
कविता–संग्रह ‘सुनो कौशिकी’, ‘महाप्रस्थान के पीछे’, ‘अब तो दे दो मुझे अंधेरा यह’ कहानी–संग्रह ‘मानुस कंपनी’ प्रकाशित।
ग़ज़लें
(1)
दिखा जो भी इशारों में, कहा वो ही इशारों में
हमें डर है कि बंट जाएं इशारे भी न नारों में
हमें कहनी ही पड़ती है इशारों में ही कहते हम
सचाई है कहां शामिल जुबां के कारोबारों में
चलो अब दूर चलते हैं वहां से देखते हैं फिर
नजर आता नहीं नजदीक से कुछ भी नजारों में
असर मौसम का है ये या है नजरों का कोई धोखा
ये कैसे फूल कागज के भी खिलते हैं बहारों में
सभी जब पूछने आते खुदा का राज हमसे भी
तभी लगता कि हम भी हैं खुदा के राजदारों में।
(2)
छा गई है धूल जो वो ही सचाई हो गई
अब जमीनी बात भी जैसे हवाई हो गई
सांस रोके लोग सड़कों से घरों में जा रहे
अब हवा बाहर की क्या इतनी कसाई हो गई?
सीढ़ियां संसद की कितनी हैं चमत्कारी कि देख
सीढियां चढ़ते-उतरते ही कमाई हो गई
सर्द रातों की हवा का अब असर होता नहीं
हो गई धरती बिछौना, शब रजाई हो गई
अब किसी की रीढ़ सीधी ही कहां रह पा रही
जिंदगी जैसे कि ढीली चारपाई हो गई
झोपड़ी में आ गए पत्तल पे खाने के लिए
कौर पहली क्या उठी, फोटो खिंचाई हो गई
पीर जब तक थी दवातों में महज इक रंग थी
वो दवातों से जो निकली रोशनाई हो गई।
संपर्क : मुख्य प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, पुणे मुख्य शाखा, डॉ बी आर अंबेडकर रोड, कलेक्ट्रेट कंपाउंड, पुणे, महाराष्ट्र– 411001 मो.8806668710

