
जी. लक्ष्मी
(जन्म : 28 जुलाई 1962) आंध्र प्रदेश के राजस्व विभाग में सरकारी कर्मचारी। इन्होंने अल्बर्ट कामू के ‘आउटसाइडर’ और काफ्का की कहानियों का तेलुगु में अनुवाद। तेलुगु में इनका कहानी-संग्रह ‘पूलु पूयनि नेला’ (जमीन जहाँ फूल नहीं खिलते’) तथा ‘अभयारण्यम’ प्रकाशित।

वी एल नरसिंहम शिवकोटि
हिंदी से तेलुगु और तेलुगु से हिंदी में अनुवाद में विशेष रुचि। ‘अंग्रेज़ी-हिंदी व्यतिरेकी विश्लेषण’ पर शोधपरक पुस्तक सहित कुछ अनूदित कहानियां और कविताएं प्रकाशित।

‘रसमलाई लाऊं या बासुंदी?’ पड़ोस के एक सज्जन अपनी पत्नी से पूछ रहे हैं। कल शाम ठीक इसी समय यही सज्जन अपनी पत्नी को खूब गालियां दे रहे थे कि तुमको कोई भी काम ढंग से करना नहीं आता है। यह सारा तमाशा देखते हुए ललिता को लगा कि राजनीति की तरह शायद पति-पत्नी के रिश्ते में भी स्थायी मित्रता और स्थायी शत्रुता नहीं होती है।
घर में क़दम रखते ही देखा कि मेज पर अखबार, मैगजीन इधर-उधर पड़े हुए हैं। हॉल में कुर्सी पर गीला तौलिया ऐसे ही पड़ा हुआ है। डायनिंग टेबल पर तो जूठी थाली, बिना ढक्कन घी का कटोरा, अचार की शीशी …. ये सब देखते ही ललिता का जी छोटा हो गया। तौलिया बाहर सूखने के लिए फैलाकर थाली उसने सिंक में डाल दी। कितनी ही बार सागर को समझा-समझा कर थक गई कि खाने के बाद कटोरी वगैरह ढंक दिया करें और खाने की कोई चीज बचे तो फ्रिज में रख दें ताकि रात में खा सकें।
दो गिलास पानी पीकर ललिता ने चाय चढ़ाई। वह जिस स्कूल में काम करती है, वहा शौचालयों की बड़ी दयनीय स्थिति है। शौचालय में कदम रखने का मतलब है – उल्टी कर लेना। इसीलिए दिन भर वह पानी न के बराबर पीती है। बहुत ज्यादा प्यास लगे तो बस दो घूँट। इसीलिए जब घर पर रहती है तो पानी ज्यादा पीती है।
चाय की प्याली लेकर सोफे पर बैठते हुए टीवी ऑन किया। ऊफ….. रिमोट काम नहीं कर रहा है। सेल ख़त्म हो गए। कल ही बताया था सागर को कि सेल लाकर डाल दे। शायद भूल गया। इससे पहले तो लगातार टीवी देखा करता था। लेकिन कंप्यूटर के आते ही टीवी देखना छोड़ दिया। अब तो अकेली ललिता ही टीवी देखती रहती है। ललिता को इतना गुस्सा आया कि मन किया रिमोट को ही पटक दे। यही झंझट है सागर के साथ। कोई काम एक बार कहने पर नहीं करता। एक-एक काम दस-दस बार बताना पड़ता है। बोल-बोल कर ललिता थक जाती है …. ऊब जाती है …. हताश हो जाती है।
ललिता के स्कूल से लौटने तक सागर घर पर रहे, तो शायद ही इतनी तकलीफ हो। ललिता को स्कूल से घर लौटने में पूरा एक घंटा लग जाता है। सागर का ऑफिस तो नज़दीक है। लेकिन, ऑफिस से लौटते ही कपड़े बदलकर टेनिस खेलने निकल जाता है। टेनिस खेलकर वहीं कुछ खा लेता है और देर रात घर लौटता है। ललिता को सुबह स्कूल के लिए निकलने की हड़बड़ में कुछ याद नहीं रहता। इसलिए जो भी सामान लाना हो वह स्कूल से आते-आते सुपर बाजार से ले आती है। एक भी चीज भूल जाए तो फिर दो-तीन मील जाना पड़ता है। कम से कम उसके घर लौटने तक सागर को घर पर रुकने के लिए बोल-बोल कर थक गई। लेकिन टेनिस खेलने के लिए रोशनी का बहाना बनाकर निकल जाता है।
