वरिष्ठ कथाकार।तीन कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह, तीन बाल कविता संग्रह प्रकाशित।

‘तू तेरह साल की थी, जब मैं यहां आई।’ वह बोली

‘हां, खेत पर ही तो गई थी मैं।लौटी तो पता चला कि तेरी काकी नहीं रहीं, इसलिए तू कुछ दिन के लिए नाना के घर गई है।’ मैं बोली।

‘मेरे जनम के पहले ही तेरे नाना चल बसे थे।नानी भी तेरी। … पांच साल की रही होऊंगी मैं …याद भी नहीं है मां का चेहरा’ -अम्मा की आवाज जैसे किसी गहरी खोह से आ रही हो-—‘तेरे नाना-नानी रहे होते तो शायद ये दिन न देखती मैं।’

 आलू छीलते उसके हाथ क्षण भर को रुके फिर उसी गति से चलने लगे।फिर अचानक जैसे उसे कुछ याद आया।बोली- ‘वह बाहर अकेले बैठा है, तू जा वहीं बैठ।’

‘नहीं, ठीक है, वह बैठ लेगा।’

‘उसने कहा यहां आने के लिए या तू उसे ले आई?’

‘वह क्यों कहेगा? …मैं ही लाई उसे।पर उसने आनाकानी नहीं की, झट तैयार हो गया।’ यह सुनकर उसने एक लंबी सांस ली, पता नहीं अपना दुख याद करके या मेरा सुख सोचकर।फिर कुछ देर तक रसोई में चुप्पी छाई रही।

मैंने देखा, जरूरत भर के बर्तन रसोई की दीवार से उठंगे पड़े हैं।चूल्हे के एक कोने में थोड़ी-सी सूखी लकड़ी, रहठा और उपले रखे हैं।थोड़ी दूर पर पीतल के दो गगरे रखे हैं, जिसमें पानी होगा।सड़सी, चिमटा, फुकनी चूल्हे के पास ही रखी है।मैं यहां आते हुए डर रही थी, पता नहीं अम्मा मुझे पहचानेगी भी या नहीं! मिलेगी या यूं ही लौटना पड़ेगा! तेरह वर्ष की उम्र में छूट गई थी उससे।अब मेरा ब्याह हुए भी पांच वर्ष बीत गए।पहचानेगी क्या! मुझे अम्मा को बताना पड़ेगा सबकुछ विस्तार से।बताने पर जान जाएगी या तब भी अनचीन्हा व्यवहार करेगी! पता नहीं मेरी बातों पर विश्वास करेगी या नहीं! तमाम प्रश्न थे मेरे दिल में।पर उससे मिलने की इच्छा इतनी बलवती थी कि सारे प्रश्न पीछे धकेलती हुई मैं पति को साथ लेकर पहुंच गई यहां।

वह अकेली बैठी थी घर में।थोड़ी देर पूछ-ताछ की, फिर पहचान ली मुझे, जैसे मेरी बढ़ती हुई छवि को हमेशा अपने दिमाग में बनाती रही हो और अब मुझे देखकर मिलान कर लिया हो।फिर जब वह पहचानी तो ऐसा कसकर कलेजे से लगाई कि बचपन की प्यासी मैं तृप्त हो गई।

वह कुछ लाने के लिए भीतर कमरे में गई।लौटी तो उसके हाथ में एक पीढ़ा था-—‘ले इसपर बैठ, मुझे ध्यान ही न आया, तू इतनी देर से नीचे ही बैठी है।’

‘तो क्या हुआ, तेरे पास बैठी हूँ न।’ उसका चेहरा यह सुनकर क्षण भर को दमका, फिर बुझ गया।

‘मैंने नहीं सोचा था, तू आएगी।’ वह अब प्याज छील रही है।

‘मेरा पता कहां से मिला?’ अचानक अम्मा चौंककर पूछी।

‘तू नाना के घर से जब बहुत दिनों तक न लौटी तो मैं रो रोकर तेरे बारे में पूछती थी…।पूछना कभी बंद ही नहीं किया था।पिछले साल बाबू मरते समय तुम्हारे बारे में बताए।’

‘मर गया वो?’

