ज्ञानरंजन सामूहिक कार्य की महत्ता समझते थे

हमलोग विशिष्ट लोग नहीं हैं। सामान्य लोग हैं। लेकिन मेहनत और ईमानदारी से काम करके कुछ अच्छे काम कर सकते हैं। सबसे अधिक जरूरी है कि हम निर्भीक हों और जहां तक हो सके वह करें जिससे समय का सदुपयोग हो और कुछ बेहतर करने की दिशा में वह काम में सहायक हो।

हमलोग अधिकतर ऐसे कामों में उलझ जाते हैं जिन्हें न करने से भी कोई नुकसान नहीं। किसी के चले जाने के बाद इतना शोक प्रकट करते हैं, मानो वह बहुत नजदीक का आदमी हो। हर जगह शोक प्रकट करने की औपचारिकता दिखलाई पड़ती है!

ज्ञानरंजन को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब उनके जीवन से सीख लेंगे। वे ‘पहल’ पत्रिका निकालते थे। कई चुनौतियों का सामना करते हुए वे इसे एक बड़ा मंच बना सके। उनके प्रयासों में इस बात का भी उल्लेख हो सकता है कि वे बहुत उच्च कोटि के कथाकार थे और संपादक के दायित्व को उन्होंने इतनी गंभीरता से लिया कि उनका कहानी लिखना ही बंद हो गया।

हमलोगों से बहुत बातचीत की थी उन्होंने। उनके कई पत्र मेरे पास आए थे। वे पत्र भी बड़े मन से लिखते थे। फोन पर उनसे बातचीत करने पर आपको यह महसूस होगा कि वे आपको नजदीक से जानते हैं। मैंने उन्हें कभी पत्र का उत्तर नहीं दिया। एक भी आलेख नहीं भेजा। बस एक बार उनके अनुरोध पर रविभूषण जी की किताब की समीक्षा लिखी, क्योंकि और कोई तैयार नहीं था। 

मुझे यह समझ में आ गया था कि वे उस युग के साहित्यकार हैं जो हमारे समय की चीजों को अपने नजरिए से ही देख-समझ सकता है। कितना भी अच्छा लेखक या विद्वान क्यों न हो वह अपने युग का ही होता है। उससे सीखकर अपने-अपने समय की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना आपकी अपनी जिम्मेदारी होती है।

‘पहल’ को पढ़कर हजारों लोगों ने अपने को संवारा है। हम भी लगातार उसे खरीदकर पढ़ते रहे। कोलकाता में जब ‘पहल’ का आयोजन हुआ तो हमलोग स्थानीय आयोजक थे। रुकने की व्यवस्था से लेकर कुछ अन्य प्रकार के सहयोग में हमलोगों की भूमिका थी। एक कारण यह भी था कि सम्मानित होने वाले आलोक धन्वा थे जिनसे उन दिनों हमलोगों की काफी नजदीकी थी।

कई बार साथ बैठे, लेकिन यह बहुत साफ था कि ज्ञान जी हमारी पीढ़ी से मिल-जुल और  घुल-मिल सकते थे लेकिन उनके विचारों के साथ हमलोग तालमेल नहीं बैठा सकते थे। उनसे सीखा जा सकता था, लेकिन उनके साथ चलना समय के साथ तालमेल बैठाना नहीं होता।

आज जब ज्ञानरंजन जी नहीं रहे, उनके साथ के लोगों के उनसे लगाव के कारण उत्पन्न हुई रिक्तता को समझ सकता हूँ। कर्मेंदु शिशिर, ममता कालिया, शंभुनाथ, विजय कुमार और बहुत सारे अन्य लोगों के साथ उनकी नजदीकी से परिचित हूँ। लेकिन यह नहीं कह सकता कि जो लोग उनके जाने के बाद उनकी प्रशंसा में इतना कुछ लिख रहे हैं, वे उनकी विरासत से अपने को कितना जोड़कर अपने को रखने में लगे हैं।

ज्ञानरंजन 89 साल तक जिए और सक्रिय रहे। अंजुम शर्मा के साथ उनकी बातचीत को सुना था। उसको सुनकर यह तो लगा ही था कि जिजीविषा उनकी अंत तक रही। यह दुर्लभ है। लेकिन ज्ञानरंजन के प्रति जो आदर है उसे हमेें बौद्धिक धरातल पर दिखलाना चाहिए। हम मंच नहीं बचा पा रहे हैं, पत्रिकाएं मर रही हैं, बौद्धिक सामूहिकता के साथ चलने के बजाए अकेले-अकेले चलने का अभ्यास अधिक सुविधाजनक लग रहा है।

ज्ञानरंजन जिस पीढ़ी के थे उसके पास स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्र भारत दोनों की स्मृतियां थीं। आज के युवा लोग स्वतंत्रता आंदोलन और स्वाधीनोत्तर भारत निर्माण के स्वप्न से कोसों दूर निकल आए हैं।

आज ज्ञानरंजन को अपने पास रखने के लिए उनके लिखे और किए को कैसे प्रस्तुत किया जाए ताकि उन्हें इस समय जीवित रखा जा सके, इसका ध्यान रखना होगा।

ज्ञानरंजन बहुत जीवंत व्यक्तित्व थे। सामूहिक कार्य की महत्ता को समझते थे। लघु पत्रिका आंदोलन के महत्व को समझते थे। पूरे देश में उनके दोस्तों को आप पाएंगे।

क्या वह नेटवर्क अपनी अगली पीढ़ी के बीच ज्ञानरंजन के स्वप्न को जोड़ने की कोशिश करेगा? या लोग ज्ञान जी से हमारा कितना गहरा रिश्ता था यह बताने या दिखाने में ही लगे रहेंगे- यह देखना होगा।

हितेंद्र पटेल