
चर्चित आलोचक और कथाकार। बर्दवान विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के पूर्व प्राध्यापक। अद्यतन आलोचना पुस्तक ‘कथालोचन के नये प्रतिमान’।

‘मैं नहीं जानता कोई कैसे अश्लीलता को परिभाषित करता है। मैं इतना निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि उम्र के अनुसार परिभाषा भी भिन्न-भिन्न होगी।’
यह एक सुपरिचित तथ्य है कि सभ्यता के प्रादुर्भाव के साथ-साथ श्लील-अश्लील के सीमांतों का आविर्भाव हुआ है। पते की बात यह है, और अश्लीलता पर बहस का इतिहास साक्षी है कि शुरुआत से ही इन द्विपक्षों (श्लील-अश्लील) का संघात इतना पलटवारमूलक रहा है कि इनसे घाव अधिक हासिल हुए हैं और ‘संभाव’ के परिदृश्य लगभग नदारद हैं।
हर मुकम्मल बहस की मध्यावधि में स्थिति यह बनती रही कि सामने महाभारत अनिवार्य है और दोनों पक्षों की सेना के बीच, गीता के अपरिहार्य उपदेश के लिए रत्तीभर स्पेस बच नहीं पाया है। वहां बीच का कॉरिडोर (बतर्ज इलियटः वेस्टलैंड) इतना युक्तिमूलक और कृत्रिम है और इसमें इतने कनिंग पैसेज हैं कि चाहे श्रीकृष्ण खुद भी आजमा लें, उन्हें रथ छोड़ना पड़ेगा और साइकिल की रॉड पर अर्जुन को बिठाकर उपदेश देना पड़ेगा- फलस्वरूप वे आमने-सामने कदापि न हो सकेंगे।
हाले-मुहाल कहना यह है कि ऐसे में दो प्रकार की सीमाबद्धताओं के बादल हर युग की प्रत्येक बहस के आसपास मंडराते रहे हैं। अव्वल तो अश्लीलता के पारिभाषिक निर्देश तलाशने के प्रयत्न नगण्य ही किए गए हैं। दूसरे, वाक-वितंडा के कोलाहल को किसी परिणाममूलक अवधारणा तक पहुंचाने के खुर्दबीन और दूरबीन हम बारंबार गंवाते रहे हैं। शेषमेष इतनी टिप्पणी जोड़ना चाहूंगा कि ऐसी बहस सार्थक क्या होती, इसके विपरीत सत्यानाशी होती है, जिसमें बातें, तथ्य या शस्त्र चला नहीं करते, बल्कि जिसमें खुर्दबीन और दूरबीन फेंककर प्रतिपक्ष को दबाने का प्रयत्न किया जाता है। लहूलुहान करने का प्रयत्न किया जाता है। जब हम एक-दूसरे को दृष्टिकोण फेंककर मारते हैं तो उसी को अंधाधुंध कहते हैं, जिसमें दृष्टि से कोण और कोण से दृष्टि का ऐसा अलगौझा हो जाता है कि हाल न पूछो!