‘हां, मर गए।फेफड़ा खराब हो गया था उनका।कह रहे थे- पाप किया है मैंने, एक बेटी पैदा करने के बाद कोख ही न फूटी उसकी।इसलिए हटा दिया यहां से।’

‘गलत, वह शराबी था।पैसे की तलब थी उसे… उसने बेचा था मुझे, हजार रुपये में।’ एकाएक उसकी आंखों से अंगारे बरसने लगे।

मैं सहम गई, ‘बाबू मुझे बहुत प्यार करते थे।’ मैंने अम्मा के क्रोध को संभालना चाहा।

‘बाबू …निगोड़ा, अपनी औरत बेच दिया।’ घृणा से मुंह टेढ़ा हो गया उसका।

‘दूसरी लाई?’ बड़े धीरे से डरते-डरते पूछा उसने।

‘नहीं।’ वह मेरी ओर देखने लगी, जैसे वह सुनना तो यही चाहती थी, पर विश्वास नहीं हो रहा है उसे।

‘कोई आई नहीं या उसने नहीं लाई?’

‘पता नहीं क्या हुआ, पर बाबू ने दूसरी नहीं लाई।’

‘आजी हैं अभी?’

‘हां, हैं।तुझे बहुत याद करती हैं।कभी-कभी अकेले में रोती भी हैं, पर मैं जान जाती हूँ कि आज वह तुझे याद करके रोई हैं।आखें लाल हो जाती हैं न उनकी।फिर पूरे दिन लाल ही रहती हैं।कहती हैं मैं कुछ कर न पाई …अब बाबू के लिए भी रोती रहती हैं।’

‘वे क्या करतीं, गहरे गड़े खूंटे से बंधी थीं।रंभाने की भी ताकत नहीं थी उनमें’ -फिर जैसे खुद से बोली- ‘मुझमें ही कहां थी!’

‘तू इतने आलू-प्याज क्यों छील रही है।हमारे लिए? ज्यादा भूख नहीं है।बस कर, इतने में हो जाएगा।’ मैंने बात बदलनी चाही।

‘वह भी तो है।’

‘दोनों का हो जाएगा।’

‘कहां गया है वह?’ मुझे आए घंटे भर से ऊपर हो गए थे, अब तक उस आदमी को न देखकर मैंने पूछा।

‘कौन? मेरा खरीददार?’ शायद व्यंग्य में बोल रही थी वह।मैं चुप रही, उसने बताया- ‘पड़ोस के गांव में सत्यनारायण की पूजा सुनाने गया है।आस-पास के गांवों में यजमानी है उसकी।थोड़े खेत भी हैं…।हो जाता है गुजर बसर…।क्या चाहिए अब जीने के लिए, दो वक्त का भोजन ही तो?’ आंचल उठाकर उसने आंखें पोछीं।पता नहीं प्याज की झार से आंखों में पानी आया था या दिल के दर्द से आंसू!’ मैंने बात बदली, ‘तू खा चुकी है?’

‘हां, रात की रोटी बची थी उससे काम चल गया।’

‘और वो?’

‘वो वहीं से खाकर आएगा।पंडिताई करता है न, महीने में पंद्रह दिन बाहर खाता है।’

‘तो तू पंद्रह दिन बचा-खुचा खाती है?’

वह मुस्कराई, इतनी देर में पहली बार।उसकी मुस्कान अब भी बिलकुल वैसी है, जैसे मेरे बचपन में थी।मुझे लगा रसोई में उजियारा फैल गया।उसके दांत हैं ही चमकदार।

उसने चूल्हा जला दिया।कड़ाही उठाकर आंचल से पोंछी और चूल्हे पर चढ़ा दिया।फिर भीतर के कमरे में गई।लौटी तो तेल, मिर्च, मसाला सब हाथ में था। ‘मिर्ची तेज चलेगी या कम?’ पूछा उसने।

‘चलेगा, तू जैसा भी बनाएगी।’

‘और उसके लिए?’

