चर्चित कथाकार।नौ कविता संग्रह और  कवि का आलोचक’, ‘कविता की प्रार्थनासभा’, ‘कविता का धागा’ (आलोचना) प्रकाशित।संप्रति, बिहार विधान परिषद के प्रकाशन विभाग में।

यह दोपहर जाड़े के दिनों वाला नहीं था, जून के महीने की गर्मी वाला था।आज सड़क पर यहां-वहां फैली हुई धूप खुशनुमा न लगकर कंटीली लग रही थी।लानत है उस डॉक्टर पर, जिसने ऐसे दोपहर में मिलने का वक्त दिया था।वह डॉक्टर, जिसका नाम जयशंकर था, मानसिक रोगियों का इलाज करता था।

‘यह डॉक्टर भी लगता है, खुद भी मानसिक रोग से ग्रस्त है, जिसे अपने मरीजों को कब देखना है, इसका शऊर तक नहीं है।वह अपने मरीजों को सुबह भी बुला सकता था या शाम को, मगर नहीं।मरीजों को दोपहर के वक्त बुलाने का क्या तुक है?’

मैं अभी डॉक्टर के बारे में यह सब सोच ही रहा था कि उसके कैम्पस में लगे छोटे-छोटे पौधों पर मेरी निगाह पड़ी, जिनका रंग लाल था।उन फूलों की सुगंध इतनी अच्छी थी कि मन खुश हो गया था।फूलों को देखकर डॉक्टर के प्रति मेरा ग़ुस्सा जाता रहा था और गर्मी का डरावना एहसास भी।

‘यह कौन-सा फूल है?’ मैंने वहां काम करने वाले एक स्टाफ से पूछा।

‘गुलदुपहरिया।’ उसका छोटा-सा जवाब मिला।

खुदा भी कैसे-कैसे तमाशे दिखाता है।हमको ऐसे कंटीले दोपहर देता है और इससे निजात के लिए सुंदर, मोहक, मन को भाने वाले फूल भी देता है और फूल का नाम क्या होता है- गुलदुपहरिया।

डॉक्टर के पास, वह भी मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टर के पास, आने की खास वजह थी।हुआ यूं कि बारिश के मौसम में एक शाम अधगीले घर के रास्ते लौटा तो वाइफ को खिड़की पर खड़े पाया।वह खिड़की पर खड़ी होकर बादलों को अपने करीब आने की दावत दे रही थी।देखा, बादलों ने मेरी वाइफ की दावत कुबूल कर ली थी।झमाझम बारिश बनकर बादल उसके गालों को छू रहे थे।बादलों को ऐसा करते देख मैं भी फिल्मी हुआ जा रहा था।मैं बारिश में भीगता शाहरुख खान बना वाइफ को ‘अंजली-अंजली’ कहकर पुकारने लगा।पुकार क्या रहा था, लगभग चीख रहा था, ताकि वह मेरी आवाजें सुने और बादलों के रोमांस से ज़हन हटाकर मेरे इस रोमांटिक रूप को देखे।उसे हमेशा इस बात की शिकायत रहती कि मैं एक बोर करने वाला भावुक आदमी हूँ।मेरी अंजली थी कि न मुझे देख रही थी, न मुझे सुन रही थी, न मेरे जोश को समझ रही थी।बस बारिश से खेल रही थी, खिड़की से हाथ बाहर निकाले।मेरा शाहरुख खान बनना बेकार चला गया था।

‘का हो, पगला गए हैं, इस घनघोर बारिश में सांड़ जैसन भीग रहे हैं! घरे जाइए!’ कार में सवार एक अनजान आदमी मुझे चिढ़ाता हुआ गुजर गया।

मैंने तो कार में सवार आदमी की आवाज सुन ली थी।अंजली ने मेरी आवाज क्यों नहीं सुनी? कुछ लोग होते हैं, जिनकी आवाज हमेशा अनसुनी रह जाती है।क्या उन्हीं कुछ लोगों में से मैं भी था? कुछ दिनों से एक बात नोटिस कर रहा था, खुद के बारे में कि मेरा कहा सुना नहीं जा रहा था।दो जन अगर बतिया रहे हों, उस बतियाने में मैं जब शरीक होता था, तब भी मेरा कहा अनकहा रह जाता था।लगता मैं वहां उनके बीच हूँ ही नहीं।मेरी आवाज इतनी दबी, इतनी कमजोर भी न थी कि कोई सुने ही नहीं!