समस्याओं की मनोरंजनाएं और भी हैं। अश्लीलता के उपलक्ष्य में, सभ्यता के तदनंतर विकास के साथ-साथ नैतिकता का प्रश्न ऐसे जुड़ जाता है जैसे गांव-देहात की नई-नवेली छुटक बहुरिया के साथ लंबा-सा घूंघट। सबको पता है, मगर इसका ‘इकबाल’ अलबत्ता लापता है कि नैतिकता स्वयं में कोई आबद्ध या अटल वस्तु नहीं है। उसका भी सतत विकास होता रहता है। काल के अनवरत विवर्तन के साथ जो ‘चिरकाल’ से नत्थी हो, उसे किसी एक कालखंड के आधार पर कैसे निर्धारित किया जा सकता है! समाज के नीति-निर्धारक मानदंड बदलते रहते हैं या यों कहा जाए कि परस्पर घुलते-मिलते रहते हैं या ये एक-दूसरे से लेते-देते रहते हैं। उनकी गति-प्रकृति हमेशा क्षतिपूर्ति नियम के तहत नवोन्मेषणी होती है। समझकर समझाने का प्रयत्न करें तो उनकी गतिमानता एस्कैलेटर की भांति होती है- चलायमान अस्थिरता की सरणी (सीढ़ी) में ‘तात्कालिक नैतिक-स्थिरता’ का पायदान भी स्थानांतरित होता रहता है। सभ्यता के प्रत्येक कालखंड में नैतिकता की चाल यही है कि वह ठहरी हुई तो दिखती है, मगर चलती रहती है।
दूसरे, निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच ‘साहित्य में अश्लीलता’ की स्थिति उस बफर-स्टेट की तरह हो जाती है जिसकी विदेश नीति और पड़ोस नीति सदैव उलझनों से घिरी होती है। निज कहूं तो पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं और सार्वजनीन कहें तो अपर की अराजकता अंतहीन। ‘दुतरफा’ के दबोच में उसकी अपनी नीति रेशा-रेशा हुई जाती है। पेंडुलम ही उसकी नियति होती है और दोनों तरफ की यति में ही उसकी गति सीमित होती है।
साहित्य का समाजशास्त्र कहता है कि जो इंडिविजुएल यूनिट है, वही सोशल यूनिट होता है, जैसे हम बाजार में क्रेता, बस में पैसेंजर या चाहे घूस मांगता ट्रैफिक पुलिस हो या अपनी ही दुकान का मिष्टान्न चखता हलवाई- कोई टूटा हुआ दिल भी इंडिविजुएल यूनिट होता है तो उसे जोड़ने के प्रयास में वही सोशल यूनिट बन जाता है।
दरअसल अश्लीलता के बारे में सदियों से चली आ रही बहस से हमने बहुत कम बचाया या पचाया है। इस बहस-कुंड में हम अधिकतर स्वाहा और आहा करते रहे हैं। मुद्दे पर पहुंचकर हकलाना इस बहस के पक्ष-प्रतिपक्ष की भाषा बन गई है- हरेक को डर है कि बात मुकम्मल न बन पाई तो काट दी जाएगी, क्योंकि यह बहस चारों तरफ से सुभेद्य या अतिसंवेदनशील है। अतएव यहां कुछ भी तयशुदा या यकीनी नहीं है। यहां तर्क की सूची लंबी है और सुस्पष्ट निर्देश की फेहरिस्त शून्य है। पिनद्ध कहूँ तो अश्लीलता को लेकर साहित्य के दायरे में पारिभाषिक निर्देशों तथा दिशाफलकों का एक सिरे से अभाव है।
दरअसल साहित्य के दायरे में अश्लीलता क्या है- इससे बड़ा प्रश्न यह है कि अश्लीलता से तात्पर्य क्या है और हम साहित्य या रचनाओं में देखते क्या हैं? हम रचनाओं में जीवन के बनते-बिगड़ते तात्पर्यों को देखते हैं। हम उन तात्पर्यों की अभिधा और व्यंजना से गहरे आंदोलित होते हैं। फिर उन्हें हम अपने जीवन के तात्पर्यों के साथ मिलाते हैं। इस प्रकार हम तात्पर्यों की, विशेष प्रकार की कलात्मक एकतानता गढ़ते हैं, जिन्हें पाठानुभूति या दूसरे शब्दों में उच्चस्तरीय आलोचना कहते हैं। तात्पर्यों को गढ़ने की इस कलात्मक आतुरता को तुच्छ और अमूर्त न समझिए। यही वह संवेदना है जो रचना के निर्माण और ग्रहण, संक्षेप में रचना और आलोचना को प्रत्युपन्न करती है।
अतएव कहता हूँ कि साहित्य के दायरे में अश्लीलता के तात्पर्यों को ढूंढना ही होगा तभी बेबातों के बीच से बात बनेगी। हमें बेबाक कहना होगा, चाहे कोई इसे बचकाना दुःसाहस कह ले, हमें पारिभाषिक निर्देशों की ओर जाना ही होगा। बच्चा चाँद के लिए बिना बालहठ किए, बिना ललचाए किसी अवधारणा की गोद में चुपचाप सो जाए, बिना रार-तकरार के- ऐसा होता है क्या, या ऐसा होना चाहिए क्या?
