शैल सूत्र’ (नैनीताल) त्रैमासिक पत्रिका का बाल साहित्य संपादन।पुस्तकेंकिनारे की चट्टान’ (कविता संग्रह), ‘भोलू भालू सुधर गया’ (बाल कहानी संग्रह), ‘वह बिलकुल चुप थी’ (कहानी संग्रह)

आज फिर से दादी सरकारी राशन के डिपो आई थी।दादी के फिंगर प्रिंट्स राशन वाली मशीन से मैच नहीं हो रहे थे।डिपो प्रभारी दादी को बार-बार हाथ धोने के लिए कह रहा था।साथ ही फिंगर प्रिंट्स अपडेट न करने के लिए डांट भी रहा था।अपडेट के लिए दादी को सात किलोमीटर दूर जाना पड़ता था।लेकिन इस बुढ़ापे में दादी अकेले इतनी दूर नहीं जा सकती थी।दादी को किसी का साथ चाहिए था।वैसे भी इस पहाड़ी इलाके में बरसात में होने वाले स्लाइड से दादी को बहुत डर लगता है।हमेशा से नहीं, जब से दादी के पति इस स्लाइड की अथाह मिट्टी में दफन हुए थे, तब से।दूसरे लोगों के साथ पांचवें दिन उनका शव बाहर निकाला गया था।इस वज्राघात ने दादी को जिस कदर तोड़ा, उसे दादी ही जानती है।

सास-ससुर ने इस प्राकृतिक घटना का जिम्मेदार दादी को ही ठहराया और ‘मनहूस’ का तमगा देकर अपने घर से निकाल दिया।पशुशाला के साथ वाला वह कमरा रहने को दिया जो पशुओं के घास, जलावन की लकड़ी व उपले आदि रखने का स्टोर था।सास-ससुर को उसके दो मासूम बच्चों पर भी जरा-सा रहम नहीं आया।वह कितना बुरा दिन था दादी के लिए।दादा के जाने के बाद एकदम से ही सब कुछ बदल गया था।यह उसके लिए अकल्पनीय था।

किस तरह से उसने उस दिन बारिश में साथ के जंगल से लकड़ी लाई थी।उस रोज बारिश के इस पानी में वह भी अपना हिस्सा जोड़ रही थी।आंखें रो-रो कर सूज गई थीं।उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसकी क्या गलती रही होगी।यह उसके टूटने और जुड़ने का क्रम था।वह इस जंगल में जाने से हमेशा डरती थी।दादा ने कई बार साथ चलने को कहा, लेकिन वह कभी नहीं गई।वह जंगल की भयावहता से भलीभांति परिचित थी।जब वह छोटी थी तो मां-भाई के साथ जंगल से लकड़ी और घास लाने गई थी।उस रोज उसके भाई को बाघ ने जिस तरह से दबोचा, वह दृश्य आज भी उसके जहन में वैसा ही तरोताजा है।बाघ ने भाई की टांगें, बाजू के साथ मुंह के एक हिस्से के मांस को बुरी तरह से नोच डाला था।यदि पीछे आने वाली की गांव की टोली न होती तो भाई जिंदा न बचता।वह बच तो गया, लेकिन आज एक अपाहिज की तरह जी रहा है, लाचार और मजबूर…।

लेकिन आज वह जंगल जाने से नहीं डरी थी।उसके दो छोटे बच्चे सुबह से भूखे बैठे थे।आज उसके लिए बाघ से बड़ा खतरा दूसरा था।जंगल से वापस आकर उसने गांव वालों से थोड़ेबहुत आटाचावल का इंतजाम किया।अस्थाई चूल्हा तैयार किया और टुकुरटुकुर मां के आंसुओं को देखते बच्चों के मुंह तक निवाला पहुंचाया।

दोनों बच्चों को उस दिन इतना तो समझ आ ही गया था कि उनके दादा-दादी ने उनके साथ बहुत बुरा किया है।वे चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते थे।कुछ वर्ष पहले ही तो उन्होंने ढंग से चलना सीखा था।उनका विरोध किसी भी काम आने वाला नहीं था।दादी के सास-ससुर को ताया के साथ रहना था, यह पहले से ही तय हो चुका था।दोनों बच्चों को दादी ने किन-किन मुश्किलों में पाला, बड़ा किया और अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, यह दादी की ही हिम्मत थी।दादी के मायके में पहले से ही अपाहिज भाई था, जो इन परिस्थितियों में मजबूर था।दादी के गरीब माता-पिता भाई का ही ख्याल रख पाएं, दादी के लिए इतना ही बहुत था।दादी ने बहुत समय तक अपने माता-पिता से अपनी इस हालत का कोई जिक्र तक नहीं किया।वैसे भी, क्या होता, यदि वह बता भी देती! वह उन्हें और ज्यादा परेशान नहीं कर सकती थी।

