(1377, बनारस) भक्तिकालीन दलित कवि। अपने और परिवार के भरण-पोषण के लिए जूते बनाने के श्रम से जुड़े। अपनी वाणी से संसार को एकता और भाईचारे का संदेश दिया। यहां रैदास के दो पदों का खड़ीबोली में काव्यात्मक अनुसृजन।

 

1-प्रभु की पहचान भी अपने जन से होती है

तुझमें मुझमें, मुझमें तुझमें अंतर कैसा
सोना और सोने के कंगन में
जल और तरंग में भेद कैसा?
अरे हे अनंत!
जो हम न करते होते पाप
तुम्हारा नाम पतित पावन कैसे होता?
हे अंतर्यामी!
तुम जो यह नायक बने हुए हो
बताओ तो जरा!
ठीक है कि-
प्रभु से ही होती है जन की पहचान
लेकिन यह भी तो उतना ही सच है कि
प्रभु की पहचान भी अपने जन से होती है
हे मेरे प्रभु!
ऐसा विचार दो
कि शरीर तुम्हारी आराधना करे।
अरे! रैदास को कोई समझावे
(कि) सब (जन) समरस हैं
सब (जन) एक हैं!!

2-जैसे पानी में पुरइन पात

जिस कुल में वैष्णो साधु का जन्म हो जाता है
फर्क नहीं पड़ता कि
वह (स) वर्ण है कि अवर्ण
धनी है कि कंगाल
उसके यश की सुगंध फैल जाती है पूरी दुनिया में
ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र या क्षत्रिय हो
या फिर हो डोम चांडाल म्लेच्छ
सबके मन में (बसता) है वही ईश्वर
भजन से पवित्र वह भक्त
अपने तर जाता है
और तार देता है
अपने दोनों कुलों को
धन्य है वह गांव
धन्य है वह ठांव
धन्य है वह पुनीत कुटुंब
और उसके लोग
जहाँ
बाकी सब त्याग कर
किसी ने पा लिया है
(भक्ति का) असली रस
वह विष जैसी विषय वासनाओं को त्याग
मगन है अपने असली रस में
पंडित हो या सूरमा
या छत्रपति राजा ही क्यों न हो
नहीं कर सकता कोई
(ऐसे) भक्त की बराबरी
जैसे पानी में पुरइन पात की
हरि में है भक्त की भलाई
जन रैदास कहता है- इस जगत में
(ऐसे) भक्त का जन्म ही सार्थक है॥

अनुसृजन : सदानंद साही