वरिष्ठ रचनाकार। अब तक दस कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक संपादित पुस्तक। नवीनतम कहानी संग्रह-‘एक नदी थी यहां’। एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त।

दिन खाली था और सन्नाटा भरा था। कुछ भी काम करने का मन नहीं हुआ तो उन्होंने एक बहुत पुरानी अलबम उठा ली। उसे खोलकर देखने लगे। उसमें सारे चित्र श्वेत-श्याम थे। वह जमाना रंगों का था भी नहीं, कम से कम आज जैसा तो कतई नहीं था। चित्र भी सब पुराने थे और लगभग घिस रहे थे। वे एक-एक चित्र देखने लगे और उन चित्रों के साथ पुरानी यादें ताजा करने लगे। एक पृष्ठ पर एक बड़ा-सा चित्र लगा हुआ था, अकेला। उन्होंने ध्यान से देखना शुरू किया। वह नाना-नानी परिवार का समवेत चित्र था। उसमें नाना-नानी थे, मां थी, दोनों मामा थे, मामियां थीं और दोनों मौसियां भी। अब इनमें से कोई शेष नहीं हैं। नाना-नानी तो जब वे हाई-स्कूल इंटर में थे तभी दो-एक साल के अंतराल पर निकल लिए थे। मां को गुजरे भी जमाना हो गया है। मामा-मामियां भी एक-एक कर चल दिए हैं। दोनों मौसियां भी अब इस धरती पर नहीं रहीं। यानी उस चित्र के सभी चरित्र कबके जा चुके हैं। आखिर वे भी तो साठ वर्ष के हो गए हैं। अभी कुछ महीने पहले ही रिटायर होकर घर बैठे हैं। लेकिन…

…अचानक ही जैसे स्मृति में जबरदस्त खचबच हुई। छोटी मौसी कब गुजरीं? उन्होंने आश्चर्य से सोचा। गुजरीं भी कि नहीं? उनके चले जाने का कोई समाचार सुना हो, याद नहीं पड़ रहा है। वे एकदम गड़बड़ा गए। इस सवाल में इतने उलझे कि बाहर कब बादल लगे और कब बूंदाबूंदी शुरू हुई, एकदम से पता ही नहीं चला। भागे हुए बाहर गए और सूखने के लिए तार में डले कपड़े बटोरकर ले आए। पत्नी एक निमंत्रण में आज बाहर गई हुई है। घर में वे अकेले हैं। एक उम्र के बाद अब ऐसा ही होने लगा है। बेटी विवाह के बाद अपने पति के साथ दिल्ली में है। दोनों पति-पत्नी नौकरी करते हैं। बेटे भी अपनी-अपनी गृहस्थी में भारत से बाहर हैं। कपड़े गीले हुए होंगे तो पत्नी की ‘तुम तो एकदम लापरवाह हो’ का फिकरा तो सुनना ही पड़ेगा। चलो वह तो सुन लेंगे, पर बड़ा सवाल तो यह है कि छोटी मौसी का क्या हुआ? उनके बारे में कभी कुछ सुनने में क्यों नहीं आया? उनको भी जानेवालों की सूची में डालकर अपने में इतना मशगूल हो जाना, ये तो कोई बात नहीं हुई, खासतौर से तब तो कतई नहीं जबकि छोटी मौसी भी उनके लिए मां जैसी ही थी, मां से कम नहीं थी।

जाने कितने सालों बाद एलबम में घिसे इस एक चित्र ने उन्हें सीधे मौसी की गोदी में धकेल दिया था।