अंततः बुद्ध वचन से इशारा लेकर आलेख के इस अंश से उठकर चल देना चाहूंगा कि ‘हमारा चिंतन ही हमें बनाता है। हम चिंतन के निरंतर अनुधावन से ही जाग्रत होते हैं और अगले चिंतन का निर्माण करते हैं।’
कैसे परिभाषा की जाए
‘हम शब्द-शब्द जोड़कर एक सुंदर-सा घर बनाते हैं मगर उसमें कभी रह नहीं पाते हैं- उसी को परिभाषा कहते हैं।’ – एक पत्र में एंटन चेखव
ध्यान रहे कि अश्लीलता का निवास भाषा में नहीं होता, क्योंकि हो ही नहीं सकता। किसी प्रकृत शब्द में अनावश्यक उपसर्ग या प्रत्यय जोड़ देना अश्लीलता है। कोई कहे कि फूलों का गुलदस्ता ले आओ या एक कप गर्म चाय ले आओ, तो रचना की दुनिया में यह अत्यंत अश्लील माना जाएगा। अत्यधिक विनम्रता के साथ आपका भवदीय कहना इसी प्रकार अश्लील है।
जिस प्रकार किसी भी कथ्य से जुड़ना अश्लीलता नहीं है, बल्कि उसी कथ्य में बलात कुछ जोड़ देना अश्लीलता है उसी प्रकार जीवन के किसी भी प्रकार के ‘सबस्टेंस’ (तत्व या उपादान) के साथ जुड़ना अश्लीलता नहीं है, बल्कि उन इंस्टेंस (दृष्टांतों) से उन्हें जोड़ देना अश्लीलता है, जो इस सबस्टेंस से किसी भी प्रकार से जुड़े हुए नहीं हैं।
जीवन के सच से जुड़ना अश्लीलता नहीं है। सच में कुछ बलात जोड़ देना अश्लीलता है। अतएव कहा जा सकता है कि रचना की दुनिया में जीवन के किसी कथ्य, कहन या थीम में अश्लीलता का निवास नहीं होता, बल्कि उस कथ्य के साथ विसंगत दृष्टांतों के बलात्कृत गठबंधन में होता है, उनके असंगत विन्यास में होता है। कहना न होगा कि जीवन के क्या या कैसे में नहीं, बल्कि रचना के ‘जैसे’ में होता है।
अश्लीलता का पता वाकई किसी वाकया में नहीं, बल्कि दृष्टांतों की नेत्रहीन अंधमति में हो सकता है। अतएव कथ्य का दृष्टांतों के साथ अनुचित गठबंधन और उचित समागम में फर्क करना जरूरी है। अपनी मृत्युशैय्या पर यह पूछे जाने पर कि अब तो शैतान का साथ छोड़ दो, भगवान को याद करो, वोल्तेयर के अंतिम शब्द कदाचित ये थे, ‘दिस इज नो टाइम फॉर मेकिंग न्यू एनीमीज’। किसी को धार्मिक दायरे में भले यह अत्यंत अश्लील प्रतीत हो, यह मुझे कहीं से अश्लील नहीं लगता। यह तथ्य साबित करता है कि वोल्तेयर आजीवन रचनाशील और श्लील (नॉन-वल्गर या क्लीन) रहा है, यहां तक कि अंतिम सांसें खींचने तक।
निवेदन है कि अश्लीलता- भाषा या शब्दों में निहित नहीं होती। इसका स्थायी पता प्रयुक्त भाषा ‘इंक्लाइनेशन’ या ‘मेंटेशन’ में ढूंढ़ा जा सकता है। इस तथ्य को सूत्रों में कहें तो अश्लीलता का निवास भाव में नहीं, भंगिमा में होता है, भंगिमा के उलजलूल जुगाड़ में होता है। अश्लीलता का निवास भाषा के इजहार में नहीं, उसके व्यवहार में होता है। अश्लीलता का निवास वृत्ति में नहीं, प्रवृत्ति में, प्रयोग में नहीं, उपयोग में और दृष्टि में नहीं, दृष्टिकोण में होता है या हो सकता है।
