युवा कवि। ‘साझा संकलन’ में रचनाएं प्रकाशित।संप्रति प्रखंड शिक्षक।

रेनकोट

शरीर से बरसाती निकालने के बाद भी
उसमें बचा रह जाता है थोड़ा-सा पानी
और यह बचा हुआ पानी
उन मछलियों, नदियों का है
जो पानी के इंतजार में
आकाश की ओर टकटकी लगाए रहती हैं
बारिश के दिनों में
उन मछलियों, नदियों का जीवन है
बारिश का यह पानी
जैसे यह जीवन है धरती का
धरती की प्यास
बारिश के दिनों में बुझती है
और पूरी पृथ्वी हरी-भरी हो जाती है
रेनकोट का यह पानी
सुखने नहीं दूंगा मैं
और सहेज कर रखूंगा
उन मछलियों, नदियों और धरती के लिए।

तुम जाओ

तुम जाना चाहते हो
जाओ पर जाकर भी
तुम कहां जा पाओगे?
बहुत कुछ छोड़ जाओगे यहां भी
जैसे तुम्हारे पायल की खनक
मौजूद रहेगी मेरे कानों में
सब्जी में तुम्हारी उपस्थिति का स्वाद
बना रहेगा जिह्वा पर
हवा में व्याप्त तुम्हारे पसीने की गंध
बनी रहेगी देह पर
पूजा के तुम्हारे तुलसी दल का नित्य भोग
हृदय को सुवासित करता रहेगा
तुम जाओ
पर गुलाब की पंखुड़ियों में छिपी हँसी
दूर्वा पर मौजूद आंखों की नमी
केले के पत्ते पर
बिखरी मन की हरीतिमा
खीर में घुली इलाइची की खूशबू
यहीं छोड़ जाओगे
तुम जाओ पर छोड़ जाओगे
आलमारी में करीने से टंगी साड़ी
तकिये पर अपने हाथों उकेरे फूल
कमरे में चारों ओर सजी तस्वीरें
तुम जाओ पर तुम कहां जा पाओगे?

संपर्क : ग्राम+पो. प्रतापगंज, जिलासुपौल, पिन852125 (बिहार) मो.8877249083