युवा और चर्चित लेखिका। तीन कहानी संग्रह ‘अलगोज़े की धुन पर’, ‘सगबग मन’ और ‘तुम बारहबानी’। डायरी ‘दराज़ों में बंद जिंदगी’। नाटकों में अभिनय। संप्रति स्वतंत्र लेखन।

 

सुस्त दुपहरी में मुहल्ले की संकरी सड़कें चुप पड़ी थीं। इक्का-दुक्का बाइक सन्नाटे को कुछ क्षणों के लिए चीरती, सड़कें करवट बदलतीं और चुप्पी फिर बहाल हो जाती। बाइक की घर्र-घर्र सुनकर कुत्ते कान हिलाते उठते, झबरीली पूंछ से मक्खियां उड़ाते और गर्दन लटकाकर दोबारा पसर जाते। ऐसे मौसम में कौन बाहर निकलता भला! सब अपने घरों में दुबककर बैठे रहते। शाम को बच्चे खेलने निकलते तब मुहल्ला कुछ गुलज़ार होता, वरना इन दिनों नीरवता ही यहां का पर्याय थी। बगीचे के पेड़-पौधे भी ऊबे खड़े रहते। इन दिनों कुछ दिलचस्प नहीं घट रहा था, सब एकरस। लू भरी इन दुपहरियों में, बंद कमरों की साजिशों-सी चरपराहट नहीं थी। था तो बस निद्रामग्न, इकहरा सूनापन।

सब रोज की तरह अलसाया-सा बीत रहा था। अचानक पेड़ की फुनगियां हुलसकर उठीं। ऊंचाई पर होने का अभिमान उस लहर में था। उन दोनों को सबसे पहले जो देख लिया था। फुनगियां लहराईं तो मौसम ने भी हिलोर ली। हवा ने सुर लगाया, ‘तुम आ गए हो, नूर आ गया है..’

लेकिन देखने के बाद भी देखने का यकीन नहीं हुआ था ज्यों घट चुकने के पश्चात भी न घटने का भ्रम बाकी रहे। जैसे मुहब्बत होने पर भी साथ रहने का वायदा न हो। जैसे हाथ छू जाने पर भी दिल पर किसी की छाप न हो। क्या सचमुच वही दोनों थे, इतने समय बाद? कैसे मुमकिन है? फुनगियों ने फूलों से दरयाफ़्त की। फूलों ने शाख़ों को पुकारा। शाख़ों ने तने को थपथपाया। तने ने अंगड़ाई ली। मंदिर के बाहर खड़े हर-गौरा से लड़का-लड़की। लड़की दुपट्टे से सिर ढके शीश नवाती, लड़का घुटनों पर बैठ पट बंद मंदिर के बाहर से गुहार लगाता। क्या मांग रहे हैं दोनों? तने के होंठ होते तो मंद हास में हिलते दीखते। कोई और दे न दे, तने ने उन्हें अपना आशीष दे दिया।

हां, थे तो वही दोनों। तने ने हामी भरी। माहौल में रौनक घुल गई। कोई अदृश्य धुन वहां बिखर गई, पत्तों ने सीटी बजाई, शाख़ों ने गलबहियां डाल दीं। कुछ ख़ुशी, कुछ हैरानी सिर उठाकर झांकने लगी। क्या वे दोनों फिर साथ हो गए हैं? ठीक पुराने दिनों की तरह, पेड़ के नीचे रखी पार्क की इकलौती बेंच की ओर बढ़ते हुए, पेड़ के एकांत के संगी बनने को उत्सुक! किसी ने फुसफुसाकर पूछा, क्या उन्होंने पहले की तरह हाथ पकड़े हुए हैं? हंस ज्यों गर्दन उठाते हैं, विकल होकर शाखें उठीं। नहीं, हाथ तो नहीं पकड़े थे बल्कि दोनों के बीच कुछ दूरी नज़र आ रही थी। कंधे विपरीत दिशा में झुके हुए थे। बीच के फ़ासले में कई सवाल ठहरे हुए थे जिनकी कसैली गंध पेड़ तक पहुंच रही थी।

क्या वे साथ होने आए हैं या पूरी तरह अलग होने? ‘क्लोज़र’ जैसी कोई बात करती है नई पीढ़ी, हो सकता है वही हो। मान लो यह अंतिम मुलाकात हुई तो? इतने समय से जिस बात के लिए सब प्रतीक्षित थे, वह न हुई तो? उन दोनों के बीच की बातें जानने के लिए पेड़ इतना अधीर था कि बग़ैर हवा के उनकी दिशा में झुक आया था।

चलते-चलते लड़का नज़रें चुराकर लड़की को देख ले रहा था लेकिन लड़की की दृष्टि पेड़ की सीध में बनी रही। जैसे पेड़ ही उनकी अदालत का न्यायाधीश होने वाला है। जैसे जब तक वह कोई ़फैसला नहीं दे देता, वह चुप रहेगी। पेड़ को अभिमान हुआ कि वह उनके जीवन में इतनी महत्ता रखता है। जब वे बेंच तक पहुंचे तो सबने देखा कि इस बार दोनों के बीच वैसी बेतकल्लुफ़ी नहीं थी जैसी हुआ करती थी। लड़की दोनों हाथ बांधे बेंच पर बैठ गई। लड़का सिर झुकाए खड़ा रहा। न लड़के के हाथों ने लड़की के बालों को सहलाया न लड़की के हाथ लड़के की गोद में जाकर बैठे। हँसी-ठिठोली तो दूर, उनके होंठों पर मुस्कुराहट तक नहीं थी। दोनों अपरिचितों की तरह मुंह सिले और परिचितों वाली असहजता ओढ़े उपस्थित थे।

पिछले वर्ष तक वे दोनों अक्सर वहां आते थे। छाया की खोज में, एकांत टटोलते हुए। बग़ैर यह जाने कि जहां वे आते हैं, वहां वे अकेले नहीं हैं। पेड़ सुनता है उनकी रसभीनी बातें। कोई बूढ़ा व्यक्ति आंखें बंद कर, वहां न होने का अभिनय करते हुए, नौजवान पीढ़ी की बातें सुनता रहे- ठीक वैसे। कितना आनंद आता है, कच्ची बातों की पकी महक में। पेड़ भी उनकी बातों में तोष पाता, उनकी बातों से आह्लादित होता। उनके जाने के बाद उनकी बातों की स्मृति में मंद स्मित से सिक्त रहता।