रचना या कला में जो अधूरा है, वह अश्लील है। जो किसी कला-प्रक्रिया को विधिवत अनर्थक बनाए, वह अश्लील है। किसी कलाकृति में वह तथ्य या तत्व अश्लील है, जब यह दिखाई दे कि भंगिमा वस्तुतः भाव पर हावी हो गई है- यह कला स्थिति अश्लील है। इसी तरह जब कोई पाठ किसी भी युग के पाठक और लेखक के बीच अनावश्यक बांध (डैम) बनाए वह ‘डैमफुली आब्सीन’ है।
पुराना अश्लील है, अगर वह नए को संतुष्ट नहीं कर पाता। नया अश्लील है, अगर वह पुराने को उत्तर नहीं दे पाता। मौलिकता स्वयं में अश्लील नहीं होती, लेकिन वह तब अश्लील बन जाती है जब वह उद्भ्रांत आजादी की मांग करती है या आजादी हथियाने का प्रयत्न करती है। यहीं पर अभिव्यक्ति की आजादी का मसला पिरोया जा सकता है।
सभी जानते हैं, अगर नहीं जानते हैं तो उन्हें जानना चाहिए कि नई आजादी, अक्सर नई प्रकार की दासताओं को भी जन्म देती है। यह तथ्य अजीब है, मगर सत्य के करीब है कि नई दासताएँ आदतन अदृश्य होती हैं, जबकि पुरानी दासताएं दृश्य ‘अदृश्य दासताएं’ सर्वथा दृश्य की तुलना में अधिक घातक और विनाशकारी होती हैं। अदृश्य दासताएं पेड़ की जड़ों में दीमकों की भांति होती हैं, जबकि दृश्य दासताएँ दीपकों की भांति होती हैं, जिनका दिन के उजाले में कोई महत्व नहीं रह जाता।
हमें ‘अदृश्य अश्लीलताओं’ पर भी गौर करना चाहिए। जैसे विच्छिन्न हो जाना अदृश्य अश्लीलता है। धर्म जब विज्ञान से विच्छिन्न हो जाता है, तब वह अश्लील हो जाता है, जैसा कि आज भी कुछ लोग ‘गंगाजल’ को परम परिशुद्धि का उपादान मानते हैं। लेखन तब अश्लील हो जाता है जब वह जीवन से विच्छिन्न हो जाता है या होने का प्रयत्न करता है। इसी तरह इतिहास जब सत्य से, न्याय जब सामाजिक दशाओं से, आवेग जब तर्क से, संस्कार जब यथार्थ से, दृष्टि जब प्रत्यक्ष से, व्यतीत जब परंपरा से, तत्काल जब चिंरतन से अनर्थक कटने या विच्छिन्न होने का प्रयत्न करता है, तब-तब वह अदृश्य अश्लीलता से आक्रांत हो जाता है। कला ही वह क्षेत्र है, जहां अक्सर ऐसी अदृश्य अश्लीलताओं के सबसे अच्छे हासिल और दृष्टांत उपलब्ध हैं।
साहित्य में अश्लीलता के बारे में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के भिड़ंत पर तनिक और चर्चा अपेक्षित है। इस भीषण संघात में यह तथ्य रोचक है कि इसमें भय और जुगुप्सा के, बिलगाव और जुड़ाव के विचित्र मनोभाव साथ-साथ सक्रिय होते हैं। हम अश्लील से भय भी खाते हैं और एकांत में उसे देखना भी चाहते हैं। निवेदन है कि अश्लीलता से भय सदैव उन्हें ही खाए जाता है, जो इस भय में पड़े रहते हैं कि उनका गोपनीय एकांत उनकी निजी संपत्ति है और कोई इसे चुरा न ले जाए। वे समझते हैं कि उनके ऐकांतिक और गोपनीय अनुभव हीरे-जवाहरात की भांति उनके निजी हैं। ये दूसरों के पास नहीं होने चाहिए।