ललिता जब भी सागर को कुछ सामान ले आने के लिए कहती है और वह भूल जाता है तो ललिता के तेवर चढ़ जाते और वह बरतन पटक कर, अलमारी के दरवाजे जोर से बंद कर अपना गुस्सा निकाला करती थी। लेकिन ललिता को इसका नतीजा जल्दी ही समझ में आ गया। बरतन खराब होने लगे। अलमारी या दरवाजा ठीक कराना तो सपना ही है। उसके इस गुस्से से सागर के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती है। इसीलिए आजकल ललिता का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है। ऊपर से गुस्से में कुछ पटक दे तो पेट में कुछ तकलीफ होने लगी, मानो पेट में कोई चीज़ अटक गई हो। ललिता एकदम डर गई कि कहीं यह वही तो नहीं जो नानी हमेशा कहा करती थी।
‘रोज-रोज बाहर जाने के बजाय घर पर रह सकते हो न!’ एक दिन जरा ऊंची आवाज में पूछा ललिता ने।
‘क्या करूं मैं यहां बैठकर? टीवी ही तो देखना है। मेरे रहने से क्या होगा?’ ठीक है। घर पर ही रहता हूँ। लेकिन बोलो तो सही कि घर पर बैठकर मैं करूं क्या?’
‘जरूरी नहीं कि कुछ करें। ऐसे भी तो रह सकते हो न?’
‘खाली बैठे-बैठे ऊब जाता हूँ। वैसे भी बोलो कि घर में मेरे बैठे रहने से तुमको क्या मिलता है?’
‘हां, सच है। पति के घर पर रहने से किसी भी पत्नी को क्या मिलता है? रोज शाम को सड़कों पर टहलते हुए समय काटने के बजाय पति के घर पर रहने से पत्नी को क्या हासिल होता है? इस सवाल का कोई भी पत्नी क्या जवाब दे सकती है? इसीलिए ललिता भी कुछ जवाब नहीं दे पाई। अपने तर्क से उसे जीत नहीं पाई कि घर लौटते ही ताले के बजाय घर पर एक आदमी हो, तो घर आने का मन करता है। ऐसा न हो तो घर आने का भी मन नहीं करता है।
घर में किसी के साथ बैठकर चाय पीने, खाना खाने और फिर टीवी देखने में जो खुशी है उसे शब्दों में सागर तक पहुंचा नहीं पाई। हर बात को बड़ी आसानी से काट देना सागर की बुनियादी आदत है। सागर के रिटायर होने में तीन ही साल बाकी हैं फिर भी सागर की आदतों में, उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया।
एक दिन सागर को लगा कि इस मामले को लेकर ललिता कुछ ज्यादा ही नाराज है। तो टेनिस खेलने न जाकर घर पर रह गया। थोड़ी देर टीवी देखता रहा। फिर चैनल पर चैनल बदलता रहा और बीच-बीच में ललिता की तरफ देखता रहा। लेकिन ललिता चुपचाप अपने काम में लगी रही।
‘हमेशा शोर मचाती रहती हो कि मैं घर पर नहीं रहता हूँ। लो, आज तो मैं घर पर ही हूँ। अब बोलो कि मुझे करना क्या है? एक-दूसरे का चेहरा देखने के बजाय दूसरा काम हो तो बोलो।’ ललिता खामोश रह गई।
इतने में फोन की घंटी बजी, तो सागर मुस्कराते हुए बात करने लगा – ‘अरे यार! ऐसा कुछ नहीं है। तबीयत तो बिलकुल ठीक है और मैं बिलकुल फिट हूँ। घर पर छोटा-सा काम था तो नहीं आ पाया। और … क्या हो रहा है? क्या हमारी पूरी टीम आ गई? ओह श्योर। कल जरूर आ जाऊंगा।’ यह पूरी बातचीत उधर ललिता भी सुन रही है और समझ भी रही है कि सागर ये बातें फोन पर अपने दोस्त को कम ललिता को अधिक सुना रहा है।
