वरिष्ठ कवि।अद्यतन कविता संग्रह मुड़ कर देखता है जीवन

विश्वास

दिखाई नहीं देता
महसूस होता है
किया जाता है विश्वास
मुझ पर कम ही ने किया
मैंने मित्रों पर ही नहीं
परिचितों पर भी किया विश्वास

किसी के चेहरे पर
लिखा नहीं होता फिर भी
चेहरा पढ़ कर किया जाता है विश्वास
अधिकांश चेहरों पर
बुनावट समझ नहीं आती
हर चेहरे पर चढ़ा होता है
एक और चेहरा

मैं किसी पर विश्वासघात का
आरोप नहीं लगा सकता
दरअसल मुझसे ही अक्सर
चेहरा पढ़ने में भूल होती है
कुछ में होता है आत्मविश्वास
कुछ में अतिविश्वास
मुझे स्वयं पर कभी
नहीं रहा विश्वास।

मन की बात

मैं किसी से अपने
मन की बात
नहीं कह सकता
हर समय मेरे
मन में क्या-क्या
चलता रहता है
कैसी-कैसी बातें
सोचता रहता हूँ
कुछ अच्छी कुछ बुरी
आशंकाओं से घिरी बातें
अपनों के लिए
दोस्तों के लिए
दुश्मनों के लिए
मेरे मन में क्या है
कह नहीं सकता

यदि मैं अपने मन की बात
कहने लगूं बताने लगूं
सारा जमाना मेरा
दुश्मन हो जाएगा
मेरा चरित्र
उजागर हो जाएगा

मन की बात
मन ही में ही रखता हूँ
मैं वही बात करता हूँ
जो सबको अच्छी लगे
मन की बात के बहाने
जग की बात करता हूँ।

भम्र – विभम्र

इन दिनों भम्र – विभम्र
साथ रहते हैं मेरे
मुझे महसूस होता है
एक साया
जो मेरा साया नहीं है
पीठ पीछे उसके होने का
अहसास बना रहता है
अंधेरे में किसी के
सांस लेने की
आवाज सुनाई देती है
नीम रोशनी में दीवारों पर
बनती – बिगड़ती आकृतियों में
सांप – बिच्छू, छिपकलियां
दिखाई देती हैं मुझे
चिकित्सक कहते हैं
भ्रम है बढ़ती उम्र का असर
कम सोचें चिंता न करें
खुली-अधखुली आंखों में
नींद मंडराती रहती है
परिजन कहते हैं
तुम सोते क्यों नहीं हो
मैं कहता हूँ
मैं जागा ही कब था।

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