कहानी संग्रह ‘मैं यहाँ कुशल से हूँ’ प्रकाशित। सेना से कर्नल रैंक से रिटायर।

 

‘थैंक्यू वैरी मच! आइ एम ऑनर्ड!’- इतना ही कह पाया था मैं। बहुत-कुछ कह सकता था, कर सकता था मैं उसके लिए। फिर फुर्सत में एकांत मिलते ही मैं अपराधबोध में खुद को दुत्कारता। मन ही मन कह उठता- अब पछताय क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत। पहले भी कुछ इसी तरह का पछतावा हुआ है। परंतु तभी जब मैं फुर्सत में एकांत में होता हूँ, अकेला।

एकांत और अकेले का मतलब- मोबाइल से दूर। टोटल डिसकनेक्टेड। सोचते हुए तब लगता कि मैंने एक ईश्वर प्रदत्त उपहार खो दिया है। उपहार मतलब – एक अच्छा इंसान, फरिश्ता। मुझे इन उपहारों को खोने का दुख है। गलती हो जाने के बाद अब मैं सिर्फ प्रायश्चित्त कर सकता हूँ। उन अनजान, अपरिचित और निस्स्वार्थ इंसानी फरिश्तों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु यह कहानी मेरा एक सद्भाव से भरा प्रयत्न मात्र है। और जनाब, यदि आप भी एकांत में मनन करेंगे, तो पाएंगे कि आपने भी ऐसे कई उपहारों को खो दिया है।

पाँच रुपये का सिक्का अथवा दस रुपए का नोट यदि रास्ते पर पड़ा मिल जाए, तो हम उसे साफ कर जेब में रख लेते हैं। मगर जब हमें राह में चलते, बस, ट्रेन या ऑटो में सफर करते हुए कोई अनजान इंसानी फरिश्ता मिल जाता है तब हम उदासीन बने रहते हैं या फॉर्मेलिटी में सिर्फ ‘थैंक्यू’ शब्द को हवा में उछाल देते हैं। पल्ला झाड़ते हुए। जैसा मैंने किया।

बहुत संभव है कि मैं जिस गलती पर पछता रहा हूँ वह आपको गलती ही न लगे। दरअसल अधिकतर लोग घोर सांसारिक, वर्ल्डली-वाइज, रोबो टाइप हैं। ‘मैं, मेरा घर, मेरे बच्चे’ मानसिकता का सिम कार्ड डाले लोगों की दिमागी स्क्रीन पर इस तरह के सिगनल नहीं आ पाते।

अब आपको मैं अपने पछतावे का सबब बताता हूँ –

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मैं अपने जिगरी दोस्त गंभीर से मिलने देहरादून गया था। उसे देहरादून पोस्टिंग पर आए दो वर्ष हो गए थे। हम दोनों एक ही गाँव दानपुर के हैं। किशोरावस्था से हमारी दोस्ती है। दोस्ती इतनी प्रगाढ़ कि स्कूल, कॉलेज के दिनों में, मैं उसके घर कई बार रात को देर तक बैठे रहता। देर रात लौटने पर माँ, बाबू की डाँट खानी पड़ती। पर मुझे उनकी डाँट खानी मंजूर थी, लेकिन मेरी उसके साथ देर तक बैठने की जब भी इच्छा होती, मैं जरूर बैठता। बाद में माँ-बाबू ने भी डाँटना छोड़ दिया था, जब उन्हें यकीन हो गया कि हम दोनों सही रास्ते पर हैं। स्कूल के दिनों से हम दोनों को पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक था। गंभीर ने अपने एक कमरे को लाइब्रेरी का रूप दे दिया था। उसके बड़े भाई हरिओम जी को हमसे भी ज्यादा पढ़ने का चस्का था। ढेरों किताबें थीं उनके पास भी। किताबों में जिल्द लगाने में उन्हें इतनी महारत हासिल थी कि यदि उन्होंने एक बार किताब में जिल्द लगा दी, तो वो शतायु हो जाती। पुरानी बाल पत्रिकाओं के उपलब्ध अंकों को पढ़ते। कई बार खरीद कर साझा करते। बड़े होने पर हमने साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़नी शुरू कीं। कई बार किसी की कहानी, कविता अच्छी लगने पर हम उस लेखक को सराहना पत्र लिखकर खुश होते। उस लेखक का हमारे नाम पत्र आने पर खुशी से फूले नहीं समाते।