‘प्रसाद का फोन था। एक दिन मेरे न जाने से उन लोगों को बेचैनी हो रही है। पहले बताया नहीं न! इसीलिए परेशान हो रहे हैं। उनको लगा कि मेरी तबीयत खराब है। घबराकर फोन किया। तुम तो घर पर रहने के लिए कहती हो, लेकिन आगे नहीं बताती कि घर पर रहकर मुझे करना क्या है?’ उसकी आवाज में चिड़चिड़ापन था। उसके बाद ललिता ने न कभी सागर को घर पर रुकने के लिए कहा और न ही वह रुका।
रोज स्कूल से लौटना, समय काटने के लिए टीवी के सामने बैठकर एक के बाद एक प्रोग्राम देखते रहना, दो निवाले खाना … बस। देखते-देखते जिंदगी के प्रति ललिता को एक वितृष्णा-सी हो गई। वह वितृष्णा धीरे-धीरे उसके मन और स्वास्थ्य पर भी छाने लगी। इससे पहले सागर के घर पहुंचते ही दिनभर की स्कूल की सारी घटनाएं एक-एक कर बताया करती थी। लेकिन अब वह मौन की शरण में चली गई है। कुछ बताने से पहले ही उसके दिमाग में यह बात उठती कि चलो अब न भी बताऊं तो क्या होनेवाला है? … क्या फर्क पड़नेवाला है और ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटनेवाला है? टेनिस से लौटकर थोड़ी देर सेलफोन और थोड़ी देर कंप्यूटर के साथ समय बितानेवाले सागर को इन सबका कोई एहसास ही नहीं हुआ। काफी पहले ही सागर समझ गया कि समय काटने का अच्छा साथी कंप्यूटर ही है। उससे तो न मनमुटाव और न ही तर्क-वितर्क। वह जो भी बोले, कंप्यूटर सुन लेता है और सबसे बड़ी बात कि उल्टा सवाल नहीं करता है। हां में हां मिलाता है और न में न। इसीलिए ललिता एक तरह से अकेली जिंदगी जीने की आदी हो गई है और सागर ने ऑफिस, टेनिस और कंप्यूटर को ही अपनी जिंदगी बना लिया है।
टीवी को विराम देकर चावल चढ़ाने गई तो देखा कि चावल का डिब्बा खाली है। उसे लगा कि मानो डिब्बा उसको देखकर ठहाका लगा रहा हो। चावल लाने के लिए वह चार दिन से कहती रही और वह सुबह-शाम कहकर टालता रहा। आज सुबह भी स्कूल जाते समय बोलकर गई कि चावल बिलकुल खत्म हो गया है, शाम को याद से ले आना। सागर को बताकर वह भी चावल की बात भूल गई। अब यही सोचते हुए चारों ओर ढूंढ़ने लगी कि शायद लाकर कहीं रखा होगा। लेकिन लाया हो तब न। एक ओर भूख और दूसरी ओर गुस्से से ललिता का दिमाग एकदम भड़क उठा। दिल में लाल-लाल लावे का फव्वारा छूटने लगा। एक अस्पष्ट चीख। लेकिन उस समय सभी पड़ोसियों के घर टीवी सीरियलों में डूबे उनके आंसू से भीगते या प्रतिकार की ज्वालाओं से भड़कते रहते हैं। सो ललिता की चीख खामोशी में ही खो गई। उसने चावल के डिब्बे को एक लात मारी तो फिर से पेट के अंदर कुछ अटका-सा लगा।
झुककर बरतन उठाने लगी। पेट में फिर कुछ अटक गया-सा … लगने लगा कि पेट में कोई चीज है जो इधर-उधर घूम रही है। बरतन उठाना छोड़कर फ्रिज में देखने लगी कि खाने के लिए कुछ मिल जाए। दो केले खाने के बाद भूख थोड़ी शांत हुई।