प्रेमियों की बातों में सैकड़ों आकाशगंगाएं समा सकती हैं। चांद तक पहुंच कर लौट आएं, फिर भी बातें ख़त्म न हों इतनी बातें। उस पेड़ के सारे फूलों को, उस जैसे दूसरे फूलों को और संसार भर के सभी फूलों को एक डोर में पिरो दिया जाए इतनी बातें।

उनकी बातों के साथ, बातों में गुंथे प्रेम के साथ, पेड़ फलता-फूलता। वहां मौजूद सभी पेड़ों से अधिक घना, अधिक हरा और फूलों से लदा। लकदक, जगमग- जिससे सब ईर्ष्या करते। सब कहते- वे तुम्हारी छांव में नहीं बैठते, तुम्हें उनकी छांव मिल गई है। तभी नई दुल्हन की तरह गदरा रहे हो। पेड़ बड़बड़ाता- किसी के प्रेम को टोक लगाना अच्छी बात नहीं।

निशाजल में भीगे पीले फूल, उनके आने से पहले बेंच पर बिछ जाते। प्रेम पर प्राणोत्सर्ग करना वे सुख-सौभाग्य समझते। जिस फूल को लड़की छू लेती वह डाल से झरकर भी कई दिनों तक खिला रहता। फूल हँसी में उस बेंच को दोनों की मधुशैया कहते। हालांकि उन्हें ऐसी-वैसी हरकत करते कभी किसी ने नहीं देखा था। हां, लड़का कभी-कभी नज़र बचाकर लड़की की उंगलियों में अपनी उंगलियां उलझाकर भींच देता और लड़की लड़के के कंधे पर सिर रखे-रखे उसके सीने तक जा पहुंचती। शाख़ों को हिदायत थी कि उनके आते ही नीचे झुक जाएं कि लड़के को फूल तोड़ने के लिए उचकना न पड़े। लड़की को कोई देख न ले यह चिंता लड़के के साथ पेड़ को भी थी। शाखें उनके आते ही आपस में सट कर घेरा बना लेतीं जिससे दूसरी ओर से आते किसी व्यक्ति की दृष्टि उनपर न पड़े।

जीवन रक्तकंठी हो चला था, लय में बद्ध। सब प्रेम के अभ्यस्त हो रहे थे कि एक दिन उन दोनों ने आना बंद कर दिया। उनका आना क्या बंद हुआ, ज्यों पेड़ की जीवनचर्या ही बाधित हो गई। रोज़ होते-होते एक दिन किसी का होना ठहर जाए तो पीड़ा का अगाध समंदर उठ खड़ा होता है, पेड़ ने पहली बार जाना। पेड़ की आबताब, कूज सब बुझने लगी। वह निस्तेज पड़ गया। श्रीहीन पेड़ की आंखों में प्रतीक्षा की बूंदें टिकी रहतीं। वह रोज़ प्रतीक्षा में रहता कि वे लौटेंगे लेकिन कई दिनों बाद भी वे नहीं लौटे। पेड़ की हरी छांह घुप-घोर अंधकार में बदल गई। धुंधियाली शामों में पत्ते अब भी उनकी बातें किया करते किंतु तना उन्हें बरज देता।

‘गए हुए लोगों को इतना याद नहीं किया जाता।’

‘अगर हम उन्हें याद न करें तो वे खो जाएंगे।’

‘ज़्यादा याद किया तो वे याद बनकर रह जाएंगे। उनके दोबारा मिलने की उम्मीद ख़त्म हो जाएगी।’

‘वे अब एक नहीं होंगे। सुनी नहीं थी उनकी तकरार? वे अलग हो गए हैं।’

‘अलग होने वाले क्या हमेशा अलग ही रह जाते हैं? कभी-कभी वे और पास होने के लिए दूर होते हैं।’

‘आपका भ्रम है। आप दुनिया को अपने ही चश्मे से देखते हैं। दूर हो गए लोग फिर से साथ नहीं होते। हो भी गए तो टिकते नहीं।’

पत्ते थे नए-नकोर। लोगों को जाते ही देखा। प्रेम टूटता तो टुकड़ों में बिखर जाता। अंगड़-खंगड़ संबंधों को कौन सहेजता? अलग होने के बाद लोग नोक-पलक से भी पीठ कर लेते। लौटना ठहरा दूर की बात, साथ रहते हुए भी दो लोगों का साथ ख़त्म हो जाता। ‘मूव ऑन’ का फ़लसफ़ा नई पीढ़ी के शब्दकोष में शामिल था। तने के पास था सदियों का अनुभव। वह उस पीढ़ी का था जहां लोग इंतज़ार में उम्र गुज़ार देते। साथ छूटता तो दोनों के बीच पतली पगडंडी खुली होती। जो न लौट सके तो भी एक-दूसरे को देखने के लिए एक झरोखा बना कर रखते। संबंध भले ही बीत जाए, प्रेम नहीं बीतता था। तने की स्मृति में पैंतालीस वर्ष पुराना एक दिन आज भी नया था।

उन दिनों आज की तरह मिलना-जुलना नहीं होता था। एक लड़की थी, अर्णा – छहरीली। लड़का था, शंबर – लहालह। अर्णा का विवाह कहीं दूर-दराज़ के गांव में पक्का हो गया था। उन दिनों न यह बगीचा था न बेंच। मकान भी इक्का-दुक्का ही थे। पक्की सहेली ने संदेश पहुंचाया अर्णा तक। ऐसी ही खड़ी दुपहरी में अनगढ़, खुरदुरी भूमि पर अर्णा खड़ी थी। शंबर की ओर उसकी पीठ थी। कुछ कदमों की दूरी पर खड़ा वह उस पीठ को देखता रहा। उसने पीठ पर उभरी दो हड्डियां देखीं और उनके मध्य का स्निग्ध समतल। सांसों के साथ उठती-गिरती पीठ कुछ पलों बाद हिलककर रोने लगी थी। शंबर आगे बढ़कर उसे थामता उससे पहले ही कहीं से उसकी पुकार हुई थी। उसकी बड़ी बहन कह रही थी – जिस लड़की का लग्न हो जाए, उसे छूने से पाप लगता है। दोनों एक-दूसरे को देखे बग़ैर विपरीत दिशा में बढ़ गए थे। अर्णा का मायका यहीं था तो साल में एक बार आती, कुछ दिनों के लिए। शहर का मिज़ाज बदल जाता। उन कुछ दिनों की ख़ातिर शंबर मरते दम तक अकेला रहा। जब उसकी मृत्यु हुई, अर्णा जीवन में पहली बार दो दफ़ा मायके आई थी।