इधरउधर से ध्यान हटाकर मैं सीधे घर के अंदर दाखिल होना चाहता था।ऐसा न हो कोई फिर से मुझे आवारा या लंपट समझ ले, जैसा उस कार वाले ने समझा था।सच कहिए तो दूसरों की फिलिंग से अब किसी को कोई लेनादेना ही नहीं रह गया था।लोगों के बीच से रिश्तों की गरमाई खत्म होती जा रही थी।तभी अब कोई घना रिश्ता बन कहां रहा था।

अब देखिए न भाई लोग, उस कार वाले ने किस हक से सांड़ कह दिया! उसे जरा भी एहसास नहीं हुआ कि उसका यह डायलॉग मुझे कितना आहत करेगा! उसको यह नहीं मालूम कि अगर मैं सचमुच का सांड़ होता तो उसके कार के चिथड़े उड़ा देता।

यह सब सोचते हुए मैं अपने घर की पुरानी सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ सीधे अपने कमरे में जा घुसा।अंजली होगी खिड़की के पास बारिश के पानी से खेलती।उसने बताया था कि ऐसा करना उसे बचपन से पसंद था।उसकी इसी पसंद का ख्याल रखते हुए मैं फिल्मी हो गया था।मैं शाहरुख खान जैसा नहीं था, शाहरुख खान की उम्र का तो था।फिर उस बदमाश कार वाले ने मुझे सांड़ क्यों कहा था? कोई करन जौहर जैसी फिल्में बनाने वाला मुझे अपनी फिल्म में हीरो का किरदार निभाने का ऑफर दे तो सही- आमिर, सलमान, शाहरुख सबकी छुट्टी न कर दूं तो मेरा भी नाम…।मुझे अपने बारे में कोई खुशफहमी नहीं थी।लेकिन हम सकारात्मक सोच तो सकते थे।

‘पापा घर आए, पापा घर आए!’ यह मेरे कमरे से बाहर टंगे मिट्ठू तोते की टांय-टांय थी।उसकी टांय-टांय ने मुझे अपने ही ख्यालों से बाहर निकाल दिया था।अंजली का सिखाया तोता हर बात इस तरह कहता कि आप पकड़ ही न सकेंगे कि यह तोते की आवाज है।मैं खुद को सांड़ कहे जाने से थोड़ा खिझा हुआ था, सो आज मिट्ठू से कुछ कहने का मन ही नहीं किया।वरना क्या मजाल कि मिट्ठू से बिना बतियाए मैं अपने कमरे में दाखिल हो जाऊं।

‘अरे, आप कब घर आए… इतना भीग कैसे गए?’ मिट्ठू की पुकार सुनकर अंजली सीधे मेरे कमरे में चली आई थीं।अंजली का पूरा चेहरा सराबोर था और उसके हाथ भी।

 ‘मैं तो बाहर से आ रहा हूँ।बाहर तेज बारिश हो रही है।तुम तो घर के अंदर थी, फिर तुम्हारा चेहरा क्यों बारिश के पानी से भीगा हुआ है?’ उसके भीगने का कारण मैं जान रहा था, तब भी उससे पूछा ताकि सड़क पर अपने फिल्मी बनने की कथा सुनाने से बचा रह सकूं।

‘आप क्या बड़बड़ करते रहते हैं? आपके मुंह में आवाज नहीं है क्या? आपसे अच्छा तो अपना मिट्ठू है, जिसकी आवाज से पूरा घर रोशन रहता है।’