उन दिनों माता-पिता समेत उनका पूरा परिवार अल्मोड़ावाले अपने घर में रहता था। जाड़ों की लंबी छुट्टियों में वे सभी कुछ दिनों के लिए ननिहाल चले जाया करते थे। केवल पिता ही नौकरी के चलते अल्मोड़ा में रुके रहते। आते भी तो सिर्फ दो-एक दिन के लिए और फिर वापस लौट जाते। शुरू-शुरू में ननिहाल के घर में खूब चहल-पहल रहती। तब भरापूरा परिवार था। धीरे-धीरे दोनों मामा फौज में चले गए, शादी-ब्याह होकर उनका घर भी बस गया। दोनों मौसियों की भी शादी हो गई। ननिहाल सूना हो गया। हालांकि जाना अब भी होता था, पर अब जाड़ों की छुट्टियों में न जाकर परीक्षाओं के बाद गर्मियों में सप्ताह भर के लिए जाना होता था। हालांकि अब उन्हें ननिहाल जाना अच्छा नहीं लगता था। वहां जाने का कोई आकर्षण भी नहीं रह गया था। उनका करीबी रिश्ता छोटी मौसी के साथ था। वह बहुत मोहिली थीं, उन्हें बहुत स्नेह करतीं। उन्हें अपने साथ जंगल, खेत सब जगह ले जातीं। हिसालु के छोट-छोटे रसभरे फल टीप-टीप कर उन्हें खिलाती। काफल के पेड़ पर चढ़ जाती, लाल जामुनी रंग में पके हुए काफल आंचल में भरकर तोड़ लाती। गोठ में जाकर गाय का दूध छोटी मौसी ही दुहा करती। कई बार उन्हें भी अपने साथ गोठ ले जाती। दिखाती कि दूध कैसे दुहा जाता है। एकाधिक बार दूध दुहते-दुहते उन्होंने गाय का थन तिरछा कर दूध की धार उनके चेहरे की ओर मारी थी। दूध की धार से चेहरा भीग गया था। वह बुरी तरह अचकचाया तो मौसी जोर से खिलखिला दी थी। उनकी खिलखिलाहट पर गाय ने भी मुड़कर पीछे की ओर देखा था और लगा जैसे गाय भी हँस दी हो। सच में, उनके प्रति छोटी मौसी अगाध मोह से भरी हुई थी। उन्हें भी गोदावरी मौसी का अपने प्रति वह मोह अद्भुत लगता था। हां, छोटी मौसी का नाम गोदावरी ही था।

छोटी मौसी का जब विवाह हुआ था तो वे उसमें शामिल होने ननिहाल नहीं जा सके थे। उनकी परीक्षाएं चल रही थीं। फिर कुछ ऐसा हुआ कि कुछ समय तक ननिहाल जाना ही नहीं हो पाया। वह अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा से बाहर चले गए थे। बीच-बीच में अल्मोड़ा आना जरूर होता, पर ननिहाल की ओर निकलना नहीं हो पाता था। वक्त गुजरता गया। उनकी नौकरी भी लग गई और वे अल्मोड़ा से बाहर अहमदाबाद निकल गए थे। एक दिन सुना, शादी के तीन साल बाद भी कोई संतान नहीं दे पाने के कारण छोटी मौसी के साथ ससुराल में बुरा व्यवहार होने लगा है। छोटी मौसी के ससुराल के ही किसी व्यक्ति ने नाना को बताया था। सुझाव भी दिया था कि हो सके तो अपनी बेटी को जल्द से जल्द वापस ले आएं…। सुनकर बदहवाश से नाना भागे-भागे गए थे और छोटी मौसी को वापस अपने साथ ले आए थे। सुनकर उन्हें भी बहुत बुरा महसूस हुआ था।

उस बार जब वे कुछ दिनों की छुट्टी पर अल्मोड़ा आए थे तो मां से छोटी मौसी के बारे में सुनकर बहुत बुुरा लगा था। अब ननिहाल में बुढ़ापे के अंतिम छोर पर खड़े नाना-नानी थे और छोटी मौसी थी। घर का सारा जिम्मा अब छोटी मौसी पर ही था। गोठ के जानवरों के लिए घास-पात, खेतीबाड़ी, धारे से पानी लाना वगैरह, यानी रसोई से जंगल तक के सारे काम, सबकुछ छोटी मौसी के ही जिम्मे थे। पहाड़ की जिंदगी में वैसे भी काम की कोई कमी नहीं होती। जब कभी कोई मामा सपरिवार छुट्टी पर गांव आते तो काम का बोझ इतना बढ़ जाता कि छोटी मौसी थककर दोहरी हो जाती।