तने ने यह क़िस्सा कई बार सुनाया था। नकचढ़े पत्ते खुसुर-फुसुर करते और हँस पड़ते। यह भी कोई कहानी हुई और हुई भी तो दशकों पुरानी हुई। पुराने समय में अटके रहना कौन बुद्धिमानी है। जहां साथ होने की उम्मीद न हो वहां जबरन साथ चिपके रहने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। जो पीड़ा दे, उसे जीवन से उखाड़ फेंकना चाहिए। आनंद ही जीवन की वास्तविकता है और येन-केन प्रकारेण वहां तक पहुंचना जीवन का ध्येय। लोगों की कमी थोड़े न है। एक के जाने पर सैकड़ों मिलते हैं। वह गीत नहीं सुना, ‘प्यार होता-होता-होता कई बार है।’ आज की तारीख़ में प्यार ऐसा रास्ता है जिसपर चलने वाले हमसफ़र बदलते रहते हैं।

तना सिलवटों से घिर जाता। सोचता, यह कैसी बेहूदा सोच है। क्या सचमुच लड़का-लड़की कभी नहीं मिलेंगे? वे अलग भी तो कैसे लड़-झगड़ कर हुए थे। इसी बेंच पर उनका झगड़ा शुरू हुआ था। हमेशा की तरह आए, बेंच पर बैठे किंतु उस दिन दोनों की मुखमुद्रा कुछ अलग थी। आंखों में ठंडी लकीरें थीं और होंठों पर सूखा। कुछ देर चुप बैठे शून्य में तकते रहे। बातों को बैसाखी की ज़रूरत थी। हवा आंधी में ढलने वाली थी। सूरज बादलों के पीछे छिपा बैठा था। दिन-दुपहरी में रात-सा अंधेरा फन फैलाए खड़ा था। रेंग कर कुछ शब्द मुंह तक पहुंचे तो बात किसी अदृश्य बिंदु से आगे बढ़ी थी। पीछे वाली बातें शायद फ़ोन पर हुई हों। तिर्यक बातों में विष का प्रभाव था। कुछ देर तक इन बातों को सब मसखरी समझते रहे। खटराग और राग एक दूसरे के पीछे वृत्त में चक्कर काटते हैं।  इतने दिनों तक प्रेम के साक्षी रहे, अब क्लेश देखने में कैसा हर्ज! कलह का नमक प्रेम का स्वाद दुगुना कर देता है लेकिन रार ऐसी ठनी ज्यों उनके रेशम-से प्रेम को कीड़ा लग गया हो।

‘मैं तुम्हारी सारी बातें क्यों मानूं?’

‘प्यार है तो मानने में हर्ज है क्या?’

‘प्यार क्या बातें माने बग़ैर साबित नहीं होता?’

‘मोबाइल का पासवर्ड दे दो। बात ख़त्म।’

‘तुम्हें मुझ पर यक़ीन नहीं?’

‘कभी-कभी यक़ीन से ज़्यादा ज़रूरी शांति होती है।’

‘मैंने तुम्हें अशांत किया?’

‘हां। तुम्हारी हरकतों ने।’

‘ऐसा क्या किया मैंने?’

‘तुम मेरे सामने फ़ोन इस्तेमाल नहीं करतीं।’

‘क्योंकि तुम्हारे आगे उसका ख़याल ही नहीं आता।’

‘तुम किसी का कॉल तक रिसीव नहीं करतीं।’

‘इतनी-सी देर के लिए हम मिलते हैं। मैं उसमें किसी और को जगह नहीं देना चाहती।’

‘फिर भी… मुझे लगता है तुम किसी और से भी बात करती हो।’

‘तुम्हारे अलावा किसी से बात करने की इच्छा नहीं होती।’

‘फिर मोबाइल क्यों छिपा रही हो?’

‘क्या तुम्हें मेरा प्यार झूठा लगता है?’

‘तुम्हारी ज़िंदगी में कोई और भी है?’

‘अगर होता तो तुम नहीं होते।’

‘तो तुम पर भरोसा क्यों नहीं होता?’

‘क्या मैंने तुम्हारा पासवर्ड मांगा? कभी भी?’

‘मैं ऐसा कुछ करता ही नहीं कि तुम्हें ज़रूरत पड़े।’

‘तो समझो, मैं भी ऐसा कुछ नहीं कर रही।’

‘लेकिन मुझे कैसे पता चलेगा?’

‘जैसे मुझे पता है।’

‘मैं लड़का हूँ। मुझे ऐसे समझ नहीं आता। मुझे आंखों देखी पर यक़ीन होता है।’

‘मेरी आंखों में तुम्हें प्यार नहीं दिखता?’

‘मैं मोबाइल देखना चाहता हूँ।’

‘देख सकते हो लेकिन उसके बाद मुझे कभी मत देखना।’

‘अगर तुम्हारी यही ज़िद है तो मेरी भी ज़िद है कि मोबाइल देखे बग़ैर तुम्हें नहीं देखूंगा।’

‘…ठीक है। पासवर्ड तुम्हारी बर्थ डेट है।’

 

यह कैसी हठ कर बैठा लड़का! लड़की की दुबली देह थरथराहट से भर गई। उसने विस्मित कातरता से अपना मोबाइल उसके आगे कर दिया था। उसने सोचा था कि वह मोबाइल की जगह उसका हाथ पकड़ लेगा, पर लड़के ने तो मोबाइल थाम लिया था। संभवतः प्रेम और संदेह की दुरभिसंधि होती होगी। पेड़ सांस साधे देख रहा था। लड़की छल कर रही है कि नहीं, वह तय नहीं कर पाया। छल का पाठ्यक्रम तय नहीं होता। वह ‘आउट ऑफ़ सिलेबस’ आ गए सवालों की तरह होता है। अरे, यह क्या..लड़की की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे। उसके चेहरे पर राख मल दी हो ज्यों किसी ने। बाहर के अंधेरे ने लड़की के गुलाबीपन को गिरफ़्त में ले लिया। अगर मोबाइल में सचमुच कुछ मिला तो लड़का रुकने वाला नहीं। वह इतना उदार नहीं है। लेकिन इस परीक्षा के बाद लड़की भी नहीं ठहरेगी। चोट के नीले निशान उसके बदन पर उभरने लगे थे।

क्या लड़के ने लड़की की आंखों में नहीं देखा? किसी फंदे में फंसी हिरणी-सी आंखें। प्रेम, चोट, भय, अपमान सब जैसे एक जगह आकर ठहर गए। वह देखता तो क्या इरादा बदलता? नहीं, संदेह से घिरा व्यक्ति आगा-पीछा नहीं सोचता है। वह घंटे भर तक मोबाइल में सिर दिए बैठा रहा। इतनी देर लड़की टुक लड़के को देखे गई। लड़की की पलकें झपकी कि नहीं, उसने सांस ली कि नहीं – किसी को नहीं मालूम। वह बुत बनी बैठी रही। देह यहां, प्राण कहीं और। वह मोबाइल छीन सकती थी, लड़के को थप्पड़ जड़ सकती थी, उठकर जा सकती थी पर वह बैठी रही। किस इंतज़ार में?