‘वह भी खा लेगा।’

‘पहले तू बिलकुल मिर्ची नहीं खाती थी।मैं हरी मिर्च अलग से पीस कर रखती थी।सब्जी पक जाने के बाद तेरी सब्जी निकाल लेती थी, फिर सबकी सब्जी में मिर्ची मिलाती थी।’

‘मुझे याद है …पर तेरे जाने के बाद मैं सबकुछ खाने लगी थी।’ वह मुझे देखने लगी, कुछ चकित सी, फिर जैसे खुद से ही बोली, ‘बिन मां की हो गई न।’

बाहर साइकिल खड़की तो वह संभल गई।अपना आंचल ठीक करने लगी, सिर की साड़ी को माथे तक खींच लिया।दरवाजे से एक बूढ़ा-सा दिखने वाला व्यक्ति अंदर घुसा।मैं समझ गई, यह वही है।उसने हाथ का झोला उसे पकड़ाया और प्रश्न भरी नजरों से मेरी ओर देखने लगा।उसने झोले को दीवाल से लगाकर रखते हुए कहा-‘रीता है, भानपुर से आई है।’ मैंने बूढ़े की ओर देखते हुए हाथ जोड़े पर उसने कोई जवाब न दिया और अगला प्रश्न पूछा-‘और बाहर?’

‘मेहमान, इसका घरवाला।’ उसकी आवाज धीमी हो गई है।

‘बाहर बैठता हूँ, पानी दे जाना।’ कहकर वह बाहर चला गया।वह लोटे में पानी भरने लगी तो मैंने कहा, ‘ला, मैं देकर आती हूँ।’ उसने मुझे देखा,  थोड़ा-सा सहमी फिर बोली, ‘नहीं, तू बैठ, मैं ही देकर आती हूँ।’

वह पानी देने चली गई।मैं रसोई में बैठे-बैठे सोचने लगी, उसके आते ही कितनी धीमी आवाज हो गई इसकी! कितना डर-डर के रहती है यहां! चौदह-पंद्रह वर्ष एक आदमी के साथ एक घर में बिताने के बाद फिर दूसरा घर! दूसरे आदमी के साथ।कैसे सहा होगा इसने! आसान नहीं रहा होगा! यहां आए भी तेरह-चौदह वर्ष बीत गए!

जब वह लौटकर आई तो मैंने उससे पूछा- ‘कैसे चली आई थी तू इसके साथ? विरोध क्यों नहीं किया?’

‘मैं तो यही जानती थी कि नैहर जा रही हूँ अपने।रास्ता थोड़ा अनजाना-सा लगा तो मैंने इससे पूछा।तब इसने बताया। ‘तू अपने नैहर नहीं, मेरे घर चल रही है।तेरे नैहर जाने की बात गलत थी।तेरी किसी काकी को मैं नहीं जानता।तेरे पति ने झूठ बोला था सबसे।’ मैं रुक गई, आगे बढ़ नहीं रही थी।ऐसा लगा कि अभी धरती फट जाए और मैं समा जाऊं उसमें, पर धरती ऐसे फटती है क्या? खींचते हुए ले आया मुझे।कह रहा था, तेरे पति के हाथ में हजार रुपये गिनकर ला रहा हूँ तुझे।सौ-सौ की एकदम कड़क नोट दी है उसे मैंने, अब तू नखरा दिखा रही है!’

खिंचती चली आई मैं इसके साथ… यहां गांव की औरतों ने गाने-बजाने से अगुवाई की मेरी।उन गाने वाली औरतों में से एक का मुंह नोच लिया था मैंने।औरतें गाना छोड़कर भाग गई थीं।फिर इसने मुझे मारा और समझाया भी।मेरा मन जल रहा था।दो-चार दिन नहीं, कई साल लगे थे मुझे यहां स्थिर होकर रहने में।कोई लेने या ढूँढने भी तो नहीं आया था मुझे, मेरा मतलब है तेरा बाप…! तू बहुत याद आती थी, रात में चौंक कर उठ जाती थी मैं।’

‘हुंह, लौटी क्यों नहीं?’

‘किसके पास लौटती? जिसने बेचा था उसके पास? लौटती कैसे? न रास्ता जाना समझा था, न पास में एक पैसा रहता था।बहुत दिनों तक निगरानी में रखा इसने…।फिर धीरे-धीरे मन मारकर रह गई।’

‘लौट भी आती तो क्या वहां फिर से जगह मिल जाती।’ वह मुझसे पूछ रही थी या खुद से, पता नहीं, पर मैं चुप रही।सच कह रही है, दुबारा अपनाना ही होता तो जानवर की तरह उसे बेचते! रह गई जानवर की तरह खूंटे से बंध कर।अब मैं उखाड़ देना चाहती हूँ इसका खूंटा।

‘कुछ दिन रुकेगी यहां?’ उसने पूछा

‘नहीं, जाऊंगी आज ही, अभी चार-साढ़े चार बजे तक निकल जाऊंगी।’

‘रुक जाती दो-चार दिन।’ आवाज उसके गले के ऊपर से ही निकल रही है।बूढ़े के आते ही समझ गई होगी यह कि हम लोगों का आना उसे अच्छा नहीं लग रहा है, पर रुकने के लिए कहना है इसलिए कह रही है।इसका दिल तो चाहता ही होगा कि रुक जाऊं, पर कितनी मजबूर है!