यह बुरा वक्त दादी ने शुरू में तो रो-रो कर गुजारा।कई दुख, परेशानियां लौट-लौट कर जब दादी को परेशान करती रहीं तो एक बार दादी ने सदा के लिए इससे छुटकारा पाना चाहा।उस रात खाने में चूहे मारने की खूब सारी गोलियां मिला दीं।लेकिन उस घड़ी न जाने कौन-सी ऐसी ताकत ने यह कदम उठाने से दादी को रोका। …फिर इस घटना के बाद दादी कभी नहीं रोई।हालातों से लड़ते हुए हर परिस्थिति में मेहनत-मजदूरी, सिलाई आदि करके अपने दोनों बच्चों की हर मुराद को पूरा करने की कोशिश करती रही।चाहे कई बार नमक के साथ ही रोटी से गुजारा करना पड़ा।

अनपढ़ दादी डिपो के बाहर एक छोटे से पत्थर के ऊपर बैठी अपनी उंगलियों के पोरों को मलते हुए सोचती रही, यदि अपडेट के लिए वह दफ्तर चली भी जाए तो उसे इस प्रक्रिया का पता ही नहीं लग पाएगा।वह कमरे-कमरे भटकती रहेगी और फिर न जाने कितना समय लग जाए।फिर घर भी तो आना है! चादरू की गांठ में इतने रुपये भी नहीं हैं कि वह घर वापसी के लिए कोई गाड़ी ही कर सके।पैदल चलना तो आफत ही होगी।गांव के लिए अंतिम बस भी तीन बजे ही निकल जाती है।क्या पता तब तक उसका काम होगा भी या नहीं!

वृद्धा पेंशन के मिलने वाले आधे रुपये तो बड़ा बेटा ही ले लेता है।जो थोड़ेबहुत बचते हैं वह उससे राशन के लिए मांग लेता है।डाकिया जैसे ही पेंशन देकर गया नहीं कि दादी के हाथ कुछ ही मिनटों में खाली हो जाते हैं।

फिर कभी-कभार दवाई आदि के लिए तो दादी को भिखारी की तरह हाथ फैलाने का सिलसिला कब से चला ही आ रहा है।उसकी भी कोई गारंटी नहीं कि पक्का मिलेंगे भी या नहीं।इसलिए दादी बार-बार हाथ धोकर या बार-बार उंगलियों के पोरों को मलकर ही फिंगर प्रिंट्स मैच करने का प्रयास कर रही थी।सोच रही थी, शायद इस बार भी हमेशा की भांति कोई तुका लग ही जाए।लेकिन सब बेकार! दादी के फिंगर प्रिंट्स मशीन से मैच नहीं हो रहे थे।दादी परेशान थी।

डिपो के साथ वाले सरकारी स्कूल में दादी के छोटे लड़के का बेटा अभिनव दूसरी में पढ़ता था।दादी उसे ‘अभ्भु’ कहकर ही बुलाती थी।अभिनव के मम्मी-डैडी दादी के साथ नहीं रहते।दादी को ताया ने अपने साथ रखा था।दादी दिनभर घर का और पशुओं का काम करती रहती।हर मौसम में दादी के हाथ-पैर फटे रहते थे।ताया ने दादी का अलग राशन कार्ड बनवाया था ताकि थोड़ा ज्यादा राशन मिल सके।पहले तो ताया ही स्वयं राशन ले आते थे लेकिन जब से फिंगर प्रिंट्स को मशीन से मिलाकर राशन मिलने लगा था तब से दादी को न चाहते हुए भी जाना ही पड़ता था।न जाए तो ताया-ताई की डांट मिलती।दादी के लिए यह मशीन मुसीबत थी।एक तो इस उम्र में ही पूरा बुढ़ापा आ गया था।ऊपर से जोड़ों का दर्द।दादी हमेशा ही चिंतित रहती।बेटे को डॉक्टर के पास ले जाने का समय कभी नहीं मिला।दादी ने इसका एक अस्थाई उपाय ढूंढ़ा था।वह एक देसी दवाई जानती थी जो रास्ते के साथ लगती झाड़ियों में उगती थी।दवाई के लिए रुपये न होने के चलते उसकी मां भी भैया को लगाती थी।कितने वर्ष बीत गए।बस! उसी से ही काम चल रहा था।जब दर्द होता तो दादी इन पत्तियों को कूट-कूट कर चादरू के साथ जोड़ों में बांध देती थी।इससे दादी को दर्द से थोड़ी राहत जरूर मिलती थी, लेकिन पूरी तरह से स्वस्थता आज तक नसीब नहीं हुई थी।