दूसरी तरफ, इस उपक्रम में अंततः यह भी कहना चाहूँगा कि जिनकी शब्दावली सीमित और कुपोषित होती है, वे ही ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का मसला उठाकर हो-हल्ला मचाते हुए अश्लीलता की जायज बहस को अक्सर गैरवाजिब बना डालते हैं।
बेवजह भय खाना अश्लील हो न हो, बेवजह चौंकना या चौंकाना अश्लीलता है। कला और साहित्य में अश्लीलता को लेकर जब-जब हो-हल्ला मचा है, उनमें से अधिकांश का संबंध इसी निरर्थक चौंकने से है। अतएव इस ‘निरर्थक चौंकने’ के मनोदर्शन की किंचित व्याख्या प्रस्तुत है।
राज की बात कह दूं तो/ जाने महफिल में फिर क्या हो
रीतिकालीन कवि बिहारी लाल का एक द्विपद-परिदृश्य है : मिसिर जी बड़ी गंभीरता से मगर अनमने परकीया दोष का बखान कर रहे हैं। वे एक-एक कर दोष गिनाते हैं और कहते हैं कि क्यों परकीया भाव त्याज्य है। वे विस्तार से समझाते हैं कि बहनों और माताओं को क्यों इससे बचना चाहिए। इतना सुनकर पिछली पंक्तियों में बैठी हुई एक प्रौढ़ा को कुछ याद आ जाता है और वह खिलखिल हँस पड़ती है।
जैसा कि हमारे समाज में होता है, उपस्थित सभ्य जन चौंक पड़ते हैं। वे पलटकर उस प्रौढ़ा को गौर से देखते हैं। उनकी हिकारत भरी नजरें यह फैसला दे देती हैं कि वह प्रौढ़ा छिनार या अश्लील है। प्रश्न है कि अश्लील कौन हुआ- प्रौढ़ा या मिसिर जी? निवेदन है कि न वह प्रौढ़ा और न ही मिसिर जी। दोनों के संबंध चरम व्यक्तिगत थे, किसी भी स्तर पर तब सामाजिक नहीं थे और दोनों जब व्याकुल होकर जुटे होंगे तो उनके बीच नीतिशास्त्र या समाजशास्त्र के मोटे-मोटे ग्रंथ के लिए सूत भर को जगह नहीं बची थी।
तो अश्लील कौन हुआ? निवेदन है कि अश्लील वे सभासद हुए, जो प्रौढ़ा की खिलखिलाहट से अनावश्यक चौंके थे और बाद में कोई संघ या गुट बनाकर कांव-कांव करने लगे थे। जो अपने एकांत के सच को सार्वजनिक परिसर में देखकर चिंहुक उठे थे, वे ही अश्लील थे। वे ही अश्लील थे जो सच को छुपाते थे और सच को देखते ही सन्न रह जाते थे।
वे धोती-कुर्ता परसाद थे, पौराणिक कछुए (बकलम गुलेरी जी) थे। वे रेशमी दाढ़ी वाले शरीयत के व्यापारी थे, वे चर्चजीवी सनातनी तिलचट्टे थे। वे सच के नाम सुपारी लेने वाले यथार्थ के हत्याकारी थे। ये वे लोग थे, जो बार-बार यही तर्क देते थे कि बच्चे बिगड़ जाएंगे। संक्षेप में, वे श्वेतकेतु, याज्ञवल्क्य और सर अलेक्जेंडर काकबर्न के शिष्य थे।
अथ कॉकबर्न कथा
