
साहित्य और पत्रकारिता में चार दशकों से सक्रिय। साहित्य की विविध विधाओं में शताधिक पुस्तकें प्रकाशित। अनियतकालीन अनुवाद पत्रिका ‘सद्भावना दर्पण’ का तीन दशकों से संपादन।
गजल
फिर कोई किस्सा पुराना याद आता है
हाँ, वही गुजरा जमाना याद आता है
मां-पिता ने जो लुटाए थे कभी हम पर
प्यार का वो ही खजाना याद आता है
अब कहां बैठें, कहां चौपाल सजती है
फिर वही कसबा-ठिकाना याद आता है
आज भी बच्चे बहाने खूब करते हैं
हमको भी हर इक बहाना याद आता है
जो हमारे दिल में बस जाए वही है गीत
जो है ऐसा, वह तराना याद आता है।
सेक्टर –3, एचआईजी–2/2, दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर– 492010

