युवा कवि।विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।

इत्तफाक़

अभी बची हुई थी मेरी दुर्गति
और एक मैं था
जो सोच रहा था कि मर जाऊंगा आसानी से

बचे थे मेरी जिंदगी के सबसे भयावह दिन
मेरा बिलखना सिसकना

मेरे हार मान लेने का जश्न
होना था तीनों लोकों में
मुझे इस क्रूर आधुनिक युग में भी
बंदूक और तोपों की जगह
बिछोह और कलंक के तीर से मरना था!
मेरे सीने से बूंद-बूंद कर रिसना था
मेरी निष्ठा और प्रेम को
मेरी मृत्यु को टाला गया था

मुझे पड़ना था तुम्हारे प्रेम में मेरी प्रिय
और हमारा मिलना कोई इत्तफाक नहीं
बल्कि, कुदरत का रचा
एक नियोजित कार्यक्रम था।

बूढ़ा पेड़

पेड़ बूढ़ा हो चुका था
पहले फलों फिर पशु-पक्षियों
और आखिर में कुछ बचे
सूखे पत्तों ने भी छुड़ा लिया था
उसके हाथों से
अपनी उंगलियों को!
उस बूढ़े पेड़ से तोड़कर
अकसर लाया करती थी मां
उसकी बची-खुची सूखी लकड़ियां
जिससे पकाए जाते थे
हम भाई-बहनों के भोजन

मां उस बूढ़े पेड़ की लकड़ियों
को तोड़ने से पूर्व
उसे सहलाना और गले लगाना नहीं भूलती

और अकसर हमसे कहा करती-
तुम्हें याद रखना है मेरे बच्चो
कि कैसे एक बूढ़े पेड़ ने
अपने बुढ़ापे से
तुम्हें जवान किया है!

निहत्थे का साथी

जब तक लड़ाई बराबरी की नहीं हो जाती
मैं हर हथियारबंद के सामने खड़े
निहत्थे का साथी हूँ
मैं किसी जनसंख्या का हिस्सा नहीं
आदमजाद की अल्पसंख्यक
आबादी हूँ
मैं प्रतिद्वंद्वी की हार को
अपनी जीत मानने से नकारता हूँ
मैं जीवन को परदेशी की नजर से देखता
और मृत्यु को मातृभाषा में पुकारता हूँ!

संपर्क : एफ 316/328, द्वितीय तल, केबल वाली गली, पीएनबी बैंक के पास, लाडो सराय-110030 (नई दिल्ली) मो.8130730527