युवा कवयित्री। कविता संग्रह ‘आंखों में मानचित्र’ प्रकाशित।

सच किवाड़ है

यह समय कितना तिक्त है
कि सच बोल नहीं सकती
और झूठ बोलना नहीं चाहती
ऐसे समय में ही लिखना काम आता है

कैसे नकार दूं आंखों देखा हाल
जबकि हो चुका है लहू-लुहान
जानती हूँ अंत तक शायद नहीं कह सकूंगी
इसलिए कि फासला नहीं है
केवल उन्नीस-बीस का

शून्य और इक्कीस से टकराना
बहुत लंबी लड़ाई है
और जीवन बहुत छोटा है
जिसे लड़ते हुए नहीं बिताना चाहती मैं

चुप हूँ
इसलिए नहीं कि साथ हूँ किसी के
बोलती तो सुनता ही कौन!
जानती हूँ
बोलना होता है जरूरी
फिर भी साधे हूँ मौन
कि समय सबका आता है
काल नहीं होता अपने बाप का भी

मैं नहीं दे सकती किसी का साथ
इसलिए कि
मुझे किसी के विरुद्ध होना है
मैं कानों से अधिक आंखों पर जो यकीं रखती हूँ

यूं भी नोम चोम्स्की ने कहा है-
दुनिया तुम्हें सच्चाई से अवगत नहीं कराएगी
इसे खुद ही खोजना होगा
सच दीवार नहीं कि दिखे केवल एक पहलू
सच किवाड़ है

जहां से दिखता है पूरा परिदृश्य
जहां पहला ही दृश्य भिन्न है
आगे बढ़ते अटक जाते मेरे पांव
शब्द मेरे गले में फंस जाता नागफनी-सा
बरसों बाद शायद किसी दिन फूल खिले
फिलवक्त हलक के दर्द से कराह रही हूँ मैं

कविताओं ने सबकुछ की सहूलियत दी
सिवाय इसके कि बची रहे थोड़ी मनुष्यता
जिसकी श्रेणी में शामिल हैं स्त्रियां भी

आज के इस तिक्त समय में जरूरी है
कवि से अधिक मनुष्यों की
जिसके होने से ही बचेंगी कविताएं।

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