मां बताते-बताते रुआंसी हुई थी। गला भर आया था। बोली, ‘बेचारी! भाग की मरी हुई निकली। उसके भाग में अब जीवन भर मायके की मजदूरी बदी है। पर तुझे बहुत याद करती है, बहुत मानती रही है तुझे। हो सके तो एक बार मिल आ जाकर।’

वे खुद भी यही सोच रहे थे। दूसरे दिन ही वे चल दिए थे। छोटी मौसी के लिए साड़ी-ब्लाउज लिया था। नाना-नानी के लिए फल व मिठाई ली थी। शाम तक ननिहाल पहुंचे तो उन्हें कोई नहीं पहचान पाया था। जब अपना परिचय दिया तो नाना-नानी का खुशी से दमकता चेहरा देखने काबिल था। दोनों का लाड़ व आशीर्वाद उन पर बरस पड़ा था। और छोटी मौसी? वह तो उनसे लिपटकर बुरी तरह रो पड़ी थी। सावन-भादो की बारिश मानो एक साथ शुरू हुई थी जो थमने का नाम नहीं ले रही थी। वह बड़ा ही कारुणिक रुदन था।

छोटी मौसी अब वैसी नहीं रह गई थीं। रंग संवला गया था। चेहरे की आभा नदारद थी। शरीर कंकाल सरीखा लगने लगा था। झुर्रियां भी खिंच आई थी। देखकर बुरा लगा था।

दूसरे दिन जब वे लौटने लगे तब भी छोटी मौसी उनसे लिपटकर खूब रोई थी। वह बुदबुदा रही थी, ‘तू दीदी का ही नहीं, मेरा भी बेटा है। मेरी भी आशल-कुशल लेते रहना, मेरा कोई नहीं है अब…’ नाना-नानी भी रुंधे कंठ से बोले थे, ‘हमारे पांव तो अब शमशान पर लटके ठहरे, नातिऽ। हो सके तो इस भाग्यहीन बेचारी का भी कभी-कभी ख्याल रख लिया करना।’ वे दोनों भी छलक पड़े थे।

तब से कितनी तो दुनिया बदल गई है। नाना-नानी गुजर गए, मां-बाबू भी नहीं रहे। दोनों मामा-मामी भी अब इस धरती पर नहीं हैं। बड़ी मौसी के भी गुजर जाने की अच्छी तरह याद है। पर छोटी मौसी? उनकी तो कोई खबर ही नहीं है। पहले मां से उनके बारे में कुछ न कुछ जानकारी मिलती रहती थी। पर मां को भी दुनिया छोड़े हुए कई साल हो गए हैं। जिंदगी की आपाधापी में कुछ भी तो याद नहीं रहा। कौन कहां है, कैसा है? अल्मोड़ा छूटे हुए भी जमाना हो गया। मन अपने को अनायास ही धिक्कारने लगा था।

तो क्या एक बार ननिहाल के उस खूबसूरत पहाड़ी गांव में जाकर पता किया जाए कि छोटी मौसी हैं भी कि नहीं? होंगी भी तो पता नहीं किस हाल में हों, किसके सहारे हों? उनका मन अपराधबोध के भाव से भरने लगा था।

उन्होंने ट्रेन का आरक्षण करवाया था और चल पड़े थे। पत्नी भी चलना चाहती थी, पर उन्होंने मना किया था। पता नहीं वहां क्या स्थिति हो, क्या नहीं? चलते हुए मौसी के लिए दो साड़ियां ली थीं। हल्द्वानी से जब पहाड़ की ओर चढ़े थे तो भवाली से कुछ फल-फूल खरीद लिए थे। अल्मोड़ा से बाल मिठाई व सिंगौड़ी भी ली थी। उन्हें ताज्जुब हुआ, अल्मोड़ा एकदम बदला हुआ था। वैसा नहीं रहा था जैसा अपने बचपन में उन्होंने देखा था। अल्मोड़ा से ननिहाल की दिशा में जाने के लिए पहले सुबह केवल एक बस जाया करती थी। बस जहां रुकती थी, वहां से गांव तीन कोस दूर होता था। सो पैदल भी जाना पड़ता। पर अब सारी तस्वीर बदल गई थी। अब ननिहाल के गांव तक भी सड़क बन गई थी और उस दिशा में शाम तक भी जीप चला करतीं। उस वक्त दिन के दो ही बज रहे थे। वे उस दिशा को जाती जीप पर सवार हो गए थे।