कॉकबर्न की कथा संक्षेप में इस प्रकार है। ये न्यायमूर्ति थे और 1968 में लंदन की अदालत में प्रसिद्ध हिकलीन मुकदमे में इन्होंने राय दी थी। कॉकबर्न का उक्त फैसला इसलिए प्रसिद्ध है कि आज भी आदलतों में (भारत में भी) जब-तब इसे उद्धृत कर लिया जाता है, जब किसी साहित्यिक कृति पर अश्लीलता का आरोप लगाया जाता है।
कॉकबर्न के उस ग्यारह पृष्ठ के वर्डिक्ट को उलटते-पुलटते हुए जो बात मेरे मन में सबसे पहले उभरती है, वह यह है कि भाषा की दृष्टि से ऐसा गड़बड़झाला मेरे पढ़ने में कम आया है। भाषा के मामले में वह कठिन काव्य का प्रेत माना जाएगा। उसके वर्डिक्ट के प्रत्येक पैराग्राफ में इतनी जटिलताएं और उलझने हैं, शब्द और शब्द के बीच इतने धुंध और कोहरे हैं, पंक्तियों के बीच इतने कांइयां रास्ते और कॉरीडोर हैं कि मेरा सुझाव है कि उसमें न उलझा जाए तो बेहतर है। कानूनविदों का कहना है कि वह क्या कहना चाहता था, यह स्पष्ट नहीं है और यह भी कि उसमें आत्मविश्वास का अपरिसीम अभाव है।
कॉकबर्न की भाषा का एक नमूना द्रष्टव्य है, ‘अश्लीलता का परीक्षण है यही कि जो विषय अश्लीलता से ग्रस्त है, (या अभियुक्त है) वह उन्हें अधःपतित बना सकता है अथवा नहीं, जिन व्यक्तियों का अबोध और चिंता न कर सकने वाला मन है- इस प्रकार की नीतिहीनता के प्रति उन्मुक्त है और उनके हाथों ये पुस्तकें लग सकती हैं…. आदि-आदि।’
कॉकबर्न की भाषिक विसंगति से ध्यान हटाना जरूरी है, क्योंकि विषयांतर हो जाने का अंदेशा है। मात्र इतना पूछना अभिप्रेत है कि यह चिंता न कर पाने वाला अबोध मन स्वयं में क्या है या क्या ऐसा मन होता भी है? आधुनिक शोध अनुसंधान का दावा है कि गर्भस्थ भ्रूण भी सोचने-सुनने की क्षमता रखते हैं। हमारी पौराणिक गाथाएं भी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं, उदाहरण के लिए चक्रव्यूह के संदर्भ में अभिमन्यु का उपाख्यान।
दरअसल कॉकबर्न जो कहना चाहता है उसका सारांश यह है कि जिस कृति को पढ़कर बच्चे बिगड़ जाएंगे, वह साहित्यिक कृति अश्लील है। ध्यातव्य है कि किसी कलाकृति पर जब अश्लीलता का सामाजिक आरोप लगाया जाता है तो सबसे पहले और अक्सर यही तर्क संस्तुत किया जाता है। इसी तरह, मेरे नोट्स बताते हैं कि भारतीय अदालतों में कम से कम दस बार (बंबई और कलकत्ता हाई कोर्ट में दो बार और सुप्रीम कोर्ट में भी) फैसले सुनाते हुए इसी कॉकबर्न वर्डिक्ट की बुनियाद पर राय कायम की गई है।
कानून की तीन-पांच और उसकी पद्धति-प्रविधि की संजात उलझनों में न पड़ते हुए मैं कला जगत से संबंधित इस वर्डिक्ट के मध्ययुगीन किले में प्रवेश करना चाहता हूँ, ताकि बातें सीधी और स्पष्ट की जा सकें। कानून तथा अधिनियम द्वारा बिगड़ते हुए बच्चों को सुधारने के इस जतन की जांच-पड़ताल अपेक्षित है।
