गुजराती कविनाटककार।तीन कविता संग्रह और तीन नाटक प्रकाशित।

संकट गहरा रहा है

आप कविता के
कविता बने रहने पर
बहुआयामी बहस कर रहे हैं
और यहाँ
इनसान के इनसान बने रहने पर
अनेकानेक प्रश्नचिह्न लग रहे हैं
संकट गहरा रहा है
संकट इसलिए भी गहरा रहा है
क्योंकि वह लकड़ी का गट्ठर खुल चुका है
जो हमारे पुरखों ने बांधा था भरोसे की डोर से
हमने अपनापे के सारे किवाड़
रिश्तों की खिड़कियां
यहां तक कि बातचीत के रोशनदान भी
बंद कर लिए हैं
और अब सर से पांव तक
अपनी ही घुटन में धंसे जा रहे हैं
बुदबुदा रहे हैं- संकट गहरा रहा है
क्यों न गहराता संकट
जब हम ही खाली हाथ लौटा रहे थे
संभावनाओं से भरे समय को!
संकट गहराता ही
क्योंकि हम नहीं चाहते थे
कि अहंकार की चट्टान टूटे
और स्वाभिमान के रास्ते खुलें
जो चाह रहे थे
वह अपने ही हाथों गवां रहे थे
और रट रहे थे- संकट गहरा रहा है
रीढ़ की हड्डी
जूझने का साहस
भीतर की चकमक
इन तीन रसायनों से हमने
बचाया है बहुत कुछ
रचाया भी है
और तीनों
हमारे रोजमर्रा समझौते के एवज में
लगातार हमसे छीने जा रहे हैं
इसलिए संकट और और और गहरा रहा है।

किराए की आवाजें

बड़ी जानदार शानदार रोबदार होती हैं
किराए की आवाजें
सत्ता के गलियारों में ऊपर तक होती है
उनकी पहुँच
जनजीवन के चौबारों पर भी
गहरा होता है उनका प्रभाव
किराए की आवाजें
तख्तनशीनों के लिए होती हैं
आला दर्जे की शराब
साधारण जन के लिए
वे रचती रहती हैं सुहाने ख़्वाब
किराए की आवाजें
जागे हुए लोगों को डराती हैं
मुखबिरों की तरह
अपने आकाओं को उनका पता बताती हैं
किराए की आवाजें
सच के मारे जाने पर
ढोल-नगाड़े बजाती हैं
झूठ का पर्दाफाश होने पर
उसके बचाव में उतर आती हैं
वे उन पालतू कुत्तों जैसी होती हैं
जो मालिक के तलुवे चाटते हैं
और मुहल्ले में आए गरीब को काटती हैं
हालांकि एक सच यह भी है
कि जब किराए की आवाजें
समूची जमीन पर कब्जा कर लेती हैं
तब भीतर के लावा की तरह
अवाम का जमीर खौलता है
बड़े बुजुर्ग कवि
शायद इसी अवस्था को क्रांति कहते हैं
जिसका सबब होती हैं किराए की आवाजें।

ग़लतियों से रू-ब-रू हो रहे हैं

ग़लतियों से रूबरू हो रहे हैं
सीना आंसुओं से भीग रहा है
आंखें पोंछ रही हैं भुजाएं
अपने ही पांव तले पड़ी हैं पगड़ियां
गलतियों से रू-ब-रू हो रहे हैं।

(स्वयं कवि द्वारा अनूदित)

संपर्क : एच-901, साम्राज्य फ्लैट्स, मानव मंदिर के पास, मेमनगर, अहमदाबाद-380052 मो. 9426245700