वक़्त बीत रहा था कि वक़्त थम गया था? ह्वाट्स्ऐप, फेसबुक, मैसेंजर, फोटो फोल्डर, मेल, कॉन्टैक्ट्स सब एक-एक कर लड़का स्क्रॉल करता गया। लड़की की आंखों में शर्मिंदगी उतरती गई। लड़के के भाव पुलिस की तरह जिसके हाथ चोर आने ही वाला हो पर चोर होता तो हाथ आता। लड़का अब भी ऊहापोह में था। वह संदेह और संकोच के बीच कहीं रुक कर बोला,

‘यहां तो कुछ नहीं है।’

‘मैंने कहा था, लेकिन तुम्हें यक़ीन ही नहीं था।’

‘फिर पासवर्ड क्यों नहीं दे रही थी?’

‘अगर अब तक नहीं समझे, तो कभी नहीं समझोगे।’

‘कुछ तो है जो तुम बताना नहीं चाहतीं।’

‘तुम अब भी!!’

‘पहले भी मेरी गर्ल ़फ्रेंड्स रहीं। कभी सोचना, स़िर्फ तुम ही क्यों हो जिसपर मुझे भरोसा नहीं होता।’

‘आईने में ख़ुद को देखना। जवाब वहीं मिलेगा।’

लड़की रोते हुए उठ खड़ी हुई थी। उसकी हतक हुई थी। गहरी ठेस लगी थी लेकिन अब भी उसके कदमों में रोक लिए जाने का आह्वान था। लड़के को उसके पीछे जाना चाहिए था, मनाना चाहिए था पर लड़का अपनी ही अकड़ में था। आख़िर समझती क्या है लड़की ख़ुद को।

प्रायः उसका फ़ोन व्यस्त आता है। वह स्क्रीनशॉट मांगता है तो आनाकानी करती है। वह पूछता है किस से बात कर रही थी तो हँसकर टरका देती है। फेसबुक पर भी कितना ऐक्टिव रहने लगी है। रोज़-दिन तस्वीर बदलना। अपरिचितों के आगे नुमाइश लगाकर जाने क्या मिलता है? फ़ोन उठाने में, मेसेज के जवाब देने में कितनी देर लगाती है। शायद लड़की की दिलचस्पी उसमें घट रही है। इसका कोई कारण तो अवश्य है जिसे वह चतुराई से छिपा रही है। वह करे तो आख़िर करे क्या?

इतने दिनों से धीरज रख रहा है पर कपट कौन सहन करता है। आज वह दूध का दूध, पानी का पानी करने की ठान कर आया था किंतु हाथ कुछ लगा नहीं। उसने लड़की की ओर देखा, जाने को तैयार। यह नहीं उसके पास ठहरकर उसकी उलझन मिटाने का प्रयास करे। कितने रोज़ हो गए, वह ठीक से सोया तक नहीं। लड़की के बारे में सोच-सोचकर तकलीफ़ से गुज़रता रहता है लेकिन उसकी तकलीफ़ से लड़की को क्या वास्ता। और फिर दावा प्रेम का करती है। क्रोध से उसकी नसें फड़क उठीं।

चिल्ला कर बोला, ‘जा रही हो तो वापस मत आना।’

लड़की लड़के को कैसे समझाए कि उसके जीवन में आने के बाद से वह स्वस्थ महसूस करने लगी है। स्वस्थ मनुष्य में पेड़ की ही भांति नई शाखें उग आती हैं। जिन लोगों से अरसे से बात नहीं होती थी अब उनसे दोबारा बात होने लगी है क्योंकि वह मानसिक रूप से स्थिर है, मन से प्रसन्न है। उससे जुड़ने के बाद, सबसे जुड़ाव महसूस होता है। अब वह पहले की तरह लोगों से भागती नहीं फिरती। लड़के को तो खुश होना चाहिए कि ज़िंदगी पर लड़की का भरोसा जम गया है, कि वह ख़ुद पर भी विश्वास करने लगी है। किंतु उसके आसपास लोगों को देखकर वह असुरक्षा से भर जाता है। रोज़ उलटे-सीधे प्रश्न करता है। वह कई बार प्यार से जवाब दे देती है। कई बार नहीं भी देती कि इन बातों का आख़िर क्या जवाब हो सकता है किंतु आज तो उसने हद पार कर दी। लड़की पल भर के लिए थमी, पीछे पलटने को हुई लेकिन पलटी नहीं। नहीं आऊंगी। इतनी महीन पर इतनी मज़बूत आवाज़ पेड़ ने कभी नहीं सुनी थी। जाते हुए लड़की ब़र्फ पर खिंची लाल लकीर-सी लग रही थी।

एक दृश्य ख़त्म हुआ, एक संसार ख़त्म हुआ। पेड़ ने लड़के के चेहरे पर ग्लानि ढूंढने का प्रयत्न किया पर वहां कुछ नहीं था। न शोक, न पछतावा। बस किसी अप्रिय स्थिति से उबरने की राहत भर थी। कुछ देर बाद लड़का बग़ैर लड़खड़ाए चलता बना था।

अब फिर से रह गया पेड़ अकेला, दोनों की स्मृतियों के साथ। शहद-से संग-साथ में कसैलापन आ गिरा था। उनकी मुहब्बत से गुलज़ार पेड़ अब उनके शंकित प्रेम की स्मृतियों से आतंकित था। उनके जाने के बाद सैकड़ों बार जिरह हुई कि कौन सही, कौन ग़लत। हस्बे-मामूल जिरह अंत तक कभी नहीं पहुंचती। बीच में ही स्थिति मार-काट तक जा पहुंचती। बड़ी मुश्किल से अर्धविराम लगाया जाता क्योंकि पूर्णविराम लगना तो असंभव था। फूल और पत्ते उस दिन का ‘पोस्टमॉर्टम’ करते थकते न थे। इस अदालत में फूल लड़की के पक्ष में और पत्ते लड़के के।

‘लड़का टॉक्सिक होने लगा था।’

‘नहीं, लड़की की नीयत में खोट था।’

‘लड़की सही थी। प्यार का मतलब पल-पल का हिसाब देना नहीं।’

‘लड़का बेचारा डरा हुआ था, इनसिक्योर था।’

‘यह डर उसका अपना बोझ था।’

‘लड़की ने कुछ तो किया होगा जो संशय के बीज पड़े।’

‘लड़के के मन के विकारों का आरोप लड़की पर क्यों?’