मेरा कहना है कि अगर चोर की दाढ़ी में तिनका हो, तो मैं तिनके को कैसे अश्लील कह दूँ? यदि हम ठग चुनने बैठें तो पूरा गांव उजाड़ हो जाएगा। हाथी के पांव में मिसिर जी के चंद सभासद तो क्या, पूरा गांव आ जाएगा। अपने भीतर पहाड़ खोदेंगे तो निकल पड़ेगी कुरकुताऊ चूहों की फौज। जो बोले सो किवाड़ खोले-झांके अपने गिरेबान में, बच्चे-बच्चों को बिगाड़ने वाले कानूनी अधिनियम का अर्थ।
नाबाकोव की लोलिता ने हमारा किवाड़ खोल दिया था, हम भीतर झांककर चौंक गए थे, तभी इस अविस्मरणीय कृति को बाहर ही बाहर खदेड़ते हुए इतना भौंके थे!
मैं प्रौढ़ा, मिसिर जी या लेडी चैटर्ली या हेक्टर को दोष नहीं देता। उन्हें अश्लील नहीं कह पाता। संक्षेप में जो अनर्थक चौंकते हैं और उचित तर्क के अभाव में अक्सर फतवा दे देते हैं कि बच्चे बिगड़ जाएंगे और जो ये समझते-सोचते हैं कि एक रचना, एक कृति, एक किताब से समाज का पूरा का पूरा ढांचा भरभराकर ढह जाएगा, उनसे बस इतना निवेदन है- ‘आप चिकित्सक नहीं, खुद मूर्तिमान रोग हैं!’
अश्लीलता का प्रश्न
प्रसंगवश कहना है कि जब बांस में फूल आते हैं तो इन्हें खाकर चूहों की प्रचनन क्षमता में हजार गुना वृद्धि हो जाती है और उनकी संख्या में अत्यधिक वृद्धि के कारण अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कुल जमा कहना यह है कि किसी रचना में गालियों का उपयोग और उसमें नग्नता का चित्रण- अश्लीलता को लेकर किसी भी कृति के मक्तल या वधस्थली के, ये ही दा रूप हैं। इनपर विचार अपेक्षित है।
हिंदी कृतियों पर भी अक्सर अश्लीलता का आरोप लगाया जाता रहा है और पत्र-पत्रिकाएं बहुधा इस वाद-विवाद में शामिल होती रही है। लेकिन सबसे बड़ा सच तो यह है कि हिंदी में इस संदर्भ में व्यवस्थित पुस्तक का एक सिर से अभाव है, कदाचित विधिवत चिंतन का भी।
मेरा ध्यान कलकत्ता के एक प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट श्री पृथ्वीनाथ मल्लिक के एक बयान पर है। दिल्ली की एक पत्रिका के एक अंक को अश्लीलता के आरोप से मुक्त करते हुए मार्च 1967 में अपने वर्डिक्ट में उन्होंने लिखा था, ‘उपलब्ध अधिनियमों के आधार पर किसी साहित्यिक कृति रचना या आलेख पर अश्लीलता की मोहर ठांप देना मुझे युक्तियों (तर्कों) का व्यभिचार प्रतीत होता है। यह तो आधुनिक काव्य के किसी कूटाभास (पैराडॉक्स) की भांति ही है कि जैसे हम नीम अंधेरे में, जब कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा, हम किसी काजल की कोठरी में किसी काले हैट (न्याय) को ढूंढ़ रहे हैं, जो कि वहां नहीं है!’
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