नौकरी लगने के बाद से रिटायरमेंट तक हम अलग-अलग जगहों में पोस्टेड हुए। मैं सेना में होने के कारण लद्दाख से चेन्नई और बाड़मेर से अरुणाचल तक घूमता रहा। गंभीर ने क्षेत्रीय बैंक में होने के कारण अपनी पूरी नौकरी उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों, कस्बों में की। छुट्टियों में मेरे दानपुर गाँव आने पर वह भी चार-पाँच दिन की छुट्टियों पर गाँव आ जाता। कई बार मैं ही उसके ड्यूटी स्टेशन पर मिलने चला जाता। यह वह समय होता, जिसमें सिर्फ हम दो होते। परिवार का कोई व्यक्ति भी नहीं। वही गाँव वाले पुराने दोस्त – साइकिल पर स्कूल जाने वाले, गाँव के बोरिंग में साथ-साथ नहाने वाले और रुद्रपुर के पंचायत घर के पास पीपल के पेड़ के नीचे भुने चने खाते भविष्य के ताने-बाने बुनने वाले दोस्त!

छुट्टियों में साथ बिताए गए ये दिन पूरे वर्ष हम दोनों के लिए ‘बूस्टर-डोज’ का काम करते। कुछ दिन गंभीर के साथ रहने के बाद जब मैं वापस नौकरी पर जाता, तो वह मेरे लिए कई कहानी संग्रह, उपन्यास, पत्रिकाओं का एक पैकेट बना कर दे देता। दरअसल मैंने उससे कह रखा था कि सेना में फील्ड पोस्टिंग में रहते ये किताबें, पत्रिकाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं। मेरी पोस्टिंग जब चेन्नई, बैंगलोर, हैदराबाद हुई तो मुझे ताज्जुब हुआ कि वहाँ के किसी भी बुक-स्टॉल, बस या रेलवे स्टेशनों में हिंदी पत्रिकाओं का नामो-निशाँ नहीं था।

इस बार भी गंभीर के साथ बिताए गए दिन सुकून से लबरेज थे। हमने पूरे वर्ष के लिए गागर में सागर भर लिया था। वापस जाने वाले दिन गंभीर ने मुझे अपनी कार से देहरादून रेलवे स्टेशन छोड़ दिया। उसके बाद उसे मैक्स अस्पताल जाना था। डॉक्टर से उसका एपॉइंटमेंट पहले से निश्चित था।

मैं अपना बैग, जो अब किताबों, पत्रिकाओं के बड़े पैकेट से भारी हो गया था, कंधे में लटकाए रेलवे स्टेशन के अंदर दाखिल हुआ। देहरादून-काठगोदाम शताब्दी एक्सप्रेस सामने प्लेटफार्म नंबर एक पर लगी थी। मैं अपनी सेकेंड ए सी की रिजर्व्ड सीट पर बैठ गया। ट्रेन जब चलने लगी तब मैंने किताबों के पैकेट से एक कहानी संग्रह निकाला और एक कहानी पढ़ने लगा।