स्कूली बच्चों की तरह सागर को भी होमवर्क देना पड़ता है। जो काम जितना बोलो, उतना ही करता है। सब्जियां लाने के लिए कहें तो लाता है, सामान लाने के लिए कहें तो लाता है। वह भी मानो ऐसे कि बस ललिता के लिए कर रहा हो। उसके व्यवहार से कहीं ऐसा नहीं लगता है कि वह अपने घर के लिए कर रहा है। ललिता मन ही मन कोसती रहती कि बिना बोले यह क्यों नहीं करता? क्या यह उसका घर नहीं है? इतनी भी समझ नहीं तो कैसे चलेगा? बच्चों को होमवर्क देना तो ठीक है, लेकिन रोज-रोज पति को होमवर्क देना शायद ही किसी पत्नी को अच्छा लगता हो।
एक बार स्टॉफ रूम में साथी टीचर कुछ परेशान-सी लग रही थी। आंसू बहाती जा रही थी। जरा सांत्वना देते हुए पूछा तो रो पड़ी कि ‘आपका क्या है मैडम, सागर जी न दारू पीते हैं और न ही सिगरेट। पान तक नहीं खाते। ऐसा पति मिलना भाग्य की बात है। आप जैसों को हमारे दुख-दर्द समझ में नहीं आते।’ न केवल वनजा बल्कि कई लोग यही कहते रहते हैं। मानो दारू, सिगरेट ही लत हैं और इनके बिना आदमी अच्छा माना जाता है। सभी को लगता है कि ऐसे मर्दों की पत्नियां खुशियों में डुबकियां लेती रहती हैं। लेकिन उनको नहीं मालूम कि गैर-जिम्मेदार पति उन सबसे ज्यादा तकलीफ़ दे सकता है… परेशान कर सकता है।
बच्चों के साथ भी यही हुआ। बस… जैसे-तैसे बड़े हो गए। उनकी खुशनसीबी कि नौकरियां मिल गईं और शादियां भी हो गईं। जब घर बन रहा था, तब भी बहुत चिढ़ा हुआ रहता था। बार-बार कहता था, ‘अब घर न बने तो क्या हर्ज है? अच्छे घर में ही तो रह रहे हैं न।’ धीरे-धीरे ललिता को समझ में आने लगा कि सागर जिम्मेदारियों से डरता है। उसे डर है कि इन जिम्मेदारियों के चलते अपने रोजाना के कामकाज, सैर-सपाटे आदि में कोई बाधा न पड़ जाए। उसका मन करता है कि पूरी जिंदगी एक पिकनिक की तरह गुज़र जाए। लेकिन जिंदगी पिकनिक तो नहीं है न! तरह-तरह की जिम्मेदारियां और उतार-चढ़ाव तो रहते ही हैं जिंदगी में। ललिता को समझ में आ गया कि सागर को किसी भी चीज की पूरी जिम्मेदारी लेना पसंद नहीं है। धीरे-धीरे उसे यह भी समझ में आ गया कि बात पसंद की नहीं, बल्कि वह जिम्मेदारी ले ही नहीं सकता है। वह जिम्मेदारी लेने के काबिल ही नहीं है। दुनियादारी नहीं जानता है, फाइनेंशियल मैनेजमेंट नहीं कर सकता है, यह भी नहीं मालूम कि कौन-सा काम कब करें। इस तरह की गैर-जिम्मेदारी और उसके परिणाम को तरह-तरह के रूपों में देखकर ललिता ऊब गई।
अकसर माना जाता है कि जो काम नहीं कर पाए वह असमर्थ है और जो जिम्मेदारी लेकर काम कर सके, वह समर्थ है। लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते में तो गंगा उल्टी बहती है। पति कुछ काम नहीं कर पाता है और जिम्मेदारी नहीं लेता है तो उसे भलमानुस माना जाता है और जब पत्नी सभी काम संभालती है और जिम्मेदारी लेती है तो वह कर्कशा मानी जाती है। इस तरह लोगों की नजर में सागर अच्छा आदमी है।
ललिता की नानी हमेशा कहती थी, ‘गैर-जिम्मेदार पति आखिरकार पत्नी के पेट में घाव बनकर निकलता है।’
ललिता ने एक बार पूछा, ‘नानी! ऐसा क्यों?’