ननिहाल के अपने गांव पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई थी। चंद कदम पैदल चलने के बाद ही वे गांव में दाखिल हो गए थे। गांव आज भी लगभग वैसा ही था, उसी तरह बसा हुआ। मकान के सामने खड़े हुए तो एकदम सन्नाटा था। शाम धीरे से संवला रही थी। एकाएक चिंता हुई कि अगर छोटी मौसी नहीं हुई तो वे रात में कहां जाएंगे? किसके पास ठहरेंगे? तभी गोठ का हल्का-सा उघड़ा हुआ द्वार धीरे-से पूरा खुला था और एक कृशकाय महिला हाथ में बरतन लिए बाहर निकली थी। वह कदाचित दूध का बरतन था। महिला गोठ से दूध दुहकर निकल रही थी। उनकी ओर महिला का ध्यान नहीं गया था। वह दूध के बरतन को सीढ़ी पर रखकर गोठ का दरवाजा बंद करने लगी थी। जब दरवाजा भलीभांति बंद हो गया तो वह मुड़ी, दूध का बरतन उठाया और सीढ़ी चढ़ने का उपक्रम करने ही वाली थी कि उनपर उसकी नजर पड़ी। वह एकदम ही अचकचाई। एक अजनबी आदमी, जिसके एक हाथ में अटेची व दूसरे हाथ में एक थैला था, वहां ऐन गोठ के सामने नीम अंधेरे में क्यों खड़ा था? वह एकाएक ही घबराई थी, घबराहट में ही पूछा था, ‘कौन हो तुम? यहां क्या कर रहे हो?’ वे भी उसे नहीं पहचान पाए। क्योंकर पहचान सकते थे भला? बीच में समय का इतना बड़ा अंतराल था, शक्लें बदल गई थीं और देह की संरचना भी। उन्होंने पूछा, ‘तुम छोटी मौसी हो न, गोदावरी मौसी?’

दूघ का बरतन गिरते-गिरते बचा था। बरतन को दुबारा सीढ़ी पर रखकर वह उनके करीब आई थी। पूछा, ‘तू चंदू है, चंद्रप्रकाश? बड़ी दीदी का बेटा, मेरा बेटा…?’ उत्तर का इंतजार किए बिना वह उनसे सीधे लिपट गई थी, रोने लगी थीं धरासार। उनकी आंखें भी छलछला उठी थीं। भीतर का पश्चाताप छलक पड़ा था। पता नहीं कितनी देर तक दोनों उसी स्थिति में बने रहे। तभी ऊपर घर की देहरी पर मंद गति में रोशनी फेंकती लालटेन लिए कोई और एक महिला नमूदार हुई थी। वह महिला खड़ी रही उसी तरह, जस की तस। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ये गोदावरी किससे लिपटकर रो रही है? कौन है यह आदमी? तभी मौसी ने अपने को अलग किया था। आंखों से लगातार बह रहे आंसू पोछे थे। ऊपर देहरी पर लालटेन लिए खड़ी महिला को संबोधित करती बोली थी, ‘जानती है भागीरथी, कौन आया है? मेरा चंदू आया है, मेरा बेटा चंद्रप्रकाश…’ मारे उल्लास के वह इतनी गदगद थी कि उससे ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था। वाणी अटपटी हो रही थी। बोली, ‘भागीरथी दूध का बरतन उठा ले।’ फिर उनसे मुखातिब होती बोली, ‘चल, अंदर चल।’

