युवा कवि। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित। कविता संकलन : ‘नूह की नाव’,  कहानी संग्रह : ‘स्टिंकी टोफू’।

शीशै* को शुक्रिया में बदलते हुए

भारत को विचित्र आंखों से देखता हुआ
नौ साल बाद मैं ताइवान से लौट आया हूँ
स्वदेश की परिभाषा एक अनुत्तरित प्रश्न है

ब्लूबेरी क्रंबल की याद में
खाता हुआ गाजर का हलवा
मैं दोबारा अपने परिवार के बीच
लंबे समय तक रहना सीख रहा हूँ

हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में
जियारत करते हुए
मेरे हाथ में है देसी गुलाब की भेंट
मेरी याद में हैं प्लम ब्लॉसम के पेड़

एक अरसे बाद छुए
मिट्टी लगे नए आलू
मेरे बचपन में कस्बे की सब्जी मंडी में
बैठनेवाली तब की नव विवाहिताएं
अब माई कही जाने लगी हैं
क्या ताइवान में किसी ने इस महीने
‘सूसू’* कहा होगा
मीठी मुस्कान वाले उस आदमी को
जो आरटी मार्ट में
फलों पर प्राइस टैग लगाता था?

न ताइवान जैसी छोटी, न राजस्थान जैसी बड़ी
मेरी हाल की कविताओं में
मध्यम आकार की आंखों वाली
काल्पनिक लड़कियां हैं
इतने भले पंछी हैं कि
बचपन का सुलेख याद आता है-
फलां पक्षी एक भोला पक्षी है

ताइवान के आसपास के पानी में
अब भी घूम रहे हैं चीनी युद्धपोत
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आकर
मैं फिक्रमंद हूँ-
आखिर कब तक बच पाएगा
वह छोटा-सा लोकतांत्रिक जजीरा
जिसे दुनिया के ज्यादातर मुल्क
बाकायदा एक मुल्क भी नहीं मानते।
(*चीनी भाषा में ‘थैंक यू’ को ‘शीशै’ और ‘अंकल’ को ‘सूसू’ कहते हैं।)

तल में जहाज

जहाज
बीच रास्ते में डूब गए जो

उनके मस्तूलों पर बंधे पाल
बरसते हैं हम पर
उनके यात्रियों का अंश
मौजूद है मछलियों की संतति में

समुद्र के गहरे तल में
कहीं मिल जाएंगे
पिंजर उंगलियों से फिसल गए
हो गई सगाइयों
और न हो पाई शादियों के छल्ले

हम उनकी
होने से रह गई संतानें हैं।

संपर्क :‘सरोज सदन’, 100 ए, गुलमोहर पार्क, फेज-1, महल रोड, रामनगरिया, जगतपुरा, जयपुर- 302017 मो. 9784972672