अंजली की इस डांट ने मुझे विस्मय में डाल दिया था।मैंने पूरी बात कह दी और उसने सुनी ही नहीं।यह चक्कर क्या है? मिट्ठू से तो मैं रोज बातें करता हूँ।मिट्ठू ने तो ऐसी शिकायत नहीं की।फिर मैंने सोचा, ‘कभी-कभी ऐसा होता है।आप किसी से बात कर रहे होते हैं और वह आपको सुन नहीं रहा होता।अंजली के साथ यही हुआ हो।

आज देर तक सोया रहा।मिट्ठू चिल्लाता रहा तब भी।सूरज की धूप खिड़की से होते हुए मेरे चेहरे पर पड़ती रही तब भी।घर के बाहर लगी घंटी बजती रही तब भी।आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था।मैं हमेशा फजर की अजान से पहले बिस्तर से उठ जाता।वजू करने के बाद सीधे मस्जिद की तरफ निकल जाता।मस्जिद से लौटकर अंजली को उठाता।उसके बाद मिट्ठू को।मिट्ठू अपना एक पांव उठाए ऊंघ रहा होता।अंजली तब तक मेरे लिए चाय ले आती।

अंजली और मैं बचपन से गहरे दोस्त थे।अंजली अकेली।मैं अकेला।हमारे शहर में एक दफा दंगा हो गया था।दंगाइयों ने मेरे और अंजली के घर के हर सदस्य को मार डाला था।बस मैं किसी तरह अपने घर से दंगाइयों की निगाहों से बचते-बचाते घर से बाहर निकल आया था।बाहर आया तो देखा शहर जैसे खून के आंसू रो रहा था।अपने रोते हुए शहर के एक एकांत हिस्से में अंजली भी जख्मी हालत में रो रही थी।उस वक्त से लेकर आज तक हम साथ थे।दंगाइयों को चिढ़ाने के लिए हमने सरेबाजार शादी कर ली थी।हमारी शादी के बाद हमें बच्चे न हुए।घर में अंजली थीं, मैं था और हमारा मधुरभाषी तोता था।हमारे घर की जीवंतता इसी में थी।बस मेरी जीवंतता नष्ट होती दिखाई दे रही थी।मेरा कहा न मेरी बीवी तक पहुंचता, न मेरे तोते तक, न मेरे दोस्त-अहबाब तक।ऐसी बात नहीं थी कि मेरी आवाज चली गई थी।मेरे मुंह में मेरी आवाज सलामत थी।बस आवाज फैल नहीं रही थी।मेरे अथक प्रयास के बाद भी नहीं।अचानक मन किया कि आज चाय बाहर चलकर पी आते हैं।

बाहर सब ठीक लगा… आसमां भी, ज़मीं भी, माहौल भी।बस चाय दुकान में लगा टेलीविजन ठीक नहीं लगा, माने टेलीविजन पर दिखाया जाने वाला समाचार ठीक नहीं लगा।न्यूजरीडर बौखलाया बक रहा था, ‘लव जेहाद’ करने वालों की बढ़ेंगी मुश्किलें, ऐसा करने वालों को मिलेगी दस साल की सजा।सरकार ने लिया है आजाद भारत का सबसे अच्छा फैसला।जो देश में सत्तर सालों में नहीं हुआ, अब होगां’

‘खाक लिया है अच्छा फैसला!’

‘बदमाशी की हद है भाई!’

‘हिम्मत है तो पहले उनको न सजा दो, जो सरकार में मंत्री बने हुए लव जेहादी हैं!’

‘राजनीति में बैठे हुए लोग हमको बेवकूफ समझते हैं!’

‘सारी मलाई खुद खा जाते हैं और जनता को कभी लव जेहाद, तो कभी हिजाब, तो कभी खाने-पीने के नाम पर उल्लू बनाते रहते हैं!’

