
युवा कवि। फिलहाल अध्ययनरत।
पहाड़ हो जाना
मैं पहाड़ हो चुका हूँ
प्रेम में
वह एक नदी थी
जिसे जाना था दूर
सागर में
मैं मौन स्तब्ध
एक जगह स्थिर
देखता रहा उसे जाते हुए एकटक
मैंने कहीं पढ़ा था :
नदियां कभी पहाड़ों की प्यास नहीं बुझातीं!
तुम्हारे जाने से
मुझे देह से जन्म मिला
एक बार
और एक बार ही
मेरी मृत्यु होगी देह से
इसके इतर
तुम्हारे आने से मुझे मिला था
पुनःजीवन
और देखना तुम
मेरी मृत्यु होगी एक बार फिर
तुम्हारे जाने से!
तुम आना
तुम आना
जैसे आता है कोई
विचार
एकाएक
मैं लिख लूंगा तुम्हें संभालकर
अपनी डायरी के
किसी पन्ने पर
और कह दूंगा तुम्हें
अपनी
सबसे प्यारी
कविता!
बारूद और गुलाब
जब दूर दूर तक
देखने पर दिखाई देगा केवल और केवल
काले बारूदी धुंए का गुबार
जब ढक दिया जाएगा सूर्य उसी धुएं से
इस धरती को फेंक दिया जाएगा
किसी अंधेरे कमरे में
तब देखना तुम
प्रेम आएगा
किसी आवारा बादल की तरह
क्रांति लिए
और फिर से निकलेगा सूर्य
उतना ही निश्छल बनकर
जितना कि होता है एक शिशु!
धरती खो देगी अपना बांझपन
तब मैं नही मिलूंगा तुम्हें
उन बुद्धिजीवियों के बीच
जो युद्धों के कारणों पर कर रहे होंगे बहस
किसी एसी रूम में बैठकर
तब तुम मुझे पाओगी
किसी खेत में जहां मैं
बो रहा होऊंगा गुलाब
मैं चाहता हूँ
आने वाली पीढ़ियों को मालूम ही न हो
बारूद की गंध!
राम नगर कॉलोनी, जौरा, जिला – मुरैना मध्यप्रदेश-476221 मो.7694027720

