
हिंदी के वरिष्ठ और चर्चित गजलकार, कथाकार और आलोचक। प्रमुख गजल संग्रह : ‘धूप के हस्ताक्षर’, ‘आंखों में आसमान’, ‘गुफ्तगू अवाम से है’, ‘कागजी कश्तियां बनाता हूँ’ आदि। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘कर्तृत्व समग्र सम्मान-2025’ से सम्मानित।

1.
बूढ़ा माली भी उसे देख के गुस्काया है
नन्हा बालक कोई अमरूद चुरा लाया है
वो कोई दोस्त है और दोस्त पुरानेवाला
बिना दस्तक के मेरे घर में चला आया है
मैंने तो नज़्म मुहब्बत पे लिखी थी यारो
शहरे-मुंसिफ़ को इसी बात पे तैश आया है
ये वो बस्ती है जहां बारिशें होती हैं बहुत
और काग़ज़ का मकां आपने बनवाया है
इस बुढ़ापे में कहां डाल के जाऊं यारो
सूट मैंने जो बड़े शौक से सिलवाया है
कोई करता नहीं विश्वास किसी पर देखो
गेट पर कैमरा सबने यहां लगवाया है
ये जो माहौल में तारी है उदासी जैसे
‘हीर’ को फिर ‘किसी ‘वारिस’ ने यहां गाया है
चंद सिक्के जो पड़े हैं मेरी इस गुल्लक में
ये हक़ीकत है कि मेरा यही सरमाया है।
2.
एक कप चाय बनाई चल पड़े
आंख पर ऐनक लगाई चल पड़े
दूर जाना था स्टेशन की तरफ
एटलस साइकिल उठाई चल पड़े
हैरिसन का लॉक देखा गौर से
और फिर चाबी घुमाई चल पड़े
शर्ट डाली, पेंट पहनी और फिर
पांव की चप्पल उठाई चल पड़े
एक डॉगी को खिलाई रोटियां
पीठ उसकी थपथपाई चल पड़े
हम फ़कीरों का न पूछो दोस्तो
इक फटी छतरी उठाई चल पड़े
एक काग़ज़ में लपेटीं रोटियां
खुश हुए, सीटी बजाई, चल पड़े
आज फिर चिट्ठी लिखी तुझको सनम
और वो चिट्ठी जलाई चल पड़े
मां ने सर पे हाथ फेरा प्यार से
यूं हुई अपनी विदाई चल पड़े।
3.
मैं छत पर बैठकर त्यौहार भी ऐसे मनाता हूँ
मुझे तारे बुलाते हैं, मैं तारों को बुलाता हूँ
मेरे यारो, मेरी औकात का तुम पूछते क्यों हो
शहर में कोई शादी हो, कनातें मैं लगाता हूँ
मुझे खिड़की के बाहर तितलियां नाराज़ लगती हैं
मैं जब भी काग़ज़ी गुलदान कमरे में सजाता हूँ
पुराने लैंप का धुंधला उजाला याद आता है
कि अपने घर के अंदर जब कभी बिजली जलाता हूँ
अचानक ये भी होता है कि आंखें भीग जाती हैं
अचनाक ये भी होता है कि दिनभर मुस्कराता हूँ
मुझे मालूम है ये ग़मज़दा लोगों की बस्ती है
सुनाता हूँ लती़फे, उनको मैं हँसना सिखाता हूँ
बहुत मज़बूत दिल हूँ दोस्तो, मेरी न पूछो तुम!
कसे जब फ़ब्तियां कोई तो मैं भी टूट जाता हूँ।
4.
मेरे उलझे हुए हालात में क्या रखा है
छोड़िए दोस्तो, इस बात में क्या रक्खा है
न कोई हाथ मिलाता है न मिलता है गले
दोस्तो, ऐसी मुलाकात में क्या रक्खा है
मूलधन की तो कभी सूद की बातें तेरी
ऐ महाजन, तेरे जज़्बात में क्या रक्खा है
डर गए कांच के दरवाज़े तेरे आने पर
सच बता दे कि तेरे हाथ में क्या रक्खा है
चांद आता है टहलने मेरे घर की छत पर
मुझसे तू पूछ मेरी रात में क्या रक्खा है
बात तो वो है जो शायर की ज़बां लगती हो
व्याकरण जैसी जटिल बात में क्या रक्खा है
संपर्क:1875 सेक्टर-6, बहादुरगढ़-124507हरियाणा मो. 9813491654

मुझे खिड़की के बाहर तितलियां नाराज़ लगती हैं
मैं जब भी काग़ज़ी गुलदान कमरे में सजाता हूँ. Wah bahut khoob.
बहुत खूब । साधुवाद ।