नानी ने समझाया, ‘इस तरह के गैर-जिम्मेदार पति को अपने कंधों पर ढो-ढोकर, घर की चिंताओं को अपने ही पेट में छुपा-छुपाकर घाव न बने तो और क्या बनेगा रे पगली।’
ललिता के नाना बिलकुल अनाड़ी थे। इस अनाड़ीपन का फायदा उठाते हुए उनके भाइयों ने जमीन-जायदाद के मामले में उन्हें धोखा दिया। उन्होंने इनके हिस्से में ऊसर जमीन थमा दी। इसलिए नानी ही पूरा काम संभालती थी। हर रोज नाना को खेत में काम करने के लिए होमवर्क देती थी। खाली होमवर्क देना नहीं, बल्कि साथ में खड़े होकर काम कराती भी थी। इसीलिए तो चारों के चारों बच्चों की जिंदगियां बन पाईं।
ललिता हमेशा नानी से पूछा करती कि फिर तुम्हारे साथ तो ऐसा कुछ हुआ नहीं। तुम तो ठीक हो।
‘मेरी बात अलग है। मैं स्वयंसिद्धा हूँ। तुम्हारे नाना अनाड़ी हैं, यह बात छुपाकर उनसे मेरी शादी कर दी गई। मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारे नाना कुछ कर नहीं सकते हैं। इसलिए मैंने उनसे कुछ अपेक्षा नहीं की। सारे काम मैं खुद संभाल लेती थी। किसी से कुछ अपेक्षा न रखें तो चिंता किस बात की? लेकिन तुम्हारी मां के साथ स्थिति अलग रही। वह हमेशा अपेक्षा रखती थी कि तुम्हारे पिता कुछ करें। लेकिन वह सपना तो कभी पूरा हुआ नहीं। वही चिंता पेट में घाव बन गई। और बस, वह इस दुनिया से चली गई।
ललिता के पिता बिलकुल बड़बोले थे। देश की राजनीति के बारे में तो घंटों लगातार बात करते थे, लेकिन दुनियादारी का कोई काम करना हो तो उनको पसीना छूटता था। देश के किसी भी कोने में कुछ भी हो रहा हो उनको चिंता होती थी, लेकिन घर में क्या हो रहा है, इसकी उनको खबर तक नहीं रहती थी।
ललिता की मां भी अपने पति को होमवर्क देती थी। कुछ काम करना हो तो कैसे करना है, कैसे बात करनी है, क्या बात करनी है – सब दस बार समझा कर भेजती थी। उनके लौटने तक इंतज़ार करती थी। लेकिन वे कभी होमवर्क सही-सही और पूरा नहीं करते थे। हर काम आधा-अधूरा ही करते थे। हमेशा इसकी असंतुष्टि मां के चेहरे पर झलकती थी। ललिता की नानी हमेशा चिंतित होते हुए कहती थीं, ‘समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसे पति के साथ तुम्हारी मां कैसे संभालेगी और बेटियों की जिंदगियां कैसे बनाएगी?’