रोटी बन गई तो उसने मेरे पति को अंदर बुलाया।भीतर से एक और पीढ़ा ले आई।लोटे में पानी भरकर रखा और दो थाली में खाना परोस दिया।मैंने उसकी ओर देखा, वह मुस्कराई, दूसरी बार… ‘दाल-भात भी बना लेती तो अच्छा रहता, लेकिन  देर लग जाती।’ उसने मेरे पति को लक्ष्य करके कहा था ये, पर जवाब मैंने दिया, ‘ठीक तो है, सब्जी रोटी बहुत है…  हम लोगों के साथ तू भी खा ले थोड़ा-सा।’

‘नहीं, तू खा।’

पति चुपचाप खा रहे थे और मैं सोच रही थी कि वह इससे कुछ बात कर लेते तो ठीक रहता।वह एकटक मेरे पति को देख रही थी, उसकी आंखों में चमक आ गई थी।

हमारे खा लेने के बाद उसने बरतन लाकर बाहर मजनौरे पर रख दिया और पीढ़ा उठाकर बोली- ‘चल बाहर ही बैठते हैं सबके साथ।’ उसे उम्मीद थी कि दोनों मडहे में आपस में बात कर रहे होंगे, हम लोग भी वहीं बैठेंगे।पर बूढ़ा सो चुका था।मेरे पति अभी-अभी खटिया पर लेटे थे, उन्होंने भी ऊंघना शुरू कर दिया था।

वह चाहती थी कि वह बूढ़ा मुझसे और मेरे पति से कुछ बात करे और मैं चाहती थी कि मेरा पति उससे और उस बूढ़े से कुछ बात करे।दोनों को सोते ऊंघते देख वह बोली, ‘यहां तो सब नींद में चले गए।’ हालांकि मैं समझ रही थी कि वह मजबूर है।बूढ़े के गुस्से का डर न रहा होता तो वह उसको जगाकर कहती कि कैसे सो गए, थोड़ी देर के लिए तो आया है मेरा दामाद, कुछ बातचीत करो।

कुछ देर पीढ़ा लिए वह मडहे में खड़ी रही।फिर बोली, ‘चल हम लोग उस पेड़ के नीचे बैठें।’ मैं उसके पीछे-पीछे चली आई।वहां पेड़ के नीचे एक मचिया पड़ी थी।उसने पीढ़ा मेरे लिए रख दिया और खुद मचिया पर बैठ गई।

अब मैं उसे बाहर की रोशनी में ठीक से देख रही थी।मुझे याद है, वह बहुत गोरी थी।सब कहते थे तू अपनी मां को पड़ी है।उतनी ही गोरी, उतनी ही सुंदर, पर आज इसे देख रही हूँ तो यह कहीं से सुंदर नहीं दिख रही है।दोनों गालों पर काले चकत्ते-सी झाई पड़ गई है।बाल सफेद हो गए हैं।गले की हड्डी उभरने से गले और हड्डी के बीच में छोटा-सा गड्ढा बन गया है।मैंने कहा, ‘तू बहुत दुबली हो गई है’।उसने एक बार अपने हाथ-पैर की ओर निहारा फिर बोली, ‘खांची भर मांस थी, मैं आधी वहां गल गई, आधी यहां…।अब क्या है, किसी तरह अंत बेला आ जाए’, उसने एक लंबी जम्हाई ली।

यह समय उसके आराम का रहता होगा।मैं फिर से उन्हीं बातों में नहीं जाना चाहती थी।शायद वह भी नहीं।उसने गरदन ऊपर करके पेड़ की ओर देखा और बोली, ‘देख, कितना गझिन पेड़ है।’ मैं उसकी गरदन और नजरों का पीछा करती हुई वहां देखने लगी, जहां वह देख रही थी।वह कटहल का पेड़ था।पेड़ सचमुच बहुत गझिन था।मैंने पूछा, ‘कटहल लगते हैं इसमें?’ उसने दोनों हाथों को फैलाया और चिहुंककर बोली, ‘खूब, खूब आते हैं।सब्जी बहुत अच्छी बनती है इसकी।’

‘दो जन में लगता ही कितना होगा, बांटती भी होगी गांव वालों को?’