दोनों अंदर चाख में चले आए। चाख में एक  तखत पड़ा था, जिस पर पुरानी-सी एक दरी बिछी थी। वे वहीं पर बैठ गए। बाहर अब भी थोड़ी-बहुत रोशनी थी, पर चाख में अंधेरा उतर आया था। सामने एक स्टूल पड़ा था, जिस पर लालटेन रख दी गई। अंधेरे को चीरती हल्की रोशनी उभर आई थी। दूसरी महिला दूध का बरतन लेकर अंदर जाने लगी तो छोटी मौसी ने उसे रोका था। बोली, ‘भागीरथी, येऽ मेरी बड़ी दीदी का बेटा है। मैं भी इसे अपना बेटा ही कहती थी। जब तक अल्मोड़ा में ही पढ़ता था, हर साल यहां आता था, अपने मालाकोट। फिर जो ये अल्मोड़ा से बाहर निकला तो कभी लौटकर इधर नहीं आया। जानने की भी कोशिश नहीं की कि मालाकोट के क्या हाल हैं? इसकी छोटी मौसी कैसी है? है भी कि नहीं?’ मौसी का गला भर आया था, आंखों से फिर आंसुओं की झड़ी लग गई थी। ‘और आज जब खुद भी बूढ़़ा हो गया है, यहां आया है, पता नहीं मुझसे मिलने या…।’ छोटी मौसी की वाणी अवरुद्ध हो गई थी।

कुछ देर के लिए माहौल एकदम गंभीर हो गया था। जल्दी ही अपने को संभालती मौसी बोली थी, ‘येऽ भागीरथी है। मालाकोट के रिश्ते से तेरी मामी लगेगी।’ वे खड़े हुए। झुककर उन्हें प्रणाम किया। वह भी मौसी की तरह ही वृद्धा थी। उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘सदा खुश रहो।’ अंदर की ओर मुड़ती हुई बोली, ‘अब तुम हाथ-मुंह धोलो। मैं फिर चाय बनाती हूँ।’

उन्होंने सूटकेस से अपने चप्पल निकाले। तौलिआ निकाला। कुरता-पायजामा निकालकर तखत पर रख दिया। मौसी लालटेन लेकर साथ चलने लगी तो वे बोले, ‘इसकी जरूरत नहीं है मौसी, मेरे पास टार्च है।’ पर बाहर चांदनी थी। आंगन के एक कोने में खड़े-खड़े उन्होंने हाथ-मुंह धोया। तौलिआ से मुंह पोछते हुए चारों ओर देखा तो चकित हुए। सामने के गांवों में बिजली के लट्टू चमचमा रहे थे। तो क्या इस गांव में बिजली नहीं आई है? चारों ओर घूमकर निगाहें फिराई। गांव में भी बिजली दिखाई दे रही थी।

चाख में वापस लौटे। सफर के कपड़े बदलकर कुरता-पायजामा पहना और आराम से तख्त पर बैठ गए। भागीरथी मामी चाय ले आई थी। साथ में गुड़ की डली थी। बोली, ‘भानिज, चीनी तो नहीं है।’ स्वर में संकोच था। वे झट से उठे। सूटकेस के साथ जो थैला था उसे खोला, उसमें से दो डिब्बे निकालते हुए बोले थे, ‘इसमें अल्मोड़ा की मिठाई है। इस वक्त चाय के साथ मिठाई खाओ। और मौसी, इस थैले में थोड़े-बहुत फल भी हैं, तुम दोनों के काम आएंगे।’

तीनों ही चाय पीने लगे। उन्होंने चाख की खिड़की खोल दी थी। बाहर दूर गांवों में बिजली देखकर याद आया। पूछा, ‘क्यों मौसी, तुमने बिजली…।’ मौसी बीच में ही हँसी। बोली, ‘कहां की बात कर रहा है तू? बिजली लेने के लिए पैसा चाहिए। बिजली क्या अब तो पानी के नल भी लग गए हैं। लोग पानी के लिए अब धारे नहीं जाते। पर हमारे लिए सब एक जैसा ही ठैरा। दो-एक गगरी पानी तो लोगों के नलों से मिल ही जाता है। वरना इस उमर में धारे जाना, धारे से पानी लाना आसान नहीं था। वह तो इस बेचारी के मायके का एक रिश्तेदार है, भतीजा लगता है इसका, वह कभी-कभी सौ-दो सौ रुपए इसे भेज देता है। उससे जिंदगी की थोड़ी-बहुत गाड़ी खिंच जाती है।…’

