्रकाशित संपादकीय श्रेष्ठ और कनिष्ठ, उच्च और निम्न,महान और लघु,हाई कल्चर और लो कल्चर पर आधारित है। नकाब पहनकर मनुष्य जीवन जीने में सहजता महसूस कर रहा है क्योंकि आज वैश्विक स्तर पर हो या राष्ट्रीय मानवीय सरोकार में सोचने के स्तर बदलते गए है । वह आत्मकेंद्रित हो चुका है। सोशल मीडिया के द्वारा नए-नए समस्या निर्माण हो रही है । संस्कृति में संकुचित वृद्धि हुई है। वंचित तबके को बचाए रखना बेहद जरूरी है लेकिन यह राजनेताओं को उदारता से सोचने समझने की आवश्यकता है।
छोटे चित्त के बड़े बुद्धिजीवी आज वर्तमान समय में इर्द गिर्द अपने आप को सभ्य कहने लगे है।भारतीय बौद्धिकता के टेबल पर ‘महान परंपरा’ और ‘लघु परंपरा’ की तरह ‘उच्च संस्कृति’ और ‘निम्न संस्कृति’ (हाई कल्चर–लो कल्चर) की धारणा समाज में सैकड़ों सालों से चलाकी से चलाकर सत्तारूढ़ हो गए है । साहित्य एवं संस्कृति को राजनीति के चंगुल में फंसाकर महान मानवीय जीवन मूल्यों की परंपरा को उच्च और निम्न में विभाजित कर मनुष्य मनुष्य में विषमता के बीज बोए गए है । सूर या तुलसी का काव्य ‘उच्च संस्कृति’ की देन है, कबीर का काव्य ‘निम्न संस्कृति’ की देन है! इस तरह की धारणा भी एक औपनिवेशिक अवशेष है।यह लोक संस्कृति, वंचितों की संस्कृति, यहां तक कि स्त्री को निम्न समझने की एलीट बौद्धिक दृष्टि का उदाहरण है।
ए के रामानुजन आम भारतीय चित्त के बारे में बताते हैं, ‘हर कोई चाहे वह गरीब हो या अमीर, सवर्ण हो या शूद्र, प्रोफेसर हो या पंडित अथवा अज्ञानी, इंजीनियर हो या फेरीवाला-अपने भीतर एक बड़ा निरक्षर उपमहाद्वीप लिए हुए होता है।… लोक वांङ्मय समाज के हर स्तर और हर वर्ग के वाङ्मय में घुला-मिला है, न कि सिर्फ देहातियों और निरक्षरों में।शहर और गांव, कल-कारखाना और रसोई, हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई और मुसलमान, हर जाति और वर्ग में (जीर्ण-शीर्ण पंचांग खराब कंप्यूटर से बदतर नहीं होता) मौखिक परंपराएं व्याप्त हैं।’ (वही)।
यहां भेदभाव जन्य स्थिति साहित्य में दिखाकर विषमता फैलाना भी एक उद्देश्य हो सकता है। हमें मानवीय मूल्यों को स्थापित करने के लिए ही तैयार रहना चाहिए। भारत मेरा देश है । वसूदैवकुंटुबकम ही हमारी पहचान है।
मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
उच्चस्तरीय विश्लेषण।
संपादकीय में शंभुनाथ जी के तथ्यपरक विश्लेषण से गंभीर पाठकीय विमर्श की भूमिका तैयार होती है। तथ्यों के साथ उनके तर्क बौद्धिक संवाद का आमंत्रण देते हैं!