‘लड़की को समझदारी दिखानी चाहिए थी।’

‘क्या समझदारी का ठेका स़िर्फ उसी ने लिया है?’

‘प्रेम में स्पर्धा नहीं होती।’

‘लड़की ने बार-बार समझाया पर लड़के को समझ आए तब न।’

‘अगर सचमुच कुछ न था तो दिखा देती मोबाइल, प्यार तो बचा रहता।’

‘जिस प्यार को बचाने की ज़रूरत पड़ने लगे, समझ लो उसकी नींव दरक रही है।’

‘दरकते रिश्तों में भी एफर्ट डालकर जान फूंकी जा सकती है। यह क्या कि पहली मुश्किल में ही हाथ खड़े कर दो।’

‘एफर्ट दोनों ओर से लिए जाते हैं।’

‘प्रेम में पारदर्शिता की चाह ग़लत तो नहीं।’

‘पारदर्शिता का अर्थ निजता का हनन तो नहीं।’

‘प्रेम में कुछ निज रह भी जाता है?’

‘निज बचा रहना चाहिए।’

‘प्रेम में एकाकार होने का महत्व…’

‘एक होकर भी स्वयं को बचाए रखने का हुनर..’

‘स्वयं को बचाना स्वार्थ है।’

‘स्वार्थ नहीं संतुलन। स्वस्थ संबंध के लिए निजता और स्पेस दोनों चाहिए।’

‘लेकिन ‘स्पेस-स्पेस’ करते-करते, दो लोगों के बीच न टूटने वाली दीवार भी खड़ी हो जाती है।’

तना सोचता – यहां बात न स्पेस की है न निजता की। बात वफ़ा और बेवफ़ाई की भी नहीं है। बात है बेदाग़ यक़ीन की। ऐसा विश्वास जिसमें कोई मिलावट न हो। प्रेम जिसमें अविश्वास के कंकड़ न रड़कते हों। लड़का यूं ही मांगता तो लड़की बेहिचक उसके हाथ में मोबाइल धर देती पर लड़के के मन में तो बेयक़ीनी के कांटे थे। वे कांटे लड़की को जा चुभे। लड़की का ही नहीं, उसके प्रेम का भी अपमान हुआ था। अपने प्रेम पर उंगली उठाया जाना किसे अच्छा लगता है? लड़की का प्रेम लड़का क्यों नहीं समझ पाया? फिर तने को बड़े-बूढ़ों की बात याद आती। वे कहा करते थे, पुरुषों का प्रेम ऐसा ठहरा कि महबूब को छूकर गुज़रने वाली हवा तक उन्हें चुभती है। पेड़ उदासी से भर जाता कि पुरुषों का यह अधिकार-भाव युगों बाद भी नहीं बदला है।

सही-ग़लत की दुविधा में समय निकलता रहा। आश्चर्य की बात कि इस बीच दोनों साथ तो दूर, अकेले भी कभी यहां नहीं आए। क्या लोग अब मुहब्बत की जगहों पर मुहब्बत खोजते हुए नहीं आते? क्या सब सही कहते हैं कि पुरानी तरह के प्रेम की बातें ‘यूटोपिया’ से अधिक कुछ नहीं?

उसे पुराने प्रेमी याद आए जो अपने महबूब के कदमों से छुई मिट्टी, माथे से लगाने में गौरवान्वित होते थे। एक-दूसरे के लिए न सही, पेड़ की ख़ातिर ही आ जाते। आख़िर उससे भी तो राब्ता था दोनों का। लड़का बदल गया था तो लड़की ही आ जाती। तने को शाखें दिलासा देतीं, लड़की को पीड़ा सहन नहीं हुई होगी इसलिए यहां आना टालती रही होगी। यह दर्द सहना क्या आसान है? व्यक्ति मृत्यु-शैया पर जा पहुंचता है।

अब लड़की आई है तो तने ने उसकी आंखों में देखा। काले घेरों से घिरी, मौन से भरी आंखें। चेहरा ही बदल गया था। बिछोह की टीप वहां साफ़ नज़र आ रही है। हां, शाख़ों की बात ठीक लगती है। फिर उसने लड़के को देखा। आंखें तो लड़के की भी उदास हैं लेकिन यह उदासी लड़की की उदासी से अलग है। लड़की की उदासी भरी-भरी। लड़के की उदासी एकदम ख़ाली। एक ख़ुद को पीड़ा से भर रहा है, दूसरा ख़ुद को ख़ाली कर रहा है।

आज शाख़ों ने घेरा नहीं बनाया, न फूल हँसी से भरे। धरती पर गिरे पत्ते खड़खड़ाए। हवा को ज्यों सूखी खांसी हो गई। ख़ुशी के क्षणिक आवेग के बाद, सब उतनी ही बेचैनी से भरे थे जितने वे दोनों। लड़के ने बात शुरू की। स्वर में हिचकिचाहट की तरल फांक थी हालांकि वह सामान्य बने रहने की पूरी कोशिश कर रहा था। बात शुरू हुई जैसे पिछले स्टेशन से रेल छूटी हो अगले स्टेशन के लिए। तुगड़क-तुगड़क-तुगड़क। बातों का घोड़ा भागते हुए रेल के सामने जा खड़ा हुआ और अगली दो टांगें उठा कर रेल पर जमा दीं। क्या रेल को रोक दिया उसने या रेल उसे रौंदते हुई निकल गई?

‘कैसी हो?’

‘तुम्हारे सामने हूँ।’

‘दुबली हो गई हो।’

‘यहां क्यों बुलाया है?’

‘याद नहीं आई मेरी?’

‘दरवाज़े तुमने बंद किए थे।’

‘दरवाज़े खोले भी जा सकते थे।’

‘जिसने बंद किए, चाभी उसी के पास थी।’

‘तुम दरवाज़ा तोड़ भी सकती थी।’

(फूलों ने कहा लड़का ‘गैसलाइटिंग’ कर रहा है। पत्तों ने कहा लड़की ‘विक्टिम कार्ड’ खेल रही है। बहस शुरू होती इससे पहले आगे की बातों ने उन्हें जकड़ लिया।)

‘किस हक़ से?’