जब दादी के फिंगर प्रिंट्स मशीन से मैच नहीं होते तो दादी को बार-बार उस मशीन तक ट्रायल के लिए बुलाया जाता।यदि फिर मैच नहीं होते तो डिपो प्रभारी उन्हें हाथ धोने या उंगलियों के पोरों को मलने के लिए भेज देता।यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती।फिर अचानक मैच हो जाते तो ठीक, वरना अगले कल आने के लिए कहा जाता।यह प्रक्रिया दादी को थका देती थी।यह औरों के साथ भी होता, लेकिन उनके एक-दो प्रयासों के बाद अकसर मैच हो ही जाते।इन सब में दादी के ही सबसे ज्यादा ट्रायल चलते थे।कई बार तो सुबह से शाम भी हो जाती थी।

दादी ने बड़े बेटे को कई बार कहा भी कि फिंगर प्रिंट्स अपडेट करवाने ले जाए।लेकिन उसे हर बार यही कहा जाता कि जैसे ही समय मिलेगा तो मैं ले जाऊंगा।लेकिन आज तक वह समय आ ही नहीं पाया।

आज भी राशन लेने दादी को अकेले ही आना पड़ा, क्योंकि पिछले कल दादी के फिंगर प्रिंट्स नहीं मिल पाए थे।घर वाले अपना राशन पिछले कल ही ले आए थे।पांच महीने पहले जब दादी तबीयत ढीली होने के चलते अपना राशन नहीं ला पाई थी तो उसे तीन दिन तक बासी खाना ही दिया गया।वह भी जानबूझ कर, विलंब से।तब से दादी ने यह रिस्क नहीं लिया।वह राशन लेने चली ही आती, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।

यह मुई मशीन उम्र का जरा भी ख्याल नहीं करती! मुझे हमेशा परेशान करती है।पता नहीं, क्या दुश्मनी है इसे मुझसे! दादी कई बार यह बुड़बुड़ाती रहती।

अभिनव को स्कूल से छुट्टी हो चुकी थी।उसने दादी को जब डिपो के बाहर उदास बैठे देखा तो वह दौड़कर दादी के पास आ गया।वह दादी से बहुत प्यार करता था।ताया और उनके घर का आंगन एक ही है।जब भी दादी दुखी होती तो वह दादी के पास पहुंच जाता।अभिनव अपने डैडी को कई बार कह चुका है कि दादी को अपने घर ले आते हैं।लेकिन ताया और उसके डैडी के बीच न जाने क्या समझौता हुआ है जिसे वह कभी समझ नहीं पाया है।

‘दादी, चलो घर चलते हैं।’ अभिनव ने कहा।

‘बेटा, अभी नहीं जा सकती।अभी मशीन से उंगलियां मिलवानी हैं।तभी राशन मिलेगा और मैं घर जा पाऊंगी।’

‘तो दादी, उंगलियां मिलवाओ न! फिर हम घर साथ चलेंगे।’

दादी ने जब सारी बात पोते को सुनाई तो वह दादी के हाथ देखकर मासूमियता से बोला, अरे दादी, तुमने हाथ ही नहीं धोए हैं।देखो मैल से कितनी लाइनें पड़ी हैं इनमें।कैसे मैच होंगी तुम्हारी उंगलियां मशीन से! जाओ, पहले तुम हाथ धोकर आओ।वह भी साबुन से रगड़-रगड़ कर।हमें स्कूल में सिखाते हैं सही से हाथ धोना।देखना, तुम्हारे हाथ बिलकुल साफ हो जाएंगे मेरी तरह।फिर फिंगर प्रिंट्स भी मैच हो जाएंगे।’

‘मैं कब से यही तो कर रही हूँ अभ्भु।’ उदासी में दादी बोली।

दादी, मैल की रेखाएं साबुन से ही जाएंगी।उंगलियां मलने से थोड़ी न! मैं अपने हाथ रोज धोता हूँ।दिन में कई बार धोता हूँ।देखो, मेरे हाथ कितने गोरे और साफ हैं।तुम्हारे भी ऐसे ही हो जाएंगे।

पोते के भोलेपन को देख दादी ने उसे प्यार से गले लगा लिया।वह जानती है, जीवित रहने के लिए उसे इन फिंगर प्रिंट्स को संभालना ही होगा।उसके यही फिंगर प्रिंट्स अपने दोनों बच्चों को प्यार से संभालते, गिरते, पड़ते, उठाते, घावों को सहलाते, उनके दुखों, परेशानियों को बांटते और उनकी ख्वाहिशों को पूरा करते न जाने कहां-कहां प्रिंट हुए होंगे।जिनकी कोई भी गिनती नहीं कर पाएगा।चाहोगे भी, तो भी नहीं! वह समय एक मां का था।जिसमें ऐसे किसी हिसाब-किताब के लिए कोई स्थान नहीं था।

पोते के कोमल हाथों को अपने हाथों में लेते हुए दादी अपने सांवले लेकिन फटे हुए झुर्रियों वाले हाथों की उंगलियों के पोरों पर, गाढ़े फिंगर प्रिंट्स उभरते हुए महसूस कर रही थी।

संपर्क :गांव व डाकघर महादेव, तहसील सुंदरनगर, जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश175018मो.9805402242