कहानी पढ़ने के दौरान मैं बीच-बीच में आस-पास बैठे सहयात्रियों पर भी नजर डाल लेता। सभी को मोबाइल की स्क्रीन पर उलझे पाता, कानों में इयर-फोन लगाए, एक ही ट्रेन में बैठे-बैठे सब सह-यात्रियों की अलग-अलग पटरियों पर अलग-अलग दिशाओं में यात्रा हो रही थी। सहयात्रियों का फेस टु फेस कनेक्शन, इंटरैक्शन विलुप्त था। सब फेसबुक, व्हाट्सऐप के मायावी इंद्रजाल में ट्रैप्ड थे। थोड़ी देर मैं इंद्रजाल में फँसे लोगों को देखता रहा। फिर सहसा मैं अतीत में चला गया, जब ट्रेन में सफर करते लोगों के बीच बड़े ही सहज, स्वाभाविक और अनौपचारिक लहजे में एक-से-एक रोचक किस्से, कहानी, बहसें, शेरो-शायरी, प्रहसन, चुटकुले शुरू हो जाते थे। कई बार घर से पैक कर लाए खाने का आदान-प्रदान भी हो जाता। ऐसे में पूरा सफर हँसी, ठहाकों और मस्ती से गुलजार हो जाता।

कई बार सफर के दौरान ऐसे दोस्त भी बन जाते, जिनसे बाद में भी पत्र-व्यवहार, दुआ-सलाम होता रहता। विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के बीच इस तरह का पारस्परिक सौहार्दपूर्ण मेल-जोल समाज के एकीकरण में उत्प्रेरक का काम करता। कोई प्यासे को पानी पिला दे; दुखी, थके-हारे आदमी के कंधे पर हाथ रख दे; मीठे बोल बोलकर, उसकी हौसला अफजाई कर दे, तो लोगों के आधे रोग, दुख-दर्द यूँ ही उड़न छू हो जाते हैं।

जब ट्रेन रामपुर पहुँची, तब तक मैं कहानी संग्रह की सभी कहानियों का रसास्वादन कर चुका था। दरअसल एक अच्छी किताब एक महँगी शराब की तरह होती है जिसका रसास्वादन धीरे-धीरे करना ही श्रेयस्कर है।

कुछ देर मैं न जाने कब आँख लग गई और ट्रेन जब झटके के साथ रुकी, तो मैंने बाहर झाँका, बिलासपुर स्टेशन आ गया था। मुझे पता था ट्रेन यहाँ सिर्फ दो मिनट के लिए रुकती है। करीब पंद्रह किलोमीटर दूर अगले स्टेशन रुद्रपुर पर मुझे उतरना था। यानी करीब दस मिनट का सफर और बचा था। मैं एसी कोच के अंदर एन्ट्रैंस वाले शीशे के दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया। रुद्रपुर स्टेशन कभी भी आ सकता था।

-‘एक्सक्यूज मी सर! आइ कुड नॉट रजिस्ट माइसैल्फ फ्रॉम कम्प्लीमैंटिंग यू… यू लुक सो स्मार्टली ड्रैस्ड-अप, एट दिस एज… आई रियली एप्रीसिएट योअर ड्रैसिंग सैंस…!’ एक सहयात्री जो करीब तीस वर्ष के आस-पास का रहा होगा, मेरे पास आकर बोला।

‘ओह! थैंक्यू वैरी मच! आइ एम ऑनर्ड!’ -यह मेरा एक मैकेनिकल रिफ्लैक्स-एक्शन था।

‘व्हैर आर यू गोइंग?’

‘सर काठगोदाम तक।’

‘आइ एम रिटायर्ड कर्नल जोशी, और आप…?’ मैंने हाथ आगे बढ़ाते हुए उससे कहा।

उसने अपना नाम बताया और जिस कंपनी में वह काम करता है, उसका नाम बताया। पर मैं सुन नहीं पाया। शायद किसी अनजान व्यक्ति द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर मैं बहरा हो गया था। कुछ कहना चाह रहा था, परंतु किंकर्तव्यविमूढ़ होकर गूँगा भी हो गया था। हम दोनों के बीच एक असहज मौन पसरा था।

रुद्रपुर स्टेशन आ गया। ‘ओ के, सी यू!’- कहकर मैं ट्रेन से नीचे उतर गया। स्टेशन पर उतरकर मैं वॉश-रूम सिर्फ इसलिए गया कि शीशे में खुद को उस अनजान सहयात्री की नजर से देख सकूँ।