फूफियां, चाचियां, मौसियां – ललिता इन सबकी जिंदगियां नजदीक से देखते हुए ही बड़ी हुई। उस क्रम में ललिता को एक बात समझ में आई कि किसी भी घर के टिकने का कारण पतियों की दक्षता नहीं, बल्कि पत्नियों की दक्षता ही है। चाहे पति जैसा भी हो, पत्नी यदि होशियार है तो वह घर टिकता है। यदि पत्नी काबिल नहीं तो वह घर नहीं टिकता।
कॉलेज के समय ललिता के फिजिक्स लेक्चरर बड़े खुशमिज़ाज व्यक्ति थे। प्रैक्टिकल के समय लैब में सब के साथ बातें करते हुए कहते थे कि देखो बच्चों, पति थियरी जैसा है तो पत्नी प्रैक्टिकल जैसी। इसीलिए प्रैक्टिकल में हमेशा लड़कियां ही अव्वल रहती हैं। ललिता हमेशा सोचती थी कि कोई और काम तो सिखा सकते हैं लेकिन जिम्मेदारी कैसे सिखाएं। इसे कौन-से स्कूल में सिखाया जाता है? सबसे पहले तो हम जो काम कर रहे हैं, उसमें रुचि होनी चाहिए। जीवन और अपने आसपास के लोगों के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए। उसी से एक तरीका बनता है कि कौन-सा काम कैसे किया जाए। हर काम को बेकार मानते चले जाएं तो एक भी काम ऐसा नहीं बचता जो काम का हो। जो व्यक्ति घर के काम न आए, वह अपने आपके भी क्या काम आएगा? समाज के किस काम आएगा?
साल भर पहले ललिता को लगा कि पेट में कुछ असुविधा है। बेचैनी-सी हो रही है। ऐसा लग रहा है कि पेट में पत्थर जैसी कोई चीज घूम रही है। डॉक्टर ने कहा कि हो सकता है अल्सर हो। लेकिन तब ललिता ने बताया कि उसे ऐसी कोई समस्या नहीं हैं। बस! कोई समस्या है तो यही कि सागर, घर की जिम्मेदारी नहीं लेता है। तब डॉक्टर ने बताया-
‘किसी भी चीज को मानो तो समस्या है। उसे देखकर हँसना सीखिए। तब वह समस्या नहीं लगती।’
तब से ललिता हँसती ही रही। हँस-हँस कर ही थकती रही।
एक दिन लंदन से बेटी का फोन आया। वेबकैम ऑन है। बेटी घर में इधर-उधर घूमते हुए घर का काम कर रही है। गुस्से से उसका चेहरा तमतमा रहा है।
‘माँ, अब मुश्किल है इनसे। मुझसे नहीं होगा। एक भी काम ठीक से करना नहीं आता है इन्हें। सारे काम मुझे अकेले ही करने हैं। ये किसी काम के नहीं हैं। ज़रा-सी मदद भी नहीं मिलती इनसे। यहां तो नौकर भी नहीं मिलते। सारा काम अकेले दम पर करना है। इंडिया में कम से कम नौकर तो मिल जाते हैं। यहां भी इंडिया से आए ऐसे कितने ही पति हैं जो घर के कामकाज संभालते हैं। एक ये हैं जो घर की जिम्मेदारियों से कोसों दूर रहते हैं।’ कहती जा रही है।
ललिता हँसते-हँसते रुक गई। अपनी विरासत लेने के लिए बेटी तैयार है। चार पीढ़ियों की इस रिले में बेटी मेरे हाथ से मशाल लेने जा रही है। लेकिन पता नहीं क्यों, ललिता हमेशा की तरह इस बार हँस नहीं पाई।
संपर्क :जी लक्ष्मीः मो.9490735322
संपर्क: डॉ. वी एल नरसिंहम शिवकोटि सहायक प्रबंधक (मा.सं.-राजभाषा), भारत डायनामिक्स लिमिटेड (रक्षा मंत्रालय), कंचनबाग, हैदराबाद-50058. तेलंगाना, मो. 8247069811

