जिंदगी के पचास साल राजनीति में गुजार देने के बाद उनका अंतिम समय आ चुका था।

‘पिता जी की सांसें अटक रही हैं …शायद इनकी कोई अंतिम इच्छा है, जो कहना चाह रहे हैं किंतु कह नहीं पा रहे हैं।’ बड़े बेटे ने कहा।

‘भैया आप ही समझो, क्योंकि आप भी राजनीति में हैं और मैंने तो सुना है कि एक नेता पुत्र  ..अपने नेता पिता की अंतिम इच्छा कुछ जल्दी ही समझ लेता है।’ छोटे ने कहा।

‘मैं समझ तो रहा हूँ, किंतु तुमको बताऊंगा तो शायद तुम इंकार कर दो..।’ बड़े ने गंभीरता से कहा।

‘बताओ तो सही… पिता जी की ऐसी कौन-सी अंतिम इच्छा है, जिसे मैं ही पूरा कर सकता हूँ?’ छोटे ने घड़ी की तरफ देखते हुए पूछा।

‘पिता जी कहना चाह रहे हैं कि इनके चले जाने के बाद उपचुनाव तुम लड़ो… ये खानदानी सीट किसी और के पास नहीं जानी चाहिए।’ बड़े ने समझाते हुए कहा!

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