‘कहां’, उसने मुंह बिचकाया- ‘ये बूढ़ा किसी को छूने भी नहीं देता।अपने लिए रखकर सब बेच डालता है।मुफ्त में यह कानी कौड़ी न दे किसी को … बड़ा कंजूस है।उस घर से आने के बाद हथेली पर पैसा कैसा दिखता है, कभी न जाना मैंने… वह अंटी में संभाले रहता है, छूने नहीं देता है कभी।’ फिर जैसे खुद को समझाते हुए बोली, ‘क्या करूंगी मैं पैसा, पेट भरने के लिए रोटी और तन ढकने के लिए धोती मिल जाए बस।और इसे देने में यह कोई कंजूसी नहीं करता।’

मैंने उसकी धोती की ओर देखा, किनारीदार सफेद धोती पहने थी, बाहर डारे पर एक ऐसी ही किनारीदार सफेद धोती सूख रही थी।मैंने पूछा, ‘छींटदार धोती अब नहीं पहनती क्या तू?’ वह मुस्कराई… तीसरी बार… ‘जो मिल जाती है वही पहन लेती हूँ, तन ढकने से मतलब है…।जमाना बीत गया छींटदार रंगीन धोती पहने।इस घर में तो कभी नहीं पहनी।’

कितना दर्द है इसके जीवन में! मैं चाहती थी कि यह अभी उसमें न डूबे।इसलिए दूसरी बात पूछ लेती हूँ, ‘इस गांव के लोग कैसे हैं?’

‘अच्छे ही होंगे, मैं तो किसी के दरवाजे जाती नहीं हूँ।जब मैं नहीं जाती तो कोई मेरे दरवाजे भी नहीं आता …।किसी के आने से ये चिढ़ता भी है।इसकी पहली घरवाली ने फाँसी लगा ली थी।पहले-पहल गांव की एकाध लड़कियां मेरे पास आई थीं।उन्होंने ही बताया था मुझे…।मैंने उसके बारे में कभी इससे पूछा नहीं …क्या करना है जानकर।’

इसके जीवन से दुख कभी निकला ही नहीं, मैं सोचती हूँ।

वह मेरी तरफ ध्यान से देखती है, ‘सुखी तो है तू?’ मुझे लगा, जैसे बड़ा साहस बटोरकर उसने ये बात मुझसे पूछी हो।

‘हाँ, बहुत।’ मेरे ऐसा कहने पर वह सिर ऊपर करके दोनों हाथ जोड़ लेती है।वह भगवान को धन्यवाद दे रही है।मै थोड़ा गुरूर से बोलती हूँ, ‘मैं ऐसी हूँ भी नहीं कि कोई मुझे दुखी कर सके…।मैं सहूंगी ही नहीं …क्यों सहूँ? मैं भी तो इनसान हूँ।’

वह ‘हूँ’ कहकर चुप हो जाती है।मेरे बारे में सोचकर जरूर संतुष्ट हुई होगी, लेकिन उसे अपनी कमजोरी याद आ गई होगी।

मडहे से खखारने की आवाज आई तो हमारा ध्यान उस ओर गया।बूढ़ा उठकर बैठ गया है और रह-रह के हम लोगों को देख रहा है।जब कुछ समय बीत गया और हम लोग बतियाते बैठे ही रहे तो वह खीझती आवाज में चिल्लाया, ‘बैठकर बकर- बकर बकैती ही करती रहेगी या चाय-चूय भी बनाएगी?’