शीशे में सब कुछ सामान्य ही लगा। फिर भी मुझे अच्छा लगा कि एक अनजान मुसाफिर ने मुझे बिना किसी प्रयोजन के कम्प्लीमेंट किया। फिर यह बात अन्य सामान्य बातों की तरह आई-गई हो गई। गाँव में कुछ दिन छुट्टियाँ बिताने के बाद मैं वापस अपने घर हैदराबाद आ गया।

दरअसल कहानी अब यहाँ से शुरू होती है –

रोज की तरह सुबह पाँच बजे जब मैं छावनी के गॉल्फ-ग्राउंड में टहलने निकला, तब सहसा ट्रेन में कम्प्लीमेंट करने वाला वह अनजान सहयात्री मेरे खयालों में आकर मेरे साथ-साथ चलने लगा। हूँ… शायद उसके पास मोबाइल न हो! …पर ऐसा कैसे हो सकता है…! आखिर नौकरी कर रहा है… अच्छी खासी अंग्रेजी बोल रहा था। आजकल नौकरों, आयाओं के पास तक मोबाइल है। मैंने मोबाइल का जिक्र इसलिए किया कि यदि वह और मुसाफिरों की तरह मोबाइल में व्यस्त होता, तब वह मुझे कैसे देख पाता। शायद वह भी मेरी तरह मोबाइल का सीमित उपयोग करता हो। मेरी ही तरह उसे आस-पास के माहौल को देखना, ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकते हुए अतीत के दृश्यों, प्रसंगों में डुबकी लगाना ज्यादा अच्छा लगता हो।

मुझे अब लगा कि मैं अब जो करना चाह रहा हूँ अपने स्वस्थ, संजीदा और तर्क-संगत दिलो-दिमाग से, तब क्यों नहीं कर पाया। तब तो लट्टू हो गया था। बहरा और गूँगा भी।

कुछ खो दिया है तुमने! पता भी है! सोचो!! – मन में एक आकाशवाणी सी हुई। मैं अंतर्द्वंद्व से गुजरता चलने लगा। आत्म-मंथन के बाद निष्कर्ष कुछ यूँ निकला:

उस समय ट्रेन में एक अनजान सहयात्री द्वार तुम्हारे ड्रेसिंग सेंस पर कंप्लीमें करने पर तुम्हारा आत्ममुग्ध हो जाना गलत था। बेहतर यह होता कि तुमने उसका मोबाइल नंबर पूछा होता, फिर उसका नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया होता। इससे भी पहले तुमने उसकी सहजता, सरलता और संवेदनशीलता को खुले दिल से तारीफ की होती।… इस घोर स्वार्थी, आत्मकेंद्रित और अमानवीय दुनिया में तुमने एक इंसानी फरिश्ता खो दिया। ये तो तेजी से विलुप्त होती जा रही प्रजातियाँ हैं। इनका संरक्षण क्या भावी समाज के लिए जरूरी नहीं…?