‘अब हम उल्लू नहीं बनेंगे।’

चाय दुकान में चाय पी रहे लोग इस समाचार पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे।चाय दुकान इनकलाबी लोगों से भरी लग रही थी।

‘मीडिया में हर वक्त छाई रहने वाली सरकार ज्यादा अच्छा काम करने वाली है तो बेरोजगारों को रोजगार देने वाला जेहाद छेड़िए न सरकार बाबू, आपको कौन रोके हुए है!’ मैंने भी वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाही।

‘का हो मियांजी, कुछ बोले का?’ चाय की चुसकी लेते आनंद मिश्र ने कहा।मैं बस खामोश रह गया।

मेरा कहा मालूम नहीं फिर कहां गायब हो गया था, शायद उस ब्लैकहोल में, जो संपर्क में आने वाली हर छोटीबड़ी चीज को अपने अंदर अवशोषित कर लेता है।इसका अर्थ यह हुआ कि मेरे आसपास भी कोई ब्लैकहोल जैसा ही कुछ था, जो मेरी आवाज को सोख लेता था।इस कारण मेरा कहा कोई सुन नहीं रहा था इन दिनों न मेरी बीवी, न मेरा तोता, न मेरे आसपास के लोगबाग।

‘ऐसा-वैसा कुछ नहीं है डार्लिंग।’ मैंने खुद से बात की।यह मेरा वहम भर है।मेरा मनोविकार है।मुझे किसी अच्छे डॉक्टर से इस बाबत मिलना चाहिए।मेरी यह बीमारी जल्द गई नहीं तो मैं एक न सुनी जाने वाली आवाज बनकर रह जाऊंगा।

आज मैं डॉक्टर जयशंकर के यहां इसी वजह से था।मेरे शहर में इनसे बढ़िया मनोचिकित्सक कोई दूसरा नहीं था।यहां आकर लगा यह डॉक्टर मनोचिकित्सक न होकर स्वयं मन के किसी रोग से ग्रसित है।ऐसा है, तभी न तीखी धूप के समय मरीजों से मिलता है।यह सब सोचकर मुझे अचानक हँसी आ गई।मेरे इस तरह हँसने पर वहां हाजिर किसी आदमी की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।सबने सोचा होगा कि मैं कोई हँसने वाला मरीज हूँ।यह सोचकर मैं फिर हँसा।बार-बार हँसा।मेरे साथ-साथ गुलदुपहरिया के फूल भी हँस रहे थे।मैंने भी गुलदुपहरिया की हँसी का साथ देने की ठान ली थी।मैं बार-बार हँसता रहा।

‘भाई, कौन यह पागल है, जो इस तरह हँस रहा है मेरे क्लिनिक में आकर?’ यह डॉक्टर जयशंकर की डांट से भरी हुई चिल्लाहट और झल्लाहट थी।

मुझे लगा कि ऐसा भी कोई डॉक्टर होता है भला, जिसको यह बात नहीं पता कि हँसने से ही तो व्याधियां दूर होती हैं।तभी मेरे हँसने भर से मेरी व्याधि दूर हो गई थी।ऐसा था, तभी डॉक्टर तक मेरी हँसी पहुंची भी और सुनी भी गई थी।

मैंने तय किया अब किसी डॉक्टर से नहीं मिलेंगे।डॉक्टरों को फी देने से अच्छा है कि मैं अपने घर भी गुलदुपहरिया के फूल लाकर बागीचे में लगा लूं, जिन फूलों ने मेरे शहर में हुए दंगे के बाद मेरे होंठ से गायब मेरी मुस्कान को वापस लौटा लाए थे।बच्चे न होने का गम भी दूर कर दिया था।

संपर्क :हुसैन कॉलोनी, नोहसा रोड, पूरबी पेट्रोल लेन के नज़दीक, फुलवारी शरीफ़, पटना-801505 मो.9835417537