‘अभी बनाती हूँ।’ कहकर वह झटके से उठी।मैं भी उठने लगी तो वह बोली, ‘यहीं बैठ हवा में, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।’

‘नहीं, मैं तेरे साथ बैठूंगी।’ पीढ़ा उठाकर मैं उसके पीछे-पीछे चली गई।रसोई में पहुंचकर उसने चूल्हा जलाया और चाय का पानी चढ़ा दिया।दूध, चीनी, चाय की पत्ती भीतर वाले कमरे से ले आई।मैं पीढ़ा बिछाकर बैठ गई।वह चूल्हे में ज्यादा लकड़ी लगाकर आंच तेज कर रही है, जिससे जल्दी चाय बन जाए।उसका डरना, घबराना मेरी नजरों से छुपा नहीं है।

चाय तैयार होने पर वह दो गिलास में छानकर बाहर ले गई।मेरे पति भी उठ गए थे।हाथ-मुंह धोने के लिए उन्हें पानी चाहिए था, वह पानी लेने दौड़ी।अब तक बची चाय गरम करके मैंने दो गिलास में छान लिया, एक उसके लिए, एक अपने लिए।वह पानी देकर लौटी तो हम दोनों ने चाय पी और बाहर आकर मडहे में बैठ गए।

बूढ़े की त्योरी चढ़ी है, ‘इतनी मगन हो गई है कि दो दिन की चीनी एक ही दिन में झोंक दिया…।कितनी मीठी बनाई थी चाय।’

वह चुप रही, जानती है कि यह चाय के मीठी होने का गुस्सा नहीं है, लेकिन मुझसे नहीं रहा गया।मैं धीरे से बोली- ‘हमें तो इतनी मीठी नहीं लगी।’ बूढ़ा मुझे घूरा, मैं चुप हो गई।

‘सवा चार हो गए, अब हम लोगों को चलना चाहिए।’ मेरे पति मेरी तरफ देखकर बोले।

वह चौंक गई, ‘अई, सवा चार बज गए? इत्ती जल्दी?’

‘इत्ती जल्दी नहीं, अपने समय पर ही बजा है।’ बूढ़ा फिर खीझा।उसने बूढ़े की बातों पर ध्यान नहीं दिया, मुझसे बोली,—‘चल भीतर, जाने के पहले भगवान को हाथ तो जोड़ ले, पहली बार आई है।’ मैं उठी, उसके साथ भीतर गई।रसोई के बगल में एक ताखे पर भगवान के कुछ फोटो रखे हैं।वह भीतर चली गई।निकली तो चांदी की एक जोड़ी पुरानी पायल हाथ में दबाए थी, उसे मेरे आंचल में गठियाते हुए बोली- ‘रख ले… तुझे देने के लिए मेरे पास इसके सिवा कुछ नहीं है… पंजीरी और थोड़ा सीधा भी देने का मन था, लेकिन बूढ़ा खीझेगा।’

‘कोई बात नहीं, यह पायल ही मेरे लिए अमूल्य है।संभालकर रखूंगी इसे।’

फिर हम लोग बाहर आ गए।मडहे में पहुंची तो पति चलने के लिए खड़े हो गए थे।अम्मा ने मुझे गले से लगाया और अपनी आंखें पोछीं।मेरी आंखें भी भर आईं।मैंने बूढ़े को हाथ जोड़ा।पति ने झुककर उसके दोनों के पैर छुए।अम्मा ने तो बीच में ही मेरे पति का हाथ पकड़ लिया, पर बूढ़ा तना खड़ा रहा।हमलोग चलने लगे।दो-चार कदम ही आगे बढ़े थे कि रोने के साथ उसकी हिचकी निकली, साथ ही बूढ़े की आवाज सुनाई दी, ‘येल्ले, अब शुरू हो गया तेरा तिरिया चरित्तर… ससुरी।’

मेरे आगे बढ़ते कदम रुक गए।मैं एकबारगी पलटी और झपट कर उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचने लगी, ‘चल, अब यहां एक पल भी नहीं रुकना है तुझे।’ बूढ़ा हक्का-बक्का हो मेरी ओर देखने लगा।बूढ़े के हाथ-पैर कांपने लगे थे, पर वह शांत खड़ी थी।उसने पहले अपने आंसू पोछे, फिर मेरे हाथ से अपना हाथ धीरे से खींचते हुए बोली- ‘अब बहुत देर हो गई है।’

मैंने उसके खिंचते हाथ को कसकर पकड़ लिया और उसकी आंखों में आंखें डालकर दृढ़ता से बोली- ‘अम्मा, देर कभी नहीं होती!’

संपर्क : 5, योगीराज शिल्प, आई. जी. बंगला के सामने, कैंप, अमरावती, महाराष्ट्र मो. 9422917252