‘तुम्हें मालूम नहीं?’

‘नहीं मालूम।’

‘सच कह रही हो?’

‘झूठ-सच का फ़र्क़ क्या महीनों पहले नहीं मिट गया?’

‘अब तक नाराज़ हो?’

‘क्या इस बात से फ़र्क़ पड़ता है?’

‘तुम्हें क्या लगता है?’

‘बात मेरे लगने न लगने की नहीं, तुम्हारी है।’

‘मेरी हर बात तुमसे जुड़ी है।’

‘तो फिर क्यों…?’

‘मैं डरा हुआ था।’

‘किससे?’

‘नहीं जानता। शायद अपने आप से।’

‘तुम्हें तो अपनी गलती तक नहीं मालूम।’

आह! ठीक यही बात तना सोच रहा था। ज़िंदगी बीत जाती है और हमें अपनी ग़लतियां नहीं पता लगतीं। हम माफ़ी मांगते जाते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं। माफ़ी मांगना अक्सर गलती का एहसास नहीं बल्कि संबंधों में ‘सर्वाइवल’ का तरीक़ा होता है। जब गलती के बावजूद हम उस व्यक्ति को छोड़ना नहीं चाहते तब अपने दंभ को माफ़ी से सहला कर समझौता करते हैं। जब आगे ग़लतियां करते जाने के लिए पहले की ग़लतियों को भुलाना ज़रूरी हो जाता है तब माफ़ी की छड़ी घुमा देते हैं। हम कभी ठगते हैं, कभी ठगे जाते हैं। तने ने लड़के को देखा। मगर यह तो ऐसा नहीं लगता। उस रोज़ लड़की की आंखें जितनी भीगी थीं, उससे अधिक आंसू लड़के की आंखों से हर रोज़ गिरे प्रतीत होते हैं। उसकी पलकों पर सदियों का भार रखा हो जैसे।

शायद वह उन चुनिंदा लोगों में से है जो अपनी ग़लतियां पहचानने का हुनर रखते हैं। उसकी शर्मिंदगी खरी थी। रूह में न जानने की अजनबियत नहीं बल्कि मालूम होने की मिठास है। तना बुदबुदाया- ‘प्रेम काल के स्केल पर नहीं नापा जाता। समय के हर मोड़ पर कुछ सुंदर कहानियां होती हैं। हो सकता है यह उन्हीं में से एक हो।’ तने का आशान्वित होना किसी को न सुहाया। लड़का-लड़की साथ न हो सके तो सबसे अधिक पीड़ा तने को ही होगी। उनकी अनुपस्थिति में वही था जो सबसे अधिक चुप हो गया था। सब मानो सांस थामे अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे। अभी कुछ ही देर में बच्चों के खेलने का समय होने वाला है। वे आ गए तो उनके हुल्लड़ में यह एकांत छिन्न-भिन्न हो जाएगा। 

लड़के ने लड़की का सिर सहलाया, लड़की ने हाथ झटक दिया। लड़के ने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा, लड़की ने हाथ खींच लिया। लड़के ने ठुड्डी से पकड़कर लड़की का चेहरा अपनी ओर किया, इस बार लड़की बग़ैर हिले बैठी रही। लड़के की उंगलियां उसकी ठुड्डी पर लकीरें उकेर रही थीं। लड़की को शायद कोई बात याद आई होगी। उसकी आंखें बंद हो गईं। लड़के की आवाज़ सुनकर उसने आंखें खोलीं।

‘तुम्हें भास्कर मामा याद हैं?’

‘हां।’

‘याद है, उन्हें कनिका जी से प्रेम हो गया था। प्रोफेसर जो सामने वाले घर में रहती थीं।’

‘हां… और अरुणा मामी ने वह खिड़की चुनवा दी थी जो कनिका जी के घर की ओर खुलती थी।’

‘कनिका जी पिछले महीने नहीं रहीं।’

‘ओह! क्या हुआ था?’

‘ग़म खा गई थीं। जब जीवन अपने अनुरूप न ढले, तो जीवन के अनुरूप ढला व्यक्ति कब तक उसका बोझ ढो सकता है?’

‘हां, एक रोज़ उसी बोझे तले उसका दम टूट जाता है।’

‘मामा उनके जाने के बाद खिड़की खुलवाना चाहते थे। उन्होंने सारे दांव-पेंच चला लिए पर मामी ने इजाज़त नहीं दी।’

‘क्यों? अब क्या दिक़्क़त थी?’

‘उनका मानना था कि कनिका जी भले ही न रही हों, उनकी स्मृतियां तो रहती हैं उस घर में।’

‘हां, प्रेमी की अनुपस्थिति में भी प्रेम जीवित रह सकता है।’

‘और उसकी अनुपस्थिति में व्यक्ति मर भी सकता है। भास्कर मामा भी पंद्रह दिन बाद चले गए कनिका जी के पीछे-पीछे।’

‘….!’

‘उनके जाते ही मामी ने खिड़की खुलवा दी। अब दिन भर उसी खिड़की पर बैठी रहती हैं।’

‘क्या!’

कहते हुए लड़की का चेहरा पहले पीला पड़ा, फिर स़फेद हुआ। पहले स्थिर हुआ फिर कांपा। रक्त पहले थमा फिर तेज़ी से दौड़ पड़ा। आंसू पहले रुके, फिर आंखों में चमक उठे। यह प्रतिक्रिया मामाजी के जाने पर या मामीजी के खिड़की खुलवा देने पर हुई, पेड़ बूझ नहीं पाया। पेड़ को याद है- जिस दिन लड़के ने यह बात लड़की को बताई थी, उसका मन-मिज़ाज सब अस्त-व्यस्त था। मामा के घर की उलझनों के छींटे लड़के के घर भी पहुंचे थे। वे कनिका के साथ रहना चाहते थे पर अरुणा मामी का प्रेम इतना तीव्र था कि चाहते हुए भी उसे तोड़ने-छोड़ने का साहस नहीं जुटा पाए। पेड़ उस दिन भी तय नहीं कर पाया था- वह ख़ुद किसके पक्ष में है। पत्नी के एकाधिकार की चाहना ग़लत कहां थी? पति द्वारा अपने हृदय का अनुसरण भी ग़लत नहीं था। और कनिका, वह तो भास्कर के सिवा कुछ चाहती ही नहीं थी, अपना जीवन तक नहीं।