‘मतलब तुम दोनों…’ । वे कुछ पूछना चाहते थे। छोटी मौसी शायद उनका मंतव्य समझ गई थी। बीच में ही बोली, ‘हम दोनों का एक ही जैसा मामला ठैरा, चंदू। ये भी अकेली, मैं भी अकेली। दोनों के आगे-पीछे कोई भी आसरा नहीं हुआ। दोनों की एक जैसी ही उमर ठैरी। हमने सोचा अकेले से दो भली। साथ रहती हैं तो जिंदगी आसान हो गई ठैरी। नहीं तो दिन तो जैसे-तैसे निकल जाता है, पर अकेली रातें, वह भी इस उमर में भौत मुश्किल होनेवाली ठैरी। सो मैं और यह भागीरथी अब एक साथ रहते हैं। सोचा, जब तक जिंदगी है साथ रहेंगे, साथ ही झेलेंगे, फिर एक तो पहले जाएगा ही, तब जो पीछे रह जाएगा…’ छोटी मौसी की आंखें भर आईं। आंखें भागीरथी मामी की भी डबडबा उठीं। माहौल एकदम करुणार्द्र हो उठा। इस स्थिति को तोड़ने की कोशिश में उन्होंने पूछा था, ‘मामी का मकान कहां पर है?’

‘है न यहीं पर, इसी बाखली में पांचवां मकान ठैरा। अभी तेरे आने से पहले गई थी अपने मकान पर, संध्या दीया-बाती करने। जानता है, हमने तय किया हुआ है कि पंद्रह दिन हम इस घर में रहेंगे और पंद्रह दिन उस घर में ताकि कोई भी घर लगातार बंद न रहे। बंद घर भुतहा हो जता है। वैसे भी शाम को दोनों घरों में दीया-बाती तो करनी ही ठैरी, वह तो रोज होती ही है। जब उस घर में रुकने की बारी आती है तो मैं यहां शाम को आकर दीया-बाती कर जाती हूँ…।’

वे चकित थे। बोले, ‘हाथ जोड़ता हूँ तुम दोनों को, तुम दोनों के निर्णय को।’

‘अच्छा मैं उठती हूँ, गोदावरी। रसोई देखती हूँ। भानिज को भूख लग रही होगी।’ भागीरथी मामी उठने लगी तो छोटी मौसी बोली, ‘मैं भी आ रही हूँ, ठहर।’

‘न, न। तुम बैठी रहो यहीं पर। बेटे के साथ गप्पें लगाओ।’ भागीरथी मामी अंदर चली गई। अंदर एक कोने में धुआं फेंकती ढिबरी जल रही थी। शायद वही रसोई का कोना था। पर पहले तो रसोई कहीं अलग हुआ करती थी, उन्होंने याद करने की कोशिश की।