विचारों के सैलाब और उससे उत्पन्न बवंडर ने मेरी चाल काफी धीमी कर दी थी।

सहसा मुझे वीर चक्र पाए कैप्टन रवि कपूर की याद हो आई। मैं पीछे 1983 वर्ष में चला गया, तब मैं भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में ट्रेनिंग पीरियड में था। जैंटलमैन कैडेट। अकादमी ज्वॉइन करते समय मैं बहुत कमजोर था। दौड़ा नहीं जाता था। सिट-अप, पुश-अप, चिन-अप, वर्टिकल रोप, मंकी रोप कुछ भी नहीं होता था। पास आउट होने के लिए पीपीटी (फिजिकल प्रोफिसिएन्सी टेस्ट), बीपीईटी (बैटल फिजिकल एफिसिएन्सी टेस्ट), रूट मार्चेज को पास करना बेहद जरूरी था। ट्रेनिंग के पहले ही हफ्ते तंग आकर मैंने बटालियन कमांडर को रैजिगनेशन लेटर दे दिया था, परंतु अकादमी बाबू और गंभीर ने मुझे समझाकर हौसला बढ़ाया। गंभीर ने मुझे प्रोत्साहन देने के लिए एक कविता लिखी- ‘योद्धा के नाम पाती’, इसने मुझे लड़ने को प्रेरित किया। ट्रेनिंग के दौरान अकेले में लेखकों के कोटेशनों को मन ही मन दोहराते हुए खुद को मजबूत करता। अक्सर कवि नरेश मेहता की पंक्तियाँ दोहराता- ‘परिस्थितियाँ धेनु हैं, दुहो इनको, अपनी निष्ठुर उँगलियों से…’ कभी हैमिंग्वे को अपने अंदर बुदबुदाता पाता – ‘मैन कैन बी डिस्ट्रक्टेड, बट नॉट डिफीटेड,’ ट्रेनिंग के सातवें महीने तक मैंने अपने आपको शारीरिक रूप से सक्षम बना लिया था। दस मील (सोलह की.मी.) की टेस्ट-दौड़ में जब मैं फिनिश लाइन पर कंधे में राइफल झुलाते पसीने से नहाई डाँगरी में ‘एक्सीलैंट टाइम’ के अंदर पहुँचा, तब फिनिश लाइन के पास खड़े कैप्टन रवि कपूर ने मुझे झप्पी मारते, यह कहकर उठा लिया – ‘जोशी, व्हॉट ए कम बैक! नाऊ यू आर ए मैन! कीप इट अप!’

उस दिन से लेकर पूरी सर्विस के दौरान जब-जब पीपीटी, बीपीईटी टेस्ट, रूट मार्चेज होते, तब-तब कैप्टन कपूर के वो अमोघ शक्ति से भरे शब्द मेरे जेहन में गूँजते रहते और मैं ऊर्जा से भर जाता। पूरे तीस वर्ष हर फिनिश लाइन पर पहुँचने से पहले मुझे शून्य की स्क्रीन पर कैप्टन कपूर हाथ हिलाते नजर आते। अब जबकि मैं रिटायर होने के बाद सीनियर सिटिजन की श्रेणी में आ गया हूँ, तीन-चार कि.मी. दौड़ना मेरे लिए केक-वॉक है।

जिस तरह हिमाच्छादित पर्वतों पर बर्फ गिरने के दौरान पर्वत शिखरों से वह ढलान पर गिरती बर्फ की छोटी-छोटी गेंदों में परिवर्तित हो जाती और लुढ़कते हुए, अपने रास्ते की ताजा बर्फ को समेटते हुए नीचे एक विशालकाय हिमखंड का रूप ले लेती है, ठीक उसी तरह सर्विस के दौरान मैंने अफसर प्रशिक्षण अकादमी चैन्नई, भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून, तोपखाना प्रशिक्षण केंद्र हैदराबाद और ए एस सी सेंटर बैंगलौर में सैकड़ों शारीरिक रूप से कमजोर कैडेट्स और जवानों को कैप्टन कपूर बनकर न सिर्फ उनको प्रोत्साहित किया, बल्कि उनके साथ दौड़ा भी। वे न सिर्फ पास हुए, बल्कि दौड़ना उनकी आदत में शुमार हो गया। क्या ये स्नो-बॉल इफेक्ट नहीं था?

