मत-मतांतर

 
वागर्थ के नए वेब एडिशन में आपका स्वागत है. कृपया हमसे जुड़ें और अपने अनुभव साझा करें. चुनिंदा प्रतिक्रियाओं को हम पत्रिका में प्रकाशित करेंगे.

एक नई सोच, संकल्पना और सृजनधर्मिता

समर कुमार

सहायक संपादक, लोक सभा सचिवालय (दिल्ली)

‘वागर्थ’ का डिजिटल अंक देखा। बड़ा सुकून मिला। अक्टूबर और नवंबर अंक में मल्टीमीडिया की शुरुआत हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता में डिजिटल प्रयोगधर्मिता की एक बेहतरीन और शानदार शुरुआत है। इसके अंतर्गत “अनहद1-केदारनाथ सिंह”  पर स्क्रिप्ट काफी अच्छी लगी। विश्व दृष्टि के अंतर्गत लुइस ग्लूक विषयक आलेख की भाषा-शैली कई बार दोबारा पढ़ने के लिए विवश करती है! दरअसल साहित्य में मेरी गहरी आस्था है और मेरा विश्वास है कि पल-पल मरती संवेदनशीलता को स्वस्थ साहित्य ही बचा सकता है।डिजिटल क्रांति के इस दौर में दृश्य, कथ्य और भाव-सम्प्रेषण को लेकर तैयार किया गया यह मल्टीमीडिया अंक एक अभिनव और अनूठा प्रयोग है। सच तो यह है कि प्रौद्योगिकी किसी भी विधा को समृद्ध करती है और उसके रचना संसार के फलक को बड़ा बनाती है। हम बहुत लंबे समय तक साहित्य को कागज के पन्नों पर देखने, समझने और पढ़ने के आदी रहे हैं। लेकिन एक नई सोच, संकल्पना और सृजनधर्मिता को जब हम डिजिटल फॉर्मेट में देखते हैं तो यह रोमांच पैदा करता है! यह स्वप्न से यथार्थ  की अंतर्यात्रा की एक बेहतरीन खोज है।

रमेश अनुपम, कानपुर 
1952rameshanupam@gmail.com

हमने इस समय सचमुच अपने भीतर का बहुत कुछ खो दिया है। इस अंक में शंकरानंद और कविता सिंह की कविताएं अलग से ध्यान खींचती है। लुईस ग्लूक की छह कविताएं इस अंक की विशेष उपलब्धि हैं। उपमा ऋचा ने इसका सुंदर अनुवाद किया है। नंदकिशोर नवल पर भारत भारद्वाज ने बहुत सुंदर संस्मरण लिखा है। कुल मिलाकर वागर्थ का यह नवंबर अंक भी बहुत सुंदर है। इसके लिए आप और पूरी संपादकीय टीम बधाई के पात्र हैं।

सौरभ मिश्रा
saurabh8563@gmail.com

वागर्थ के नए वेब एडिशन का स्वागत है. समकालीन हिन्दी कविता में नए और सार्थक बिंबों का प्रयोग अपने-आप में एक जटिल कार्य है। नवम्बर अंक की सभी कविताएं अच्छी लगीं, लेकिन लक्ष्मण प्रसाद जी की कविता ख़ासतौर पर मन को छू गई. कवि को साधुवाद है, कि उन्होंने बिंबों का सधा प्रयोग करके कविता को यथार्थ बोध का पर्याय बना दिया है।

जिंदगी कहीं चुपचाप किसी कोने में दुबक गई है।

डॉ सुजाता चौधरी
sujatacoudhary@hotmail.com

छोटी जगहों में जहाँ वागर्थ नहीं पहुँच पाती थी।डाक से आने जाने में इधर उधर गुम हो जाने का भय होता था।अब उनसे मुक्ति मिल जाएगी ।परन्तु हाथ में पत्रिका लेकर उलटने पलटने से लेकर पढ़ने के आनन्द से वंचित होने का मलाल होना भी स्वाभाविक है। इस बार पत्रिका उस कटुसत्य को प्रस्तुत करती मालूम हो रही है,जो आज हमारे जीवन में विषवेल की तरह फैल गया है। आदमी को आदमी से डर लगने लगा है।  जिंदगी कहीं चुपचाप किसी कोने में दुबक गई है। स्त्रियों के प्रति असंवेदनशीलता का आलम किस कदर बढ़ता जा रहा है,यह महसूस करने के लिए सूक्ष्म दृष्टि की कोई आवश्यकता नहीं। लुइस ग्लूक की कविता हम पाठकों तक पहुंचाने के लिए साधुवाद। ऐसी प्रतीति हो रही थी,मानो स्वयं लुइस ग्लूक से ही कविता पाठ सुन रही हूं। दृश्य के साथ स्वर का तालमेल बहुत सुंदर लगा।
2020 शिक्षा नीति कॉरपोरेट दुनिया के लिए आदर्श श्रमिक बनाने की कवायद करती दिखाई पड़ रही है। इस बार की बहस ने बहुत सरलतापूर्वक क्लिष्ट शिक्षा नीति को सामने रखा है। बहुत आभार इन विषयों पर आलेख पढ़वाने के लिए।

संतोष कुमार
skbhuhindi@gmail.com

जब पूरी दुनिया अपनी श्रेष्ठता की स्वांग रच रही हो, ऐसे में एक कवि का कहना, ‘ कि मैं जहाँ भी जाता हूँ, एक स्याहपन साथ लिए जाता हूँ’ खुद की जबाबदेही को इमानदारी पूर्वक स्वीकारने जैसा है ! जिसे लेखक बचा देखना चाहता है! बहरहाल.. कवि लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता को बेहतरीन कविता के लिए.. साधुवाद!

वेद प्रकाश आर्य
vedparya1965@gmail.com

नवम्बर अंक में युवा कवि और शोधार्थी परमिंदर यादव की कविता ‘जो मनुष्य नहीं होते’ अच्छी लगी. गहन, चिंतनपरक शब्द संयोजन के लिए बधाई लेकिन मुझे लगता है कि कविता में कवि यह लिखना भूल गया है जो मनुष्य नहीं होते वे सत्ता के शीर्ष पर होते हैं. वे दिखते तो मनुष्य जैसे हैं परंतु मनुष्य नहीं होते.