‘और मौसी, खेती-बाड़ी का क्या करती हो तुमलोग?’ उन्होंने पूछ लिया, हालांकि समझ रहे थे कि खेती-बाड़ी अब इन दोनों के बूते की बात कहां रही होगी। पहाड़ों में बड़ा जटिल काम है यह। जवान औरत-मर्द ही संभाल पाते हैं। सुनकर मौसी हँस दी थी। बोली, ‘अब खेती-बाड़ी की उमर कहां रह गई ठैरी? वह तो गांव अच्छा है हमारा, इस जमाने में भी अपनापा बरतनेवाला। कहने को तो अब पहाड़ के गांव खाली हो रहे ठैरे। पर हमारा गांव अभी आधे से ज्यादा यहीं है… भागा नहीं यहां से। जहां तक खेती-बाड़ी की बात है, मेरे और भागीरथी के सभी खेत बुद्धिबल्लभजी के पास हैं। वही सब करते-धरते हैं। तू कहां जान पाएगा बुद्धिबल्लभ जी को। गांव में उनकी एक दुकान भी है। खेतों में जो फसल होती है, ईमानदारी से आधा बांट जाते हैं। फसल का भी क्या ठैरा, किसी साल ठीक बखत पर बारिश हो गई और जानवरों के उत्पात से फसल बच गई तो ठीक, नहीं तो कभी-कभी अकाल जैसी गत भी हो जाती है। बेचारे भले आदमी हैं बुद्धिबल्लभ जी। गेहूं, धान, मादिर, मड़ू, गहत, भट जो भी हमारा हिस्सा बननेवाला हुआ, यहीं आकर दे जाते हैं। बल्कि धान हम इस उमर में कैसे कूट पाएंगे सोचकर, खुद ही धान कुटवाकर चावल भिजवा देते हैं। सो, हम दोनों का काम चल जाता है। अब इस उमर में अन्न की जरूरत ही कितनी होती है। इस उमर तक तो आहार भी चिड़ियों जैसा हो जानेवाला ठैरा।’ छोटी मौसी अपनी ही उक्ति पर हँसी, पल भर रुकने के बाद बोली, ‘बाकी लूण, तेल गुड़ की भेली, चाय पत्ती, मसाले जैसी चीजें बुद्धिबल्लभ जी की दुकान से ले आते हैं। भागीरथी के पास कभी-कभी जो दो सौ रुपए का मन्यौडर आता है, उससे यह सब भी चल जाता है। कभी जब पैसे नहीं हुए तो बुद्धिबल्लभ जी के दुकान से ही उधार ले आते हैं।…’

छोटी मौसी चुप हो गई। कुछ पल चाख में चुप्पी बनी रही। बाहर अब पूरी तरह अंधेरा उतर आया था। एकदम सन्नाटा। अंदर रसोई में सब्जी छोंकने के अलावा कुछ खटर-पटर की-सी आवाजें आ रही थीं। छोटी मौसी ने अचानक पूछा, ‘तू और तो चाहा नहीं पीएगा? बनवाऊं?’

‘नहीं, मौसी…। चाय मैं बहुत कम पीता हूँ। डॉक्टर भी मना करता है।’ उन्होंने कहा तो छोटी मौसी ने चिंतित होते हुए पूछा, ‘क्यों, क्या हो गया तुझे?’

‘अरेऽ कुछ नहीं। थोड़ा-बहुत तो लगा ही रहता है।’ उन्होंने टाला। पूछा, ‘गांव के लोग कुछ मदद करते हैं कि नहीं?’

‘करते हैं, बेटा…करते ही हैं। मैंने बताया न तुझे, गांव अच्छा है हमारा। बखत-बेबखत पूछताछ करते रहते हैं। गांव के जो बेटे बाहर नौकरयों में हैं, वे भी जब छुट्टी पर आते हैं, हमारे लिए भी गुड़ की भेली, मिसरी या मिठाई कुछ न कुछ जरूर लाते हैं। छुट्टी से वापस जाते बखत भी मिलने आते हैं, हाथ में जबरदस्ती बीस-पचास रुपए भी दबा जाते हैं। बेटियां भी जब मायके आती हैं, आकर पांव छूती हैं, गले मिलती हैं। तब लगता है हम अकेले नहीं हैं, हमारे भी कोई न कोई हैं।…’ छोटी मौसी की आंखें फिर छलछला उठी थीं। तत्काल ही छोटी मौसी ने अपने को संभाला था। बोली, ‘चल अंदर चलते हैं। भागीरथी ने लगता है पूड़ियां तलनी शुरू कर दी है।’

लालटेन लेकर छोटी मौसी अंदर रसोई में चली आई। उन्होंने छोटी मौसी का अनुसरण किया। भागीरथी मामी से वह बोली, ‘ढिबरी बुझा दे। और ये क्याऽ, तू पूड़ियां निकालने लगी?’