कैप्टन रवि कपूर तब चुप, उदासीन या सिर्फ फॉर्मल रह सकता था। जैसे बाकी अफसर उस समय फिनिश लाइन के पास खड़े थे। ज्यादातर अफसर, फिनिश लाइन पर पहुँचते कैडट को सिर्फ – ‘हरी अप’, ‘वैल डन’ ही कह रहे थे। कैप्टन कपूर मेरा क्या लगता था? कुछ भी तो नहीं! बीसियों अफसरों में वह भी एक था। परंतु वह मेरा प्रेरणास्रोत बन गया।

‘गुड मॉर्निंग सर! कुछ खो गया क्या?-’ कर्नल बलजीत गॉल्फ ग्रीन टॉप से बोले।

‘मिल गई। चाबी गुम गई थी’- एक टालने वाला उत्तर देकर मैं फिर शून्य में कुछ ढूँढ़ता आगे बढ़ गया। मुझे एक और घटना याद आ गई।

घटना जनवरी 2000 के पहले सप्ताह की है। मैं अपनी भाँजी की शादी में शामिल होने के बाद माँ, बाबू के साथ लखनऊ से किच्छा तक ट्रेन में सफर कर रहा था। हड्डी को कँपा देने वाली कड़ाके की ठंड थी। बाबू की उम्र तब नब्बे के आस-पास रही होगी और माँ की अस्सी के करीब। बाबू, माँ को नीचे की बर्थ में अच्छी तरह बिस्तर बिछाकर, उनके ऊपर अच्छी तरह कंबल ओढ़ा मैं अपनी ऊपर की बर्थ में आ गया था। रात में अपनी बर्थ से जब-जब मैं नीचे देखता, बाबू-माँ का कंबल फर्श पर नीचे गिरा पाता। इधर-उधर पलटने से गिर जाता होगा। और मैं बर्थ से उतरकर उन्हें फिर अच्छी तरह से कंबल ओढ़ा देता। ऐसा करीब दस बार तो हुआ ही होगा।

सुबह जब हम तीनों अपनी सीट पर बैठे थे, तब साइड वाली बर्थ पर बैठा सहयात्री माँ-बाबू को संबोधित कर हाथ जोड़ता बोला -‘बाबा! आपका बेटा हीरा है। बड़े भागवान हैं आप दोनों। मैं इनको रात भर देखता रहा। पूरी रात ये सोए नहीं। बार-बार नीचे उतर कर आपका नीचे गिरा कंबल उठाकर आपको ओढ़ाते रहे। भगवान ऐसा बेटा सबको दे।’

मेरे लिए माँ-बाबू के लिए यह करना एक सामान्य बात थी, क्योंकि यह मेरा परम कर्तव्य था। बचपन से नौकरी लगने के बाद तक माँ-बाबू ने यही सब हमारे लिए किया था। परंतु वह सहयात्री मुझे यह करते देख जरूर प्रभावित हुआ होगा। उसके सराहनापूर्ण शब्दों ने माँ-बाबू को एक असीम सुकून और ऊर्जा से भर दिया था। माँ-बाबू उस सहयात्री को मुस्कराते हुए हाथ जोड़कर आसमान की तरफ इशारा कर रहे थे।

माँ-बाबू के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती थी! और मेरे लिए भी। एक अनजान सहयात्री द्वारा।

ट्रेन से उतरने से पहले हम दोनों ने एक दूसरे के पते नोट किए थे। कई वर्षों तक हम दोनों के बीच कुशल-क्षेम, दुआ-सलाम होता रहा, चूँकि उसका घर भी रुद्रपुर में ही था। छुट्टी में घर आने पर ही मिलना होता।

‘सर चाबी तो मिल गई थी आपको। अब इतने धीरे वॉक… नेवर सीन यू वॉकिंग एट ए स्नेल पेस।’ एक बार फिर कर्नल बलजीत टकराए।

‘टुडे इज रिफलेक्टिव वॉक! नॉट ए फिजिकल वॉक। रेमंड इनमोन कहता है- इफ यू आर सीकिंग क्रिएटिव आइडियाज, गो आउट वॉकिंग, एंजल्स व्हिस्पर टु ए मैन व्हैन ही गोज फॉर ए वॉक। अब एंजल की फुसफुसाहट सुननी है तो डियर, धीरे तो चलना पड़ेगा न।’

‘ग्रेट सर!’