दिनों तक मन ऊभ-चूभ होता रहा था। पत्नी अगर पति और प्रेमिका के बीच देखे का राब्ता भी नहीं चाहती, पत्नी होने का मान चाहती है तो क्या ग़लत है? किंतु प्रेम की हत्या क्या इस तरह मुमकिन है? क्या दो लोगों को जबरन अलग कर देना संभव है? मामी ने दोनों को अपने जाने दूर भले ही कर दिया पर कहां अलग हो सके वे दोनों। प्रेम ‘गामा किरणों’ की तरह बेधक कहीं भी आर-पार हो सकता है। प्रेम परिभाषाओं और नियमों से दूर अपना गढ़ बनाता है। प्रेम सीधा गलियारा नहीं बल्कि एक-दूसरे को काटते रास्तों का जाल है। तभी तो दूर रहने पर भी न भास्कर मामा और कनिका जी का प्रेम ख़त्म हो सका, न अरुणा मामी से प्रेम न होते हुए भी भास्कर मामा उनके प्रेम का असम्मान कर सके और न भास्कर मामा के छल के पश्चात भी अरुणा मामी उनसे प्रेम करना छोड़ पाईं। उनके जीते-जी जो नहीं किया, उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी वही इच्छा पूरी कर दी अरुणा मामी ने।

लड़का बता रहा था उधर भास्कर मामा की मृत देह अंतिम क्रियाओं के लिए रखी थी, उधर वे अपने हाथों दीवार तोड़ रही थीं। पत्तों ने फूलों को इशारा किया। फूलों ने जवाब में पंखुड़ियां समेट लीं। पत्तों और फूलों में फिर तनातनी शुरू हो चुकी थी।

‘मामी का प्रेम देखा।’

‘प्रेम था या पिंजरा, जिसमें मामा आजीवन तड़फड़ाते रहे।’

‘पिंजरा तोड़ना मुश्किल नहीं, ख़ासकर पुरुष के लिए। मामी का प्रेम ही था जो वह कनिका जी के पास नहीं गए।’

‘गए नहीं या जा नहीं पाए, नियमों में बंधे होने के कारण।’

‘चाहते तो नियमों को धता बता सकते थे। मामी का प्रेम उन्हें रोके रहा।’

‘और कनिका का प्रेम उन्हें ले गया।’

‘एक प्रेम उत्तरी ध्रुव तो दूसरा दक्षिणी ध्रुव।’

‘न, प्रेम तो एक ही था। दूसरा स़िर्फ आधिपत्य था।’

‘वह तो गहरे प्रेम के साथ नत्थी होता है।’

‘तो क्या मामी निर्दोष थीं?’

‘सौत तो माटी की सहन नहीं होती। फिर कनिका जी तो जीती-जागती औरत थीं। क्या करतीं मामी?’

‘मामी उनके बीच खिड़की तो छोड़ो, सांस भर फ़ासला भी न बना सकीं।’

‘जीते जी तो अपना बनाकर रखा भास्कर मामा को।’

‘न जीते जी, न मृत्यु के बाद। प्रेम के अक्षर ईश्वर स्वयं अपनी क़लम से लिखता है।’

बात और आगे बढ़ती इसके पहले ही शाख़ों ने दोनों को झिंझोड़ डाला। हर बात की चीरफाड़ आवश्यक तो नहीं! दोनों सहम कर एकदम चुप।

अरुणा, भास्कर और कनिका के प्रेम में जाने किसकी जीत हुई किसकी हार। किंतु प्रेम के  बजाय प्रेम की सुदूर अनुभूति ही सबके हिस्से आई। एक तृष्णा, एक उत्कंठा, एक लालसा की तहों में छिपा रहा प्रेम, संताप को जन्मता हुआ। प्रेम को असमंजस नहीं, अविचल संग चाहिए होता है।

लड़की पहले डरी, फिर और ज़्यादा डरी। अरुणा मामी, भास्कर मामा और कनिका जी की तरह वह प्रेम की खोज में जीवन भर भटकती रही तो? भटकते हुए वह जीवन भर की भटकन में फंस गई तो? आवारागर्द होकर मर जाना आसान है, मगर बेहिसाब जीते जाना कठिन। उसने सामने बैठे लड़के को ग़ौर से देखा। यह वही है जिसे वह कुछ महीने पहले बेहद प्रेम करती थी और अब कुछ महीनों बाद सबसे अधिक प्रेम करने लगी है। मगर लड़के की टॉक्सीसिटी?

हां, यही कहा था उसके दोस्तों ने कि लड़का टॉक्सिक है। ऐसे टॉक्सिक लोग सेहत के लिए अच्छे नहीं होते। जितना जल्दी मुमकिन हो उनसे दूर हो जाना चाहिए। पर वह दूर कहां हो पाई। लड़का उसके ज़र्रे-ज़र्रे में उग आया था। मन के हर दरीचे-दरवाज़े से झांकने लगा था। वह जितना उसको दूर करती, उतना वह उसमें उतरता जाता, उतना वह उसमें डूबती जाती। लड़का नहीं था, पर हर ओर लड़का ही था। किंतु आत्म-सम्मान उसे लड़के के पास जाने न देता।

आज उसने देखे लड़के के बढ़े हुए, बिखरे बाल। शर्ट के बटन ऊपर-नीचे बंद। आंखों में अजाना भय। मेले में अकेले छूटे बच्चे-सा भाव। जिस मन को उसने पिछले कुछ महीनों में कोड़े लगा-लगा कर ज़रा-सा क़ाबू में किया था, वह पिघलने लगा। लड़की को यूं देखता पा लड़के ने उसका हाथ थामा और अपनी आंखें उसकी हथेली पर रख दीं। लड़के की पुतलियों का कंपन लड़की को महसूस हुआ। पलकों के उस पार कोई दूसरा संसार था। लड़का बदल गया था। उसका अहंकार जलकर राख हो गया था। वह पहले से कहीं अधिक कोमल हो गया था। उसकी देह-भाषा से समर्पण झांक रहा था। उसने दूसरे हाथ से लड़के के गालों को छुआ। अधबढ़ी दाढ़ी ने हथेली को गुदगुदाया। लड़की के जीवन से यह स्पर्श अनुपस्थित हो गया था।

आज इतने समय बाद लड़के को छुआ तो गालों और हथेली के बीच पहले की तरह करंट बह रहा था। उसने हैरत से अपने हाथों को देखा और दोनों हाथों में लड़के के गालों को भर लिया। लड़का मुस्कुरा रहा था, महीनों बाद। पिछले कुछ महीने उसने ज्यों किसी अपराध का दंड भोगते बिताए हैं। पीड़ा के कोड़े रह-रहकर बरसे हैं उसपर। पछतावे से भरा वह ख़ुद को कोसता रहता। राह देखता कि क्या पता लड़की आ जाए। पर वह आई नहीं और वह ख़ुद जा न सका। जिस अहंकार से उसने लड़की को धक्का दिया था, उस अहंकार को मिटाना उसके लिए आसान न था। धीरे-धीरे वह ख़ुद गुम होकर लड़की में बदल गया। ख़ुद को खोकर और अपने महबूब में ढलकर ही उस आवाज़ में पुकारा जा सकता है जिसे सुनकर वह चला आए। तने को ज्यों अपने धैर्य का पारितोषिक मिल रहा था। अब लड़की लड़के से मुख़ातिब थी।

‘तुम मामी जी से मिले?’