भागीरथी मामी बोली, ‘तेरा बेटा, मेरा भानिज कितने साल बाद आज गांव आया है। सूखी रोटी से उसका स्वागत करती क्या? एक कटोरे में जरा ताजा दही निकाल दे, तब तक मैं थाली लगाती हूँ।’

पहाड़ का भोजन स्वादिष्ट तो होता ही है, पर वह इतना स्वादिष्ट भी होता है, यह कभी अनुभव नहीं किया था। आलू की रसेदार सब्जी, कटोरे में ताजा दही व गरमागरम पूड़ियां, उन्हें आनंद आ गया। यह आस्वाद पहाड़ के पानी का तो था ही, पर भागीरथी मामी व छोटी मौसी के भीतर के सात्विक स्नेह का रस भी उसमें घुला हुआ था। काश, कि वे पत्नी को भी साथ ला पाते। मुग्ध हो उठती वह। पर नहीं ला सके इसलिए कि गांव में पता नहीं शौचालय व नहाने की क्या व्यवस्था हो। हो सकता है गांव में कुछ लोगों ने अपने शौचालय व स्नान-कक्ष बना लिए हों, पर छोटी मौसी के लिए वह कहां संभव था? वैसे भी, चलते समय तक यह भी कहां पता था कि छोटी मौसी हैं भी कि नहीं?

भोजन से निवृत्त हुए तो भागीरथी मामी को कहते सुना, ‘गोदावरी, उस घर में एकाध गद्दा है। चलकर ले आते हैं।’

उन्होंने सुना तो रोका। बोले, ‘उसकी कोई जरूरत नहीं है। तखत पर दरी तो बिछी है। मैं इसी पर सो जाऊंगा।’

भागीरथी मामी बोली थी, ‘ऐसा कैसे हो सकता है? जब उस घर में गद्दा पड़ा है तो हम दौड़कर ले आते हैं। गोदावरी जल्दी कर, लालटेन उठा और चल।’

‘अच्छा तो मैं आता हूँ। इस बहाने मामी का घर भी देख आऊंगा।’ वे चट से बोले थे।

भागीरथी मामी ने टोका था, ‘ऐसा मत बोल। न तो ये घर गोदावरी का है और न वह घर भागीरथी का है। दोनों ही घर हमारे हैं, हम दोनों के। वह घर तू कल दिन में देख लेना। इस बखत हम चट गए और पट आए।’

उन्होंने लालटेन पकड़ी और चल दिए थे। उनके सामने ढिबरी छोड़ गए। सचमुच ही वे चट गए और पट लौट आए। उनके हाथ में एक गद्दा था, तकिया था और एक चादर थी।

सोते समय गाय का एक गिलास शुद्ध दूध पीने के लिए हाजिर था। उनके मना करने के बावजूद वे दोनों ही कहां माननेवाली थीं।

एक दिन और रुककर वे तीसरे दिन लौट आए थे। लौटते समय छोटी मौसी ने उन्हें अपनी बाहों में भींच लिया था। बच्चों की तरह रोने लगी थी। वे बोले थे, ‘मैं तुम्हें अपने साथ भी ले जाता, मौसी, पर अब तुम्हारे साथ मामी भी है। तुम दोनों का साथ मैं तोड़ना नहीं चाहता। मुझे सुख मिला कि तुम दोनों ने दो घरों का एक घर बना लिया है। मैं अपना पता कागज में लिखकर छोड़ गया हूँ। जब कभी मेरी जरूरत लगे, मुझे चिट्ठी लिखना। और तुम भी मामी मुझे पराया मत समझना। मैं भानिज हूँ तुम्हारा। और ये कुछ रुपए मैं दे जा रहा हूँ। हो सके तो बिजली लगवा लेना। और जरूरत पड़े तो मुझे बताना। संकोच मत करना…।’ उनका भी गला भरने लगा था।

उस उम्र में भी दोनों उन्हें गाड़ी सड़क तक छोड़ने आई थीं। कितना मना किया था, पर वे नहीं मानीं। वे भावुक हो आए थे। पर यह भावुकता उन्हें अच्छी लगी थी। स्मृति में अंकित हो गई थी।

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