कुछ दूर आगे चलकर एक एंजल ने मेरे कानों में फुसफुसाते हुए कहा- ‘फरवरी 1983 में पूना रेलवे स्टेशन में मिले उस अंजान फरिश्ते का उल्लेख किए बिना क्या तुम पछतावे से उबर सकोगे और उसके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर पाओगे। बोलो!’

मैंने कहा, उसने तो मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

मैं फिर अतीत में चला गया।

बचपन से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएट होने तक मेरी जिंदगी पहाड़ के एक छोटे से गाँव और फिर कस्बे में गुजरी थी। उम्र के पच्चीस वर्ष तक मैंने अकेले कभी ट्रेन में सफर नहीं किया था। लखनऊ, देहरादून के सिवाय मैंने कोई बड़ा शहर नहीं देखा था। ये दो शहर भी परिवार के साथ शादी में सम्मिलित होने गया था। एस.एस.बी. इंटरव्यू के लिए मुझे बैंगलोर जाना था। यह मेरे लिए एक एडवैंचर से कम नहीं था। महानगरों की ट्रैफिक, भीड़-भाड़, लूट-खसोट के मैंने बहुत किस्से सुन रखे थे। मेरे इस डर को गंभीर ने पढ़ लिया था। इसी कारण मेरे साथ वह भी दिल्ली चल पड़ा। दिल्ली-बैंगलोर का टिकट तो नहीं मिल पाया पर उसने मुझे दिल्ली-पूना झेलम एक्सप्रेस में यह कहकर बैठा दिया कि पूना रेलवे स्टेशन पर उतर कर, ‘इनक्वायरी विंडो’ से पूछताछ कर पूना-बैंगलोर ट्रेन का टिकट ले लेना।

पूना रेलवे स्टेशन पर उतर कर पूछते-पाछते मैं पूना-बैंगलौर ट्रेन वाली खिड़की नंबर एक के आगे लगी लंबी क्यू में सबसे पीछे खड़ा हो गया। जिंदगी में पहली बार किसी भी रेलवे स्टेशन की क्यू में खड़ा था। मैं अकेला। बिना किसी दोस्त, रिश्तेदार के। करीब सवा घंटा क्यू में खड़े रहने के बाद जब मेरा टिकट-काउंटर से तीसरा नंबर था क्यू में खड़े, तो अचानक टिकट काउंटर बंद हो गया। मेरे तो पैरों के नीचे की जैसे जमीन ही खिसक गई थी। आंखों में आंसू आ गए। बाबू, की याद हो आई। आस-पास खड़े लोगों से पूछा, कुछ पता नहीं लग पाया। ‘इनक्वायरी विंडो’ वाले ने बताया बैंगलोर जाने वाली ट्रेन अगले दिन सुबह सात बजे है। अगले दिन दोपहर के दो बजे तक मुझे एस.एस.बी. सेंटर बैंगलोर में रिपोर्ट करना था। तब हवाई जहाज से यात्रा करना सपने तक में नहीं था। कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। अब तो बैंगलोर पहुँचना असंभव है – मन में यह निर्णय लेते ही मैंने निश्चय कर लिया कि अब वापस दिल्ली चला जाए। मैं खिड़की नंबर तीन जहाँ से पूना-दिल्ली के टिकट मिल रहे थे, उस क्यू में खड़ा हो गया। सोचा कुछ दिन मुजफ्फरनगर में गंभीर के यहाँ रहूँगा और फिर घर जाकर कह दूँगा कि इंटरव्यू में रह गया। उस समय क्यू में खड़े मुझ पर क्या बीत रही थी, उसे मैं ही जानता था।

‘भाईसाब! अभी कुछ देर पहले आप पूना-बैंगलोर वाली विंडो की क्यू में खड़े थे काफी देर से। अब वहाँ से हटकर आप विंडो नंबर तीन के आगे लगी क्यू में खड़े हैं!’- एक अनजान आदमी मेरे पास आकर बोला।

