कविता की 18 पुस्तकें प्रकाशित। आलोचना की पुस्तक  ‘शब्द असीमित’। रेल सेवा से अवकाश प्राप्त।

सिद्दीक़ी बाबू

जब आपको लगे आप अकेले हैं
तो चहल पहल में जाइए
सिद्दीक़ी बाबू की तरह

हर शाम
कभी-कभी तो उनकी उदास दोपहरें भी
खिली हुई धूप से सजे-धजे गोलघर में कटती हैं
कंधे पर लहराती ज़ुल्फ़ों वाले किसी आदमी को
पहली बार देखा था गोलघर ने

चाक चौबंद
अपनी आदतों के पाबंद
यूँ तो सिद्दिक़ी बाबू की पाबंदी
रोज़ा नमाज़ की भी नहीं
दिल न दुखे किसी का
बस इसी का एहतराम करते हैं
बाक़ी क्या है दुनिया में अहले वतन
हम किताबों के बीच आराम करते हैं
शाम को ताज़ा सुबह
सुबह को हसीन शाम करते हैं
जिसमें एक क़तरा भी शराब शामिल नहीं

घर में भी ऐसे रहते
जैसे बस कहीं निकलने ही वाले हैं
या शायद अभी-अभी लौट कर आए हैं कहीं से
बहाना मिला नहीं
कि सिद्दीक़ी बाबू अपनी
वेल मेंटेंड ‘आस्था’ के बाहर
अब कौन भला साढ़े चार किलोमीटर
पेट्रोल जला कर हाई-फाई माल में
अरजेंटीना का आलू लेने जाएगा अलावा उनके
पादरी बाज़ार से असुरन के बीच
क्या नहीं मिलता
सिवा गोलघर की ख़ुशबू के

स्पीकर लगाए ठेलों से आलू ख़रीदते
किसी हुसैन नगरवासी ने देखा हो तो बताए
सिद्दीक़ी बाबू ऐसे लोगों से बहस ही नहीं करते
जिनके लिए आलू तो आलू है
अरजेंटीना का हो या नौगढ़ का

वो एक लफ़्ज़ है न लज़्ज़त
बस उसी के दीवाने हैं सिद्दीक़ी बाबू
न भी हो तो ढूंढ लेते हैं अपने हिसाब से
इंसान में भी

उत्सवधर्मी हैं सिद्दीक़ी बाबू
लोग भी ढूंढ़ लेते हैं उन्हें कहां कहां से
किसी को लिट फेस्ट करना है
किसी को गोरखपुर महोत्सव
किसी को दुर्गा मंडपों की प्रतियोगिता
तो किसी को रस्में इज़रा का संचालन
लोग ढूंढ़ ही लेते हैं उन्हें
जैसे बाज़ार ढूंढ लेता है हमें
और अपना प्रोडक्ट बेच सलाम कर लेता है
बस इतना जान भर लें सिद्दीक़ी बाबू
कि फलनवा सही में दुखी है
तो दरवाज़े से ख़ाली हाथ नहीं जाने देते
बायां हाथ भी नहीं जान पाता
कि दाएं ने क्या किया
लिए का भले रखते हों
दिए का कोई हिसाब नहीं रखते
मगर समझते रहे अपने को वेट्रन रंगकर्मी
कइयों का मेकअप और डायलॉग डिलिवरी
भांप नहीं पाते
छेड़ो तो कह कर टाल देते हैं
मर्ज़ी ऊपरवाले की

हैं सब
मगर हैं वही मियां वही बीवी
कितना कोई पढ़े लिखे, टीवी देखे, गाना सुने
फ़ोन पर दोस्तों की खैरियत ले
पहले जब भाभी जी के हाथों में दम था
महफ़िलें सजती थीं
मेहमान नवाज़ी कोई सिद्दीक़ी साहब से सीखे

अच्छे लोग अकेले क्यों पड़ जाते हैं, मैंने पूछा
तो हँस कर बोले देवेंद्र भाई
ज़िंदगी एक समूह गान है
जिसमें हर कोई अकेले गाता है
मुझे तो आपको देख कर सब्र आता है

दोस्तो
आपको भी जब लगे कि आप अकेले हैं
तो चहल पहल में जाइए
बोलिए बतिआइए
अकेलेपन की सुरंग में खो जाने से बेहतर
भीड़ के झाड़ झंखाड़ से होकर गुज़रना
सिद्दीक़ी बाबू की तरह

मैं तो गोलघर जाने के बजाय
संत हुसैन नगर चला जाता हूँ
मीठी नीम की सुगंध बटोरने

अपने गमकते अकेलेपन को छुपाए
किसी किताब या पत्रिका के आने की
पहली सूचना की तरह मिलते हैं सिद्दीक़ी बाबू
आप मिल कर मादक चांदनी सा महक उठेंगे।

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