‘हां पर वे मुझे पहचानती नहीं।’

‘क्यों?’

‘वे पागल हो गई हैं।’

‘किसने कहा?’

‘मैंने देखा है।’

‘डॉक्टर को दिखाया?’

‘कोई फ़ायदा नहीं?’

‘लेकिन क्यों?’

‘कहते हैं कि दूसरे का सोना चुराने वाला पागल हो जाता है।’

‘तुम्हें लगता है भास्कर मामा कनिका जी के थे?’

‘पता नहीं। पर इतना समझ गया हूँ कि कोई कितने भी प्रतिबंध लगाए, चाहे सात तालों में रखे, मन जिसके साथ जा जुड़ा, उसी का हो रहता है। कोई तीसरा शख़्स इस जुड़ाव को काट नहीं सकता। उस जुड़ाव को बनाए रखने वाले भी वही दो लोग होते हैं और ख़त्म करने वाले भी।’

‘फिर क्यों तुमने मुझ पर संदेह किया? क्या तुम नहीं जानते थे मेरा मन तुमसे बद्ध था।’

‘संदेह की रस्सी ने मेरे गले में फंदा डाल दिया था।’

‘तुमने मुझे बहुत चोट पहुंचाई।’

‘मैं तुम्हें खोने से डरने लगा था।’

‘पर अंततः खो तो तुमने दिया था।’

‘हां।’

‘तुमने मुझे बचाने की कोशिश भी नहीं की।’

‘मैं ख़ुद भी बचा नहीं रहा।’

‘…’

‘क्या मैं तुमसे माफ़ी मांग सकता हूँ?’

लड़की के उत्तर देने से पहले लड़का नीचे झुक गया था और लड़की के पैरों पर अपना माथा टिका दिया था। चुंबनों से उसके पांव भिगोते हुए वह उपासक हो चला था। उस दिन का दंभी, अड़ियल लड़का जो निहायत ही मूढ़ नज़र आ रहा था, उसकी जगह आज एक सरल लड़का, प्रेम में बिंधा खड़ा था। समय रहते प्रेम को ‘ओन’ न किया जाए तो वही प्रेम एक दिन ‘डिसओन’ कर देता है। सब यह अविस्मरणीय दृश्य देख रहे थे। जहां न लड़के का दर्प आड़े आ रहा था न लड़के के पास कभी न आने का लड़की का हठ। दोनों के व्यक्तित्व से एक-एक कठोर परत झर चुकी थी। दोनों के बीच किसी बहस के लिए स्थान नहीं बचा था। लड़की को कुछ याद आया।

‘तुम दोबारा क्यों आए?’

‘तुम नहीं जानतीं?’

‘नहीं जानती।’

‘तुम क्यों मेरे बुलाने से लौट आईं?’

‘यह भी नहीं जानती।’

‘नहीं जानती?’

‘न, बिलकुल नहीं।’

‘इधर आओ तुम।’

लड़के ने हाथ बढ़ाया और लड़की को अपनी ओर खींच लिया। लड़की अनायास ही उसकी ओर खिंची चली आई और उसके सीने से आ लगी। अहा! महीनों बाद कैसी ठंडक पड़ी। लड़की ने गहरी सांस भरी, ज्यों लड़के की छुई हवा, भीतर भर रही हो। लड़के ने उसे यूं चिपका लिया जैसे जिस्म रूह से आ मिला हो। लड़की सुबकने लगी। लड़के की कमीज़ भीग गई। लड़के ने वही कमीज़ पहनी थी जो उनकी पहली मुलाक़ात की गवाह थी। पेड़ ने देखा, लड़के की आंखें भी भीग रही थीं। इतने महीनों का ग़ुबार भरा था आंखों में, रेगिस्तान की परत पड़ी थी। सब बह चला था। लड़की ने लड़के के अधरोष्ठ का स्पर्श किया। तने को सुख मिल रहा था।

पत्तों और फूलों ने सरगोशी की-

-‘सेकंड चांस’ में ज़्यादातर रिश्ते लुढ़क जाते हैं।

-हां, इनके रिश्ते की सफलता पर भी संदेह है।

-व्यक्ति बदलता थोड़े न है।

-देखना इनके बीच फिर वही सवाल आ खड़े होंगे।

तना सोच रहा था यह दूसरी पारी नहीं है। प्रेम के इम्तिहानों में पहला इम्तिहान कहा जा सकता है। प्रेम समतल नहीं है, पहाड़ी रास्ता है- कच्चा, खुरदुरा, ऊंचा-नीचा। नीचे की ओर लुढ़के तो ऊपर आने के लिए दम लगाना पड़ता है, एक-दूसरे का हाथ थामना पड़ता है। नहीं थामा तो ढलान ही अंत है। आगे और भी इम्तिहान होंगे। प्रेम कॉन्स्टेंट नहीं है, वेरिएबल भी नहीं। यह तो कोवेलेंट बॉण्ड है, जहां दो लोग होते हैं अपने कुछ हिस्सों के साझेदार। न किसी की हुकूमत, न कोई मातहत। बस शिरकत, बराबर की। ऐसे बंधन बहुत मज़बूत होते हैं किंतु तना यह भी जानता है कि बंधन कितना भी मज़बूत हो संतुलन बिगड़ने पर उसका टूटना तय है। पलड़ा इधर से उधर हुआ कि स्थिरता बदल गई अस्थिरता में। इन दोनों का मिलना भी अंतिम निर्णय नहीं, अभ्यास है। इसी अभ्यास में प्रेम की सुंदरता है। यक-ब-यक बारिश की बूंदें सूरज को भिगोने लगीं। लगता है आज इंद्रधनुष निकलेगा।

शाखसार : कई शाखाओं वाला घना पेड़

संपर्क :ए-113, अनुकंपा रेजीडेंसी, शांति नगर, दुर्गापुरा, जयपुर-302018 मो.7728822940