रुआँसी आवाज में मैंने उसे अपनी आपबीती सुना दी। उसको आपबीती सुनाते मुझे बड़ी राहत मिली। परदेस में मुझे कोई सुनने वाला तो मिला।

उसने घड़ी देखी, ‘साब आधा घंटा है अभी। साढे़ सात बजे स्वार बस अड्डे से इंटरस्टेट वीडियो कोच बसें चलती हैं। आप तुरंत निकल लो। वह रहा सामने ताँगा।’

बदहवासी में उसको ‘थैंक्यू वैरी मच’ कहकर मैं अटेची उठाए ताँगे की तरफ भागा। मेरे पंख निकल आए थे। मैं बादलों के ऊपर उड़ने लगा था। ताँगा स्वार बस अड्डे के पास जैसे ही पहुँचा, पूना-बैंगलोर बस गेट से बाहर निकलने को थी। खुशी के मारे मैंने ताँगे वाले को बीस रुपए का नोट देने के बजाय पचास का नोट थमाया और बस के अंदर घुस गया।

उस बैच में सिर्फ मेरा ही चयन हुआ था। यदि वह अनजान फरिश्ता मुझे पहले विंडो नंबर एक में काफी देर क्यू में खड़े रहने के बाद फिर विंडो नंबर तीन के आगे लगी क्यू में जाकर इंतजार करते न देखता, तो… तो क्या मैं वहाँ होता, जहाँ आज हूँ?

मुझे यकीन है, इस तरह के अनजान फरिश्ते आपको भी राह में चलते-फिरते, सड़क-चैराहों, गली-मोहल्लों, बस-ट्रेन में सफर करते निस्स्वार्थ भाव से आपसे टकराए होंगे। हो सकता है, ऐसे कदरदानों ने बिना किसी प्रयोजन के आपके अंदर के ‘सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्’ को उद्घाटित कर आपका प्रोत्साहन किया हो, आपकी प्रशंसा की हो, आपका मार्ग-दर्शन किया हो। और आप पुनर्जीवित होकर दुगने जोश के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हुए हों। ऐसा है न!

क्या ऐसे फरिश्तों को आप खोना चाहेंगे? मेरी आपसे बस एक सलाह है। सफर के दौरान, टहलते हुए, चैराहों, बस स्टेशन-रेलवे स्टेशन में इंतजार करते समय जहाँ तक संभव हो सके- मोबाइल को जेब में ही रहने दें। मोबाइल के गुलाम न बनें। क्योंकि जब आपका दिलो-दिमाग चर-अचर से एकाकार होगा तभी तो आप किसी के लिए फरिश्ते बनेंगे अथवा कोई अनजान व्यक्ति आपके लिए फरिश्ता बनेगा।

जब मैं घर पहुँचा तो जूते उतारते समय मुझे सहसा गुलशन शर्मा की याद हो आई। मैं स्टडी-रूम के अंदर गया। मैंने डायरी निकाली और गुलशन शर्मा का नंबर ढूढ़ने लगा। वही गुलशन शर्मा जो जनवरी 2000 को ट्रेन में माँ-बाबू की साइड वाली बर्थ पर लेटे-लेटे रात को मुझे माँ-बाबू के ऊपर कंबल ओढ़ाते देख रहा था।

उसका नंबर रिंग हो रहा था और रिंगिंग टोन सुनते हुए मैं मंदिर की दीवार पर फूलों की माला पहने माँ-बाबू की फ्रेम में जड़ी तस्वीर देख रहा था। और देखते हुए मेरी आँखें डबडबा गई थीं।

संपर्क सूत्र :

कर्नल एम.सी. जोशी, 23/1, बी-ब्लॉक, मधुपार्क रिज अपार्टमेंट्स, टीपूखान ब्रिज के पास, लंगर हौज, हैदराबाद-500031, (तैलंगाना) मो.9591701924 email-mcjoshi.edu@gmail.com